विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1112, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व] षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८५
धावति स्म; तदा क्षिप्रं हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ॥ २६ ॥
ऐसा कहता हुआ विशाल ठोड़ीवाला राक्षसराज निशाचर हिडिम्ब उस समय मुँह वाकर उनकी ओर दौड़ा ॥ २६ ॥
वसुदेवोग्रसेनौ च भीतौ विप्रेक्ष्य सर्वतः ।
दिशोऽभ्यभजतां राजन् निःशस्त्रौ वृष्णिपुङ्गवौ ॥ २७॥
राजन् ! तब शस्त्रहीन हुए वृष्णिशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन भयभीत हो सब ओर देखकर विभिन्न दिशाओंमें भागने लगे ॥ २७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा बलभद्रः प्रतापवान् ।
दृष्ट्वा च तौ तथाभूतौ वसुदेवोग्रसेनकौ ॥ २८ ॥
वासुदेवे समादिश्य हंसं युध्यन्तमीश्वरे ।
निर्गत्य चान्तरं तस्य राक्षसस्य दुरात्मनः ॥ २९ ॥
इसी बीचमें प्रतापी बलभद्रने वसुदेव और उग्रसेनको वैसी अवस्थामें पड़ा देख, जूझते हुए हंसका भार बलवान् श्रीकृष्णको सौंप दिया और स्वयं वे उस दुरात्मा राक्षसके बीचमें आकर इस प्रकार बोले—॥ २८-२९ ॥
मा कृथाः साहसं रक्षो मुञ्चैतौ राजसत्तमौ ।
स्थितोऽस्मि युध्यतां रक्षो मया शत्रूञ्जिघांसता ॥३०॥
अहमेव हनिष्ये त्वां का चेयं तव भीषिका ।
'ओ राक्षस ! ऐसा दुःसाहस न कर। इन दोनों भूप-शिरोमणियोंको छोड़ दे। मैं खड़ा हूँ। शत्रुओंके वधकी इच्छा-से यहाँ आये हुए मुझ बलभद्रके साथ तू युद्ध कर। केवल मैं ही तुझे मार डालूँगा, यह क्या तेरी विभीषिका है ! ॥
इति ब्रुवाणं हलिनं तौ विसृज्य महारणे ॥ ३१ ॥
महानयमसो दुष्टो भक्षयाम्येनमग्रतः ।
विदार्य पूर्ववद् वक्त्रं बलभद्रमुपाद्रवत् ॥ ३२ ॥
इस तरह बोलते हुए हलधरकी बात सुनकर हिडिम्बने उस महासमरमें वसुदेव और उग्रसेनको तो छोड़ दिया और सोचा—'यह महान् दुष्ट है, अतः पहले इसीको खा जाऊँ' ऐसा विचारकर पूर्ववत् मुँह फैलाये हुए उसने बलभद्रपर धावा किया ॥ ३१-३२ ॥
विसृज्य सशरं चापं राक्षसस्य पुरः स्थितः ।
मुष्टिं प्रगृह्य बलवान् स्फोटयन् बाहुमुत्तमम् ॥ ३३ ॥
बलवान् बलभद्र बाणसहित धनुषको त्यागकर अपनी उत्तम भुजापर ताल ठोंकते हुए उस राक्षसके आगे मुट्ठी बाँधकर खड़े हो गये ॥ ३३ ॥
हिडिम्बस्त्वथ दुष्टात्मा मुष्टिकृत्वा भयानकम्।
जघान वक्षो रामस्य व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३४ ॥
दुष्टात्मा हिडिम्बने भी मुँह बाये हुए यमराजकी भाँति भयंकर मुट्ठी बाँधकर बलरामके वक्षःस्थलपर प्रहार किया ॥
क्रुद्धोऽथ गलभद्रस्तु मुष्टिना तेन ताडितः ।
जघान मुष्टिना तेन राक्षसेशमनिन्दितः ॥ ३५ ॥
उसके मुक्केकी मार खाकर अनिन्द्य बलशाली बलभद्रजी कुपित हो उठे। फिर उन्होंने भी उस राक्षसराजको मुक्केसे मारा॥
मुष्टियुद्धं समभवन्नरराक्षसवीरयोः ।
युध्यतोर्युद्धरङ्गेऽथ नरराक्षससिंहयोः ॥ ३६ ॥
तयोश्चटचटाशब्दः प्रादुरासीद् भयानकः ।
फिर तो उन नर और निशाचर वीरोंमें मुक्केसे ही युद्ध होने लगा। युद्धकी रङ्गभूमिमे जूझते हुए नरसिंह बलभद्र और राक्षससिंह हिडिम्बके मुक्कोंका भयंकर चट-चट शब्द प्रकट होने लगा ॥ ३६१/२ ॥
अथ राक्षसराजस्तु मुष्टिना राममाहवे ॥ ३७॥
जघान वक्षोदेशे तु वज्रेणेव पुरंदरः ।
तदनन्तर राक्षसराज हिडिम्बने समराङ्गणमें बलरामके वक्षःस्थलपर मुक्केसे प्रहार किया, मानो देवराज इन्द्रने किसी पर्वतपर वज्रसे आघात किया हो ॥ ३७१/२ ॥
अथ रामो बली साक्षान्मुष्टिं संवर्त्य यत्नतः ॥ ३८ ॥
हिडिम्बं ताडयामास वक्षस्यमरविद्विषम् ।
तलाभ्यामथ रामस्तु वक्त्रे हत्वा स राक्षसम् ॥ ३९ ॥
इसके बाद साक्षात् बलवान् बलरामने यत्नपूर्वक मुट्ठी बाँधकर देवद्रोही हिडिम्बके वक्षःस्थलपर बड़े जोरसे आघात किया। तत्पश्चात् उन्होंने उस राक्षसके मुँहपर दो तमाचे जड़ दिये ॥ ३८-३९ ॥
आहतस्तलघातेन हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ।
जानुभ्यामपतद् भूमौ गतासुर्वीरराक्षसः ॥ ४० ॥
उनके तमाचेकी मार खाकर वीर निशाचर राक्षसराज हिडिम्ब प्राणहीन-सा होकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़ा।
तत उत्पत्य रामस्तु दोर्भ्यां संगृह्य राक्षसम् ।
आदाय बहुवेगेन भ्रामयित्वा पदात् पदम् ॥ ४१ ॥
व्याविध्यत् सुचिरं रामो दर्शयन्नात्मनो बलम् ।
उत्क्षिप्य राक्षसेन्द्रं तं सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४२ ॥
गव्यूतिमात्रं चिक्षेप ततो देशाद्धलायुधः ।
गतासू राक्षसश्रेष्ठस्ततो देशान्निराक्रमत् ॥ ४३ ॥
फिर बलरामजीने उछलकर उस राक्षसको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया और उसे उठाकर पग-पगपर बड़े वेगसे घुमाया। इस तरह अपना बल दिखाते हुए बलरामजी देरतक उसे घुमाते रहे। फिर सब लोगोंके देखते-देखते हलधरने उस राक्षसराजको उछालकर वहाँसे दो कोस दूर फेंक दिया। इस प्रकार राक्षसप्रवर हिडिम्ब प्राणशून्य होकर उस स्थानसे दूर निकल गया* ॥ ४१-४३ ॥
ये केचिद् राक्षसास्तत्र हतशेषा महारणे ।
बलभद्रात् ततो भीता जगमुश्चैव दिशो दश ॥ ४४ ॥
* पाण्डव भीमसेनने एकचक्रा नगरीमें जानेसे पूर्व जिस हिडिम्ब नामक राक्षसको मारा था, वह इससे भिन्न था और वह इससे पहले ही मारा जा चुका था। यह दूसरा हिडिम्ब बलभद्रजीके हाथों मारा गया।