विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1132, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ भविष्यपर्व ] चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ ११०५ ]
छोड़कर तीन प्रज्वलित एवं वेगशाली बाणोंद्वारा उस दैत्य-नगरको विदीर्ण कर दिया ॥ ७८ ॥
शरघातप्रदीप्तानि विन्ध्याग्राणीव भारत ।
गोपुराणि पुरैः सार्धं व्यशीर्यन्त नराधिप ॥ ७९ ॥
भरतनन्दन ! नरेश्वर ! बाणोंके आघातसे जलते हुए गोपुर विन्ध्यपर्वतके शिखरोंके समान उन तीनों पुरोंसहित भस्म होकर बिखर गये ॥ ७९ ॥
अग्निना सम्प्रदीप्तानि वह्निगर्भाणि भारत ।
धरणीं सम्प्रपद्यन्त पुराणि वसुधाधिप ॥ ८० ॥
भारत ! पृथ्वीनाथ ! अग्निसे जलकर भीतर आग छिपाये हुए वे तीनों पुर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८० ॥
तानि वैदूर्यवर्णानि शिखराणि गिरेरिव ।
शंकरेण प्रदग्धानि ब्रह्मास्त्रेणापतन्भुवि ॥ ८१ ॥
नरेश्वर ! पर्वत-शिखरोंके समान वे वैदूर्य-वर्णवाले नगर भगवान् शङ्करके ब्रह्मास्त्रसे दग्ध होकर नीचे गिर पड़े ॥ ८१ ॥
हते च त्रिपुरे देवैर्वाचो हर्षात् किलेरिताः ।
सर्वाञ्जहीति शत्रूंस्त्वं प्रवृद्धान् पुरुषोत्तम ॥ ८२ ॥
त्रिपुरके नष्ट हो जानेपर देवताओंने बड़े हर्षसे यह बात कही—‘पुरुषोत्तम ! आप ही सम्पूर्ण बढ़े हुए शत्रुओंको नष्ट कीजिये’ ॥ ८२ ॥
विष्णुरेव महायोगी योगेन प्रस्मयन्निव ।
स्तूयते ब्रह्मसदृशैर्ऋषिभिः शंकरेण च ।
ब्रह्मणा सहितैर्देवैः सम्पन्नबलपौरुषैः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार उस समय योगबलसे सम्पन्न एवं मुस्कराते हुए महायोगी विष्णुकी ही ब्रह्मतुल्य ऋषियोंने, भगवान् शङ्करने तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न ब्रह्माजीसहित देवताओंने स्तुति की ॥ ८३ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि त्रिपुरवधे त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें त्रिपुरवधविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥
चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
हरिवंशमें वर्णित वृत्तान्तोंका संग्रह
वैशम्पायन उवाच
हरिवंशेऽत्र वृत्तान्ताः प्रकीर्त्यन्ते क्रमोदिताः ।
तत्रादावादिसर्गस्तु भूतसर्गस्ततः परः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय ! इस हरिवंशमें क्रमशः कहे गये वृत्तान्तोंका यहाँ संक्षेपसे कीर्तन किया जाता है—इसमें पहले (हरिवंशपर्वमें) आदिसृष्टिका वर्णन है, तत्पश्चात् भूतसृष्टिका वर्णन किया गया है ॥ १ ॥
पृथोर्वैन्यस्य चाख्यानं मनूनां कीर्तनं तथा ।
वैवस्वतकुलोत्पत्तिर्धुन्धुमारकथा तथा ॥ २ ॥
फिर वेनके पुत्र पृथुकी कथा है। इसके बाद मनुओंका वर्णन, वैवस्वत मनुके कुलकी उत्पत्ति तथा धुन्धुमारकी कथा आयी है ॥ २ ॥
गालवोत्पत्तिरिक्ष्वाकुवंशस्याप्यनुकीर्तनम् ।
पितृकल्पस्तथोत्पत्तिः सोमस्य च बुधस्य च ॥ ३ ॥
फिर गालवकी उत्पत्ति, इक्ष्वाकुवंशका वर्णन, पितृकल्प (श्राद्ध) तथा सोम एवं बुधकी उत्पत्तिका प्रसंग है ॥ ३ ॥
अमावसोश्चान्वयस्य कीर्तनं कीर्तिवर्धनम् ।
च्युतिंप्रतिष्ठे शक्रस्य प्रसवः क्षत्रवृद्धजः ॥ ४ ॥
तदनन्तर अमावसुके वंशका वर्णन है, जो पढ़ने और सुननेवालेकी कीर्तिका बढ़ानेवाला है। इसके बाद इन्द्रके अपने स्थानसे च्युत होने और पुनः उसपर प्रतिष्ठित होनेका प्रसंग है। तत्पश्चात् क्षत्रवृद्धकी संततिका वर्णन आया है ॥ ४ ॥
दिवोदासप्रतिष्ठा च त्रिशङ्कोः क्षत्रियस्य च ।
ययातिचरितं चैव पूरुवंशस्य कीर्तनम् ॥ ५ ॥
फिर दिवोदासकी प्रतिष्ठा, राजा त्रिशङ्कुकी कथा, ययातिको चरित्र और पूरुवंशका वर्णन है ॥ ५ ॥
कीर्तनं कृष्णसम्भूतैः स्यमन्तकमणेस्तथा ।
संक्षेपात् कीर्तिता विष्णोः प्रादुर्भावास्ततः परम् ॥ ६ ॥
इसके बाद श्रीकृष्णके प्राकट्यका वर्णन है, फिर स्यमन्तकमणिकी कथा संक्षेपसे कही गयी है। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुके अवतार बताये गये हैं ॥ ६ ॥
तारकामययुद्धं च ब्रह्मलोकस्य वर्णनम् ।
योगनिद्रासमुत्थानं विष्णोर्वाक्यं च वेधसः ॥ ७ ॥
पृथ्वीवाक्यं च देवानांमशावतरणं तथा ।