भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1133
११०६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

तदनन्तर तारकामय युद्धका प्रसंग है। फिर ब्रह्मलोकका वर्णन है। भगवान् विष्णुके योगनिद्रासे उठनेकी कथा है। इसके बाद ब्रह्माजी और पृथ्वीके वचन हैं। तत्पश्चात् देवताओंके अंशावतरणकी कथा है ॥ ७३ ॥

ततो नारदवाक्यं च खपद्मगर्भविघित्सता ॥ ८ ॥
आर्यास्तवः पुनः कृष्णसमुत्पत्तिः प्रपञ्चतः ।
गोव्रजे गमनं विष्णोः शकटस्य निवर्तनम् ॥ ९ ॥
पूतनाया वधो भङ्गो यमलार्जुनयोरपि ।
वृकसंदर्शनं चैव वृन्दावननिवेशनम् ॥ १० ॥

तदनन्तर (द्वितीय विष्णुपर्वमें) कंसके प्रति नारदजीका वचन, भगवान् विष्णुका जलमें सोये हुए षड्गर्भ नामक दैत्योंके जीवोंको खींचकर निद्रादेवीके हाथमें देना, आर्यादेवीकी स्तुति, श्रीकृष्णके अवतारका विस्तारपूर्वक वर्णन, उनका गौओंके व्रजमें गमन, छकड़ेको उलटना, पूतनाका वध करना, अर्जुन नामक जुड़वें वृक्षोंको तोड़ देना, गोपोंको भेड़ियोंका दर्शन तथा समस्त गोव्रजका वृन्दावनमें निवास—इन विषयोंका क्रमशः वर्णन है ॥ ८—१० ॥

प्रावृषो वर्णनं चापि यमुनाह्रददर्शनम् ।
कालियस्यापि दमनं धेनुकस्य च भञ्जनम् ॥ ११ ॥
प्रलम्बनिधनं चैव शरद्वर्णनमेव च ।
गिरियज्ञप्रवृत्तिश्च गोवर्धनविधारणम् ॥ १२ ॥
गोविन्दस्याभिषेकं च गोपीसंकीडनं तथा ।
रिष्टासुरस्य निधनमक्रूरप्रेषणं तथा ॥ १३ ॥

इसके बाद वर्षाका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा यमुनाके कालियदहका दर्शन, कालियनागका दमन, बलरामद्वारा धेनुकासुर और प्रलम्भासुरका वध, शरद्-वर्णन, गिरियज्ञका आरम्भ, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धन-धारण, उनका गोविन्द-पदपर अभिषेक, उनकी गोपियोंके साथ क्रीड़ा, उनके द्वारा अरिष्टासुरका वध और कंसका अक्रूरको व्रजमें भेजना—इन विषयोंका उल्लेख है ॥ ११—१३ ॥

अन्धकस्य च वाक्यानि केशिनो निधनं तथा ।
अक्रूरागमनं चैव नागलोकस्य दर्शनम् ॥ १४ ॥
धनुर्भङ्गस्य कथनं कंसवाक्यमतः परम् ।
कुवलयापीडवधश्चाणूरान्ध्रवधस्तथा ॥ १५ ॥
कंसस्य निधनं चापि विलापः कंसयोषिताम् ।
उग्रसेनाभिषेकश्च यादवाश्वासनं तथा ॥ १६ ॥

फिर कंसके प्रति अंधकके वचन, केशीका वध, अक्रूरका व्रजमें आगमन, लौटते समय उन्हें यमुनामें नागलोकका दर्शन, श्रीकृष्णके द्वारा कंसके धनुषके तोड़े जानेका वर्णन, कंसकी चाणूर और मुष्टिकसे बातचीत, तत्पश्चात् श्रीकृष्णद्वारा कुवलयापीड़, चाणूर एवं अन्ध्र देशीय मुष्टिकका वध, कंसका निधन, कंसकी स्त्रियोंका विलाप, उग्रसेनका अभिषेक तथा श्रीकृष्णद्वारा यादवोंको आश्वासन आदि विषयोंका वर्णन है ॥ १४—१६ ॥

प्रत्यागतिर्गुरुकुलाद्योद्धा रामष्णयोः ।
मथुरायाश्चोपरोधो जरासंधनिवर्तनम् ॥ १७ ॥
विकद्रुवाक्यं रामस्य दर्शनं भापणं तथा ।
गोमन्तारोहणं चापि जरासंधगतिस्तथा ॥ १८ ॥
गोमन्तस्य गिरेर्दाहः करवीरपुरे गतिः ।
शृंगालस्य वधस्तत्र मथुरागमनं ततः ॥ १९ ॥

बलराम और श्रीकृष्णका गुरुकुलसे विद्या पढ़कर लौटना, जरासंधका मथुरापर घेरा डालना और पराजित होकर लौटना, विकद्रुका भाषण, श्रीकृष्ण और बलरामको परशुरामजीका दर्शन और उनसे बातचीत, उन सबका गोमंत पर्वतपर चढ़ना, जरासंधका आक्रमण, उसके द्वारा गोमंतपर्वतका दाह, श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना, श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा दोनों भाइयोंका मथुरामें आगमन आदिक प्रसंगोंका वर्णन है ॥ १७—१९ ॥

यमुनाकर्षणं चैव मथुराप्रक्रमस्तथो ।
उपायेन वधः कालयवनस्य प्रकीर्तितः ॥ २० ॥

इसके बाद बलरामद्वारा यमुनाका आकर्षण, यादवोंका मथुरासे हट जाना और कालयवनका युक्तिपूर्वक वध—इन विषयोंका वर्णन है ॥ २० ॥

निर्माणं द्वारवत्यास्तु रुक्मिणीहरणं तथा ।
विवाहश्चैव रुक्मिण्या रुक्मिणो निधनं तथा ॥ २१ ॥
बलदेवाधिकं पुण्यं वलमाहात्म्यमेव च ।

तदनन्तर द्वारकाका निर्माण, रुक्मिणीका हरण, रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णका विवाह, बलरामद्वारा रुक्मीका वध, ६२ वें अध्यायमें बलदेवजीके माहात्म्य तथा १०९ वें अध्यायमें बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निक स्तोत्रके उपदेशका वर्णन है ॥ २१३ ॥

नरकस्य वधः पारिजातस्य हरणं तथा ॥ २२ ॥
द्वारवत्या विशेषेण पुनर्निर्माणकीर्तनम् ।
द्वारकायां प्रवेशश्च सभायां च प्रवेशनम् ॥ २३ ॥
नारदस्य च वाक्यानि वृष्णिवंशानुकीर्तनम् ।

फिर ६३ वें अध्यायमें नरकासुरके वधका वर्णन है। तदनन्तर पारिजात-हरण, द्वारकापुरीका पुनः विशेषरूपसे निर्माण, द्वारकामें प्रवेश, सभामें प्रवेश, नारदजीके वचन तथा वृष्णिवंशकी परम्पराका वर्णन है ॥ २२-२३३ ॥

षट्पुरस्य वधाख्यानमन्धकस्य निबर्हणम् ॥ २४ ॥
समुद्रयात्रा कृष्णस्य जलक्रीडाकुतूहलम् ।
तथा भैमप्रवीराणां मधुपानप्रवर्तनम् ॥ २५ ॥
ततश्छालिक्यगान्धर्वसमुदाहरणं हरेः ।