भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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[ भविष्यपर्व ] त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १११०१


क्ष्वेडितोत्कृष्टबहुलं सिंहनादविनादितम् ॥ १४ ॥
बभौ बहुजनाकीर्णं वनं चैत्ररथं यथा।
वहाँ गर्जना और कोलाहल अधिक होते थे। वह नगर वीरोंके सिंहनादसे गूँजता रहता था। मनोहर स्त्री-पुरुषोंसे भरा होनेके कारण वह चैत्ररथ नामक वनके समान सुशोभित होता था ॥ १४½ ॥

समुच्छ्रितपताकं तदसिभिश्च विराजितम् ॥ १५ ॥
रराज त्रिपुरं राजन् महाविद्युदिवाम्बरे।
राजन् ! ऊँची-ऊँची पताकाओंसे सुशोभित तथा चमचमाती हुई तलवारोंसे प्रकाशित वह त्रिपुर नामक नगर आकाशमें विशाल विद्युत्‌के समान उद्भासित होता था ॥

सूर्यनाभश्च दैत्येन्द्रश्चन्द्रनाभश्च भारत ॥ १६ ॥
तथान्ये च महावीर्या दानवा बलदर्पिताः।
भारत ! उस नगरमे दैत्यराज सूर्यनाभ, चन्द्रनाभ तथा अन्य महापराक्रमी बलाभिमानी दानव रहते थे ॥ १६½ ॥

ममृदुश्च बभञ्जुश्च मोहिताः परमेष्ठिना ॥ १७ ॥
पन्थानं देवगमनं पितृयानं च भारत।
भारत ! वे अभिमानसे मोहित होकर ब्रह्माजीके बनाये हुए देवयान और पितृयान मार्गको तोड़ने-फोड़ने एवं नष्ट करने लगे ॥ १७½ ॥

तैरेवमसुराग्रैश्च प्रगृहीतशरासनैः ॥ १८ ॥
दानवैर्नरशार्दूल देवयाने महापथे।
पितृवाहिवलोपेते हते भरतसत्तम ॥ १९ ॥
ब्रह्माणमभ्यधावन्त सर्वे सुरगणास्तथा।
विवर्णवदना दीनाश्छिन्ने वै गतिकर्मणि ॥ २० ॥
पुरुषसिंह ! भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार हाथमें धनुष लेकर उन श्रेष्ठ असुरों और दानवोंने जब अग्निवलसे युक्त देवयान और पितरोंके वलसे युक्त पितृयान नामक महामार्ग-का अपहरण कर लिया, तव समस्त देवगण ब्रह्माजीके पास दौड़े गये। उनका मुख उदास हो गया था। वे दोनों मागोंके नष्ट होनेसे गमन-कर्मका उच्छेद हो जानेके कारण अत्यन्त विवर्ण (शोकाकुल) हो रहे थे ॥ १८-२० ॥

अनुवंशं गताः स्थित्वा स्वरेणार्त्तनिनादिना।
हन्यामहे शत्रुगणैर्भागोच्छेदेन भागद ॥ २१ ॥
वे ब्रह्माजीके सामने खड़े होकर आर्तनादयुक्त स्वरसे बोले—'देवताओंको भाग देनेवाले पितामह ! शत्रुगण हमारे यज्ञभागका उच्छेद करके हमें मार रहे हैं ॥ २१ ॥

तेषां चैव वधोपायं वदस्व वदतां वर।
यं ज्ञात्वा बाहुबलिनो बाधेम समरे परान् ॥ २२ ॥
'वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! उन दैत्योंके वधका कोई उपाय बताइये, जिसे जानकर हम बाहुबलशाली देवता समरमे शत्रुओंको पीड़ित कर सकें ॥ २२ ॥


सान्त्वयित्वा तु वरदो ब्रह्मा प्रोवाच देवताः।
शृणुध्वं देवताः सर्वाः शत्रुप्रतिकृतिं पराम् ॥ २३ ॥
अवध्या दानवाः सर्वे ऋते शंकरमव्ययम्।
तब वरदायक ब्रह्माजीने उन देवगणोंको सान्त्वना देकर उनसे कहा—'देवताओ ! तुम सब लोग शत्रुओंसे बदला लेनेका उत्तम उपाय सुनो—वे समस्त दानव अविनाशी भगवान् शङ्करके सिवा दूसरेके लिये अवध्य हैं' ॥ २३½ ॥

प्रतिगृह्य च तद् वाक्यं मनोभिर्वाग्भिरेव च ॥ २४ ॥
भूमौ प्रपेदिरे सर्वे सह रुद्रैश्च भारत।
भरतनन्दन ! उनके उस वचनको मन और वाणीद्वारा स्वीकार करके सब देवता रुद्रगणोंके साथ पृथ्वीपर आये ॥

विन्ध्यपादे च मेरौ च मध्ये च पृथिवीतले ॥ २५ ॥
तपसोग्रेण योगज्ञाः सर्वे ते मुनयोऽभवन्।
काश्यपेयं हरं प्राप्ता जपन्तो ब्रह्मसंहिताम् ॥ २६ ॥
वे विन्ध्य और मेरु पर्वतकी तलैटीमें तथा भूतलके मध्यभागमें उग्र तपस्या करते हुए सब-के-सब योगज्ञ मुनि हो गये और ब्रह्मसंहिता (प्रणव) का जप करते हुए कश्यप-नन्दन हरकी शरणमें गये ॥ २५-२६ ॥

तेषां च परदाराणामभवद् वन्ध्यता जने।
विन्यस्तदर्भनिचये ताम्रलोहं च भूषणम् ॥ २७ ॥
उनके लिये जनसमुदायमें परायी स्त्रियाँ वन्ध्य—निष्फल अर्थात् मोह उत्पन्न करनेमें असमर्थ थीं। वे कुशकी चटाई बिछाकर उसीपर सोते थे। ताँबा और लोहा ही उनका आभूषण था ॥ २७ ॥

परिधानानि चर्माणि मृदूनि च शुभानि च।
स्वयं मृतानां कृष्णानां मृगाणां कुरुसत्तम ॥ २८ ॥
गृहीतानि विमुक्तानि देहेभ्यो वनचारिणाम्।
कुरुश्रेष्ठ ! स्वयं मरे हुए वनचारी काले मृगोके शरीरोंसे उधेड़कर लिये गये सुन्दर और कोमल मृगचर्म एवं व्याघ्रम्बर ही उनके पहननेके वस्त्र थे ॥ २८½ ॥

अन्तरिक्षमथोपेत विविशुर्माययाऽऽवृताः ॥ २९ ॥
हरालयं सुराः सर्वे व्याघ्रचर्मनिवासिनः।
प्रणिपत्याथ ते दीना भगवन्तं जगत्पतिम् ॥ ३० ॥
सुव्यक्तनाभिधानेन प्रभाषन्त हरं ततः।
व्याघ्रचर्म धारण करके मायासे अपनेको छिपाकर समस्त देवता आकाशमार्गका आश्रय ले भगवान् शङ्करके धाममें जा पहुँचे और उन भगवान् विश्वनाथ हरको प्रणाम करके स्पष्ट शब्दोंमें उनसे बोले—॥ २९-३०½ ॥

हविर्दत्तमविक्षानाद् भस्मच्छन्नेषु वह्निषु ॥ ३१ ॥
वरदानं वृथास्मासु भगवन् विमुखे त्वयि।