विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११०२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
यथादेशं यथाकालं क्रियतां ब्रह्मणो वचः ॥ ३२ ॥ यदुक्तं देवदेवेन खेचराणां समीपतः ।
'भगवन् ! आपने हमारी ओरसे मुँह फेर लिया है, इसलिये जैसे राखसे ढकी हुई आगमें अज्ञानवश दी हुई आहुति निष्फल हो जाती है, उसी प्रकार हमें मिला हुआ वरदान व्यर्थ हो गया है। अतः देवाधिदेव ब्रह्माजीने आकाश-चारी देवताओंके समीप जो बात कही थी, उनके उस वचन-का आप देश-कालके अनुसार पालन करें' ॥ ३१-३२३ ॥
एवं देववचोभिश्च भाविनोऽर्थस्य वैभवात् ॥ ३३ ॥ समनह्यन्महादेवो देवैः सह सवासवैः ।
इस प्रकार देवताओंके कहनेसे तथा भावी कार्यके प्रभावसे प्रेरित हो इन्द्र आदि देवताओंके साथ महादेवजी कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ ३३३ ॥
आदित्यपथमास्थाय संनद्धाः समलंकृताः ॥ ३४ ॥ सर्वे काञ्चनवर्णाभा वभुर्दीप्ता इवाग्नयः ।
वे सब-के-सब कवच और अलंकार धारण करके सुवर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित हो सूर्यके मार्गका आश्रय ले प्रज्वलित अग्नियोंके समान उद्भासित होने लगे ॥ ३४३ ॥
रुद्रेण सहिता रुद्रा दहन्त इव तेजसा ॥ ३५ ॥ संनद्धाः कुशलाः सर्वे प्रांशवः पर्वता इव ।
महादेवजीके साथ कवच बाँधकर युद्धकुशल समस्त रुद्रगण अपने तेजसे शत्रुओंको दग्ध से करने लगे। वे पर्वतोंके समान ऊँचे दिखायी देते थे ॥ ३५३ ॥
विश्वे विश्वेन वपुषा बलिनः कामरूपिणः ॥ ३६ ॥ समनह्यन्महात्मानो दानवान्तं विधित्सवः ।
दानवोंका अन्त करनेकी इच्छावाले वे सभी महात्मा बलवान् तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। वे अपने विश्वमय शरीरसे कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥
एभिः सहघनाध्यक्षैः समन्तात् परिवारितः ॥ ३७ ॥ त्रिपुरं योधयत् त्र्यक्षः प्रगृह्य सशरं धनुः ।
कुबेरसहित इन समस्त देवताओंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए त्रिनेत्रधारी महादेवने धनुष-बाण लेकर त्रिपुरवासियोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ ३७३ ॥
अथ दैत्या भिन्नदेहाः पुराट्टालं गता इव ॥ ३८ ॥ न्यपतन्त विदेहास्ते विशीर्णा इव पर्वताः ।
तदनन्तर जैसे नगरकी अट्टालिकापर चढ़े हुए लोग गिरते हों, उसी प्रकार वे त्रिपुरवासी दैत्यगण अपने शरीरोंके विदीर्ण हो जानेसे देहरहित हो जीर्ण-शीर्ण हुए पर्वतोंके समान उस नगरसे नीचे गिरने लगे ॥ ३८३ ॥
अतिविद्धाः सुविद्धाश्च रणमध्यगता नृप ॥ ३९ ॥ न्यपतन् दैत्यसंघाता वज्रेणेव हता नगाः ।
नरेश्वर ! समराङ्गणमें आये हुए दैत्यसमूह अत्यन्त घायल और क्षत-विक्षत हो वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे ॥ ३९३ ॥
असिभिश्च हता देवैः शक्तिचक्रपरश्वधैः ॥ ४० ॥ बाणैश्च भिन्नमर्माणो दैत्येन्द्रा युद्धगोचरे । प्रपेतुः सहिता उर्व्यां छिन्नपक्षा इवाचलाः ॥ ४१ ॥
देवताओंके खड्गों, शक्तियों, चक्रों, फरसों और बाणोंसे युद्धस्थलमें मारे गये उन दैत्यराजोंके मर्म विदीर्ण हो गये और वे पंख कटे हुए पर्वतोंके समान एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४०-४१ ॥
तत्र संज्ञां विमुञ्चन्ति दीप्यमानेन तेजसा । एवं तेऽन्योन्यसम्बाधे क्षीयन्ते क्षयकर्मणा ॥ ४२ ॥ नोपालभ्यन्त चक्षुर्भ्यामपि दिव्येन चक्षुषा ।
देवताओंके बढ़ते हुए तेजसे दग्ध हो वे दैत्य वहाँ अपनी सुध-बुध खोने लगे। इस प्रकार वे देवता और दैत्य एक-दूसरेको बाधा देते हुए युद्धरूपी क्षयकर्मसे क्षीण होने लगे। दैत्योंके दोनों नेत्रोंसे तथा दिव्य दृष्टिसे देखनेपर भी उस समय देवता उनकी पकड़में नहीं आते थे ॥ ४२३ ॥
अस्तं प्राप्ते दिनकरे सुरेन्द्रास्ते निशामुखे । छिन्नभिन्नक्षतमुखा निपेतुर्वसुधातले ॥ ४३ ॥
सूर्यके अस्त हो जानेपर प्रदोषकालमें (सबल हुए दैत्योंके आक्रमणसे) उन देवेश्वरोंके मुख छिन्न-भिन्न एवं क्षत-विक्षत हो गये तथा वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४३ ॥
अथ दैत्या जयं प्राप्ता निशायां निशितैः शरैः । विनेदुर्विपुलैर्नादैर्मेघा इव महार्णवाः ॥ ४४ ॥
रातमें अपने तीखे बाणोंसे विजयको प्राप्त हुए दैत्यगण महान् सिंहनाद करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले मेघों-की भाँति बड़ा भारी कोलाहल मचाने लगे ॥ ४४ ॥
जयप्राप्त्यासुराश्चैव तेऽन्योन्यमभिजल्पिरे । त्रासितास्त्रिदशाः सर्वे संग्रामजयकाङ्क्षिणः ॥ ४५ ॥ अस्माभिर्बलसम्पन्नैः सह प्रासासिनोमरैः ।
विजयकी प्राप्तिसे उत्साहित हुए वे असुर आपसमें कहने लगे—'संग्राममें विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त देवताओंको हम बलवान् दैत्योंने संगठित होकर प्रास, खड्ग और तोमरोंसे भयभीत कर दिया' ॥ ४५३ ॥
विरेजुश्च जयं प्राप्ता उशनोहेव्यवोधिताः ॥ ४६ ॥ समरे बलसम्पन्नाः सायुधा दैत्यसत्तमाः ।
शुक्राचार्यके हविष्यसे सजग एवं बलसम्पन्न हुए विजयी दैत्यशिरोमणि समराङ्गणमें आयुधोंसहित बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ४६३ ॥