विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1130, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ११०३
सुरैश्च सहितः सर्वै रथमास्थाय शंकरः ॥ ४७ ॥
दर्पितान् निनदन् दैत्यान् प्रदहन्निव तेजसा ।
तब दर्पमें भरे हुए उन दैत्योंको अपने तेजसे दग्ध-से करते हुए भगवान् शङ्कर समस्त देवताओंके साथ रथपर बैठकर गर्जना करने लगे ॥ ४७ १/२ ॥
युगान्तकाले वितते रश्मिवानिव निर्दहन् ॥ ४८ ॥
सर्वभूतानि भूताग्निः प्रलये समुपस्थिते ।
जैसे युगान्तकाल आनेपर अंशुमाली सूर्य सम्पूर्ण लोगोंको दग्ध करने लगते हैं तथा प्रलय उपस्थित होनेपर भूतनाथ भगवान् रुद्र सम्पूर्ण भूतोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार वे अपने तेजसे दैत्योंको दग्ध करने लगे ॥ ४८ १/२ ॥
स रथो वाजिभिः शीघ्रैरुह्यमानो मनोजवैः ॥ ४९ ॥
विवभौ नभसो मध्यं सविद्युदिव तोयदः ।
मनके समान वेगशाली और शीघ्रगामी घोड़ोंके द्वारा खींचा जाता हुआ वह रथ आकाशके मध्यभागमे पहुँचकर विद्युत्सहित मेघकी भाँति प्रकाशित होने लगा ॥ ४९ १/२ ॥
वृषभेण ध्वजाग्रेण गर्जमानेन भारत ॥ ५० ॥
भाति स्म स रथो राजन् सेन्द्रायुध इवाम्बुदः ।
भरतनन्दन ! नरेश्वर ! ध्वजके अग्रभागमें गर्जते हुए वृषभसे उपलक्षित होनेवाला वह रथ इन्द्रधनुषसहित मेघके समान शोभा पाने लगा ॥ ५० १/२ ॥
ततोऽम्बरगताः सिद्धास्तुष्टुवुर्वृषभध्वजम् ॥ ५१ ॥
कर्मभिः पूर्वजैः पूर्वैः शुचिभिस्त्वव्ययं तदा ।
तदनन्तर आकाशमें उपस्थित हुए सिद्धोंने सबके पूर्वज त्रिनेत्रधारी भगवान् वृषभध्वजका उनके परम पवित्र पूर्वकर्मोंका उल्लेख करते हुए स्तवन किया ॥ ५१ १/२ ॥
ऋषयश्च तपःशान्ताः सत्यव्रतपरायणाः ॥ ५२ ॥
अमृतप्राशिनश्चैव सुरसंघास्तथैव च ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव गान्धर्वेण स्वरेण वै ॥ ५३ ॥
प्रहृष्टवदनाः सौम्याः पित्र्ये स्थानान्तरे नृप ।
तपस्यासे शान्तिको प्राप्त हुए सत्यव्रतपरायण ऋषियों, अमृतभोजी देवसमूहों तथा गन्धर्वों और अप्सराओंने भी गान्धर्वस्वरसे उनकी स्तुति की । नरेश्वर ! पितृसम्बन्धी दूसरे स्थानपर खड़े हुए सौम्यस्वभाववाले देवताओंके मुखपर महान् हर्ष छा रहा था ॥ ५२-५३ १/२ ॥
चयाट्टालकसम्पन्ने शतघ्नीशतसंकुले ॥ ५४ ॥
तस्मिंस्तु दैत्यनगरे सर्वभूतभयावहे ।
ततस्तु शरवर्षाणि मुमुचुर्दैत्यदानवाः ॥ ५५ ॥
सुराणामरयो मध्ये तीक्ष्णाग्राणि समन्ततः ।
तदनन्तर परकोटे और अट्टालिकाओंसे युक्त, सैकड़ों शतघ्नियों (तोपों) से व्याप्त तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस दैत्यनगरके मध्यभागमें खड़े हुए देववैरी दैत्यों और दानवोंने सब ओरसे तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ५४-५५ १/२ ॥
शतघ्नीभिश्च निघ्नन्तो भल्लैः शूलैश्च भारत ॥ ५६ ॥
ते चक्रिरे महत्कर्म दानवा युद्धकोविदाः ।
भारत ! वे युद्धकुशल दानव शतघ्नियों, भल्लों और शूलोंसे चोट करते हुए महान् पराक्रम प्रकट कर रहे थे ॥
गदाभिश्च गदा जघ्नुर्भल्लैर्भल्लांश्च चिच्छिदुः ॥ ५७ ॥
अस्त्रैरस्त्राण्यबाधन्त माया मायाभिरेव च ।
उन्होंने गदाओंसे गदाएँ तोड़ डालीं, भल्लोंसे भल्ल काट दिये, अस्त्रोंसे अस्त्रोंको बाधा पहुँचायी और मायाओंको मायाओंसे ही शान्त कर दिया ॥ ५७ १/२ ॥
ततोऽपरे समुद्यम्य शरशक्तिपरश्वधान् ॥ ५८ ॥
अशनींश्च महाघोरानमुञ्चन्त सहस्रशः ।
तदनन्तर दूसरे दैत्योंने सहस्रों बाणों, शक्तियों, फरसों और महाभयंकर अशनियोंको उठाकर देवताओंपर चलाया ॥
असिभिर्मायाविहितैर्मृत्योर्विषयगोचरे ॥ ५९ ॥
ते वध्यमाना विबुधाः शरवर्षैरवस्थिताः ।
गन्धर्वनगराकारः सोऽसीदत् सह रो रथः ॥ ६० ॥
उनके मायानिर्मित खड्गों और बाण-वर्षाओंसे आहत होते हुए देवता मृत्युके पथपर खड़े थे और गन्धर्वनगरके समान आकारवाला महादेवजीका वह रथ उनके साथ ही बड़े सङ्कटमें पड़ गया ॥ ५९-६० ॥
हन्यमानोऽसुरगणैः प्रासासिशरतोमरैः ।
तैश्च दैत्यप्रहरणैर्गुरुभिर्भारसाहिभिः ।
चित्रैश्च बहुभिः शस्त्रैरतिष्ठत शचीपतिः ॥ ६१ ॥
उन असुरोंके प्रासों, खड्गों, बाणों और तोमरोंकी मार खाकर तथा दैत्योंके भार सहन करनेमें समर्थ, भारी, विचित्र और बहुसंख्यक अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित होकर शचीपति इन्द्र जहाँ-के-तहाँ खड़े रह गये ॥ ६१ ॥
ततो मध्ये दिव्यशब्दः प्रादुरासीन्महीपते ।
ऋषीणां ब्रह्मपुत्राणां महतामपि भारत ॥ ६२ ॥
पृथ्वीनाथ ! भरतनन्दन ! इसी बीचमें ब्रह्माजीके पुत्र-रूप महर्षियोंका दिव्य शब्द प्रकट हुआ—॥ ६२ ॥ -
स एष शंकरस्याग्रे रथो भूमिं प्रतिष्ठितः ।
अजेयो जय्यतां प्राप्तः सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ६३ ॥
'यह आगे चलनेवाला भगवान् शङ्करका रथ भूमिपर प्रतिष्ठित हो रहा है। यह अजेय होकर भी सब लोगोंके देखते-देखते जीतने योग्य हो गया' ॥ ६३ ॥
तस्मिन्निपतिते राजन् रथानां प्रवरे रथे ।