भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1126

[ भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९९


सुस्पष्ट अक्षर, पद एवं स्वरके साथ ब्राह्मणोंके भविष्यपर्व एवं भारतका श्रवण कराये ॥ ८५ ॥

भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेषु यथावत् सम्प्रदापयेत् ।
वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम् ॥ ८६ ॥
भरतश्रेष्ठ ! श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वाचकको भी भोजन कराकर उसे भलीभाँति अलंकृत करके यथोचित रूपसे दक्षिणा दे ॥ ८६ ॥

वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरुत्तमा ।
ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु प्रसन्नाः सर्वदेवताः ॥ ८७ ॥
वाचकके संतुष्ट होनेपर परम उत्तम मङ्गलमयी प्रीति प्राप्त होती है। अन्य ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ८७ ॥

ततो हि भरणं कार्यं द्विजानां भरतर्षभ ।
सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च यथाक्रमम् ॥ ८८ ॥
भरतभूषण ! तत्पश्चात् यथोचित रूपसे सब प्रकारके उत्तम, मनोवाञ्छित पदार्थ देकर क्रमशः सभी द्विजोंका भरण-पोषण करना चाहिये ॥ ८८ ॥

इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर ।
श्रद्धानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ८९ ॥
नरश्रेष्ठ ! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके अनुसार मैंने तुमसे महाभारत और हरिवंश सुननेकी यह विधि बतायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये ॥ ८९ ॥

भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम ।
सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ॥ ९० ॥
राजन् ! नृपश्रेष्ठ ! जो परम कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे हरिवंशसहित महाभारत सुनने और उसकी पारणा पूरी करनेके लिये सदा यत्नशील रहना चाहिये ॥ ९० ॥

भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत् ।
भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ॥ ९१ ॥
प्रतिदिन भारतका श्रवण करे। नित्य-प्रति भारतका कीर्तन करे। जिसके घरमें महाभारतकी पुस्तक है, उसके हाथमें विजय है ॥ ९१ ॥

भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः ।
भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परिकीर्तयेत् ॥ ९२ ॥
भारत परम पुण्यमय ग्रन्थ है। भारतमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवतालोग भी भारतका सेवन करते हैं, अतः भारतका अवश्य कीर्तन करे ॥ ९२ ॥

भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ ।
भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९३ ॥
भरतश्रेष्ठ ! भारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। भारतके अनुशीलनसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुम्हे तत्त्वकी बात बता रहा हूँ ॥ ९३ ॥

महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् ।
ब्राह्मणं केशवं चापि कीर्तयन् नावसीदति ॥ ९४ ॥
जो महाभारत इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान् श्रीकृष्णका कीर्तन करता है, वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता ॥ ९४ ॥

वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ ९५ ॥
भरतभूषण ! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका गान किया जाता है ॥ ९५ ॥

यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः ।
तच्छ्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥ ९६ ॥
जो इस लोकमें परम पदकी इच्छा रखता हो, उस मनुष्यको चाहिये कि जिसमें भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाएँ और सनातन श्रुतियाँ हैं, उस महाभारत एवं हरिवंशका वह श्रवण करे ॥ ९६ ॥

एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम् ।
एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ॥ ९७ ॥
यह परम पवित्र है। यह धर्मका निरूपण करनेवाला शास्त्र है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे युक्त है। अतः कल्याण-कामी पुरुषको इसका श्रवण करना चाहिये ॥ ९७ ॥

क्रियतेऽसारसंसारे वाञ्छितस्यैव कारणम् ।
हरिवंशस्य श्रवणमिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ९८ ॥
इस असार संसारमें हरिवंशका श्रवण सभी मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है, इसलिये श्रेष्ठ पुरुष इसका श्रवण करते हैं। ऐसा द्वैपायन वेदव्यासका कथन है ॥ ९८ ॥

अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतैस्तथा ।
यत् फलं प्राप्यते पुंभिस्तद्धरेर्वंशपारणात् ॥ ९९ ॥
एक हजार अश्वमेध और एक सौ वाजपेय यज्ञ करनेसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह हरिवंशका पारायण करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है ॥ ९९ ॥

अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं
सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् ।
निरुपममनुमेयं योगिनां ज्ञानगम्यं
त्रिभुवनगुरुमीशं त्वां प्रपन्नोऽस्मि विष्णो ॥ १०० ॥
विष्णो ! आप अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्यान करने योग्य, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि-कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, अनुमानके योग्य, योगियोंके लिये ज्ञानगम्य, तीनों लोकोंके गुरु तथा ईश्वर हैं, अतः मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १०० ॥

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु ।