विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः १०८७
प्रद्युम्नस्त्रिंशतां राजन् साम्बश्चापि च सप्तभिः ।
अनाधृष्टिस्त्वेकषष्ट्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ९ ॥
जनमेजय ! प्रद्युम्नने तीस, साम्बने सात और अनाधृष्टि-ने झुकी हुई गाँठवाले इकसठ बाणोंद्वारा शत्रुओंको घायल कर दिया ॥ ९ ॥
एवं ते संहता राजंश्चक्रुर्युद्धमदीनवत् ।
अत्यद्भुतं महाघोरं यादवाः सर्व एव हि ॥ १० ॥
राजन् ! इस प्रकार वे समस्त यादव एक साथ होकर उत्साहसम्पन्न पुरुषकी भाँति अत्यन्त अद्भुत और महाघोर युद्ध करने लगे ॥ १० ॥
चक्रुस्ताभ्यां महायुद्धं वासुदेवस्य पश्यतः ।
सर्वानपि महाराज यादवान् बलदर्पितान् ॥ ११ ॥
तावुभौ हंसडिम्भकौ नृपांस्तान् प्रत्यविध्यताम् ।
महाराज ! भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते समस्त यादवोंने हंस और डिम्भकके साथ महान् युद्ध छेड़ दिया। दोनों भाई हंस और डिम्भकने भी उन समस्त यादवनरेशोंको अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ११ १/२ ॥
प्रत्येकं दशभिर्विद्ध्वा बाणैर्निशितनिर्मलैः ॥ १२ ॥
जघ्नतुश्च शरैस्तीक्ष्णैरत्यर्थं यादवेश्वरान् ।
उन दोनोंने तेज धारवाले चमचमाते हुए दस-दस बाणोंद्वारा प्रत्येकको घायल करके पैने बाणोंसे समस्त यादवेश्वरोंको गहरी चोट पहुँचायी ॥ १२ १/२ ॥
व्यथिताः सर्व एवैते वमन्तः शोणितं बहु ॥ १३ ॥
माधवे किंशुका राजन् पुष्पिता इव ते बभुः ।
राजन् ! उन बाणोंसे व्यथित हो ये सब-के-सब मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन करते हुए वसन्त ऋतुमें खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान शोभा पाने लगे ॥ १३ १/२ ॥
भीताश्च यादवा राजन् पलायनपरायणाः ॥ १४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् वसुदेवात्मजो नृप ।
वासुदेवो हली युद्धे प्रमुखे धन्विनौ तयोः ॥ १५ ॥
चक्रतुर्युद्धमतुलं स्कन्दशक्राविवाम्बरे ।
राजन् ! उस समय यादव सैनिक भयभीत होकर भागने लगे। महाराज जनमेजय ! इसी बीचमें वसुदेवके पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण और हलधर बलराम धनुष हाथमें लिये युद्धके मुहानेपर उन दोनोंके सामने आकर उसी तरह अनुपम संग्राम करने लगे, जैसे इन्द्र और कार्तिकेय आकाशमें खड़े होकर असुरोंसे युद्ध करते हैं ॥ १४-१५ १/२ ॥
तयोरेव सगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महर्षयः ॥ १६ ॥
विमानस्थाश्च ददृशुर्युद्धं देवासुरोपमम् ।
उस समय विमानोंपर बैठे हुए गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और महर्षि देवासुर-संग्रामके समान उन दोनोंका युद्ध देखने लगे ॥ १६ १/२ ॥
ततः प्रादुर्भूतां तौ दूतौ भूतेश्वरौ नृप ॥ १७ ॥
शूलिना प्रेषितौ युद्धे रक्षार्थं बलिनोस्तयोः ।
नरेश्वर ! तदनन्तर वहाँ युद्धमें उन दोनों बलवान् वीर हंस और डिम्भककी रक्षा करनेके लिये महादेवजीके भेजे हुए वे दोनों भूतेश्वर दूत प्रकट हुए ॥ १७ १/२ ॥
हंसोऽथ वासुदेवश्च युद्धं चक्रतुरीश्वरौ ॥ १८ ॥
रामश्च डिम्भकश्चैव संयुगौ युद्धकाङ्क्षया ।
उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और हंस दोनों सामर्थ्यशाली वीर एक दूसरेके साथ युद्ध करने लगे। उधर बलराम और डिम्भक भी युद्ध करनेकी इच्छासे परस्पर उलझ गये ॥ १८ १/२ ॥
विक्रान्ताः सर्व एवैते ह्यस्त्रे शस्त्रे तथा बले ॥ १९ ॥
शङ्खान् दध्मुः पृथग्भावं स्वे स्वे सर्वे रथे स्थिताः ।
ये सब-के-सब अस्त्र, शस्त्र और बलमें पराक्रमी थे। इन सबने अपने-अपने रथमें स्थित होकर पृथक्-पृथक् शङ्ख बजाना आरम्भ किया ॥ १९ १/२ ॥
अथ कृष्णो हृषीकेशः पाञ्चजन्यं महारवम् ॥ २० ॥
दध्मौ पद्मपलाशाक्षः सर्वान् विस्मापयन्निव ।
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सबको विस्मयमे डालते हुए-से महान् शब्द करनेवाले पाञ्चजन्य शङ्खको बजाया ॥ २० १/२ ॥
अथ भूतौ महाघोरौ लम्बोदरशरीरिणौ ॥ २१ ॥
दुद्रुवतुर्महाराज शूलमादाय केशवम् ।
महाराज ! इतनेमें ही लंबे पेट और विशाल शरीरवाले उन महाभयंकर भूतोंने शूल लेकर भगवान् श्रीकृष्णपर आक्रमण किया ॥ २१ १/२ ॥
शूलेन पोथयां राजञ्चक्रतुर्यादवेश्वरम् ॥ २२ ॥
ताभ्यां समाहतो विष्णुर्देवगन्धर्वसंनिधौ ।
ईषत्स्सिताधरो देवः किंचिदुत्प्लुत्य सत्वरम् ॥ २३ ॥
रथाद् रथिवरश्रेष्ठस्तौ प्रगृह्य जनार्दनः ।
भ्रामयित्वा शतगुणमलातमिव केशवः ॥ २४ ॥
कैलासं च समुद्दिश्य प्रचिक्षेप ततो हरिः ।
राजन् ! उन दोनोंने यादवेश्वर श्रीकृष्णपर एक साथ ही शूलसे प्रहार किया। देवताओं और गन्धर्वोंके समीप उन दोनोंके आघातसे आहत हो भगवान् श्रीकृष्णके अधरपर मन्द मुसकानकी छटा बिखर गयी। वे रथियोंमें श्रेष्ठ भगवान् जनार्दन कुछ उछलकर तुरंत रथसे कूद पड़े और दोनों भूतेश्वरोंको पकड़कर उन्हें अलातचक्रके समान सौ बार घुमानेके पश्चात् उन केशव हरिने कैलासपर्वतकी ओर फेंक दिया ॥ २२-२४ १/२ ॥
तावुपेत्य गिरेः शृङ्गं कैलासस्य महामते ॥ २५ ॥
दृष्ट्वा तत्कर्म देवस्य विस्मयं जग्मतुः परम् ।
महामते ! वे दोनों कैलासपर्वतके शिखरपर पहुँचकर भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देख बड़े विस्मयमें पड़ गये ॥ २५ १/२ ॥
| १०८८ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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हंसश्च दृष्ट्वा तत्कर्म रोषात्ताम्रायतेक्षणः ॥ २६ ॥
उवाच वचनं हंसः शृण्वतां त्रिदिवौकसाम् ।
श्रीकृष्णका वह कर्म देखकर हंसके बड़े-बड़े नेत्र रोषसे लाल हो गये। उसने समस्त देवताओंके सुनते हुए यह बात कही—॥ २६ १/२ ॥
किमर्थं राजसूयस्य विघ्नं चरसि केशव ॥ २७ ॥
ब्रह्मदत्तो महीपालो यष्टा तस्य महाक्रतोः ।
करं दिश यथायोगं यदि प्राणान् हि रक्षसि ॥ २८ ॥
'केशव ! हमारे राजसूय यज्ञमें क्यों विघ्न डाल रहे हो ? महाराज ब्रह्मदत्त उस महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। यदि अपने प्राणोंकी रक्षा चाहते हो तो उसमें यथायोग्य कर दो ॥
अथवा त्वं क्षणं तिष्ठ ततो ज्ञात्वा परं बहु ।
ददासि त्वं नन्दपुत्र ततो यष्टा स मे गुरुः ॥ २९ ॥
'अथवा नन्दपुत्र ! तुम क्षणभर मेरे सामने खड़े रहो, फिर मेरी श्रेष्ठताको जानकर स्वयं ही बहुत सा कर प्रदान करोगे; फिर मेरे पिता यज्ञका आरम्भ करेंगे ॥ २९ ॥
ईश्वरोऽहं सदा राज्ञां देवानामिव शूलभृत् ।
एष ते वीर्यमतुलं नाशयिष्यामि संयुगे ॥ ३० ॥
'जैसे देवताओंके ईश्वर शूलधारी महादेव हैं; उसी प्रकार सदा समस्त राजाओंका ईश्वर मैं हूँ। इस युद्धमें मैं तुम्हारे अनुपम बलको अभी नष्ट किये देता हूँ' ॥ ३० ॥
इत्युक्त्वा सशरं चापं शालतालोपमं नृप ।
आकृष्य च यथाप्राणं नाराचेन च केशवम् ॥ ३१ ॥
ललाटे विक्षिपे हंसो ललाम इव सोऽभवत् ।
नरेश्वर ! ऐसा कहकर हंसने शाल और तालके समान विशाल धनुष और बाण ले उसे बलपूर्वक खींचकर उस नाराचके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके ललाटमें प्रहार किया । वह नाराच उनके लिये मनोहर आभूषण-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३१ १/२ ॥
उवाच सात्यकिं कृष्णो रथं वाहय मे प्रभो ॥ ३२ ॥
दारुकं पृष्ठवाहं तं कृत्वा देशं तमीश्वरः ।
अथ तेन समादिष्टः सात्यकिर्वाहयन् रथम् ॥ ३३ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—'प्रभावशाली वीर ! तुम मेरा रथ हाँको।' भगवान्ने जब सात्यकिको इस प्रकार आदेश दिया, तब वे दारुकको पीछे करके उस स्थानपर बैठकर उनका रथ हाँकने लगे ॥ ३२-३३ ॥
मण्डलानि बहून्याजौ दर्शयामास सत्वरम् ।
अथ विद्धो दृढं तेन शरेण हरिरीश्वरः ॥ ३४ ॥
आग्नेयमस्त्रं संयोज्य शरे कस्मिंश्चिदव्ययः ।
उवाच हंसं राजेन्द्र सात्यकिं प्रेरयन् रणे ॥ ३५ ॥
राजेन्द्र ! सात्यकिने युद्धस्थलमें शीघ्रतापूर्वक रथके बहुत-से पैंतरे दिखाये। उधर हंसके बाणसे गहरी चोट खाकर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने किसी बाणपर आग्नेयास्त्रका आधान करके सात्यकिको रणभूमिमें आगे बढ़नेके लिये प्रेरित करते हुए हंससे कहा—॥ ३४-३५ ॥
अनेन त्वां दहे पाप यदि शक्तोऽसि वारय ।
अलं ते बह्वबद्धेन क्षत्रियोऽसि सदा शठ ॥ ३६ ॥
'पापी ! शठ ! मैं इस बाणसे तुझे अभी दग्ध किये देता हूँ, यदि शक्ति हो तो इसे रोक । अब तेरे लिये बहुत-सी असङ्गत बातें बकनेसे कोई लाभ न होगा। तू क्षत्रिय है, सदा अपने कर्तव्यका पालन कर ॥ ३६ ॥
मत्तश्चेत् करमिच्छेस्त्वं दर्शयाद्य पराक्रमम् ।
यतयो बाधिता हंस पुष्करे संस्थितास्त्वया ॥ ३७ ॥
'यदि मुझसे कर लेना चाहता है तो आज दिखा अपना पराक्रम ! हंस ! तूने पुष्करमें रहनेवाले यतियोंको सताया है ॥
शास्ता त्वं खलु विप्राणां स्थिते मयि नराधम ।
स्थिते मयि जगन्नाथे हत्वा क्षत्रियकण्टकान् ॥ ३८ ॥
शास्तास्म्यद्य सतां लोके दुष्टानां ब्रह्मविद्विषाम् ।
'नराधम ! मैं इस सम्पूर्ण जगत्का ईश्वर हूँ। तू मेरे रहते ब्राह्मणोंपर शासन करता है। मैं तुझ-जैसे क्षत्रियरूपी कण्टकोंका वध करके सत्पुरुषोंके जगत्में ब्रह्मद्रोही दुष्टोंका शासन करनेवाला हूँ ॥ ३८ १/२ ॥
शापेन यतिमुख्यानां हत एव नराधम ॥ ३९॥
मृत्युवे त्वां नियोद्याद्य रक्षिता ब्राह्मणानहम् ।
'नराधम ! तू मुख्य-मुख्य यतियोंके शापसे ही मर चुका है। आज तुझे मृत्युके हवाले करके मैं ब्राह्मणोंकी रक्षा करूँगा' ॥ ३९ १/२ ॥
इति ब्रुवंस्तदस्त्रं तु मुमोच युधि केशवः ॥ ४० ॥
तदस्त्रं वारुणेनाथ हंसोऽपि प्रत्यपेधयत् ।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें हंसपर उस आग्नेयास्त्रको छोड़ दिया; तब हंसने भी वारुणास्त्रसे उस अस्त्रका निवारण कर दिया ॥ ४० १/२ ॥
वायव्यमथ गोविन्दो मुमोच युधि हंसके ॥ ४१ ॥
तदस्त्रं वारयामास माहेन्द्रेण नृपोत्तमः ।
यह देख गोविन्दने रणभूमिमें हंसपर वायव्यास्त्र चलाया, किंतु नृपश्रेष्ठ हंसने माहेन्द्रास्त्रसे उसका वारण कर दिया ॥ ४१ १/२ ॥
अथ माहेश्वरं कृष्णो मुमोचात्युग्रमाहवे ॥ ४२ ॥
रौद्रेण तत् ततो हंसो वारयामास तत्क्षणात् ।
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अत्यन्त भयंकर माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, परंतु हंसने रौद्रास्त्रद्वारा तत्काल उसका निवारण कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥
गान्धर्वं राक्षसं चैव पैशाचमथ केशवः ॥ ४३ ॥
ब्रह्मास्त्रमथ कौवेरमासुरं याम्यमेव च ।
चत्वार्येतानि हंसस्तु मुमोच युधि सत्वरम् ॥ ४४ ॥
वारणार्थं तदस्त्राणां चतुर्णां माधवस्य ह ।
भविष्यपर्व ] सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः [ १०८९
तत्र श्रीकृष्णने लगातार गान्धर्व, राक्षस और पैशाच अस्त्र छोड़े (पूर्वोक्त माहेश्वर अस्त्रको लेकर ये चार हुए)। माधवके उन चारों अस्त्रोंका निवारण करनेके लिये हंसने युद्धस्थलमें तुरंत ही ब्रह्मास्त्र, कौवेरास्त्र, आगुरास्त्र और याम्यास्त्र—ये चार अस्त्र छोड़े ॥ ४२-४४ ½ ॥
अथ ब्रह्मशिरो नाम घोरमस्त्रं विनाशकम् ॥ ४५ ॥
मुमोच हंसमुद्दिश्य देवदेवो जनार्दनः ।
योजयामास तद्धंसे महाघोरपराक्रमम् ॥ ४६ ॥
तदनन्तर देवाधिदेव जनार्दनने ब्रह्मशिर नामक महान् विनाशकारी भयानक अस्त्र हंसपर छोड़ा। उन्होंने महान् एवं घोर पराक्रमवाले उस अस्त्रका हंसके लिये ही प्रयोग किया था ॥ ४५-४६ ॥
अथ भीतो महारौद्रमस्त्रं दृष्ट्वा नृपोत्तमः ।
हंसोऽपि तेन राजेन्द्र वारयामास तं शरम् ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र ! उस महाभयंकर अस्त्रको देखकर नृपश्रेष्ठ हंस भयभीत हो उठा; फिर उसने भी उसी अस्त्रसे उस बाणका वारण किया ॥ ४७ ॥
यमुनाप उपस्पृश्य देवदेवो जनार्दनः ।
अस्त्रं वैष्णवमादाय शरे सं निशिते हरिः ॥ ४८ ॥
योजयामास भूतात्मा भूतभावनभावनः ।
तदनन्तर सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले भूतात्मा देवाधिदेव जनार्दन हरिने यमुनाजीके जलका आचमन करके एक तीखे बाणपर वैष्णवास्त्रकी संयोजना की ॥
येन देवा रणे हत्वा राज्यमापुः पुरासुरान् ।
तदस्त्रं योजयामास वधार्थं तस्य भूपतेः ॥ ४९ ॥
पूर्वकालमें देवताओंने रणभूमिमें जिसके द्वारा असुरोंका वध करके अपना राज्य प्राप्त किया था, उसी अस्त्रका राजा हंसके वधके लिये श्रीकृष्णने प्रयोग किया ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसकेशवयुद्धे
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंस और श्रीकृष्णका युद्धविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥
अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा हंसका वध
वैशम्पायन उवाच
अथ भीतो महारौद्रमस्त्रं दृष्ट्वा नृपोत्तम ।
हंसो राजा महाराज निश्चेष्ट इव सम्बभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ ! महाराज ! उस महाभयंकर अस्त्रको देखकर राजा हंस भयके मारे निश्चेष्ट-सा प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥
उत्प्लुत्य स रथात् तस्माद् यमुनाम्अभ्यधावत ।
यत्र कृष्णो हृषीकेशः कालियाहिं ममर्द्द ह ॥ २ ॥
वह उस रथसे उछलकर यमुनाजीकी ओर भागा, जहाँ पूर्वकालमे हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्णने कालियनागका मर्दन किया था ॥ २ ॥
महाह्रदं महारौद्रं यावत्पातालसंस्थितम् ।
तावद्वतीर्णं महानीलं कालाञ्जननिभं हि यत् ॥ ३ ॥
वह महान् ह्रद बड़ा भयंकर और पातालपर्यन्त गहरा था। उसका विस्तार भी उतना ही था। वह काली अञ्जन-राशि (अथवा कोयले) के समान महानील (या काला) प्रतीत होता था ॥ ३ ॥
तस्मिन् हृदे महाघोरे पपाताथ स हंसकः ।
हंसे पतति तस्मिंस्तु महान् रावो बभूव ह ॥ ४ ॥
गिरीणां पात्यमानानां समुद्रे इव वज्रिणा ।
उसी महाघोर कालियह्रदमें हंस कूद पड़ा। उसके कूदनेपर वहाँ बड़ा भारी धमाके-सा शब्द हुआ, मानो इन्द्रके द्वारा समुद्रमें गिराये जाते हुए पर्वतोंका कोलाहल प्रकट हुआ हो ॥ ४ ½ ॥
रथादुत्प्लुत्य कृष्णोऽपि तस्योपरि पपात ह ॥ ५ ॥
देवदेवो जगन्नाथो जगद् विस्मापयन्निव ।
तब जगदीश्वर देवाधिदेव श्रीकृष्ण भी सम्पूर्ण जगत्को विस्मयमें डालते हुए-से रथसे उछलकर उस कुण्डमें हंसके ऊपर कूद पड़े ॥ ५ ½ ॥
प्राहरन् तं महाबाहुः पादाभ्यामथ केशवः ॥ ६ ॥
पादक्षेपं नृपस्तस्माल्लब्ध्वा हंसो नृपोत्तम ।
ममार च नृपश्रेष्ठ केचिदेवं वदन्ति हि ॥ ७ ॥
उस समय महाबाहु केशवने उसपर दोनों पैरोंसे प्रहार किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! श्रीकृष्णके चरणोंका प्रहार पाकर राजा हंस मर गया—ऐसा कुछ लोग कहते हैं ॥ ६-७ ॥
अन्ये पातालमायातो भक्षितः पन्नगैरिति ।
अद्यापि नैव राजेन्द्र दृष्ट इत्यनुशुश्रुम ॥ ८ ॥
राजेन्द्र ! दूसरोंका कहना है कि वह पातालमें धँस गया और वहाँ सर्प उसे खा गये। वह अबतक वहाँसे लौटा नहीं देखा गया—ऐसा उसके विषयमें हमने सुना है ॥ ८ ॥
यथापूर्वं जगन्नाथो रथं समुपजग्मिवान् ।
हते तस्मिन् महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
| १०९० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
अकरोद् राजसूयं च तव पूर्वपितामहः।
यदि जीवेदसौ हंसः को नमस्यति तं क्रतुम् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्ण पूर्ववत् रथपर आ गये। महाराज ! हंसके मारे जानेपर ही तुम्हारे पूर्वपितामह धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञ किया था। यदि हंस जीवित होता तो कौन उस यज्ञके सामने मस्तक झुकाता ॥ ९-१० ॥
स च सर्वास्त्रविन्नित्यं रुद्राल्लब्धवरः प्रभो।
क्षणादेव महाराज वार्तेयं गामगाहत ॥ ११ ॥
हतो हंसो हतो हंसः कृष्णेन रिपुमर्दिना।
जगुर्गन्धर्वपतयो देवलोके दिवानिशम् ॥ १२ ॥
प्रभो ! वह भगवान् रुद्रसे वर पाकर सदाके लिये सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता हो गया था। महाराज ! क्षणभरमें यह समाचार भूमण्डलमें फैल गया। 'शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णने हंसको मार डाला, हंसको मार डाला'—यह गन्धर्वराजगण देवलोकमें दिन-रात गान करने लगे ॥ ११-१२ ॥
कृष्णेन लोकनाथेन विष्णुना प्रभविष्णुना।
यमुनाया ह्रदे घोरे हंसो निहत इत्यपि ॥ १३ ॥
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी प्रभावशाली विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाके भयंकर ह्रदमें हंसको मार डाला।' इस प्रकार उनके यशका सर्वत्र गान होने लगा ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवधे अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वधविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
डिम्भककी आत्महत्या
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा निहतमत्युग्रं भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
बलदेवं परित्यज्य युध्यमानं महारणे ॥ १ ॥
डिम्भको वीर्यसम्पन्नो यमुनामनुजग्मिवान्।
तमन्वधावद् वेगेन बलभद्रो हलायुधः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! अपने पराक्रमशाली भाई अत्यन्त उग्र हंसको उस महासमरमें मारा गया सुनकर बलवान् डिम्भक जूझते हुए बलभद्रको वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर गया। उस समय हलधर बलभद्रने बड़े वेगसे उसका पीछा किया ॥ १-२ ॥
हंसो हि यत्र पतितस्तत्रासौ निपपात ह।
यमुनायां महाराज विलोड्य जलसंचयम् ॥ ३ ॥
महाराज ! हंस जहाँ यमुनाजीमें कूदा था, वहीं डिम्भक भी कूद पड़ा। उसने यमुनाकी जलराशिको मथ डाला ॥ ३ ॥
अथ क्रुद्धः स डिम्भको भ्रामयित्वा जलं बहु।
उन्मज्ज्योन्मज्ज्य सहसा निमज्ज्य च पुनः पुनः ॥ ४ ॥
न ददर्श तदा राजन् भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
क्रोधमें भरा हुआ डिम्भक उस जलमें चक्कर लगाकर सहसा गोता लगाता और ऊपरको निकल आता था। राजन् ! इस प्रकार बारंबार डुबकी लगानेपर भी उसने अपने पराक्रमशाली भाईको वहाँ नहीं देखा ॥ ४ ॥
उन्मज्ज्याथ महाबाहुर्वासुदेवं विलोक्य च ॥ ५ ॥
उवाच वचनं राजन् डिम्भको वीर्यवत्तमः।
राजन् ! तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु डिम्भक जलसे ऊपर आकर वासुदेव श्रीकृष्णको सामने देख उनसे इस प्रकार बोला—॥ ५½ ॥
अरे गोपप्रदायाद क्वासौ हंस इति स्थितः ॥ ६ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा यमुनां पृच्छ राजक।
'अरे गोपपुत्र ! वह हंस कहाँ है ?' धर्मात्मा वासुदेवने भी उत्तर दिया—'नीच नरेश ! यमुनाजीसे पूछ' ॥ ६½ ॥
इत्यब्रवीत् प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा यमुनां भूयः प्रविश्य डिम्भकः किल।
बहुप्रकारमुद्वीक्ष्य भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ८ ॥
विललाप ततो राजा डिम्भको भ्रान्तमानसः।
प्रतापी वासुदेवने जब प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार कहा, तब भ्रातृवत्सल डिम्भकने उनकी बात सुनकर पुनः यमुनामें प्रवेश किया और नाना प्रकारसे अपने भाईकी खोज करके भ्रान्तचित्त हुआ वह राजा विलाप करने लगा ॥ ७-८½ ॥
क्व नु गच्छसि राजेन्द्र विहायैनमबान्धवम् ॥ ९ ॥
कुतो भ्रातरितो गच्छेः परित्यज्यैव मामिह।
'राजेन्द्र ! इस बन्धुहीन डिम्भकको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? भैया ! मुझे यहीं छोड़कर यहाँसे कहाँ चले जा रहे हो ?' ॥ ९½ ॥
विलप्यैवं नृपश्रेष्ठ डिम्भको भ्रातृवत्सलः ॥ १० ॥
आत्मत्यागे मनः कुर्वन् यमुनाया महाह्रदे।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! इस प्रकार विलाप करके भ्रातृवत्सल
भविष्यपर्व ] त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९१
डिम्भकने यमुनाजीके महान् कुण्डमें अपने शरीरको त्याग देनेका विचार किया ॥ १०१/२ ॥
निमज्ज्योन्मज्ज्य सहसा मरणे कृतनिश्चयः ॥ ११ ॥
हस्तेन जिह्वामाकृष्य भूयो भूयो विलप्य च ।
ततः समूलामाकृष्य जिह्वां साहसकृत् स्वयम् ॥ १२ ॥
ममारान्तर्जले राजन् डिम्भको नरकाय वै ।
सहसा गोता लगाकर वह जलसे ऊपरको उठा और मरनेका निश्चय करके बारंबार विलाप करनेके पश्चात् स्वयं दुःसाहस करनेवाला वह डिम्भक हाथसे जिह्वाको जड़सहित बाहर खींचकर जलके भीतर मर गया। राजन्! उसका यह दुर्मरण नरककी प्राप्ति करानेवाला था ॥ ११-१२१/२ ॥
एवं तु निहते हंसे डिम्भके वीर्यशालिनि ॥ १३ ॥
आगमत् पुण्डरीकाक्षो भूतान् विस्मापयन्निव ।
इस प्रकार पराक्रमशाली हंस और डिम्भकके मारे जाने पर कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण भूतोंको विस्मयमें डालते हुए-से लौट आये ॥ १३१/२ ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १४ ॥
गोवर्धनेऽथ विश्रम्य वलभद्रसहायवान् ।
कंचित् कालं महाराज पूर्वभुक्तमुवास ह ॥ १५ ॥
महाराज ! इससे प्रीतियुक्त और प्रसन्नचित्त हुए प्रतापी भगवान् वासुदेवने वलभद्रजीके साथ गोवर्धन पर्वतपर विश्राम करके अपने पूर्वभुक्त स्थानपर कुछ कालतक निवास किया ॥ १४-१५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि डिम्भकमरणे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें डिम्भकका मरणविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥
त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और वलभद्रसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
यशोदा नन्दगोपश्च कृष्णदर्शनलालसौ ।
गोवर्धनगतं श्रुत्वा वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ १ ॥
नवनीतं च दधि च पायसं कृसरं तथा ।
वन्यं पुष्पं महाराज मयूराङ्गमथैव च ॥ २ ॥
वल्लवैरपरैः सार्धं गोपिभिश्च समन्ततः ।
जग्मतुः सहसा प्रीतौ गोवर्धनमथो नृप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! यशोदा और नन्दगोपके मनमें श्रीकृष्णको देखनेके लिये बड़ी लालसा थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाईके साथ गोवर्धन पर्वतपर आये हैं, तब वे दोनों सहसा बड़े प्रसन्न हुए और मक्खन, दही, खीर, खिचड़ी, जंगली फूल तथा मोरपंखके बाजूबंद लेकर सब ओरसे एकत्र हुए दूसरे गोपों और गोपियोंके साथ गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ १-३ ॥
क्वचिद् वृक्षे समासक्तं कृष्णं कृष्णमृगेक्षणम् ।
ददर्शतुरमहाबाहुं वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ ४ ॥
वहाँ उन्होंने कृष्णमृगके समान विशाल नेत्रवाले वसुदेव-नन्दन महाबाहु श्रीकृष्णको अपने बड़े भाईके साथ कहीं वृक्षके नीचे उससे सटकर बैठे देखा ॥ ४ ॥
प्रणेमतुः सुसंहृष्टौ तत्र दृष्ट्वा महाबलौ ।
दर्शयामासतुर्देवौ पायसानि महान्ति च ॥ ५ ॥
उन्हें देखकर नन्द और यशोदा बड़े प्रसन्न हुए, फिर उन महाबली देवता श्रीकृष्ण-बलदेवने नन्द और यशोदाको प्रणाम किया। इसके बाद यशोदा और नन्दने खीर आदि महत्त्वपूर्ण उपहार उनके सामने प्रस्तुत किया ॥ ५ ॥
तात मातर्व्रजे गोष्ठे कुशलं वा स्वगोधनम् ।
अपि गावः क्षीरवत्यो वत्सा वत्सतराः पितः ॥ ६ ॥
उस समय श्रीकृष्णने पूछा—चाचा! मैया! व्रजके गोष्ठमें अपने सभी गोधन सकुशल तो हैं न? पिताजी! गौएँ दूध देती हैं न? उनके बड़े-छोटे बछड़े सुखी हैं न ॥ ६ ॥
अपि वा सुशुभं क्षीरमपि गावः सुशोभनाः ।
अपि वा दारका मातर्वत्सपालाः पिबन्ति च ॥ ७ ॥
'क्या व्रजकी गोओंका दूध शुद्ध एवं मङ्गलकारी होता है? क्या अपने यहाँ सुन्दर शोभामयी गौएँ हैं! मैया! छोटे-छोटे बच्चे और बछड़े चरानेवाले बालक भरपूर दूध पीते हैं न ? ॥ ७ ॥
बहूनि चापि दामानि कीलका अपि वा बहु ।
तृणानि बहुरूपाणि किं वा सन्ति पितः सदा ॥ ८ ॥
'तात! क्या अपने यहाँ बहुत-सी रस्सियाँ, बहुतेरे खूँटे तथा अनेक प्रकारकी घासें सदा प्रस्तुत रहती हैं? ॥ ८ ॥
शकटानि सुगन्धीनि किं वा सन्ति पितुर्गृहम् ।
अपि गोप्यः पुत्रवत्यो दारकान् किमजीजनन् ॥ ९ ॥
'पिताजी! क्या छकड़े सदा गोरससे सुगन्धित रहते हैं? क्या गोपियाँ पुत्रवती हुई हैं? क्या उन्होंने बच्चोंको जन्म दिया है ? ॥ ९ ॥
| १०९२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
घटाः किं बहवो मातरभिन्नाः सर्वतो व्रजे ।
किं गावः क्षीरमतुलं स्रवन्त्यहरहः पितः ॥ १० ॥
'मैया ! क्या ब्रजमें सब ओर बिना फूटे हुए बहुत-से घड़े हैं ? बाबा ! क्या गौएँ प्रतिदिन अतुलनीय दुग्ध प्रदान करती हैं ? ॥ १० ॥
हैयङ्गवीनं क्षीराणि दधि वा किमजीजनन् ।
गोधनं सर्वमेवेदं नीरोगं प्रतिपद्यते ॥ ११ ॥
'क्या अपनी गौओंने दूध-दही और मक्खनकी उपज बढ़ायी है ? अपना सारा गोधन नीरोग तो है न ?' ॥ ११ ॥
नन्द उवाच
सर्वमेतद् यदुश्रेष्ठ नीरोगं बहुशः प्रभो ।
कुशलं गोधनस्यैव सर्वकालेषु केशव ॥ १२ ॥
नन्द बोले--'प्रभो ! यदुश्रेष्ठ ! अपना यह सारा गोधन प्रायः नीरोग ही है । केशव ! गोधन तो सदा ही सकुशल है ॥ १२ ॥
रक्षणात् तव देवेश सदा कुशलिनो वयम् ।
सगोधनाः सवत्साश्च नीरोगा इव केशव ॥ १३ ॥
देवेश्वर ! तुम्हारे संरक्षणसे हमलोग सदा कुशलपूर्वक रहते हैं । केशव ! हम गोधन और बछड़ोंसहित नीरोग-से ही हैं ॥ १३ ॥
एकमेव सदा दुःखं न त्वां द्रक्ष्यामि केशव ।
यदेतत् केवलं दुःखमिति धीः शीर्यते सदा ॥ १४ ॥
श्रीकृष्ण ! मुझे तो सदा एक ही दुःख बना रहता है कि मैं तुम्हें भर आँख देख नहीं पाता हूँ । यह जो एक ही दुःख है, इससे सदा मेरा अन्तःकरण व्यथित रहता है ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमादि विलप्यन्तं गच्छेत्याह स केशवः ।
यशोदां पुनराहेदं मातर्गच्छ गृहं प्रति ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इस तरह विलाप करते हुए नन्दसे भगवान् श्रीकृष्णने कहा--'बाबा ! रोओ मत ! अपने घरको जाओ।' फिर उन्होंने यशोदासे कहा--'मैया ! तुम भी घर जाओ ॥ १५ ॥
ये च त्वां कीर्तयिष्यन्ति ते च स्वर्गमवाप्नुयुः ।
ये केचित् त्वां नमस्यन्ति ते मे प्रियतराः सदा ॥ १६ ॥
मद्भक्ताः सर्वदा सन्तु गच्छेत्याह च तां हरिः ।
'जो लोग तुम्हारा कीर्तन करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायेंगे तथा जो कोई तुम्हे नमस्कार करेंगे, वे सदा-सर्वदा मेरे परम प्रिय भक्त होंगे।' ऐसा कहकर श्रीहरिने मैयासे कहा--'तुम जाओ' ॥ १६ १/२ ॥
इत्युक्त्वा पितरौ देवो वासुदेवः सनातनः ॥ १७ ॥
गाढमालिङ्ग्य तौ प्रीतौ प्रेषयामास केशवः ।
यशोदा नन्दगोपश्च जग्मतुः स्वगृहं प्रति ॥ १८ ॥
माता-पितासे ऐसा कहकर सनातन भगवान् वासुदेवने प्रसन्नतापूर्वक उनके गलेसे लगकर उन्हें विदा किया। तत्पश्चात् यशोदा और नन्दगोप अपने घरको लौट गये ॥ १७-१८ ॥
ततः कृष्णो हृषीकेशो यादवैः सह वृष्णिभिः ।
गन्तुमैच्छत् तदा विष्णुः पुरीं द्वारवतीं किल ॥ १९ ॥
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक विष्णुरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवों तथा वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीको लौट जानेकी इच्छा की ॥ १९ ॥
य एतच्छृणुयान्नित्यं पठेद् वापि समाहितः ।
पुत्रवान् धनवांश्चैव अन्ते मोक्षं च गच्छति ॥ २० ॥
जो एकाग्रचित्त हो सदा इस प्रसंगको सुनता अथवा पढ़ता है, वह इस लोकमें पुत्रवान् और धनवान् होता है तथा अन्तमे मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि यशोदानन्दगोपबलभद्रकृष्णसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें यशोदा, नन्दगोप, बलभद्र और श्रीकृष्णका समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥
एकत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः
द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन
| वैशम्पायन उवाच<br>गच्छन्नथ महाविष्णुः पुष्करं प्राप्य यादवैः ।<br>अपश्यन्मुनिमुख्यांस्तु पुष्करस्थान् नृपोत्तम ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! वहाँसे जाते हुए महाविष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंके साथ पुष्करमें पहुँचकर वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ मुनियोंका दर्शन किया ॥ १ ॥ | ते समेत्य महादेवमुपयो वीतमत्सराः ।<br>अर्घ्यादिसमुदाचारं कृत्वैनं यादवोत्तमम् ॥ २ ॥<br>प्रोचुर्विश्वेश्वरं विष्णुं भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।<br><br>उन मात्सर्यरहित ऋषियोंने इन यदुकुलतिलक महान् देव श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें अर्घ्य आदि निवेदन करनेके पश्चात् भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा--॥ २ १/२ ॥ |
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९३
अत्यद्भुतमिदं विष्णो तव वीर्यं जनार्दन ॥ ३ ॥
येन तौ निहतौ युद्धे हंसो डिम्भक एव च।
'विष्णो ! जनार्दन ! आपका यह बल-पराक्रम अत्यन्त अद्भुत है, जिससे आपने युद्धमें हंस और डिम्भकको मार डाला ॥ ३½ ॥'
यो विचक्रो दुराधर्षो देवैरपि सुदुःसहः ॥ ४ ॥
संगरे निहतो देव दुःसाध्य इति नो मतिः ।
'देव ! जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह था। उस दुर्जय वीर विचक्रको भी आपने युद्धस्थलमें मार डाला ! उसे पराजित करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। ऐसा हमारा विश्वास है ॥ ४½ ॥'
क्षेमो नः सर्वकार्येषु चरतां तप उत्तमम् ॥ ५ ॥
निष्कल्मषा भविष्यामस्त्वत्संस्मरणाद्धरे ।
'अब उत्तम तपका आचरण करनेवाले हमलोगोंके सभी कार्योंमें क्षेम सुलभ हो गया। हरे ! हम आपके स्मरणसे सर्वथा निष्पाप हो जायेंगे ॥ ५½ ॥'
त्वं हि सर्वस्य दुःखस्य हर्तात्वां ध्यायतां सदा॥ ६ ॥
त्वदनुस्मरणं जन्तोः सदा पुण्यप्रदं प्रभो।
'जो सदा आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी दुःखोंको आप हर लेते हैं। प्रभो ! आपका वारंवार चिन्तन प्राणिमात्रके लिये सदा पुण्य-प्रदान करनेवाला है ॥ ६½ ॥'
त्वं हि नः सततं धाता विधाता तपसो हरे ॥ ७ ॥
त्वमोंकारो वषट्कारस्त्वं यज्ञस्त्वं पितामहः ।
'हरे ! आप ही सदा हमारी तपस्याके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही ओंकार हैं। आप ही वषट्कार हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही पितामह हैं ॥ ७½ ॥'
त्वं ज्योतिर्ब्रह्मणो मूर्तिंस्त्वं ब्रह्मा रुद्र एव च ॥ ८ ॥
प्राणस्त्वं सर्वभूतानामन्तरात्मेति कथ्यते।
उपास्यः सर्वभूतानां यज्ञैर्दानैर्जगत्पते ॥ ९ ॥
'आप ही ज्योति हैं। आप ही ब्रह्ममूर्ति हैं। आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके प्राण हैं। आप ही अन्तरात्मा कहलाते हैं। जगत्पते ! यज्ञों और दानोंद्वारा समस्त प्राणियोंके लिये उपासना करने योग्य आप ही हैं ॥ ८-९ ॥'
नमो विश्वसृजे देव नमस्ते विश्वमूर्तये ।
पाहि लोकमिमं देव हत्वा ब्रह्मद्विषः सदा ॥ १० ॥
'देव ! आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपकी मूर्ति है, आपको नमस्कार है। देव ! आप ब्रह्मद्रोहियोंका वध करके सदा इस विश्वका पालन कीजिये' ॥ १० ॥
स तथेति हरिर्विष्णुर्ययौ द्वारवतीं पुरीम् ।
अवसद् वृष्णिभिः सार्धं स्तूयमानः समागधैः ॥ ११ ॥
अथ 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीविष्णु हरि द्वारकापुरीको गये और मागधोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वृष्णिवंशियोंके साथ वहाँ निवास करने लगे ॥ ११ ॥
इयं च देवदेवस्य चेष्टा हि जनमेजय ।
प्रोक्ता ते पृच्छते राजन् किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
राजा जनमेजय ! तुम्हारे पूछनेपर मैंने देवाधिदेव श्रीकृष्णकी यह लीला तुम्हें बतायी है। तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि द्वारकायां कृष्णस्य प्रत्यागमने एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रत्यागमन-विषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य
जनमेजय उवाच
भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः ।
फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्ठिषु ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—भगवन् ! विद्वान् पुरुषोंको महाभारतका श्रवण किस विधिसे करना चाहिये ? इसका फल क्या है ? तथा इसकी समाप्तिपर किन-किन देवताओंका पूजन करना चाहिये ? ॥ १ ॥
देयं समाप्तौ भगवन् किं च पर्वणि पर्वणि ।
वाचकः कीदृशश्चात्र यष्टव्यस्तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥
भगवन् ! प्रत्येक पर्वके समाप्त होनेपर क्या दान देना चाहिये ? तथा इसमे कैसे वाचकका पूजन करना चाहिये ? यह सब मुझे बताइये ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात् ।
श्रुताद् भवति राजेन्द्र यत् त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महाभारत सुननेकी इस विधिको सुनिये। राजेन्द्र ! महाभारत श्रवण करनेसे जो फल होता है, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वह भी बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥
१०९४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवनिं गताः ।
कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्च दिवमागताः ॥ ४ ॥
महीपाल ! स्वर्गके देवता लीलाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे। वे यह (अवतार-) कार्य करके वहाँसे देवलोकको लौट आये ॥ ४ ॥
हन्त यत् ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः ।
ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले ॥ ५ ॥
जनमेजय ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। भूतलपर ऋषियों और देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५ ॥
अत्र रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्च शाश्वताः ।
आदित्याश्चाश्विनौ देवौ लोकपाला महर्षयः ॥ ६ ॥
गुह्यकाश्च सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा ।
सिद्धा धर्मः स्वयम्भूश्च मुनिः कात्यायनोवरः ॥ ७ ॥
गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः ।
ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा ॥ ८ ॥
स्थावरं जङ्गमं चैव जगत् सर्वं सुरासुरम् ।
भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमारनामक देवता, लोकपाल, महर्षि, गुह्यक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्माजी, श्रेष्ठ कात्यायन मुनि, पर्वत, सागर, नदियाँ, अप्सराएँ, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, स्थावर-जङ्गमस्वरूप सारा जगत्, देवता और असुर—ये इस महाभारतमें एकत्र स्थित देखे जाते हैं ॥ ६–९ ॥
तेषां श्रुतिप्रतिष्ठानां नामकर्मानुकीर्तनात् ।
कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः ॥ १० ॥
श्रुतिमें प्रतिष्ठित हुए इन सबके नाम और कर्मोंका बारंबार कीर्तन करनेसे मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उससे तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥
इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः ।
संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते ॥ ११ ॥
तेषां शृणु त्वं श्राद्धानि श्रुत्वा भारत भारतम् ।
ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ ॥ १२ ॥
महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च ।
गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ १३ ॥
भारत ! मनुष्य संयतचित्त एवं पवित्र हो इस इतिहासको क्रमशः यथावत् रूपसे सुनकर समूचे महाभारतके पार जाकर भारतयुद्धमें काम आये हुए वीरोंके किस प्रकार श्राद्ध करने चाहिये, यह बताता हूँ सुनो। भरतश्रेष्ठ ! महाभारत सुनकर यथाशक्ति भक्तिपूर्वक उनके लिये ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न एवं बड़े-बड़े दान देने चाहिये। गौएँ, काँसके दुग्धपात्र तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याएँ देनी चाहिये ॥ ११–१३ ॥
सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च ।
भाजनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम् ॥ १४ ॥
वे कन्याएँ सम्पूर्ण कमनीय गुणोंसे सम्पन्न हों। इनके सिवा, नाना प्रकारके वाहन, विचित्र पात्र, पृथ्वी, वस्त्र एवं सुवर्णका दान करना चाहिये ॥ १४ ॥
वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः ।
शयनं शिविकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृताः ॥ १५ ॥
वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिविका और सजे-सजाये रथ भी देने चाहिये ॥ १५ ॥
यद् यद् गृहे वरं किंचिद् यद् यदस्ति महद्धसु ।
तत् तद् देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः ॥ १६ ॥
अपने घरमें जो-जो कोई श्रेष्ठ वस्तु हो और जो-जो महान् धन हो, उसका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। अपने स्त्री-पुत्र और शरीरको भी उनकी सेवामें अर्पण कर देना चाहिये ॥ १६ ॥
श्रद्धया परया दद्यात् क्रमशस्तस्य पारगः ।
शक्तितः सुमना हृष्टः शुश्रूषुरविकत्थनः ॥ १७ ॥
क्रमशः महाभारतको समाप्त करनेवाला पुरुष शुद्ध हृदयसे हर्षपूर्वक मनमें सेवाभाव रखते हुए स्थिरतापूर्वक बड़ी श्रद्धाके साथ यथाशक्ति पूर्वोक्त वस्तुओंका दान करे ॥ १७ ॥
सत्यार्जवरतो यत्तः शुचिः शौचपरायणः ।
श्रद्दधानो जितक्रोधो यथा सिद्ध्यति तच्छृणु ॥ १८ ॥
सत्य और सरलतामे तत्पर, प्रयत्नशील, पवित्र, शौचाचारपरायण, क्रोधको जीतनेवाला तथा श्रद्धालु श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह बताता हूँ, सुनो ॥ १८ ॥
शुचिः शीलान्विताचारः शुक्लवासा जितेन्द्रियः ।
संस्कृतः सर्वशास्त्रज्ञः श्रद्दधानोऽनसूयकः ॥ १९ ॥
रूपवान् सुभगो दान्तः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
दानमानग्रहीता च कार्यो भवति वाचकः ॥ २० ॥
जो शुद्ध, सुशील, सदाचारी, श्वेतवस्त्रधारी, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता, श्रद्धालु, अदोषदर्शी, रूपवान्, सौभाग्यशाली, मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाला, सत्यवादी, इन्द्रियविजयी तथा दान-मानको ग्रहण करनेवाला हो, ऐसे विद्वान् पुरुषको ही वाचक बनाना चाहिये ॥ १९-२० ॥
अविलम्बितमनायस्तमद्रुतं घोरमूर्जितम् ।
असंसक्ताक्षरपदं न च भावसमन्वितम् ॥ २१ ॥
त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम् ।
वाचयेद् वाचकः स्वस्थः स्वाधीनः सुसमाहितः ॥ २२ ॥
भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९५
स्वस्थ वाचक स्वाधीन और एकाग्रचित्त हो इस तरह कथा बाँचे कि विलम्बसे या रुक-रुककर शब्द न निकले (धारावाहिकरूपसे कथा चलती रहे), कठोर अक्षरका उच्चारण न करे, जल्दबाजी न करे, अस्पष्ट रूपसे शब्दोंका उच्चारण न करे—इस तरह बोले कि कोई अक्षर या पद टूटने न पावे, मनमें कोई विशेष अभिप्राय (लोभ आदि) रखकर कथा न बाँचे । आठ स्थानोंसे उच्चरित होनेवाले तिरसठ वर्णोंसे युक्त महाभारतका इस तरह पाठ करे कि प्रत्येक वर्णका स्पष्टतः विवेक होता रहे ॥ २१-२२ ॥
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ २३ ॥
वाचक पहले अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (इतिहास, पुराण एवं महाभारत) का पाठ आरम्भ करे ॥ २३ ॥
ईदृशाद् वाचकाद् राजञ्छ्रुत्वा भारत भारतम् ।
नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन् स फलमश्नुते ॥ २४ ॥
राजन्! भरतनन्दन! जो श्रोता शौच, संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर एवं पवित्र रहकर ऐसे वाचकसे महाभारत सुनता है, वह उसके पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
पारणां प्रथमां प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयेत् ।
अग्निष्टोमस्य यागस्य फलं वै लभते नरः ॥ २५ ॥
प्रथम बार नियमपूर्वक हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण पूरा करके ब्राह्मणोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंसे तृप्त करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य अग्निष्टोम यागका फल पाता है ॥ २५ ॥
अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत् ।
प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः ॥ २६ ॥
उसे अप्सराओंसे भरा हुआ महान् विमान प्राप्त होता है और वह हर्षसे उत्फुल्ल एवं एकाग्रचित्त होकर देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २६ ॥
द्वितीयां पारणां प्राप्य अतिरात्रफलं लभेत् ।
सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥ २७ ॥
दूसरी बार हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण कर लेनेपर श्रोताको अतिरात्रयज्ञका फल मिलता है तथा वह सम्पूर्ण रत्नोंसे बने हुए दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ २७ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषितः ।
दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते ॥ २८ ॥
वहाँ वह दिव्य माला और वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे विभूषित हो, दिव्य अङ्गद आदि आभूषण पहनकर सदा देवलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ ॥
तृतीयां पारणां प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् ।
वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि ॥ २९ ॥
तीसरी पारणा पूरी करनेपर उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह देवताओंके समान तेजस्वी रूप धारण करके दस हजार वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है ॥
चतुर्थ्यां वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् ।
उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम् ॥ ३० ॥
विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति ।
वर्षाण्ययुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते ॥ ३१ ॥
चौथी पारणापर वाजपेय यज्ञका और पाँचवींपर उससे दूना फल मिलता है। वह उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर देवताओंके साथ आरूढ़ हो देवलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥ ३०-३१ ॥
षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् ।
कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम् ॥ ३२ ॥
परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् ।
विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम् ॥ ३३ ॥
सर्वलोकान् विचरते द्वितीय इव भास्करः ।
पाद-टिप्पणी:
१. कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्वामूल और हृदय—ये वर्णोंके उच्चारणके आठ स्थान हैं।
२. पाणिनीय शिक्षामें तिरसठ वर्णोंकी गणना इस प्रकार दी गयी है—इकीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, ᳵ क, ᳶ प तथा दुःस्पृष्ट—ये सब मिलाकर तिरसठ वर्ण हैं। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है—‘अ इ उ ऋ’ ये चार स्वर ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतके भेदसे तीन-तीन तरहके माने गये हैं, अतः ये बारह हुए। लृकारका केवल ह्रस्वरूप ही ग्रहण किया गया है—इस प्रकार ये तेरह स्वर हुए। इनके सिवा, ‘ए ओ ऐ औ’ ये दीर्घ और प्लुतके भेदसे दो-दो प्रकारके हैं, अतः आठ हुए। पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ स्वर होते हैं। ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके २५ अक्षर स्पर्श कहलाते हैं। इनको मिलानेसे ४६ अक्षर हुए। ‘य’ से लेकर ‘ह’ तकके आठ अक्षरोंको जोड़ लेनेपर इनकी संख्या ५४ होती है। प्रातिशाख्यके अनुसार चार यम होते हैं। यथा—‘प॒लिक्नी’ ‘च॒ख्नतुः’ ‘अ॒ग्निः’ ‘घ्॒घ्नन्ति’ इन उदाहरणोंमें क् ख् ग् घ्’ से परे जो इन्हींके सदृश वर्ण हैं, इन्हींकी ‘यम’ संज्ञा है। इन चार यमोंको जोड़ लेनेसे अक्षरोंकी संख्या ५८ तक पहुँचती है। इनके सिवा, अनुस्वार (अं), विसर्ग (अः) ᳵ क (जिह्वामूलीय), ᳶ प (उपध्मानीय) तथा दुःस्पृष्टवर्ण (दो स्वरोंके मध्यमें वर्तमान ळकार)—ये पाँच अक्षर और हैं। इन सबका योग तिरसठ होता है। ये ही तिरसठ अक्षर हैं।
| १०९६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
छठी पारणामें इससे दूना अर्थात् चार वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। सातवेंमे तीन गुने अर्थात् बारह वाजपेय यज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है। वह कैलास शिखरके समान उज्ज्वल एवं विशाल वैदूर्यमणिकी वेदीसे विभूषित, अनेक प्रकारके मण्डलाकार मागोंसे युक्त, मणियों और मूँगोंसे अलंकृत, अप्सराओंसे परिपूर्ण तथा इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दूसरे सूर्यके समान सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है॥ ३२-३३ १/२ ॥
अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् ॥ ३४ ॥
चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति ।
चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः ॥ ३५ ॥
आठवीं पारणा पूरी होनेपर उसे राजसूय यज्ञका फल मिलता है। वह चन्द्रोदयके समान रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है। जिसमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल और मनके समान वेगशाली घोड़े जुते होते हैं॥ ३४-३५॥
सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रकान्तरैर्मुखैः।
मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः ॥ ३६ ॥
अङ्के परमनारीणां सुखं सुप्तो विबुध्यते ।
वह देवसुन्दरीयोंके चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंसे, उनकी मेखलाओंकी ध्वनिसे तथा नूपुरोंकी झनकारोंसे सेवित हो दिव्याङ्गनाओंके अङ्कमें सुखपूर्वक सोता और जागता है॥ ३६ १/२ ॥
नवमं क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत ॥ ३७ ॥
काञ्चनस्तम्भनिर्व्यूहं वैदूर्यकृतवेदिकम् ।
जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम् ॥ ३८ ॥
सेवितं चाप्सरःसङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः ।
विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ३९ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनभूषितः।
मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापरः ॥ ४० ॥
भरतनन्दन ! नवीं पारणा पूर्ण करके श्रोता यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल पाता है। वह सोनेके खंभों और कँगूरोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी वेदीसे अलंकृत, सब ओर बने हुए सुवर्णमय दिव्य गवाक्षोंसे आवृत तथा स्वर्गमें विचरनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंसे सेवित विमानपर बैठकर अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रकाशित होता है तथा दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य चन्दनसे चर्चित हो दूसरे देवताकी भाँति देवलोकमें देवगणोंके साथ आनन्द भोगता है ॥३७–४०॥
दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च।
किङ्किणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम् ॥ ४१ ॥
रत्नवेदिकसंकाशं वैदूर्यमणितोरणम् ।
हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम् ॥ ४२ ॥
गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिर्निषेवितम् ।
विमानं सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते ॥ ४३ ॥
दसवीं पारणा पूरी करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, ऐसा करके श्रोता पुण्यात्माओंके आवासस्थान दिव्य विमानको सुखपूर्वक पा लेता है। उस विमानमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती है। ध्वजा और पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। वह रत्नमयी वेदिकाओंसे प्रकाशित होता है। उसमें वैदूर्यमणि-के फाटक लगे होते हैं। वह सब ओरसे सोनेकी जालीसे घिरा रहता है। उसके छज्जोंका मुखभाग मूँगोंसे अलंकृत होता है तथा गीतकुशल गन्धर्व और अप्सराएँ उस विमानपर सेवाके लिये उपस्थित रहती हैं॥ ४१-४३॥
मुकुटेनाकंस्वर्णेन जाम्बूनदविभूषणः ।
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गो दिव्यमाल्यविभूषितः ॥ ४४ ॥
दिव्याँल्लोकान् प्रचरति दिव्यैर्भोगैः समन्वितः ।
विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युतः ॥ ४५ ॥
वह पुरुष अपने मस्तकपर सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुटसे सुशोभित हो जाम्बूनद (सुवर्ण) के आभूषण धारण करके सारे अङ्गोंमें दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य मालाओं-से विभूषित हो, दिव्य भोगों तथा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न होकर देवताओंके प्रसादसे दिव्य लोकोंमें विचरता है॥
अथ वर्षगणान्वेवं स्वर्गलोके महीयते ।
ततो गन्धर्वसहितः सहस्राण्येकविंशतिः ॥ ४६ ॥
पुरंदरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते ।
इस प्रकार बहुत वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमे प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर गन्धर्वोंके साथ रमणीय पुरन्दरपुरी अमरावतीमें रहकर इक्कीस हजार वर्षोंतक इन्द्रके साथ आनन्द भोगता है॥
दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च ॥ ४७ ॥
दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा ।
इसके बाद नाना प्रकारके पुण्यलोकोंमें दिव्य यानों और विमानोंपर दिव्य नारियोंसे घिरा रहकर वहाँ देवताके समान निवास करता है॥ ४७ १/२ ॥
ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा ॥ ४८ ॥
शिवस्य भवने राजन् विष्णोर्याति सलोकताम् ।
राजन् ! तत्पश्चात् वह क्रमशः सूर्यभवनमें, चन्द्रलोकमें तथा भगवान् शिवके धाममे निवास करके अन्तमे भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त कर लेता है॥ ४८ १/२ ॥
एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा ॥४९॥
श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।
महाराज ! यह ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमे अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। इसपर श्रद्धा करनी चाहिये। यह मेरे गुरु व्यासजीका कथन है॥ ४९ १/२ ॥
वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद् यदिच्छति ॥ ५० ॥
हस्त्यश्वरथयानादि वाहनं च विशेषतः ।
भविष्यपर्व ] द्वातत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९७
वाचकको वह मनसे जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करे, वही देनी चाहिये। विशेषतः हाथी, घोड़े, रथ और शिविका आदि वाहन-का दान करना उचित है ॥ ५०३ ॥
कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथापरम् ॥ ५१ ॥
वस्त्रं चैव विचित्रं च गन्धं चैवं विशेषतः ।
देववत् पूजयेत् तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥
उसके लिये कड़े, कुण्डल, नूतन यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र तथा विशेषतः गन्ध आदि देकर देवताके समान उनकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ५१-५२ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते ।
वाच्यमानेऽथ विप्रेभ्यो राजन् पर्वणि पर्वणि ॥ ५३ ॥
राजन् ! अब मैं यह बता रहा हूँ कि जब महाभारतका पारायण आरम्भ हो जाय, तब प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर ब्राह्मणोंके लिये किन-किन वस्तुओंका दान देना चाहिये ॥
जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ ।
धर्मवृत्तिं च विज्ञाय ब्राह्मणानां नराधिप ॥ ५४ ॥
स्वस्ति वाच्यं द्विजैरादौ ततः कार्यं प्रवर्तयेत् ।
समाप्तपर्वणि ततः स्वशक्त्या तर्पयेद् द्विजान् ॥ ५५ ॥
भरतश्रेष्ठ ! नरेश्वर ! पर्वके आरम्भमे ब्राह्मणोंकी जाति, देश, सत्य, माहात्म्य तथा धर्मवृत्तिको जानकर पहले उनके द्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। तदनन्तर कार्य (कथा-श्रवण) आरम्भ करे। फिर उस पर्वकी समाप्ति होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको तृप्त करे ॥ ५४-५५ ॥
आदौ तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम् ।
विधिवद् भोजयेद् राजन् मधुपायससंयुतम् ॥ ५६ ॥
राजन् ! आदिपर्वके अनुक्रमणिकापर्वमें पहले वाचककी वस्त्र और गन्ध आदिसे पूजा करके उसे मधुयुक्त खीरका विधिवत् भोजन कराये ॥ ५६ ॥
ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा ।
आस्तीके भोजयेद् राजन् दद्याच्चैव गुडौदनम् ॥५७॥
नरेश्वर ! तदनन्तर आस्तीकपर्वमें प्रायः फल-मूल तथा मधु और घीसे युक्त खीर भोजन कराये तथा गुड़ और चावलका दान करे ॥ ५७ ॥
अपूपैश्चैव पूपैश्च मोदकैश्च समन्वितम् ।
सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र ! फिर सभापर्वमें पूप (पुआ), अपूप (माल-पुआ) और मोदक (लड्डू) के साथ खीर ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥ ५८ ॥
आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेच्च द्विजोत्तमान् ।
अरणीपर्व आसाद्य जलकुम्भान् प्रदापयेत् ॥ ५९ ॥
आरण्यक (वन) पर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फल-मूलसे तृप्त करे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घड़ोंका दान करे ॥ ५९ ॥
तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च ।
सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्योऽन्नं प्रदापयेत् ॥ ६० ॥
तृप्तिके मुख्य साधन, जंगली फल-मूल तथा मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका ब्राह्मणोंको दान करे ॥ ६० ॥
विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च ।
उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम् ॥ ६१ ॥
भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् ।
विराटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे। भरतश्रेष्ठ ! उद्योगपर्वमें ब्राह्मणोंको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके उन्हें मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका भोजन कराये ॥ ६१३ ॥
भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम् ।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ॥ ६२॥
राजेन्द्र ! भीष्मपर्वमे परम उत्तम शिविकाका दान करके अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किये गये सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान करे ॥ ६२ ॥
द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम् ।
शराश्च देया राजेन्द्र चापान्यसिवरांस्तथा ॥ ६३ ॥
राजेन्द्र ! द्रोणपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन अर्पित करे तथा उन्हें धनुष, बाण एवं उत्तम खङ्ग दे ॥ ६३ ॥
कर्णपर्वण्यपि तथा भोजनं सार्वकामिकम् ।
विप्रेभ्यः संस्कृतं सम्यग् दद्यात् संयतमानसः ॥ ६४ ॥
कर्णपर्वमें भी मनको संयममें रखकर ब्राह्मणोंको सबकी-रुचिके अनुकूल उत्तम संस्कारयुक्त भोजन दे ॥ ६४ ॥
शल्यपर्वणि राजेन्द्र मोदकैः सगुडौदनैः ।
अपूपैस्तर्पयेच्चैव सर्वमन्नं प्रदापयेत् ॥ ६५ ॥
महाराज ! शल्यपर्वमें लड्डू, गुडमिश्रित ओदन और पूओंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करे तथा उन्हे सब प्रकारके अन्नका दान दे ॥ ६५ ॥
गदापर्वण्यपि तथा मुद्गमिश्नं प्रदापयेत् ।
स्त्रीपर्वणि तथा रत्नैस्तर्पयेत् तु द्विजोत्तमान् ॥ ६६ ॥
गदापर्वमें भी मूँग मिलायी हुई खिचड़ीका दान करे। स्त्रीपर्वमे उत्तम ब्राह्मणोंको रत्नोंद्वारा तृप्त करे ॥ ६६ ॥
घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत् पुनः ।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ॥ ६७ ॥
ऐषीकपर्वमें पहले घी मिलाये हुए भातका दान करे। तत्पश्चात् अच्छी तरह छौंक-बघारकर बनाया हुआ सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान दे ॥ ६७ ॥
शान्तिपर्वण्यपि गते हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।
आश्वमेधिकमासाद्य भोजनं सार्वकामिकम् ॥ ६८ ॥
| १०९८ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
शान्तिपर्व पूर्ण होनेपर ब्राह्मणोंको हविष्यका भोजन कराये। फिर आश्वमेधिकपर्वमें पहुँचकर सबकी रुचिके अनुकूल भोजन दे ॥ ६८ ॥
तथाऽऽश्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद् द्विजान्।
मौसले सार्वगुणिकं गन्धमाल्यानुलेपनम् ॥ ६९ ॥
आश्रमवासिकपर्वमें ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। मौसलपर्वमें सर्वगुणसम्पन्न अन्न तथा गन्ध, माला और अनुलेपनका दान करे ॥ ६९ ॥
महाप्रस्थानिके तद्वत् सर्वकामगुणान्वितम्।
स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ॥ ७० ॥
उसी प्रकार महाप्रस्थानिकपर्वमें समस्त मनोवाञ्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका तथा स्वर्गारोहणपर्वमें हविष्यका ब्राह्मणोंको भोजन कराये ॥ ७० ॥
हरिवंशसमाप्तौ तु सहस्रं भोजयेद् द्विजान्।
गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ७१ ॥
हरिवंशकी समाप्ति होनेपर एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वर्णपदकसे युक्त एक गौका ब्राह्मणको दान करे ॥ ७१ ॥
तदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव।
प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षणः ॥ ७२ ॥
सुवर्णेन च संयुक्तं वाचकाय निवेदयेत्।
पृथ्वीनाथ ! दरिद्रको भी पूरा नहीं तो आधा दान अवश्य करना चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर वाचकको सुवर्णयुक्त पुस्तक अर्पित करे ॥७२१/२॥
हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत् ॥ ७३ ॥
श्लोकं वा श्लोकपादं वा अक्षरं वा नृपात्मज।
शृणुयादेकचित्तस्तु स विष्णुदयितो भवेत् ॥ ७४ ॥
हरिवंशपर्वमें ब्राह्मणोंको खीर भोजन कराये। राजकुमार ! जो एकाग्रचित्त होकर हरिवंशके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुका प्रिय भक्त होता है ॥ ७३-७४ ॥
व्यासं चैव सपत्नीकं पूजयेच्च यथाविधि।
लक्ष्मीनारायणं देवं पूजितं तं च पूजयेत् ॥ ७५ ॥
कथावाचक व्यासकी उसकी पत्नीके साथ विधिवत् पूजा करे। इससे भगवान् लक्ष्मीनारायणका पूजन हो जाता है। फिर पूर्वपूजित भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी भी पूजा करे ॥७५॥
वाचकं पूजयेद् यस्तु भूमिवस्त्रसुधेनुभिः।
विष्णुः सम्पूजितस्तेन स साक्षाद् देवकीसुतः ॥७६॥
जो भूमि, वस्त्र और उत्तम धेनु देकर वाचककी पूजा करता है, उसके द्वारा साक्षात् विष्णुरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जाता है ॥ ७६ ॥
पारणे पारणे राजन् यथावद् भरतर्षभ।
समाप्य सर्वाः प्रयततः संहिताः शास्त्रकोविदः ॥ ७७ ॥
शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृतः।
शुक्लाम्बरधरः श्रीमाञ्छुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः ॥ ७८ ॥
अर्चयेत् तं यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक् पृथक्।
संहितापुस्तकञ्च राजन् प्रयततः शिष्टसम्मतः ॥७९॥
राजन् ! भरतवंशावतंस जनमेजय ! शास्त्रज्ञ पुरुष इन्द्रिय-संयमपूर्वक यथोचित रूपसे सम्पूर्ण महाभारत-संहिताको (हरिवंशसहित) पूर्ण करके प्रत्येक पारणामें वाचकको शुभ स्थानमें बैठाकर रेशमी वस्त्र अथवा शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करके शोभा-सम्पन्न, पवित्र एवं अलंकृत हो यथोचित रीतिसे पृथक्-पृथक् गन्ध, माल्य आदि अर्पित करके उस वाचककी पूजा करे। राजन् ! संयतचित्त एवं शिष्ट पुरुषों-द्वारा सम्मानित पुरुष संहिताकी पुस्तकोंका भी पूजन करे ॥ ७७-७९ ॥
भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च कामैश्च विविधैः शुभैः।
हिरण्यं गां च वस्त्रं च दक्षिणामथ दापयेत् ॥ ८० ॥
वाचकको उत्तमोत्तम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, पेय रस आदि तथा नाना प्रकारकी शुभ मनोवाञ्छित वस्तुओंके साथ सुवर्ण, गौ, वस्त्र तथा दक्षिणा समर्पित करे ॥ ८० ॥
सर्वत्र त्रिपलं स्वर्णं दातव्यं प्रणतात्मना।
तदर्धे पादशेषं वा वित्तशाठ्यविवर्जितम् ॥ ८१ ॥
सभी पारणाओंमें प्रणतभावसे तीन पल (तीन भर) सुवर्ण देना चाहिये। इतना सम्भव न हो तो सवा दो भर या डेढ़ भर अवश्य दे। धन रहते हुए कंजूसी न करे ॥ ८१ ॥
यद् यदेवात्मनोऽभीष्टं तत् तद् देयं द्विजातये।
सर्वथा तोषयेद् भक्त्या वाचकं गुरुमात्मनः।
देवताः कीर्तयेत् सर्वा नरनारायणौ तथा ॥ ८२ ॥
जो-जो वस्तु अपनेको अभीष्ट हो, उसी-उसीका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। वाचक अपना गुरु है, अतः भक्ति-भावसे उसको सर्वथा संतुष्ट करे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंका तथा नर-नारायणका कीर्तन करे ॥ ८२ ॥
ततो गन्धैश्च माल्यैश्च स्वलंकृतद्विजोत्तमान्।
तर्पयेद् विविधैः कामैर्दानैश्चोच्चावचैस्तथा ॥ ८३ ॥
तदनन्तर गन्ध, माल्य आदिसे भलीभाँति अलंकृत किये गये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके कमनीय पदार्थ तथा अनेक प्रकारके छोटे-बड़े दान देकर तृप्त करे ॥ ८३ ॥
अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः।
प्राप्नुयाच्च क्रतुफलं तथा पर्वणि पर्वणि ॥ ८४ ॥
ऐसा करनेवाला मनुष्य अतिरात्र यज्ञका फल पाता है। प्रत्येक पर्वपर ऐसा करनेसे यज्ञ-फलकी प्राप्ति होती है ॥८४॥
वाचको भरतश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वरः।
भविष्यं श्रावयेद् विप्रान् भारतं भरतर्षभ ॥ ८५ ॥
भरतकुलतिलक जनमेजय ! वाचकको चाहिये कि वह
[ भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९९
सुस्पष्ट अक्षर, पद एवं स्वरके साथ ब्राह्मणोंके भविष्यपर्व एवं भारतका श्रवण कराये ॥ ८५ ॥
भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेषु यथावत् सम्प्रदापयेत् ।
वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम् ॥ ८६ ॥
भरतश्रेष्ठ ! श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वाचकको भी भोजन कराकर उसे भलीभाँति अलंकृत करके यथोचित रूपसे दक्षिणा दे ॥ ८६ ॥
वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरुत्तमा ।
ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु प्रसन्नाः सर्वदेवताः ॥ ८७ ॥
वाचकके संतुष्ट होनेपर परम उत्तम मङ्गलमयी प्रीति प्राप्त होती है। अन्य ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ८७ ॥
ततो हि भरणं कार्यं द्विजानां भरतर्षभ ।
सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च यथाक्रमम् ॥ ८८ ॥
भरतभूषण ! तत्पश्चात् यथोचित रूपसे सब प्रकारके उत्तम, मनोवाञ्छित पदार्थ देकर क्रमशः सभी द्विजोंका भरण-पोषण करना चाहिये ॥ ८८ ॥
इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर ।
श्रद्धानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ८९ ॥
नरश्रेष्ठ ! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके अनुसार मैंने तुमसे महाभारत और हरिवंश सुननेकी यह विधि बतायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये ॥ ८९ ॥
भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम ।
सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ॥ ९० ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! जो परम कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे हरिवंशसहित महाभारत सुनने और उसकी पारणा पूरी करनेके लिये सदा यत्नशील रहना चाहिये ॥ ९० ॥
भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत् ।
भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ॥ ९१ ॥
प्रतिदिन भारतका श्रवण करे। नित्य-प्रति भारतका कीर्तन करे। जिसके घरमें महाभारतकी पुस्तक है, उसके हाथमें विजय है ॥ ९१ ॥
भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः ।
भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परिकीर्तयेत् ॥ ९२ ॥
भारत परम पुण्यमय ग्रन्थ है। भारतमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवतालोग भी भारतका सेवन करते हैं, अतः भारतका अवश्य कीर्तन करे ॥ ९२ ॥
भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ ।
भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९३ ॥
भरतश्रेष्ठ ! भारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। भारतके अनुशीलनसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुम्हे तत्त्वकी बात बता रहा हूँ ॥ ९३ ॥
महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् ।
ब्राह्मणं केशवं चापि कीर्तयन् नावसीदति ॥ ९४ ॥
जो महाभारत इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान् श्रीकृष्णका कीर्तन करता है, वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता ॥ ९४ ॥
वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ ९५ ॥
भरतभूषण ! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका गान किया जाता है ॥ ९५ ॥
यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः ।
तच्छ्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥ ९६ ॥
जो इस लोकमें परम पदकी इच्छा रखता हो, उस मनुष्यको चाहिये कि जिसमें भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाएँ और सनातन श्रुतियाँ हैं, उस महाभारत एवं हरिवंशका वह श्रवण करे ॥ ९६ ॥
एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम् ।
एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ॥ ९७ ॥
यह परम पवित्र है। यह धर्मका निरूपण करनेवाला शास्त्र है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे युक्त है। अतः कल्याण-कामी पुरुषको इसका श्रवण करना चाहिये ॥ ९७ ॥
क्रियतेऽसारसंसारे वाञ्छितस्यैव कारणम् ।
हरिवंशस्य श्रवणमिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ९८ ॥
इस असार संसारमें हरिवंशका श्रवण सभी मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है, इसलिये श्रेष्ठ पुरुष इसका श्रवण करते हैं। ऐसा द्वैपायन वेदव्यासका कथन है ॥ ९८ ॥
अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतैस्तथा ।
यत् फलं प्राप्यते पुंभिस्तद्धरेर्वंशपारणात् ॥ ९९ ॥
एक हजार अश्वमेध और एक सौ वाजपेय यज्ञ करनेसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह हरिवंशका पारायण करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है ॥ ९९ ॥
अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं
सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् ।
निरुपममनुमेयं योगिनां ज्ञानगम्यं
त्रिभुवनगुरुमीशं त्वां प्रपन्नोऽस्मि विष्णो ॥ १०० ॥
विष्णो ! आप अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्यान करने योग्य, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि-कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, अनुमानके योग्य, योगियोंके लिये ज्ञानगम्य, तीनों लोकोंके गुरु तथा ईश्वर हैं, अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १०० ॥
सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु ।
११०० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
सर्वेषां वाञ्छिता अर्था भवन्त्यस्य च पारणात् ॥ १०१ ॥
इस ग्रन्थके नियमपूर्वक पठन एवं श्रवणसे सब लोग दुर्गम संकटोंसे पार हो जायं, सब कल्याणका दर्शन करें तथा सबके मनोवाञ्छित अर्थ सिद्ध हो जायें ॥ १०१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि श्रवणफलकथने द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें महाभारत और हरिवंशके श्रवणके फलका वर्णनविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥
त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
त्रिपुर-वधकी कथा
जनमेजय उवाच
त्र्यक्षाद् वधमहं ब्रह्मञ्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
त्रयाणां पुरसंज्ञानां खेचराणां समासतः ॥ १ ॥
जनमेजयनें पूछा— ब्रह्मन् ! दैत्योंके जो आकाशमें विचरनेवाले तीन पुर थे, उनका त्रिनेत्रधारी महादेवजीके हाथसे किस प्रकार वध हुआ ? इस प्रसङ्गको मैं ठीक-ठीक और संक्षेपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरतः सर्वं यन्मां पृच्छसि नैधनम् ।
दैत्यानां बाहुबलिनां सर्वप्राणिविरोधिनाम् ॥ २ ॥
शंकरेण वधं राजञ्छूलैस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
कृतं पुरासुरेन्द्राणां सर्वभूतवधैषिणाम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! जो समस्त प्राणियोंके विरोधी थे, उन बाहुबलशाली दैत्योंका भगवान् शङ्करके हाथ किस प्रकार निधन हुआ ? यह जो तुम मुझसे पूछते हो, यह सारा प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक सुनो—पूर्वकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके वधकी इच्छावाले उन असुरेन्द्रोंका वध भगवान् शिवने अपने सीधे जानेवाले तीन शूलोंद्वारा किया था ॥ २-३ ॥
त्रिपुरं पुरुषव्याघ्र बृहद्धातुसमीरितम् ।
विक्रामति नभोमध्ये मेघवृन्दमिवोत्थितम् ॥ ४ ॥
नरव्याघ्र ! वे तीनों पुर बृहद् (बहुमूल्य एवं महान्) धातुओंसे निर्मित हुए थे । वे आकाशमें उमड़े हुए मेघ-समूहोंकी भाँति प्रकट होकर सर्वत्र विचरते थे ॥ ४ ॥
प्राकारेण प्रवृद्धेन काञ्चनेन विराजता ।
मणिभिश्च प्रकाशद्भिः सर्वरत्नैश्च तोरणैः ॥ ५ ॥
बभासे नभसो मध्ये श्रिया परमया ज्वलत् ।
गन्धर्वाणामिवोद्विग्नं कर्मणा साधितं पुरम् ॥ ६ ॥
सुवर्णनिर्मित ऊँचे विशाल एवं प्रकाशमान परकोटेसे उद्दीप्त होनेवाली मणियोंसे तथा सर्वरत्नमय फाटकोंसे वे तीनों पुर आकाशमण्डलमें चमकते रहते थे । वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रज्वलित हो रहे थे । तपस्यारूपी कर्मसे साधित हुए वे भयंकर पुर गन्धर्वोंके नगर-से जान पड़ते थे ॥ ५-६ ॥
वाजिनः पक्षसंयुक्ता वहन्ति बलदर्पिताः ।
पुरं प्रभाकरश्रेष्ठं मनोभिः कामवृंहणैः ॥ ७ ॥
बलके अभिमानसे युक्त, पङ्खवाले घोड़े सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान उस पुरको इच्छानुसार बढ़नेवाले मनके तुल्य वेगसे ढोया करते थे ॥ ७ ॥
धावन्ति हेषमाणास्ते विक्रमैः प्राणसम्भृतैः ।
आह्वयत इवाकाशं खुरैः श्यामदलप्रभैः ॥ ८ ॥
सारी प्राणशक्ति लगाकर संचित किये गये बल-विक्रमसे जब वे घोड़े हिनहिनाते हुए दौड़ते थे, उस समय उनकी काली टापोंसे आकाश आहत होता-सा प्रतीत होता था ॥ ८ ॥
वायुवेगसमैर्वेगैः कालयन्त इवाम्बरम् ।
असुराः समदृश्यन्त चक्षुर्भिर्विदितात्मभिः ॥ ९ ॥
ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्विषैः ।
जिन्होंने तपस्यासे सारे पापोंको दग्ध कर दिया था तथा जो अग्निके समान तेजस्वी थे, वे आत्मज्ञानी महर्षि ही अपने नेत्रोंद्वारा उन असुरोंको देख पाते थे । वे वायुके समान वेगसे समूचे आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए-से जान पड़ते थे ॥
गीतवादित्रबहुलं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ १० ॥
चित्राद्युधसमाकीर्णैः प्रतप्तकनकप्रभैः ।
भवनैर्बहुभिश्चैव प्रांशुभिः समलंकृतैः ॥ ११ ॥
देवेन्द्रभवनाकारैः शुशुभे तन्महाद्युति ।
उन पुरोंमें प्रायः गीत और वाद्यके समारोह होते रहते थे । वे गन्धर्वनगरके समान प्रतीत होते थे । विचित्र आयुधोंसे भरे हुए, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा विविध अलंकारोंसे अलंकृत बहुसंख्यक ऊँचे भवन, जो देवराज इन्द्रके भवनकी भाँति सुशोभित होते थे, उन महातेजस्वी पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १०-११ १/२ ॥
प्रासादाग्रैः प्रवृद्धैश्च कैलासशिखरप्रभैः ॥ १२ ॥
शुशुभे दैत्यनगरं बहुसूर्यमिवाम्बरम् ।
कैलासके शृङ्गोंकी भाँति प्रकाशित होनेवाले बड़े-बड़े प्रासादशिखरोंसे युक्त दैत्योंका वह नगर अनेक सूर्योंसे प्रकाशित आकाशके समान सुशोभित होता था ॥ १२ १/२ ॥
वराट्टालकसम्पन्नं तप्तकाञ्चनप्रभम् ॥ १३ ॥
प्रदीप्तमिव तेजोभी रराजार्थ महाप्रभो ।
महाराज ! बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे सम्पन्न, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा तेजसे प्रज्वलित-सा वह दैत्य-नगर बड़ी शोभा पाता था ॥ १३ १/२ ॥
[ भविष्यपर्व ] त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १११०१
क्ष्वेडितोत्कृष्टबहुलं सिंहनादविनादितम् ॥ १४ ॥
बभौ बहुजनाकीर्णं वनं चैत्ररथं यथा।
वहाँ गर्जना और कोलाहल अधिक होते थे। वह नगर वीरोंके सिंहनादसे गूँजता रहता था। मनोहर स्त्री-पुरुषोंसे भरा होनेके कारण वह चैत्ररथ नामक वनके समान सुशोभित होता था ॥ १४½ ॥
समुच्छ्रितपताकं तदसिभिश्च विराजितम् ॥ १५ ॥
रराज त्रिपुरं राजन् महाविद्युदिवाम्बरे।
राजन् ! ऊँची-ऊँची पताकाओंसे सुशोभित तथा चमचमाती हुई तलवारोंसे प्रकाशित वह त्रिपुर नामक नगर आकाशमें विशाल विद्युत्के समान उद्भासित होता था ॥
सूर्यनाभश्च दैत्येन्द्रश्चन्द्रनाभश्च भारत ॥ १६ ॥
तथान्ये च महावीर्या दानवा बलदर्पिताः।
भारत ! उस नगरमे दैत्यराज सूर्यनाभ, चन्द्रनाभ तथा अन्य महापराक्रमी बलाभिमानी दानव रहते थे ॥ १६½ ॥
ममृदुश्च बभञ्जुश्च मोहिताः परमेष्ठिना ॥ १७ ॥
पन्थानं देवगमनं पितृयानं च भारत।
भारत ! वे अभिमानसे मोहित होकर ब्रह्माजीके बनाये हुए देवयान और पितृयान मार्गको तोड़ने-फोड़ने एवं नष्ट करने लगे ॥ १७½ ॥
तैरेवमसुराग्रैश्च प्रगृहीतशरासनैः ॥ १८ ॥
दानवैर्नरशार्दूल देवयाने महापथे।
पितृवाहिवलोपेते हते भरतसत्तम ॥ १९ ॥
ब्रह्माणमभ्यधावन्त सर्वे सुरगणास्तथा।
विवर्णवदना दीनाश्छिन्ने वै गतिकर्मणि ॥ २० ॥
पुरुषसिंह ! भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार हाथमें धनुष लेकर उन श्रेष्ठ असुरों और दानवोंने जब अग्निवलसे युक्त देवयान और पितरोंके वलसे युक्त पितृयान नामक महामार्ग-का अपहरण कर लिया, तव समस्त देवगण ब्रह्माजीके पास दौड़े गये। उनका मुख उदास हो गया था। वे दोनों मागोंके नष्ट होनेसे गमन-कर्मका उच्छेद हो जानेके कारण अत्यन्त विवर्ण (शोकाकुल) हो रहे थे ॥ १८-२० ॥
अनुवंशं गताः स्थित्वा स्वरेणार्त्तनिनादिना।
हन्यामहे शत्रुगणैर्भागोच्छेदेन भागद ॥ २१ ॥
वे ब्रह्माजीके सामने खड़े होकर आर्तनादयुक्त स्वरसे बोले—'देवताओंको भाग देनेवाले पितामह ! शत्रुगण हमारे यज्ञभागका उच्छेद करके हमें मार रहे हैं ॥ २१ ॥
तेषां चैव वधोपायं वदस्व वदतां वर।
यं ज्ञात्वा बाहुबलिनो बाधेम समरे परान् ॥ २२ ॥
'वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! उन दैत्योंके वधका कोई उपाय बताइये, जिसे जानकर हम बाहुबलशाली देवता समरमे शत्रुओंको पीड़ित कर सकें ॥ २२ ॥
सान्त्वयित्वा तु वरदो ब्रह्मा प्रोवाच देवताः।
शृणुध्वं देवताः सर्वाः शत्रुप्रतिकृतिं पराम् ॥ २३ ॥
अवध्या दानवाः सर्वे ऋते शंकरमव्ययम्।
तब वरदायक ब्रह्माजीने उन देवगणोंको सान्त्वना देकर उनसे कहा—'देवताओ ! तुम सब लोग शत्रुओंसे बदला लेनेका उत्तम उपाय सुनो—वे समस्त दानव अविनाशी भगवान् शङ्करके सिवा दूसरेके लिये अवध्य हैं' ॥ २३½ ॥
प्रतिगृह्य च तद् वाक्यं मनोभिर्वाग्भिरेव च ॥ २४ ॥
भूमौ प्रपेदिरे सर्वे सह रुद्रैश्च भारत।
भरतनन्दन ! उनके उस वचनको मन और वाणीद्वारा स्वीकार करके सब देवता रुद्रगणोंके साथ पृथ्वीपर आये ॥
विन्ध्यपादे च मेरौ च मध्ये च पृथिवीतले ॥ २५ ॥
तपसोग्रेण योगज्ञाः सर्वे ते मुनयोऽभवन्।
काश्यपेयं हरं प्राप्ता जपन्तो ब्रह्मसंहिताम् ॥ २६ ॥
वे विन्ध्य और मेरु पर्वतकी तलैटीमें तथा भूतलके मध्यभागमें उग्र तपस्या करते हुए सब-के-सब योगज्ञ मुनि हो गये और ब्रह्मसंहिता (प्रणव) का जप करते हुए कश्यप-नन्दन हरकी शरणमें गये ॥ २५-२६ ॥
तेषां च परदाराणामभवद् वन्ध्यता जने।
विन्यस्तदर्भनिचये ताम्रलोहं च भूषणम् ॥ २७ ॥
उनके लिये जनसमुदायमें परायी स्त्रियाँ वन्ध्य—निष्फल अर्थात् मोह उत्पन्न करनेमें असमर्थ थीं। वे कुशकी चटाई बिछाकर उसीपर सोते थे। ताँबा और लोहा ही उनका आभूषण था ॥ २७ ॥
परिधानानि चर्माणि मृदूनि च शुभानि च।
स्वयं मृतानां कृष्णानां मृगाणां कुरुसत्तम ॥ २८ ॥
गृहीतानि विमुक्तानि देहेभ्यो वनचारिणाम्।
कुरुश्रेष्ठ ! स्वयं मरे हुए वनचारी काले मृगोके शरीरोंसे उधेड़कर लिये गये सुन्दर और कोमल मृगचर्म एवं व्याघ्रम्बर ही उनके पहननेके वस्त्र थे ॥ २८½ ॥
अन्तरिक्षमथोपेत विविशुर्माययाऽऽवृताः ॥ २९ ॥
हरालयं सुराः सर्वे व्याघ्रचर्मनिवासिनः।
प्रणिपत्याथ ते दीना भगवन्तं जगत्पतिम् ॥ ३० ॥
सुव्यक्तनाभिधानेन प्रभाषन्त हरं ततः।
व्याघ्रचर्म धारण करके मायासे अपनेको छिपाकर समस्त देवता आकाशमार्गका आश्रय ले भगवान् शङ्करके धाममें जा पहुँचे और उन भगवान् विश्वनाथ हरको प्रणाम करके स्पष्ट शब्दोंमें उनसे बोले—॥ २९-३०½ ॥
हविर्दत्तमविक्षानाद् भस्मच्छन्नेषु वह्निषु ॥ ३१ ॥
वरदानं वृथास्मासु भगवन् विमुखे त्वयि।
११०२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
यथादेशं यथाकालं क्रियतां ब्रह्मणो वचः ॥ ३२ ॥ यदुक्तं देवदेवेन खेचराणां समीपतः ।
'भगवन् ! आपने हमारी ओरसे मुँह फेर लिया है, इसलिये जैसे राखसे ढकी हुई आगमें अज्ञानवश दी हुई आहुति निष्फल हो जाती है, उसी प्रकार हमें मिला हुआ वरदान व्यर्थ हो गया है। अतः देवाधिदेव ब्रह्माजीने आकाश-चारी देवताओंके समीप जो बात कही थी, उनके उस वचन-का आप देश-कालके अनुसार पालन करें' ॥ ३१-३२३ ॥
एवं देववचोभिश्च भाविनोऽर्थस्य वैभवात् ॥ ३३ ॥ समनह्यन्महादेवो देवैः सह सवासवैः ।
इस प्रकार देवताओंके कहनेसे तथा भावी कार्यके प्रभावसे प्रेरित हो इन्द्र आदि देवताओंके साथ महादेवजी कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ३३३ ॥
आदित्यपथमास्थाय संनद्धाः समलंकृताः ॥ ३४ ॥ सर्वे काञ्चनवर्णाभा वभुर्दीप्ता इवाग्नयः ।
वे सब-के-सब कवच और अलंकार धारण करके सुवर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित हो सूर्यके मार्गका आश्रय ले प्रज्वलित अग्नियोंके समान उद्भासित होने लगे ॥ ३४३ ॥
रुद्रेण सहिता रुद्रा दहन्त इव तेजसा ॥ ३५ ॥ संनद्धाः कुशलाः सर्वे प्रांशवः पर्वता इव ।
महादेवजीके साथ कवच बाँधकर युद्धकुशल समस्त रुद्रगण अपने तेजसे शत्रुओंको दग्ध से करने लगे। वे पर्वतोंके समान ऊँचे दिखायी देते थे ॥ ३५३ ॥
विश्वे विश्वेन वपुषा बलिनः कामरूपिणः ॥ ३६ ॥ समनह्यन्महात्मानो दानवान्तं विधित्सवः ।
दानवोंका अन्त करनेकी इच्छावाले वे सभी महात्मा बलवान् तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। वे अपने विश्वमय शरीरसे कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥
एभिः सहघनाध्यक्षैः समन्तात् परिवारितः ॥ ३७ ॥ त्रिपुरं योधयत् त्र्यक्षः प्रगृह्य सशरं धनुः ।
कुबेरसहित इन समस्त देवताओंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए त्रिनेत्रधारी महादेवने धनुष-बाण लेकर त्रिपुरवासियोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ३७३ ॥
अथ दैत्या भिन्नदेहाः पुराट्टालं गता इव ॥ ३८ ॥ न्यपतन्त विदेहास्ते विशीर्णा इव पर्वताः ।
तदनन्तर जैसे नगरकी अट्टालिकापर चढ़े हुए लोग गिरते हों, उसी प्रकार वे त्रिपुरवासी दैत्यगण अपने शरीरोंके विदीर्ण हो जानेसे देहरहित हो जीर्ण-शीर्ण हुए पर्वतोंके समान उस नगरसे नीचे गिरने लगे ॥ ३८३ ॥
अतिविद्धाः सुविद्धाश्च रणमध्यगता नृप ॥ ३९ ॥ न्यपतन् दैत्यसंघाता वज्रेणेव हता नगाः ।
नरेश्वर ! समराङ्गणमें आये हुए दैत्यसमूह अत्यन्त घायल और क्षत-विक्षत हो वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे ॥ ३९३ ॥
असिभिश्च हता देवैः शक्तिचक्रपरश्वधैः ॥ ४० ॥ बाणैश्च भिन्नमर्माणो दैत्येन्द्रा युद्धगोचरे । प्रपेतुः सहिता उर्व्यां छिन्नपक्षा इवाचलाः ॥ ४१ ॥
देवताओंके खड्गों, शक्तियों, चक्रों, फरसों और बाणोंसे युद्धस्थलमें मारे गये उन दैत्यराजोंके मर्म विदीर्ण हो गये और वे पंख कटे हुए पर्वतोंके समान एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४०-४१ ॥
तत्र संज्ञां विमुञ्चन्ति दीप्यमानेन तेजसा । एवं तेऽन्योन्यसम्बाधे क्षीयन्ते क्षयकर्मणा ॥ ४२ ॥ नोपालभ्यन्त चक्षुर्भ्यामपि दिव्येन चक्षुषा ।
देवताओंके बढ़ते हुए तेजसे दग्ध हो वे दैत्य वहाँ अपनी सुध-बुध खोने लगे। इस प्रकार वे देवता और दैत्य एक-दूसरेको बाधा देते हुए युद्धरूपी क्षयकर्मसे क्षीण होने लगे। दैत्योंके दोनों नेत्रोंसे तथा दिव्य दृष्टिसे देखनेपर भी उस समय देवता उनकी पकड़में नहीं आते थे ॥ ४२३ ॥
अस्तं प्राप्ते दिनकरे सुरेन्द्रास्ते निशामुखे । छिन्नभिन्नक्षतमुखा निपेतुर्वसुधातले ॥ ४३ ॥
सूर्यके अस्त हो जानेपर प्रदोषकालमें (सबल हुए दैत्योंके आक्रमणसे) उन देवेश्वरोंके मुख छिन्न-भिन्न एवं क्षत-विक्षत हो गये तथा वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४३ ॥
अथ दैत्या जयं प्राप्ता निशायां निशितैः शरैः । विनेदुर्विपुलैर्नादैर्मेघा इव महार्णवाः ॥ ४४ ॥
रातमें अपने तीखे बाणोंसे विजयको प्राप्त हुए दैत्यगण महान् सिंहनाद करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले मेघों-की भाँति बड़ा भारी कोलाहल मचाने लगे ॥ ४४ ॥
जयप्राप्त्यासुराश्चैव तेऽन्योन्यमभिजल्पिरे । त्रासितास्त्रिदशाः सर्वे संग्रामजयकाङ्क्षिणः ॥ ४५ ॥ अस्माभिर्बलसम्पन्नैः सह प्रासासिनोमरैः ।
विजयकी प्राप्तिसे उत्साहित हुए वे असुर आपसमें कहने लगे—'संग्राममें विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त देवताओंको हम बलवान् दैत्योंने संगठित होकर प्रास, खड्ग और तोमरोंसे भयभीत कर दिया' ॥ ४५३ ॥
विरेजुश्च जयं प्राप्ता उशनोहेव्यवोधिताः ॥ ४६ ॥ समरे बलसम्पन्नाः सायुधा दैत्यसत्तमाः ।
शुक्राचार्यके हविष्यसे सजग एवं बलसम्पन्न हुए विजयी दैत्यशिरोमणि समराङ्गणमें आयुधोंसहित बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ४६३ ॥
भविष्यपर्व ] त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ११०३
सुरैश्च सहितः सर्वै रथमास्थाय शंकरः ॥ ४७ ॥
दर्पितान् निनदन् दैत्यान् प्रदहन्निव तेजसा ।
तब दर्पमें भरे हुए उन दैत्योंको अपने तेजसे दग्ध-से करते हुए भगवान् शङ्कर समस्त देवताओंके साथ रथपर बैठकर गर्जना करने लगे ॥ ४७ १/२ ॥
युगान्तकाले वितते रश्मिवानिव निर्दहन् ॥ ४८ ॥
सर्वभूतानि भूताग्निः प्रलये समुपस्थिते ।
जैसे युगान्तकाल आनेपर अंशुमाली सूर्य सम्पूर्ण लोगोंको दग्ध करने लगते हैं तथा प्रलय उपस्थित होनेपर भूतनाथ भगवान् रुद्र सम्पूर्ण भूतोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार वे अपने तेजसे दैत्योंको दग्ध करने लगे ॥ ४८ १/२ ॥
स रथो वाजिभिः शीघ्रैरुह्यमानो मनोजवैः ॥ ४९ ॥
विवभौ नभसो मध्यं सविद्युदिव तोयदः ।
मनके समान वेगशाली और शीघ्रगामी घोड़ोंके द्वारा खींचा जाता हुआ वह रथ आकाशके मध्यभागमे पहुँचकर विद्युत्सहित मेघकी भाँति प्रकाशित होने लगा ॥ ४९ १/२ ॥
वृषभेण ध्वजाग्रेण गर्जमानेन भारत ॥ ५० ॥
भाति स्म स रथो राजन् सेन्द्रायुध इवाम्बुदः ।
भरतनन्दन ! नरेश्वर ! ध्वजके अग्रभागमें गर्जते हुए वृषभसे उपलक्षित होनेवाला वह रथ इन्द्रधनुषसहित मेघके समान शोभा पाने लगा ॥ ५० १/२ ॥
ततोऽम्बरगताः सिद्धास्तुष्टुवुर्वृषभध्वजम् ॥ ५१ ॥
कर्मभिः पूर्वजैः पूर्वैः शुचिभिस्त्वव्ययं तदा ।
तदनन्तर आकाशमें उपस्थित हुए सिद्धोंने सबके पूर्वज त्रिनेत्रधारी भगवान् वृषभध्वजका उनके परम पवित्र पूर्वकर्मोंका उल्लेख करते हुए स्तवन किया ॥ ५१ १/२ ॥
ऋषयश्च तपःशान्ताः सत्यव्रतपरायणाः ॥ ५२ ॥
अमृतप्राशिनश्चैव सुरसंघास्तथैव च ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गान्धर्वेण स्वरेण वै ॥ ५३ ॥
प्रहृष्टवदनाः सौम्याः पित्र्ये स्थानान्तरे नृप ।
तपस्यासे शान्तिको प्राप्त हुए सत्यव्रतपरायण ऋषियों, अमृतभोजी देवसमूहों तथा गन्धर्वों और अप्सराओंने भी गान्धर्वस्वरसे उनकी स्तुति की । नरेश्वर ! पितृसम्बन्धी दूसरे स्थानपर खड़े हुए सौम्यस्वभाववाले देवताओंके मुखपर महान् हर्ष छा रहा था ॥ ५२-५३ १/२ ॥
चयाट्टालकसम्पन्ने शतघ्नीशतसंकुले ॥ ५४ ॥
तस्मिंस्तु दैत्यनगरे सर्वभूतभयावहे ।
ततस्तु शरवर्षाणि मुमुचुर्दैत्यदानवाः ॥ ५५ ॥
सुराणामरयो मध्ये तीक्ष्णाग्राणि समन्ततः ।
तदनन्तर परकोटे और अट्टालिकाओंसे युक्त, सैकड़ों शतघ्नियों (तोपों) से व्याप्त तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस दैत्यनगरके मध्यभागमें खड़े हुए देववैरी दैत्यों और दानवोंने सब ओरसे तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५४-५५ १/२ ॥
शतघ्नीभिश्च निघ्नन्तो भल्लैः शूलैश्च भारत ॥ ५६ ॥
ते चक्रिरे महत्कर्म दानवा युद्धकोविदाः ।
भारत ! वे युद्धकुशल दानव शतघ्नियों, भल्लों और शूलोंसे चोट करते हुए महान् पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥
गदाभिश्च गदा जघ्नुर्भल्लैर्भल्लांश्च चिच्छिदुः ॥ ५७ ॥
अस्त्रैरस्त्राण्यबाधन्त माया मायाभिरेव च ।
उन्होंने गदाओंसे गदाएँ तोड़ डालीं, भल्लोंसे भल्ल काट दिये, अस्त्रोंसे अस्त्रोंको बाधा पहुँचायी और मायाओंको मायाओंसे ही शान्त कर दिया ॥ ५७ १/२ ॥
ततोऽपरे समुद्यम्य शरशक्तिपरश्वधान् ॥ ५८ ॥
अशनींश्च महाघोरानमुञ्चन्त सहस्रशः ।
तदनन्तर दूसरे दैत्योंने सहस्रों बाणों, शक्तियों, फरसों और महाभयंकर अशनियोंको उठाकर देवताओंपर चलाया ॥
असिभिर्मायाविहितैर्मृत्योर्विषयगोचरे ॥ ५९ ॥
ते वध्यमाना विबुधाः शरवर्षैरवस्थिताः ।
गन्धर्वनगराकारः सोऽसीदत् सह रो रथः ॥ ६० ॥
उनके मायानिर्मित खड्गों और बाण-वर्षाओंसे आहत होते हुए देवता मृत्युके पथपर खड़े थे और गन्धर्वनगरके समान आकारवाला महादेवजीका वह रथ उनके साथ ही बड़े सङ्कटमें पड़ गया ॥ ५९-६० ॥
हन्यमानोऽसुरगणैः प्रासासिशरतोमरैः ।
तैश्च दैत्यप्रहरणैर्गुरुभिर्भारसाहिभिः ।
चित्रैश्च बहुभिः शस्त्रैरतिष्ठत शचीपतिः ॥ ६१ ॥
उन असुरोंके प्रासों, खड्गों, बाणों और तोमरोंकी मार खाकर तथा दैत्योंके भार सहन करनेमें समर्थ, भारी, विचित्र और बहुसंख्यक अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित होकर शचीपति इन्द्र जहाँ-के-तहाँ खड़े रह गये ॥ ६१ ॥
ततो मध्ये दिव्यशब्दः प्रादुरासीन्महीपते ।
ऋषीणां ब्रह्मपुत्राणां महतामपि भारत ॥ ६२ ॥
पृथ्वीनाथ ! भरतनन्दन ! इसी बीचमें ब्रह्माजीके पुत्र-रूप महर्षियोंका दिव्य शब्द प्रकट हुआ—॥ ६२ ॥ -
स एष शंकरस्याग्रे रथो भूमिं प्रतिष्ठितः ।
अजेयो जय्यतां प्राप्तः सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ६३ ॥
'यह आगे चलनेवाला भगवान् शङ्करका रथ भूमिपर प्रतिष्ठित हो रहा है। यह अजेय होकर भी सब लोगोंके देखते-देखते जीतने योग्य हो गया' ॥ ६३ ॥
तस्मिन्निपतिते राजन् रथानां प्रवरे रथे ।
| ११०४ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
|---|
निपेतुः सर्वभूतानि भूतले वसुधाधिप ॥ ६४ ॥
राजन् ! वसुधापते ! रथोंमें श्रेष्ठ भगवान् शङ्करके उस रथके पृथ्वीपर गिरते ही समस्त प्राणी भूतलपर आ गिरे ॥ ६४ ॥
विचेलुः पर्वताग्राणि चेलुश्चैव महाद्रुमाः ।
विक्षुभुः समुद्राश्च न रेजुश्च दिशो दश ॥ ६५ ॥
पर्वतोंके शिखर हिलने लगे। बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाने लगे। समुद्रोंमें तूफान आ गया और दसों दिशाएँ श्रीहीन हो गयीं ॥ ६५ ॥
वृद्धाश्च ब्राह्मणास्तत्र जेपुश्च परमं जपम् ।
यत् तद् ब्रह्ममयं तेजः सर्वत्र विजयैषिणाम् ॥ ६६ ॥
शान्त्यर्थं सर्वभूतानामिह लोके परत्र च ।
वहाँ जो वृद्ध ब्राह्मण थे, वे उस परम उत्तम मन्त्रका जप करने लगे। जो सर्वत्र विजय चाहनेवाले पुरुषोंके लिये ब्रह्ममय तेजःस्वरूप है, वह तेज इहलोक और परलोकमें भी समस्त प्राणियोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है ॥ ६६३॥
समाधायात्मनाऽऽत्मानं योगप्राप्तेन हेतुना ॥ ६७ ॥
रथन्तरेण साम्नाथ ब्रह्मभूतेन भारत ।
तेजसा ज्वलयन् विष्णोस्त्र्यक्षस्य च महात्मनः ॥ ६८ ॥
सर्वेषां चैव देवानां बलिनां कामरूपिणाम् ।
ऋषीणां तपसाऽऽढ्यानां वसतां विजने वने ॥ ६९ ॥
अथ विष्णुर्महायोगी सर्वतोऽश्य तत्त्वतः ।
वृषरूपं समास्थाय प्रोज्जहार रथोत्तमम् ॥ ७० ॥
भारत ! तदनन्तर उस तेजःस्वरूप महायोगी विष्णुने सब ओर दृष्टि डालकर अपने-आप ही मनको एकाग्र करके योगबलसे वृषरूप धर्मके स्वरूपका आश्रय ले ब्रह्मभूत रथन्तर सामके द्वारा महादेवजीके उस उत्तम रथको ऊपर उठाया। उस समय वे विष्णुदेव अपने, महात्मा त्रिनेत्रधारी शिवके, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सम्पूर्ण बलवान् देवताओंके तथा निर्जन वनमें वास करनेवाले तपोबलसम्पन्न महर्षियोंके तेजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६७-७० ॥
समाक्रान्तं देवगणैः समग्रबलपौरुषैः ।
बलवांस्तोलयित्वा तु विषाणाभ्यां महाबलः ।
ननाद प्राणयोगेन मथ्यमान इवार्णवः ॥ ७१ ॥
सम्पूर्ण बल-पौरुषसे सम्पन्न देवता जिसपर आरूढ़ थे, उस उत्तम रथको अपने दोनों सींगोंसे उठाकर वे महाबली श्रीहरि मथे जाते हुए समुद्रकी भाँति पूरी प्राणशक्तिसे गर्जना करने लगे ॥ ७१ ॥
तृतीयं वायुविषयं समाक्रम्य विषाणवान् ।
ननाद बलवान् नादं समुद्र इव पर्वणि ॥ ७२ ॥
दो सींगोंसे युक्त वृषभरूपधारी बलवान् विष्णु तृतीय<sup>१</sup> वायु (उद्वह) के स्थानमें पहुँचकर पूर्णिमाके समुद्रकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ७२ ॥
ततो नादेन वित्रस्ता दैतेया युद्धदुर्मदाः ।
पुनस्ते कृतसन्नाहा युयुधुः सुमहाबलाः ॥ ७३ ॥
तब उस गर्जनासे भयभीत हो वे महाबली रणदुर्मद दैत्य कवच बाँधकर पुनः युद्ध करने लगे ॥ ७३ ॥
सर्वे वै बाहुबलिनः समर्थबलपौरुषाः ।
सुरसैन्यं प्रमर्द्दन्तः प्रगृहीतशरासनाः ॥ ७४ ॥
वे सब-के-सब बाहुबलशाली और समर्थ बल-पौरुषसे सम्पन्न थे। उन्होंने धनुष लेकर देवताओंकी सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया ॥ ७४ ॥
अग्निं संधाय धनुषि शितं वाणं सुपत्रिणम् ।
ब्रह्मास्त्रेणाभिसंयोज्य ब्रह्मदण्डं शिवोऽव्ययः ।
मुमोच दैत्यनगरं त्रिधाशब्देन संज्ञितम् ॥ ७५ ॥
तब अविनाशी शिवने अपने धनुषपर सुन्दर पंखवाले और तीखे अग्नितुल्य तेजस्वी बाणको रखकर उसे ब्रह्मास्त्रसे संयुक्त किया, फिर उस ब्रह्मदण्डको उस त्रिपुर-संज्ञक दैत्य-नगरपर छोड़ दिया ॥ ७५ ॥
तं वाणं त्रिविधं वीर्यात् संधाय मनसा प्रभुः ।
सत्येन ब्रह्मयोगेन तपसोग्रेण भारत ॥ ७६ ॥
मुमोच दैत्यनगरे सर्वप्राणहराञ्छरान् ।
दीप्तान् कनकवर्णाभान् सुवर्णांश्च सुनिर्मलान् ॥ ७७ ॥
भरतनन्दन ! भगवान् शिवने मन-ही-मन उस बाणका सत्य, ब्रह्मयोग तथा उग्र तपस्याद्वारा बलपूर्वक तीन रूपोंमें संधान करके उस दैत्यनगरपर ऐसे बाण छोड़े, जो सबके प्राण हर लेनेवाले थे। वे बाण उद्दीप्त, सुवर्णकी-सी कान्ति-वाले, सुवर्णमय और अत्यन्त निर्मल थे ॥ ७६-७७ ॥
मुक्त्वा वरशरान् घोरान् सविषानिव पन्नगान् ।
सुप्रदीप्तैस्त्रिभिर्वाणैर्वेगमद्भिर्विदारितम् ॥ ७८ ॥
विषैले सर्पोंके समान उन श्रेष्ठ एवं भयंकर बाणोंको
१. महाभारत शान्तिपर्वके अध्याय ३२८ में श्लोक ३८ से ४० तक तृतीय वायुका परिचय इस प्रकार दिया गया है—जो सदा सोम, सूर्य आदि ग्रहोंका उदय एवं उद्भव करता है। मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे 'उदान' कहते हैं। जो चारों समुद्रोंसे जलको ऊपर उठाकर जीमूत नामक मेघोंमें स्थापित करता है तथा जीमूत नामक मेघोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें पर्जन्यके हवाले कर देता है, वह महान् वायु 'उद्वह' कहलाता है। जो तृतीय मार्गपर चलनेके कारण तीसरा कहा गया है।
[ भविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ ११०५ ]
छोड़कर तीन प्रज्वलित एवं वेगशाली बाणोंद्वारा उस दैत्य-नगरको विदीर्ण कर दिया ॥ ७८ ॥
शरघातप्रदीप्तानि विन्ध्याग्राणीव भारत ।
गोपुराणि पुरैः सार्धं व्यशीर्यन्त नराधिप ॥ ७९ ॥
भरतनन्दन ! नरेश्वर ! बाणोंके आघातसे जलते हुए गोपुर विन्ध्यपर्वतके शिखरोंके समान उन तीनों पुरोंसहित भस्म होकर बिखर गये ॥ ७९ ॥
अग्निना सम्प्रदीप्तानि वह्निगर्भाणि भारत ।
धरणीं सम्प्रपद्यन्त पुराणि वसुधाधिप ॥ ८० ॥
भारत ! पृथ्वीनाथ ! अग्निसे जलकर भीतर आग छिपाये हुए वे तीनों पुर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८० ॥
तानि वैदूर्यवर्णानि शिखराणि गिरेरिव ।
शंकरेण प्रदग्धानि ब्रह्मास्त्रेणापतन्भुवि ॥ ८१ ॥
नरेश्वर ! पर्वत-शिखरोंके समान वे वैदूर्य-वर्णवाले नगर भगवान् शङ्करके ब्रह्मास्त्रसे दग्ध होकर नीचे गिर पड़े ॥ ८१ ॥
हते च त्रिपुरे देवैर्वाचो हर्षात् किलेरिताः ।
सर्वाञ्जहीति शत्रूंस्त्वं प्रवृद्धान् पुरुषोत्तम ॥ ८२ ॥
त्रिपुरके नष्ट हो जानेपर देवताओंने बड़े हर्षसे यह बात कही—‘पुरुषोत्तम ! आप ही सम्पूर्ण बढ़े हुए शत्रुओंको नष्ट कीजिये’ ॥ ८२ ॥
विष्णुरेव महायोगी योगेन प्रस्मयन्निव ।
स्तूयते ब्रह्मसदृशैर्ऋषिभिः शंकरेण च ।
ब्रह्मणा सहितैर्देवैः सम्पन्नबलपौरुषैः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार उस समय योगबलसे सम्पन्न एवं मुस्कराते हुए महायोगी विष्णुकी ही ब्रह्मतुल्य ऋषियोंने, भगवान् शङ्करने तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न ब्रह्माजीसहित देवताओंने स्तुति की ॥ ८३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि त्रिपुरवधे त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें त्रिपुरवधविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥
चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
हरिवंशमें वर्णित वृत्तान्तोंका संग्रह
वैशम्पायन उवाच
हरिवंशेऽत्र वृत्तान्ताः प्रकीर्त्यन्ते क्रमोदिताः ।
तत्रादावादिसर्गस्तु भूतसर्गस्ततः परः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! इस हरिवंशमें क्रमशः कहे गये वृत्तान्तोंका यहाँ संक्षेपसे कीर्तन किया जाता है—इसमें पहले (हरिवंशपर्वमें) आदिसृष्टिका वर्णन है, तत्पश्चात् भूतसृष्टिका वर्णन किया गया है ॥ १ ॥
पृथोर्वैन्यस्य चाख्यानं मनूनां कीर्तनं तथा ।
वैवस्वतकुलोत्पत्तिर्धुन्धुमारकथा तथा ॥ २ ॥
फिर वेनके पुत्र पृथुकी कथा है। इसके बाद मनुओंका वर्णन, वैवस्वत मनुके कुलकी उत्पत्ति तथा धुन्धुमारकी कथा आयी है ॥ २ ॥
गालवोत्पत्तिरिक्ष्वाकुवंशस्याप्यनुकीर्तनम् ।
पितृकल्पस्तथोत्पत्तिः सोमस्य च बुधस्य च ॥ ३ ॥
फिर गालवकी उत्पत्ति, इक्ष्वाकुवंशका वर्णन, पितृकल्प (श्राद्ध) तथा सोम एवं बुधकी उत्पत्तिका प्रसंग है ॥ ३ ॥
अमावसोश्चान्वयस्य कीर्तनं कीर्तिवर्धनम् ।
च्युतिंप्रतिष्ठे शक्रस्य प्रसवः क्षत्रवृद्धजः ॥ ४ ॥
तदनन्तर अमावसुके वंशका वर्णन है, जो पढ़ने और सुननेवालेकी कीर्तिका बढ़ानेवाला है। इसके बाद इन्द्रके अपने स्थानसे च्युत होने और पुनः उसपर प्रतिष्ठित होनेका प्रसंग है। तत्पश्चात् क्षत्रवृद्धकी संततिका वर्णन आया है ॥ ४ ॥
दिवोदासप्रतिष्ठा च त्रिशङ्कोः क्षत्रियस्य च ।
ययातिचरितं चैव पूरुवंशस्य कीर्तनम् ॥ ५ ॥
फिर दिवोदासकी प्रतिष्ठा, राजा त्रिशङ्कुकी कथा, ययातिको चरित्र और पूरुवंशका वर्णन है ॥ ५ ॥
कीर्तनं कृष्णसम्भूतैः स्यमन्तकमणेस्तथा ।
संक्षेपात् कीर्तिता विष्णोः प्रादुर्भावास्ततः परम् ॥ ६ ॥
इसके बाद श्रीकृष्णके प्राकट्यका वर्णन है, फिर स्यमन्तकमणिकी कथा संक्षेपसे कही गयी है। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुके अवतार बताये गये हैं ॥ ६ ॥
तारकामययुद्धं च ब्रह्मलोकस्य वर्णनम् ।
योगनिद्रासमुत्थानं विष्णोर्वाक्यं च वेधसः ॥ ७ ॥
पृथ्वीवाक्यं च देवानांमशावतरणं तथा ।
| ११०६ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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तदनन्तर तारकामय युद्धका प्रसंग है। फिर ब्रह्मलोकका वर्णन है। भगवान् विष्णुके योगनिद्रासे उठनेकी कथा है। इसके बाद ब्रह्माजी और पृथ्वीके वचन हैं। तत्पश्चात् देवताओंके अंशावतरणकी कथा है ॥ ७३ ॥
ततो नारदवाक्यं च खपद्मगर्भविघित्सता ॥ ८ ॥
आर्यास्तवः पुनः कृष्णसमुत्पत्तिः प्रपञ्चतः ।
गोव्रजे गमनं विष्णोः शकटस्य निवर्तनम् ॥ ९ ॥
पूतनाया वधो भङ्गो यमलार्जुनयोरपि ।
वृकसंदर्शनं चैव वृन्दावननिवेशनम् ॥ १० ॥
तदनन्तर (द्वितीय विष्णुपर्वमें) कंसके प्रति नारदजीका वचन, भगवान् विष्णुका जलमें सोये हुए षड्गर्भ नामक दैत्योंके जीवोंको खींचकर निद्रादेवीके हाथमें देना, आर्यादेवीकी स्तुति, श्रीकृष्णके अवतारका विस्तारपूर्वक वर्णन, उनका गौओंके व्रजमें गमन, छकड़ेको उलटना, पूतनाका वध करना, अर्जुन नामक जुड़वें वृक्षोंको तोड़ देना, गोपोंको भेड़ियोंका दर्शन तथा समस्त गोव्रजका वृन्दावनमें निवास—इन विषयोंका क्रमशः वर्णन है ॥ ८—१० ॥
प्रावृषो वर्णनं चापि यमुनाह्रददर्शनम् ।
कालियस्यापि दमनं धेनुकस्य च भञ्जनम् ॥ ११ ॥
प्रलम्बनिधनं चैव शरद्वर्णनमेव च ।
गिरियज्ञप्रवृत्तिश्च गोवर्धनविधारणम् ॥ १२ ॥
गोविन्दस्याभिषेकं च गोपीसंकीडनं तथा ।
रिष्टासुरस्य निधनमक्रूरप्रेषणं तथा ॥ १३ ॥
इसके बाद वर्षाका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा यमुनाके कालियदहका दर्शन, कालियनागका दमन, बलरामद्वारा धेनुकासुर और प्रलम्भासुरका वध, शरद्-वर्णन, गिरियज्ञका आरम्भ, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धन-धारण, उनका गोविन्द-पदपर अभिषेक, उनकी गोपियोंके साथ क्रीड़ा, उनके द्वारा अरिष्टासुरका वध और कंसका अक्रूरको व्रजमें भेजना—इन विषयोंका उल्लेख है ॥ ११—१३ ॥
अन्धकस्य च वाक्यानि केशिनो निधनं तथा ।
अक्रूरागमनं चैव नागलोकस्य दर्शनम् ॥ १४ ॥
धनुर्भङ्गस्य कथनं कंसवाक्यमतः परम् ।
कुवलयापीडवधश्चाणूरान्ध्रवधस्तथा ॥ १५ ॥
कंसस्य निधनं चापि विलापः कंसयोषिताम् ।
उग्रसेनाभिषेकश्च यादवाश्वासनं तथा ॥ १६ ॥
फिर कंसके प्रति अंधकके वचन, केशीका वध, अक्रूरका व्रजमें आगमन, लौटते समय उन्हें यमुनामें नागलोकका दर्शन, श्रीकृष्णके द्वारा कंसके धनुषके तोड़े जानेका वर्णन, कंसकी चाणूर और मुष्टिकसे बातचीत, तत्पश्चात् श्रीकृष्णद्वारा कुवलयापीड़, चाणूर एवं अन्ध्र देशीय मुष्टिकका वध, कंसका निधन, कंसकी स्त्रियोंका विलाप, उग्रसेनका अभिषेक तथा श्रीकृष्णद्वारा यादवोंको आश्वासन आदि विषयोंका वर्णन है ॥ १४—१६ ॥
प्रत्यागतिर्गुरुकुलाद्योद्धा रामष्णयोः ।
मथुरायाश्चोपरोधो जरासंधनिवर्तनम् ॥ १७ ॥
विकद्रुवाक्यं रामस्य दर्शनं भापणं तथा ।
गोमन्तारोहणं चापि जरासंधगतिस्तथा ॥ १८ ॥
गोमन्तस्य गिरेर्दाहः करवीरपुरे गतिः ।
शृंगालस्य वधस्तत्र मथुरागमनं ततः ॥ १९ ॥
बलराम और श्रीकृष्णका गुरुकुलसे विद्या पढ़कर लौटना, जरासंधका मथुरापर घेरा डालना और पराजित होकर लौटना, विकद्रुका भाषण, श्रीकृष्ण और बलरामको परशुरामजीका दर्शन और उनसे बातचीत, उन सबका गोमंत पर्वतपर चढ़ना, जरासंधका आक्रमण, उसके द्वारा गोमंतपर्वतका दाह, श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना, श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा दोनों भाइयोंका मथुरामें आगमन आदिक प्रसंगोंका वर्णन है ॥ १७—१९ ॥
यमुनाकर्षणं चैव मथुराप्रक्रमस्तथो ।
उपायेन वधः कालयवनस्य प्रकीर्तितः ॥ २० ॥
इसके बाद बलरामद्वारा यमुनाका आकर्षण, यादवोंका मथुरासे हट जाना और कालयवनका युक्तिपूर्वक वध—इन विषयोंका वर्णन है ॥ २० ॥
निर्माणं द्वारवत्यास्तु रुक्मिणीहरणं तथा ।
विवाहश्चैव रुक्मिण्या रुक्मिणो निधनं तथा ॥ २१ ॥
बलदेवाधिकं पुण्यं वलमाहात्म्यमेव च ।
तदनन्तर द्वारकाका निर्माण, रुक्मिणीका हरण, रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णका विवाह, बलरामद्वारा रुक्मीका वध, ६२ वें अध्यायमें बलदेवजीके माहात्म्य तथा १०९ वें अध्यायमें बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निक स्तोत्रके उपदेशका वर्णन है ॥ २१३ ॥
नरकस्य वधः पारिजातस्य हरणं तथा ॥ २२ ॥
द्वारवत्या विशेषेण पुनर्निर्माणकीर्तनम् ।
द्वारकायां प्रवेशश्च सभायां च प्रवेशनम् ॥ २३ ॥
नारदस्य च वाक्यानि वृष्णिवंशानुकीर्तनम् ।
फिर ६३ वें अध्यायमें नरकासुरके वधका वर्णन है। तदनन्तर पारिजात-हरण, द्वारकापुरीका पुनः विशेषरूपसे निर्माण, द्वारकामें प्रवेश, सभामें प्रवेश, नारदजीके वचन तथा वृष्णिवंशकी परम्पराका वर्णन है ॥ २२-२३३ ॥
षट्पुरस्य वधाख्यानमन्धकस्य निबर्हणम् ॥ २४ ॥
समुद्रयात्रा कृष्णस्य जलक्रीडाकुतूहलम् ।
तथा भैमप्रवीराणां मधुपानप्रवर्तनम् ॥ २५ ॥
ततश्छालिक्यगान्धर्वसमुदाहरणं हरेः ।