भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1114, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1114

भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८७


प्रद्युम्नस्त्रिंशतां राजन् साम्बश्चापि च सप्तभिः ।
अनाधृष्टिस्त्वेकषष्ट्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ९ ॥
जनमेजय ! प्रद्युम्नने तीस, साम्बने सात और अनाधृष्टि-ने झुकी हुई गाँठवाले इकसठ बाणोंद्वारा शत्रुओंको घायल कर दिया ॥ ९ ॥

एवं ते संहता राजंश्चक्रुर्युद्धमदीनवत् ।
अत्यद्भुतं महाघोरं यादवाः सर्व एव हि ॥ १० ॥
राजन् ! इस प्रकार वे समस्त यादव एक साथ होकर उत्साहसम्पन्न पुरुषकी भाँति अत्यन्त अद्भुत और महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १० ॥

चक्रुस्ताभ्यां महायुद्धं वासुदेवस्य पश्यतः ।
सर्वानपि महाराज यादवान् बलदर्पितान् ॥ ११ ॥
तावुभौ हंसडिम्भकौ नृपांस्तान् प्रत्यविध्यताम् ।
महाराज ! भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते समस्त यादवोंने हंस और डिम्भकके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। दोनों भाई हंस और डिम्भकने भी उन समस्त यादवनरेशोंको अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ११ १/२ ॥

प्रत्येकं दशभिर्विद्ध्वा बाणैर्निशितनिर्मलैः ॥ १२ ॥
जघ्नतुश्च शरैस्तीक्ष्णैरत्यर्थं यादवेश्वरान् ।
उन दोनोंने तेज धारवाले चमचमाते हुए दस-दस बाणोंद्वारा प्रत्येकको घायल करके पैने बाणोंसे समस्त यादवेश्वरोंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२ १/२ ॥

व्यथिताः सर्व एवैते वमन्तः शोणितं बहु ॥ १३ ॥
माधवे किंशुका राजन् पुष्पिता इव ते बभुः ।
राजन् ! उन बाणोंसे व्यथित हो ये सब-के-सब मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन करते हुए वसन्त ऋतुमें खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान शोभा पाने लगे ॥ १३ १/२ ॥

भीताश्च यादवा राजन् पलायनपरायणाः ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् वसुदेवात्मजो नृप ।
वासुदेवो हली युद्धे प्रमुखे धन्विनौ तयोः ॥ १५ ॥
चक्रतुर्युद्धमतुलं स्कन्दशक्राविवाम्बरे ।
राजन् ! उस समय यादव सैनिक भयभीत होकर भागने लगे। महाराज जनमेजय ! इसी बीचमें वसुदेवके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण और हलधर बलराम धनुष हाथमें लिये युद्धके मुहानेपर उन दोनोंके सामने आकर उसी तरह अनुपम संग्राम करने लगे, जैसे इन्द्र और कार्तिकेय आकाशमें खड़े होकर असुरोंसे युद्ध करते हैं ॥ १४-१५ १/२ ॥

तयोरेव सगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महर्षयः ॥ १६ ॥
विमानस्थाश्च ददृशुर्युद्धं देवासुरोपमम् ।
उस समय विमानोंपर बैठे हुए गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और महर्षि देवासुर-संग्रामके समान उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ॥ १६ १/२ ॥

ततः प्रादुर्भूतां तौ दूतौ भूतेश्वरौ नृप ॥ १७ ॥
शूलिना प्रेषितौ युद्धे रक्षार्थं बलिनोस्तयोः ।
नरेश्वर ! तदनन्तर वहाँ युद्धमें उन दोनों बलवान् वीर हंस और डिम्भककी रक्षा करनेके लिये महादेवजीके भेजे हुए वे दोनों भूतेश्वर दूत प्रकट हुए ॥ १७ १/२ ॥

हंसोऽथ वासुदेवश्च युद्धं चक्रतुरीश्वरौ ॥ १८ ॥
रामश्च डिम्भकश्चैव संयुगौ युद्धकाङ्क्षया ।
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और हंस दोनों सामर्थ्यशाली वीर एक दूसरेके साथ युद्ध करने लगे। उधर बलराम और डिम्भक भी युद्ध करनेकी इच्छासे परस्पर उलझ गये ॥ १८ १/२ ॥

विक्रान्ताः सर्व एवैते ह्यस्त्रे शस्त्रे तथा बले ॥ १९ ॥
शङ्खान् दध्मुः पृथग्भावं स्वे स्वे सर्वे रथे स्थिताः ।
ये सब-के-सब अस्त्र, शस्त्र और बलमें पराक्रमी थे। इन सबने अपने-अपने रथमें स्थित होकर पृथक्-पृथक् शङ्ख बजाना आरम्भ किया ॥ १९ १/२ ॥

अथ कृष्णो हृषीकेशः पाञ्चजन्यं महारवम् ॥ २० ॥
दध्मौ पद्मपलाशाक्षः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सबको विस्मयमे डालते हुए-से महान् शब्द करनेवाले पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया ॥ २० १/२ ॥

अथ भूतौ महाघोरौ लम्बोदरशरीरिणौ ॥ २१ ॥
दुद्रुवतुर्महाराज शूलमादाय केशवम् ।
महाराज ! इतनेमें ही लंबे पेट और विशाल शरीरवाले उन महाभयंकर भूतोंने शूल लेकर भगवान् श्रीकृष्णपर आक्रमण किया ॥ २१ १/२ ॥

शूलेन पोथयां राजञ्चक्रतुर्यादवेश्वरम् ॥ २२ ॥
ताभ्यां समाहतो विष्णुर्देवगन्धर्वसंनिधौ ।
ईषत्स्सिताधरो देवः किंचिदुत्प्लुत्य सत्वरम् ॥ २३ ॥
रथाद् रथिवरश्रेष्ठस्तौ प्रगृह्य जनार्दनः ।
भ्रामयित्वा शतगुणमलातमिव केशवः ॥ २४ ॥
कैलासं च समुद्दिश्य प्रचिक्षेप ततो हरिः ।
राजन् ! उन दोनोंने यादवेश्वर श्रीकृष्णपर एक साथ ही शूलसे प्रहार किया। देवताओं और गन्धर्वोंके समीप उन दोनोंके आघातसे आहत हो भगवान् श्रीकृष्णके अधरपर मन्द मुसकानकी छटा बिखर गयी। वे रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् जनार्दन कुछ उछलकर तुरंत रथसे कूद पड़े और दोनों भूतेश्वरोंको पकड़कर उन्हें अलातचक्रके समान सौ बार घुमानेके पश्चात् उन केशव हरिने कैलासपर्वतकी ओर फेंक दिया ॥ २२-२४ १/२ ॥

तावुपेत्य गिरेः शृङ्गं कैलासस्य महामते ॥ २५ ॥
दृष्ट्वा तत्कर्म देवस्य विस्मयं जग्मतुः परम् ।
महामते ! वे दोनों कैलासपर्वतके शिखरपर पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देख बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ २५ १/२ ॥