भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1131
११०४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

निपेतुः सर्वभूतानि भूतले वसुधाधिप ॥ ६४ ॥
राजन् ! वसुधापते ! रथोंमें श्रेष्ठ भगवान् शङ्करके उस रथके पृथ्वीपर गिरते ही समस्त प्राणी भूतलपर आ गिरे ॥ ६४ ॥
विचेलुः पर्वताग्राणि चेलुश्चैव महाद्रुमाः ।
विक्षुभुः समुद्राश्च न रेजुश्च दिशो दश ॥ ६५ ॥
पर्वतोंके शिखर हिलने लगे। बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाने लगे। समुद्रोंमें तूफान आ गया और दसों दिशाएँ श्रीहीन हो गयीं ॥ ६५ ॥
वृद्धाश्च ब्राह्मणास्तत्र जेपुश्च परमं जपम् ।
यत् तद् ब्रह्ममयं तेजः सर्वत्र विजयैषिणाम् ॥ ६६ ॥
शान्त्यर्थं सर्वभूतानामिह लोके परत्र च ।
वहाँ जो वृद्ध ब्राह्मण थे, वे उस परम उत्तम मन्त्रका जप करने लगे। जो सर्वत्र विजय चाहनेवाले पुरुषोंके लिये ब्रह्ममय तेजःस्वरूप है, वह तेज इहलोक और परलोकमें भी समस्त प्राणियोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है ॥ ६६३॥
समाधायात्मनाऽऽत्मानं योगप्राप्तेन हेतुना ॥ ६७ ॥
रथन्तरेण साम्नाथ ब्रह्मभूतेन भारत ।
तेजसा ज्वलयन् विष्णोस्त्र्यक्षस्य च महात्मनः ॥ ६८ ॥
सर्वेषां चैव देवानां बलिनां कामरूपिणाम् ।
ऋषीणां तपसाऽऽढ्यानां वसतां विजने वने ॥ ६९ ॥
अथ विष्णुर्महायोगी सर्वतोऽश्य तत्त्वतः ।
वृषरूपं समास्थाय प्रोज्जहार रथोत्तमम् ॥ ७० ॥
भारत ! तदनन्तर उस तेजःस्वरूप महायोगी विष्णुने सब ओर दृष्टि डालकर अपने-आप ही मनको एकाग्र करके योगबलसे वृषरूप धर्मके स्वरूपका आश्रय ले ब्रह्मभूत रथन्तर सामके द्वारा महादेवजीके उस उत्तम रथको ऊपर उठाया। उस समय वे विष्णुदेव अपने, महात्मा त्रिनेत्रधारी शिवके, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सम्पूर्ण बलवान् देवताओंके तथा निर्जन वनमें वास करनेवाले तपोबलसम्पन्न महर्षियोंके तेजसे प्रकाशित हो रहे थे ॥ ६७-७० ॥
समाक्रान्तं देवगणैः समग्रबलपौरुषैः ।
बलवांस्तोलयित्वा तु विषाणाभ्यां महाबलः ।
ननाद प्राणयोगेन मथ्यमान इवार्णवः ॥ ७१ ॥
सम्पूर्ण बल-पौरुषसे सम्पन्न देवता जिसपर आरूढ़ थे, उस उत्तम रथको अपने दोनों सींगोंसे उठाकर वे महाबली श्रीहरि मथे जाते हुए समुद्रकी भाँति पूरी प्राणशक्तिसे गर्जना करने लगे ॥ ७१ ॥
तृतीयं वायुविषयं समाक्रम्य विषाणवान् ।
ननाद बलवान् नादं समुद्र इव पर्वणि ॥ ७२ ॥
दो सींगोंसे युक्त वृषभरूपधारी बलवान् विष्णु तृतीय<sup></sup> वायु (उद्वह) के स्थानमें पहुँचकर पूर्णिमाके समुद्रकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ७२ ॥
ततो नादेन वित्रस्ता दैतेया युद्धदुर्मदाः ।
पुनस्ते कृतसन्नाहा युयुधुः सुमहाबलाः ॥ ७३ ॥
तब उस गर्जनासे भयभीत हो वे महाबली रणदुर्मद दैत्य कवच बाँधकर पुनः युद्ध करने लगे ॥ ७३ ॥
सर्वे वै बाहुबलिनः समर्थबलपौरुषाः ।
सुरसैन्यं प्रमर्द्दन्तः प्रगृहीतशरासनाः ॥ ७४ ॥
वे सब-के-सब बाहुबलशाली और समर्थ बल-पौरुषसे सम्पन्न थे। उन्होंने धनुष लेकर देवताओंकी सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया ॥ ७४ ॥
अग्निं संधाय धनुषि शितं वाणं सुपत्रिणम् ।
ब्रह्मास्त्रेणाभिसंयोज्य ब्रह्मदण्डं शिवोऽव्ययः ।
मुमोच दैत्यनगरं त्रिधाशब्देन संज्ञितम् ॥ ७५ ॥
तब अविनाशी शिवने अपने धनुषपर सुन्दर पंखवाले और तीखे अग्नितुल्य तेजस्वी बाणको रखकर उसे ब्रह्मास्त्रसे संयुक्त किया, फिर उस ब्रह्मदण्डको उस त्रिपुर-संज्ञक दैत्य-नगरपर छोड़ दिया ॥ ७५ ॥
तं वाणं त्रिविधं वीर्यात् संधाय मनसा प्रभुः ।
सत्येन ब्रह्मयोगेन तपसोग्रेण भारत ॥ ७६ ॥
मुमोच दैत्यनगरे सर्वप्राणहराञ्छरान् ।
दीप्तान् कनकवर्णाभान् सुवर्णांश्च सुनिर्मलान् ॥ ७७ ॥
भरतनन्दन ! भगवान् शिवने मन-ही-मन उस बाणका सत्य, ब्रह्मयोग तथा उग्र तपस्याद्वारा बलपूर्वक तीन रूपोंमें संधान करके उस दैत्यनगरपर ऐसे बाण छोड़े, जो सबके प्राण हर लेनेवाले थे। वे बाण उद्दीप्त, सुवर्णकी-सी कान्ति-वाले, सुवर्णमय और अत्यन्त निर्मल थे ॥ ७६-७७ ॥
मुक्त्वा वरशरान् घोरान् सविषानिव पन्नगान् ।
सुप्रदीप्तैस्त्रिभिर्वाणैर्वेगमद्भिर्विदारितम् ॥ ७८ ॥
विषैले सर्पोंके समान उन श्रेष्ठ एवं भयंकर बाणोंको


१. महाभारत शान्तिपर्वके अध्याय ३२८ में श्लोक ३८ से ४० तक तृतीय वायुका परिचय इस प्रकार दिया गया है—जो सदा सोम, सूर्य आदि ग्रहोंका उदय एवं उद्भव करता है। मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे 'उदान' कहते हैं। जो चारों समुद्रोंसे जलको ऊपर उठाकर जीमूत नामक मेघोंमें स्थापित करता है तथा जीमूत नामक मेघोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें पर्जन्यके हवाले कर देता है, वह महान् वायु 'उद्वह' कहलाता है। जो तृतीय मार्गपर चलनेके कारण तीसरा कहा गया है।