भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1127

११०० श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

सर्वेषां वाञ्छिता अर्था भवन्त्यस्य च पारणात् ॥ १०१ ॥
इस ग्रन्थके नियमपूर्वक पठन एवं श्रवणसे सब लोग दुर्गम संकटोंसे पार हो जायं, सब कल्याणका दर्शन करें तथा सबके मनोवाञ्छित अर्थ सिद्ध हो जायें ॥ १०१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि श्रवणफलकथने द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें महाभारत और हरिवंशके श्रवणके फलका वर्णनविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥


त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

त्रिपुर-वधकी कथा

जनमेजय उवाच
त्र्यक्षाद् वधमहं ब्रह्मञ्श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
त्रयाणां पुरसंज्ञानां खेचराणां समासतः ॥ १ ॥
जनमेजयनें पूछा— ब्रह्मन् ! दैत्योंके जो आकाशमें विचरनेवाले तीन पुर थे, उनका त्रिनेत्रधारी महादेवजीके हाथसे किस प्रकार वध हुआ ? इस प्रसङ्गको मैं ठीक-ठीक और संक्षेपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु विस्तरतः सर्वं यन्मां पृच्छसि नैधनम् ।
दैत्यानां बाहुबलिनां सर्वप्राणिविरोधिनाम् ॥ २ ॥
शंकरेण वधं राजञ्छूलैस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
कृतं पुरासुरेन्द्राणां सर्वभूतवधैषिणाम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! जो समस्त प्राणियोंके विरोधी थे, उन बाहुबलशाली दैत्योंका भगवान् शङ्करके हाथ किस प्रकार निधन हुआ ? यह जो तुम मुझसे पूछते हो, यह सारा प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक सुनो—पूर्वकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके वधकी इच्छावाले उन असुरेन्द्रोंका वध भगवान् शिवने अपने सीधे जानेवाले तीन शूलोंद्वारा किया था ॥ २-३ ॥

त्रिपुरं पुरुषव्याघ्र बृहद्धातुसमीरितम् ।
विक्रामति नभोमध्ये मेघवृन्दमिवोत्थितम् ॥ ४ ॥
नरव्याघ्र ! वे तीनों पुर बृहद् (बहुमूल्य एवं महान्) धातुओंसे निर्मित हुए थे । वे आकाशमें उमड़े हुए मेघ-समूहोंकी भाँति प्रकट होकर सर्वत्र विचरते थे ॥ ४ ॥

प्राकारेण प्रवृद्धेन काञ्चनेन विराजता ।
मणिभिश्च प्रकाशद्भिः सर्वरत्नैश्च तोरणैः ॥ ५ ॥
बभासे नभसो मध्ये श्रिया परमया ज्वलत् ।
गन्धर्वाणामिवोद्विग्नं कर्मणा साधितं पुरम् ॥ ६ ॥
सुवर्णनिर्मित ऊँचे विशाल एवं प्रकाशमान परकोटेसे उद्दीप्त होनेवाली मणियोंसे तथा सर्वरत्नमय फाटकोंसे वे तीनों पुर आकाशमण्डलमें चमकते रहते थे । वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रज्वलित हो रहे थे । तपस्यारूपी कर्मसे साधित हुए वे भयंकर पुर गन्धर्वोंके नगर-से जान पड़ते थे ॥ ५-६ ॥

वाजिनः पक्षसंयुक्ता वहन्ति बलदर्पिताः ।
पुरं प्रभाकरश्रेष्ठं मनोभिः कामवृंहणैः ॥ ७ ॥
बलके अभिमानसे युक्त, पङ्खवाले घोड़े सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान उस पुरको इच्छानुसार बढ़नेवाले मनके तुल्य वेगसे ढोया करते थे ॥ ७ ॥

धावन्ति हेषमाणास्ते विक्रमैः प्राणसम्भृतैः ।
आह्वयत इवाकाशं खुरैः श्यामदलप्रभैः ॥ ८ ॥
सारी प्राणशक्ति लगाकर संचित किये गये बल-विक्रमसे जब वे घोड़े हिनहिनाते हुए दौड़ते थे, उस समय उनकी काली टापोंसे आकाश आहत होता-सा प्रतीत होता था ॥ ८ ॥

वायुवेगसमैर्वेगैः कालयन्त इवाम्बरम् ।
असुराः समदृश्यन्त चक्षुर्भिर्विदितात्मभिः ॥ ९ ॥
ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्विषैः ।
जिन्होंने तपस्यासे सारे पापोंको दग्ध कर दिया था तथा जो अग्निके समान तेजस्वी थे, वे आत्मज्ञानी महर्षि ही अपने नेत्रोंद्वारा उन असुरोंको देख पाते थे । वे वायुके समान वेगसे समूचे आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए-से जान पड़ते थे ॥

गीतवादित्रबहुलं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ १० ॥
चित्राद्युधसमाकीर्णैः प्रतप्तकनकप्रभैः ।
भवनैर्बहुभिश्चैव प्रांशुभिः समलंकृतैः ॥ ११ ॥
देवेन्द्रभवनाकारैः शुशुभे तन्महाद्युति ।
उन पुरोंमें प्रायः गीत और वाद्यके समारोह होते रहते थे । वे गन्धर्वनगरके समान प्रतीत होते थे । विचित्र आयुधोंसे भरे हुए, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा विविध अलंकारोंसे अलंकृत बहुसंख्यक ऊँचे भवन, जो देवराज इन्द्रके भवनकी भाँति सुशोभित होते थे, उन महातेजस्वी पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १०-११ १/२ ॥

प्रासादाग्रैः प्रवृद्धैश्च कैलासशिखरप्रभैः ॥ १२ ॥
शुशुभे दैत्यनगरं बहुसूर्यमिवाम्बरम् ।
कैलासके शृङ्गोंकी भाँति प्रकाशित होनेवाले बड़े-बड़े प्रासादशिखरोंसे युक्त दैत्योंका वह नगर अनेक सूर्योंसे प्रकाशित आकाशके समान सुशोभित होता था ॥ १२ १/२ ॥

वराट्टालकसम्पन्नं तप्तकाञ्चनप्रभम् ॥ १३ ॥
प्रदीप्तमिव तेजोभी रराजार्थ महाप्रभो ।
महाराज ! बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे सम्पन्न, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा तेजसे प्रज्वलित-सा वह दैत्य-नगर बड़ी शोभा पाता था ॥ १३ १/२ ॥