विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1111, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०८४ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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भक्षयामास सहसा हिडिम्बः पुरुषादकः ।
यान् पश्यन् पुरतो रक्षस्तांश्चघान विरूपधृक् ॥ १० ॥
वह मनुष्योंको अपने सामने देखकर उन्हें नासिकाका ग्रास बना लेता था—नसकी तरह श्वासमार्गसे भीतर खींच लेता था। महाराज ! नरभक्षी हिडिम्बने सब ओरसे आक्रमण करके कुछ वृष्णिपालक योद्धाओंको मारकर सहसा अपना आहार बना लिया। उस विकराल रूपधारी राक्षसने जिन्हें सामने देखा, उन्हींका वध कर डाला ॥ ९-१० ॥
भक्षयन्नपरान् वृष्णीन् यादवान् राक्षसेश्वरः ।
चिक्षेप सहसा कांश्चिद्धिडिम्बः पुरुषादकः ॥ ११ ॥
पुरुषभक्षी राक्षसराज हिडिम्बने कितने ही वृष्णियों और यादवोंको खाते हुए उनमेंसे कुछको उठाकर सहसा दूर फेंक दिया ॥ ११ ॥
अन्तकाले यथा क्रुद्धो रुद्रः प्राणभृतो नृप ।
क्षणेनैकेन सर्वांस्तान् भक्षयामास राक्षसः ॥ १२ ॥
नरेश्वर ! जैसे कुपित हुए रुद्रदेव अन्तकालमें प्राणियोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार उस राक्षसने एक ही क्षणमें उन सबका भक्षण कर लिया ॥ १२ ॥
केचिद् भीता दिशः प्रापुर्वृष्णयो वीर्यशालिनः ।
केचित् तु भक्षितास्तेन रक्षसा वृष्णिपुङ्गवाः ॥ १३ ॥
कुछ पराक्रमशाली वृष्णिवंशी भयभीत हो विभिन्न दिशाओंमें भाग गये तथा कितने ही वृष्णिवंशके श्रेष्ठ योद्धा उस राक्षसके आहार बन गये ॥ १३ ॥
कुम्भकर्णो यथा राजन् भक्षयामास वानरान् ।
निःशेषं वृष्णिसैन्यं तु चकार पुरुषादकः ॥ १४ ॥
राजन् ! जैसे कुम्भकर्ण वानरोंको खा गया था। उसी प्रकार उस नरभक्षी निशाचरने वृष्णिवंशकी सेनाको समाप्त-सी कर दिया ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धौ वृद्धौ यादवपुङ्गवौ ।
धनुर्गृह्य महाघोरं राक्षसस्य पुरः स्थितौ ॥ १५ ॥
यथा क्रुद्धस्य सिंहस्य मृगौ वृद्धतमाविव ।
इसी बीचमें बूढ़े यादवशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन कुपित हो महाभयंकर धनुष हाथमें लेकर उस राक्षसके सामने खड़े हुए, मानो क्रोधमें भरे हुए सिंहके समक्ष दो अत्यन्त वृद्ध मृग आ गये हों ॥ १५½ ॥
व्यादायास्यं महारक्षस्तौ वृद्धावभ्यधावत ॥ १६ ॥
विखादिषुर्विरूपाक्षः पातालतलसंनिभः ।
उस समय वह महाराक्षस मुँह बाकर उन दोनों बूढ़ोंको खा जानेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ा। उसके नेत्र बड़े भयंकर थे। वह अपने खुले हुए मुखसे पाताल-तलके समान प्रतीत होता था ॥ १६½ ॥
ततोरक्षः पर्यधावत् खादत् खादत् कलेवरम् ॥ १७ ॥
पूरयामासतुर्वीरौ शरैर्युद्धधुरंधरौ नृप ।
हिडिम्बस्य महाघोरं व्यादितास्यमिवान्तकम् ॥ १८ ॥
नरेश्वर ! तदनन्तर मनुष्यके शरीरको बारंबार चबाता हुआ वह राक्षस उन दोनोंकी ओर वेगपूर्वक दौड़ा। उस समय उन युद्धश्रेष्ठ वीरोंने अपने बाणोंद्वारा हिडिम्बके महाभयंकर खुले हुए मुखको, जो मुँह बाये हुए यमराजके समान जान पड़ता था, अपने बाणोंसे भर दिया ॥ १७-१८॥
सर्वोस्तान् वारयामास देवशत्रुर्विरूपधृक् ।
धावति स्म ततो रक्षो व्यादितास्यं भयानकम् ॥ १९ ॥
तब उस विकराल रूपधारी देवद्रोही भयानक राक्षसने उन सब बाणोंका निवारण कर दिया और पुनः मुँह फैलाकर उनपर धावा किया ॥ १९ ॥
तयोर्गृहीत्वा धनुषी बभञ्ज युधि सत्वरम् ।
बाहू प्रसार्य दुष्टात्मा राक्षसो विकृताननः ॥ २० ॥
वसुदेवं महीपालं राजानं वृद्धसेविनम् ।
ग्रहीतुं राक्षसंश्रेष्ठो यतते नृपसंसदि ॥ २१ ॥
उसने उन दोनोंके धनुष छीनकर तुरंत उस युद्धस्थलमें ही तोड़ डाले; फिर वह विकराल मुखवाला दुष्टात्मा राक्षस अपनी दोनों बाहें फैलाकर वृद्धसेवी भूपाल राजा वसुदेवको उस राजसमाजमें ही पकड़नेकी चेष्टा करने लगा। वह राक्षसोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था ॥ २०-२१ ॥
हिडिम्ब उवाच
एष वां भक्षयिष्यामि वसुदेवं त्वया सह ।
उग्रसेन किमर्थं त्वं तिष्ठसे मत्पुरोगमः ॥ २२ ॥
हिडिम्ब बोला—उग्रसेन ! तुम किस लिये मेरे सामने खड़े हो। मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा । तुम्हारे साथ वसुदेवको भी चट कर जाऊँगा ॥ २२ ॥
आगच्छ प्रविशास्यं मे ग्रासभूतौ तु वां मम ।
विधिना निर्मितो वृद्धो वसुदेवो हरेः पिता ॥ २३ ॥
बुभुक्षितः श्रमात्तश्च युद्धे त्वरितविक्रमः ।
मन्मुखान्नैव गच्छेतां प्रविशेतां त्वरान्वितौ ॥ २४ ॥
आओ ! मेरे मुखमें प्रवेश करो। तुम दोनों मेरे ग्रास-स्वरूप हो। जिसे विधाताने श्रीकृष्णका पिता बना दिया है, वह बूढ़ा वसुदेव भूखसे पीड़ित है, परिश्रमसे कष्ट पाता है और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करता है। अब तुम दोनों मेरे मुँहसे छूटकर नहीं जा सकते, तुरंत ही मेरे मुखके भीतर प्रवेश करो ॥ २३-२४ ॥
युवयोः शोणितं पीत्वा तृप्तिं यास्यामि निर्वृतः ।
खादामि च पुनर्मांसं वृद्धयोर्युवयोः सुखम् ॥ २५ ॥
तुम दोनोंका रक्त पीकर मैं तृप्त होऊँगा और संतोष प्राप्त करूँगा । इसके बाद तुम दोनों वृद्धोंके मांसको मैं सुखपूर्वक खाऊँगा ॥ २५ ॥
इति ब्रुवंस्तथा रक्षो व्यादितास्यो महाहनुः ।