विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८६ श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
उस महासमरमें जो कोई भी राक्षस वहाँ मरनेसे बचे हुए थे, वे बलभद्रजी से भयभीत हो वहाँसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥
अथांशुमाली भगवान् दिनेशः संहृत्य तेजांसि सहस्ररश्मिः।
अस्तं ययौ चक्षुरपि प्रजानामीषत्तमश्चापि समाविवेश॥ ४५ ॥
तदनन्तर सहस्रों किरणोंसे सुशोभित दिनके स्वामी अंशुमाली भगवान् सूर्य अपने तेज समेटकर अस्ताचलको चले गये और प्रजाजनोंके नेत्रोंमें कुछ-कुछ अन्धकारका समावेश हो गया ॥ ४५ ॥
तस्मिन् प्रविष्टेऽथ समुद्रतोयं प्रजापतौ विश्वमुखे जगद्गुरौ।
नक्षत्रनाथः समुपाजगाम संध्यातमोऽपि व्यनशन्नृपोत्तम॥ ४६ ॥
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! सम्पूर्ण विश्वके मुखस्वरूप प्रजापालक जगद्गुरु सूर्यदेवके समुद्रके जलमें प्रवेश कर जानेपर नक्षत्रनाथ चन्द्रमाका उदय हुआ, जिससे संध्याकालका अन्धकार भी नष्ट हो गया ॥ ४६ ॥
प्रभातकाले नृप सत्तमो रणे गोवर्धने किन्नरगीतनादिते।
इति ब्रुवन्तो नृपसत्तमास्तदा व्युपारमंस्तत्र रणोत्सवे नृप॥ ४७ ॥
जनमेजय ! उस समय हंसकी सेनामें जो श्रेष्ठ नरेश थे, वे यह कहते हुए वहाँ समरोत्सवसे विरत हो गये कि 'राजन् ! कल प्रातःकालका युद्ध किन्नरोंके गीतसे गूँजते हुए गोवर्धन पर्वतपर हो तो अच्छा होगा' (ऐसा कहकर वे सब नरेश वहाँसे भागकर गोवर्धन पर्वतपर चले गये) ॥ ४७ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हिडिम्बपराभवे षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हिडिम्बका पराभवविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥१२६॥
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
गोवर्धन पर्वतके समीप हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भूतेश्वरोंकी पराजय तथा श्रीकृष्ण और हंसका घोर युद्ध
वैशम्पायन उवाच
उभौ तौ हंसडिम्भकौ रात्रावेव महागिरिम्।
जग्मतुः सहितौ राजन् गोवर्धनमथो नृप॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! नरेश्वर ! तदनन्तर वे दोनों भाई हंस और डिम्भक रातमें ही एक साथ महागिरि गोवर्धन पर्वतको चल दिये ॥ १ ॥
अथ प्रभाते विमले सूर्ये चाभ्युदिते सति ।
गोवर्धनं जगामाशु केशवः केशिसूदनः ॥ २ ॥
जब निर्मल प्रभातकाल आनेपर सूर्यदेवका उदय हुआ, तब केशिहन्ता भगवान् केशव भी शीघ्रतापूर्वक गोवर्धन पर्वतकी ओर चले ॥ २ ॥
शैनेयो बलभद्रश्च यादवाः सारणादयः ।
गन्धर्वरप्सरोभिश्च नादितं बहुधा गिरिम् ॥ ३ ॥
सात्यकि, बलभद्र और सारण आदि यादव भी गन्धर्वों और अप्सराओंके नाना प्रकारके गीतोंसे निनादित गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ ३ ॥
जग्मुस्ते सहिता राजन् गोवर्धनमथो गिरिम्।
गोधनैश्च सैन्यैश्च नादितं बहुधा गिरिम् ॥ ४ ॥
राजन् ! वे सब लोग एक साथ गोवर्धन पर्वतपर जा पहुँचे। वह पर्वत गोधनों और सेनाओंके नाना प्रकारके शब्दोंसे प्रतिध्वनित हो रहा था ॥ ४ ॥
तस्योत्तरं नृपश्रेष्ठ पार्श्वं सम्प्राप्य यादवाः ।
निकषा यमुनां राजंस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ५ ॥
नृपश्रेष्ठ ! राजन् ! जब यादव उस पर्वतके उत्तर तटपर पहुँच गये, तब यमुनाके निकट पुनः युद्ध आरम्भ हुआ ॥ ५ ॥
विव्याध हंसडिम्भकौ वसुदेवं सप्तभिः ।
सारणः पञ्चविंशत्या दशभिः कङ्क एव च ॥ ६ ॥
वसुदेवने सात बाणोंसे हंस और डिम्भकको घायल कर दिया। सारणने पच्चीस और कङ्कने दस बाण मारे ॥ ६ ॥
हंसेन डिम्भकेनाथ यादवैश्च समन्ततः ।
उग्रसेनस्त्रिसप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार हंस और डिम्भकके साथ यादवोंका सब ओरसे युद्ध छिड़ गया । उग्रसेनने झुकी हुई गाँठवाले तिहत्तर बाण मारे ॥ ७ ॥
विराटस्त्रिंशता राजन् सात्यकिश्चापि सप्तभिः ।
अशीत्या विष्पृशू राजन्नुद्धवो दशभिः शरैः ॥ ८ ॥
राजन् ! विराटने तीस, सात्यकिने सात, विष्पृशुने अस्सी तथा उद्धवने दस बाणोंका प्रहार किया ॥ ८ ॥