भारतकोश
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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
११०६श्रीमद्भारते खिलभागे[ हरिवंशे

तदनन्तर तारकामय युद्धका प्रसंग है। फिर ब्रह्मलोकका वर्णन है। भगवान् विष्णुके योगनिद्रासे उठनेकी कथा है। इसके बाद ब्रह्माजी और पृथ्वीके वचन हैं। तत्पश्चात् देवताओंके अंशावतरणकी कथा है ॥ ७३ ॥

ततो नारदवाक्यं च खपद्मगर्भविघित्सता ॥ ८ ॥
आर्यास्तवः पुनः कृष्णसमुत्पत्तिः प्रपञ्चतः ।
गोव्रजे गमनं विष्णोः शकटस्य निवर्तनम् ॥ ९ ॥
पूतनाया वधो भङ्गो यमलार्जुनयोरपि ।
वृकसंदर्शनं चैव वृन्दावननिवेशनम् ॥ १० ॥

तदनन्तर (द्वितीय विष्णुपर्वमें) कंसके प्रति नारदजीका वचन, भगवान् विष्णुका जलमें सोये हुए षड्गर्भ नामक दैत्योंके जीवोंको खींचकर निद्रादेवीके हाथमें देना, आर्यादेवीकी स्तुति, श्रीकृष्णके अवतारका विस्तारपूर्वक वर्णन, उनका गौओंके व्रजमें गमन, छकड़ेको उलटना, पूतनाका वध करना, अर्जुन नामक जुड़वें वृक्षोंको तोड़ देना, गोपोंको भेड़ियोंका दर्शन तथा समस्त गोव्रजका वृन्दावनमें निवास—इन विषयोंका क्रमशः वर्णन है ॥ ८—१० ॥

प्रावृषो वर्णनं चापि यमुनाह्रददर्शनम् ।
कालियस्यापि दमनं धेनुकस्य च भञ्जनम् ॥ ११ ॥
प्रलम्बनिधनं चैव शरद्वर्णनमेव च ।
गिरियज्ञप्रवृत्तिश्च गोवर्धनविधारणम् ॥ १२ ॥
गोविन्दस्याभिषेकं च गोपीसंकीडनं तथा ।
रिष्टासुरस्य निधनमक्रूरप्रेषणं तथा ॥ १३ ॥

इसके बाद वर्षाका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा यमुनाके कालियदहका दर्शन, कालियनागका दमन, बलरामद्वारा धेनुकासुर और प्रलम्भासुरका वध, शरद्-वर्णन, गिरियज्ञका आरम्भ, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धन-धारण, उनका गोविन्द-पदपर अभिषेक, उनकी गोपियोंके साथ क्रीड़ा, उनके द्वारा अरिष्टासुरका वध और कंसका अक्रूरको व्रजमें भेजना—इन विषयोंका उल्लेख है ॥ ११—१३ ॥

अन्धकस्य च वाक्यानि केशिनो निधनं तथा ।
अक्रूरागमनं चैव नागलोकस्य दर्शनम् ॥ १४ ॥
धनुर्भङ्गस्य कथनं कंसवाक्यमतः परम् ।
कुवलयापीडवधश्चाणूरान्ध्रवधस्तथा ॥ १५ ॥
कंसस्य निधनं चापि विलापः कंसयोषिताम् ।
उग्रसेनाभिषेकश्च यादवाश्वासनं तथा ॥ १६ ॥

फिर कंसके प्रति अंधकके वचन, केशीका वध, अक्रूरका व्रजमें आगमन, लौटते समय उन्हें यमुनामें नागलोकका दर्शन, श्रीकृष्णके द्वारा कंसके धनुषके तोड़े जानेका वर्णन, कंसकी चाणूर और मुष्टिकसे बातचीत, तत्पश्चात् श्रीकृष्णद्वारा कुवलयापीड़, चाणूर एवं अन्ध्र देशीय मुष्टिकका वध, कंसका निधन, कंसकी स्त्रियोंका विलाप, उग्रसेनका अभिषेक तथा श्रीकृष्णद्वारा यादवोंको आश्वासन आदि विषयोंका वर्णन है ॥ १४—१६ ॥

प्रत्यागतिर्गुरुकुलाद्योद्धा रामष्णयोः ।
मथुरायाश्चोपरोधो जरासंधनिवर्तनम् ॥ १७ ॥
विकद्रुवाक्यं रामस्य दर्शनं भापणं तथा ।
गोमन्तारोहणं चापि जरासंधगतिस्तथा ॥ १८ ॥
गोमन्तस्य गिरेर्दाहः करवीरपुरे गतिः ।
शृंगालस्य वधस्तत्र मथुरागमनं ततः ॥ १९ ॥

बलराम और श्रीकृष्णका गुरुकुलसे विद्या पढ़कर लौटना, जरासंधका मथुरापर घेरा डालना और पराजित होकर लौटना, विकद्रुका भाषण, श्रीकृष्ण और बलरामको परशुरामजीका दर्शन और उनसे बातचीत, उन सबका गोमंत पर्वतपर चढ़ना, जरासंधका आक्रमण, उसके द्वारा गोमंतपर्वतका दाह, श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना, श्रीकृष्णद्वारा शृगालका वध तथा दोनों भाइयोंका मथुरामें आगमन आदिक प्रसंगोंका वर्णन है ॥ १७—१९ ॥

यमुनाकर्षणं चैव मथुराप्रक्रमस्तथो ।
उपायेन वधः कालयवनस्य प्रकीर्तितः ॥ २० ॥

इसके बाद बलरामद्वारा यमुनाका आकर्षण, यादवोंका मथुरासे हट जाना और कालयवनका युक्तिपूर्वक वध—इन विषयोंका वर्णन है ॥ २० ॥

निर्माणं द्वारवत्यास्तु रुक्मिणीहरणं तथा ।
विवाहश्चैव रुक्मिण्या रुक्मिणो निधनं तथा ॥ २१ ॥
बलदेवाधिकं पुण्यं वलमाहात्म्यमेव च ।

तदनन्तर द्वारकाका निर्माण, रुक्मिणीका हरण, रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णका विवाह, बलरामद्वारा रुक्मीका वध, ६२ वें अध्यायमें बलदेवजीके माहात्म्य तथा १०९ वें अध्यायमें बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निक स्तोत्रके उपदेशका वर्णन है ॥ २१३ ॥

नरकस्य वधः पारिजातस्य हरणं तथा ॥ २२ ॥
द्वारवत्या विशेषेण पुनर्निर्माणकीर्तनम् ।
द्वारकायां प्रवेशश्च सभायां च प्रवेशनम् ॥ २३ ॥
नारदस्य च वाक्यानि वृष्णिवंशानुकीर्तनम् ।

फिर ६३ वें अध्यायमें नरकासुरके वधका वर्णन है। तदनन्तर पारिजात-हरण, द्वारकापुरीका पुनः विशेषरूपसे निर्माण, द्वारकामें प्रवेश, सभामें प्रवेश, नारदजीके वचन तथा वृष्णिवंशकी परम्पराका वर्णन है ॥ २२-२३३ ॥

षट्पुरस्य वधाख्यानमन्धकस्य निबर्हणम् ॥ २४ ॥
समुद्रयात्रा कृष्णस्य जलक्रीडाकुतूहलम् ।
तथा भैमप्रवीराणां मधुपानप्रवर्तनम् ॥ २५ ॥
ततश्छालिक्यगान्धर्वसमुदाहरणं हरेः ।

भविष्यपर्व ] पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ ११०७

भानोश्च दुहितुर्भानुमत्या हरणकीर्तनम् ॥ २६ ॥
शम्बरस्य वधश्चैव धन्योपाख्यानमेव च ।
वासुदेवस्य माहात्म्यं बाणयुद्धं प्रपञ्चितम् ॥ २७ ॥

इसके बाद षट्पुर-वधकी कथा, अन्धकासुर-संहार, श्रीकृष्णकी समुद्रयात्रा और जलक्रीड़ा-कौतूहल, भीमवंशी वीरोंकी मधुपानमें प्रवृत्ति, श्रीहरिकी इच्छासे छालिक्य गान्धर्वका भूतलपर आनयन, भानुपुत्री भानुमतीके हरणकी कथा, शम्बरासुरका वध, धन्योपाख्यान, वासुदेव-माहात्म्य तथा बाणासुरके युद्ध आदि विषयोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है ॥ २४—२७ ॥

भविष्यं पुष्करं चैव प्रपञ्चेनैव कीर्तितम् ।
वाराहं नारसिंहं च वामनं बहुविस्तरम् ॥ २८ ॥

(तीसरे भविष्यपर्वमें) भविष्य राजवंश एवं भावी कलियुगका वर्णन, फिर पुष्कर-प्रादुर्भावका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् भगवान्‌के वराह, नृसिंह और वामन अवतारकी कथाका अधिक विस्तृत वर्णन है ॥ २८ ॥

कैलासयात्रा कृष्णस्य पौण्ड्रकस्य वधस्ततः ।
हंसस्य डिम्भकस्यैव वधश्चैव प्रकीर्तितः ॥ २९ ॥

तदनन्तर श्रीकृष्णकी कैलासयात्रा, पौण्ड्रक-वध तथा हंस और डिम्भकके मारे जानेके प्रसंगका वर्णन आया है ॥ २९ ॥

पुरत्रयस्य संहार इति वृत्तान्तसंग्रहः ।
कथितो नृपशार्दूल सर्वपापप्रणाशनः ॥ ३० ॥

नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् महादेवजीके द्वारा त्रिपुरके संहारकी कथा है। इस प्रकार हरिवंशके वृत्तान्तोंका यह संक्षिप्त संग्रह बताया गया है। यह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ३० ॥

वृत्तान्तं शृणुयाद् यस्तु सायं प्रातः समाहितः ।
स याति वैष्णवं धाम लब्धकामः कुरूद्वह ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ३१ ॥

कुरुश्रेष्ठ ! जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल इस वृत्तान्तको सुनता है, वह सफलमनोरथ होकर भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। यह वृत्तान्त धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला तथा भोग और मोक्षरूपी फलको देनेवाला है ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वृत्तान्तसंग्रहे चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वृत्तान्तसंग्रहविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥


पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

हरिवंश-श्रवणकी दक्षिणा, फल एवं माहात्म्यका वर्णन

जनमेजय उवाच
हरिवंशे पुराणे तु श्रुते मुनिवरोत्तम ।
किं फलं किं च देयं वै तद् ब्रूहि त्वं ममाग्रतः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुनिवरोत्तम ! अब आप मेरे सामने यह बताइये कि हरिवंश-पुराण सुन लेनेपर क्या फल होता है और उस समय क्या दान देना चाहिये ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
हरिवंशे पुराणे तु श्रुते च भरतोत्तम ।
कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् ॥ २ ॥
तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ।

वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे ! हरिवंशपुराण सुन लेनेपर शरीर, वाणी और मनके द्वारा उपार्जित सारे पापोंका उसी प्रकार नाश हो जाता है, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार ॥ २ ॥

अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं भवेत् ॥ ३ ॥
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ।

अठारह पुराणोंके श्रवणसे जो फल प्राप्त होता है, उसे विष्णुभक्त पुरुष केवल हरिवंश सुनकर प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥

श्लोकार्धं श्लोकपादं वा हरिवंशसमुद्भवम् ॥ ४ ॥
शृण्वन्ति श्रद्धया युक्ता वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।

११०८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

जो श्रद्धापूर्वक हरिवंशके आधे या चौथाई श्लोकको भी सुनते हैं, वे भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते हैं ॥ ४ १/२ ॥

जम्बूद्वीपं समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभाः कलौ ॥ ५ ॥
भविष्यन्ति नरा राजन् सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।
स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥ ६ ॥
राजन् ! कलियुगमें जम्बूद्वीपका आश्रय लेकर रहनेवाले लोगोंमें इस ग्रन्थके श्रोता दुर्लभ हो जायेंगे, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ । पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान् विष्णुके सुयशसे भरे हुए इस ग्रन्थका अवश्य श्रवण करना चाहिये ॥ ५-६ ॥

दक्षिणा चात्र देया वै निष्कत्रयसुवर्णकम् ।
वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता ॥ ७ ॥
जो शास्त्रोक्त फलको प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हो, उस श्रोताको चाहिये कि वह अपनी शक्तिके अनुसार वाचकको हरिवंश सुननेकी दक्षिणाके रूपमें तीन निष्क¹ सुवर्ण प्रदान करे ॥ ७ ॥

स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंयुताम् ।
वाचकाय प्रदद्याद् वै आत्मनः श्रेयकाङ्क्षया ॥ ८ ॥
अपने कल्याणकी इच्छासे वह वाचकको वस्त्र और बछड़ेसहित एक कपिला गौ भी दे, जिसके सींगोंमें सोना मढ़ा हुआ हो ॥ ८ ॥

अलंकारं प्रदद्याच्च पाण्योर्वै भरतर्षभ ।
कर्णस्याभरणं दद्याद् यानं च सविशेषतः ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! वह दोनों हाथोंके लिये अलंकार (कड़े, बाजूबन्द, अँगूठी आदि) भी दे तथा कानके आभूषण (कुण्डल आदि) भी अर्पित करे; विशेषतः, शिविका आदि कोई सवारी अवश्य दे ॥ ९ ॥

भूमिदानं समादद्याद् ब्राह्मणाय नराधिप ।
भूमिदानसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ १० ॥
नरेश्वर ! उसे ब्राह्मणके लिये भूमिको दान भी देना चाहिये; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न तो हुआ है और न होगा ही ॥ १० ॥

शृणोति श्रावयेद् वापि हरिवंशं तु यो नरः ।
सर्वथा पापनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥ ११ ॥
जो मनुष्य हरिवंशको सुनता और सुनाता है, वह सब प्रकारसे पापमुक्त होकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

पितॄनुद्धरते सर्वानैकादशसमुद्भवान् ।
आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ ! वह अपनी ग्यारह पीढ़ीके समस्त पितरोंका उद्धार कर देता है। साथ ही अपना, अपने पुत्रका तथा अपनी पत्नीका भी उद्धार करता है ॥ १२ ॥

दशांशाञ्चात्र होमो वै कार्यः श्रोत्रा नराधिप ।
इदं मया तवाग्रे च सर्वं प्रोक्तं नरर्षभ ॥ १३ ॥
नरेश्वर ! नरश्रेष्ठ ! श्रोताको इस हरिवंश-श्रवणके उपलक्ष्यमें इसकी श्लोकसंख्याका दशांश हवन करना चाहिये। यह सब कुछ मैंने तुम्हारे सामने कह दिया ॥ १३ ॥

यस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
अपुत्रः पुत्रमाप्नोति अधनो धनमाप्नुयात् ॥ १४ ॥
इसके स्मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

नरमेधाश्वमेधाभ्यां यत् फलं प्राप्यते नरैः।
तत् फलं लभते नूनं पुराणश्रवणाद्धरेः ॥ १५ ॥
नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, उसीको श्रीहरिके इस पुराणका श्रवण करनेसे मनुष्य निश्चय ही प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥

ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः ।
सकृत्पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा ॥ १६ ॥
ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, गोहत्या, सुरापान और गुरुपत्नी-गमन—इन महापातकोंसे युक्त मनुष्य भी इस पुराणको एक बार पूर्वोक्त विधिसे सुन लेनेपर पवित्र हो जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥

इदं मया ते परिकीर्तितं मह-
च्छ्रीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् ।
शृण्वन् पठन्नाशु समाप्नुयात् फलं
यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभं महत् ॥ १७ ॥
यह मैंने तुमसे श्रीकृष्णके अपार, अद्भुत एवं महान् माहात्म्यका वर्णन किया है। जो इसे सुनता और पढ़ता है, वह लोकमें जो परम दुर्लभ और महान् फल है, उसे भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥


इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि श्रवणफलकथने पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतमें व्यासनिर्मित एक लाख श्लोकोंकी संख्याके अन्तर्गत उसके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रवणफलका वर्णनविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥

॥ हरिवंशपर्व सम्पूर्ण ॥


१. सोलह मासे वजनका एक निष्क होता है। (संस्कृत शब्दार्थकौस्तुभ)

श्रीपरमात्मने नमः

श्रीहरिवंशमाहात्म्यम्


प्रथमोऽध्यायः

हरिवंश-श्रवणका माहात्म्य, नारीके पाँच दोष और हरिवंशश्रवणसे उनकी निवृत्ति, पाठके उत्तम, मध्यम आदि भेद तथा गोत्रतकी विधि

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण एवं महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥

जयति पराशरस्नुः सत्यवतीहृदयनन्दनोव्यासः।
यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत् पिवति ॥ २ ॥
सत्यवतीके हृदयको आनन्दित करनेवाले उन पराशर-पुत्र व्यासजीकी जय हो, जिनके मुखारविन्दसे निकले हुए वाङ्मय अमृतका सारा जगत् पान करता है ॥ २ ॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ३ ॥
मैं अज्ञानरूपी तिमिररोग (रतौंधी) से अन्धा हो रहा था, उस दशामें जिन्होंने ज्ञानरूपी अञ्जनकी शलाकासे मेरे बुद्धिरूपी नेत्रको खोल दिया है—उसमें ज्ञानका प्रकाश भर दिया है, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ ३ ॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत् पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ४ ॥
जिससे यह अखण्ड मण्डलाकार चराचर जगत् व्याप्त है, उस परमात्माके पद (स्वरूप) का जिन्होंने साक्षात्कार कराया है, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ ४ ॥

जनमेजय उवाच
त्वया मे भगवन् प्रोक्तो भारतश्रवणे विधिः ।
श्रवणे हरिवंशस्य विशेषाद् वद मे विधिम् ॥ ५ ॥
जनमेजय बोले— भगवन् ! आपने मुझे महाभारत-श्रवणकी विधि बतायी है। अब हरिवंश सुननेकी जो विधि है, उसे विशेषरूपसे मुझे बताइये ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मविष्णुमहेशानां हरिवंशं जगुर्बुधः।
शब्दब्रह्ममयं विद्धि हरिवंशं सनातनम् ॥ ६ ॥
शब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! ऋषि-मुनि हरिवंश-को ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीका स्वरूप बताते हैं। तुम यह समझ लो कि हरिवंश सनातन शब्द ब्रह्ममय है। इस शब्दब्रह्ममें निष्णात हुआ पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ६½ ॥

हरिवंशपुराणे तु श्रुते वै राजसत्तम ॥ ७ ॥
कायिकं वाचिकं पापं मनसा समुपार्जितम् ।
तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ ! हरिवंशपुराण सुन लेनेपर शरीर, वाणी और मनके द्वारा संचित किये हुए सारे पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार ॥ ७-८ ॥

अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं लभेत् ।
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥ ९ ॥
अठारह पुराणोंका श्रवण करनेसे जो फल मिलता है, उसीको वैष्णवभक्त पुरुष केवल हरिवंश सुनकर प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।
जम्बूद्वीपं समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभाः कलौ ॥ १० ॥
भविष्यन्ति नरा राजन् सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।
स्त्रियाँ और पुरुष इसे सुनकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। राजन् ! कलियुगमें जम्बूद्वीपका आश्रय लेकर रहनेवाले लोगोंमें इस ग्रन्थके श्रोता दुर्लभ हो जायेंगे, यह मैं सत्य-सत्य बता रहा हूँ ॥ १०½ ॥

स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥ ११ ॥
बालघाती च पुरुषो मृतवत्सः प्रजायते ।
श्रवणं हरिवंशस्य कर्तव्यं च यथाविधि ॥ १२ ॥
पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान् विष्णुके इस यशका श्रवण करना चाहिये। बालकोंकी हत्या करने-वाले पुरुषके पुत्र हो-होकर मर जाते हैं। ऐसे मनुष्यको विधिपूर्वक हरिवंश सुनना चाहिये ॥ ११-१२ ॥

१११० श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


गुरुचन्द्राग्निसूर्याणां सम्मुखे मेहते च यः।
बीजमुत्सृज्यते तेन त्यक्तरेता नरो भवेत् ॥ १३ ॥

जो गुरु, चन्द्रमा, अग्नि और सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करता है अथवा वीर्य छोड़ता है, वह पुरुष जन्मान्तरमें वीर्यहीन (नपुंसक) हो जाता है ॥ १३ ॥

योषित्पुष्पफलानां च बालानां घातिनी तथा।
फलानां कर्तनकरी मातापितृवियोगिनी ॥ १४ ॥
स्राविणी परगर्भाणां तत् तत् प्रायोपजोषिणी।
ईदृग्विधा भविष्यन्ति पञ्चदोषयुताः स्त्रियः ॥ १५ ॥
अपुष्पा मृतवत्साश्च काकवन्ध्यास्तथैव च।
कन्याप्रजात्वं च तथा स्रावयुक्ताः स्वपातकैः ॥ १६ ॥

जो स्त्री फूलों और फलोंका नाश तथा बालकोंकी हत्या करनेवाली होती है, जो फलोंको काटती तथा बालकोंका माता-पितासे वियोग करा देती है, जो दूसरी स्त्रियोंके गर्भ गिरानेवाली और प्रायः ऐसी ही स्त्रियोंके सम्पर्कमें रहनेवाली है, इस तरहकी सारी स्त्रियाँ अपने पापोंके कारण पाँच प्रकारके दोषोंसे युक्त होती हैं—अपुष्पा (रजोधर्शनसे रहित), मृतवत्सा (जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हों ऐसी), काकवन्ध्या (जिसके एक ही संतान होकर रह जाय, दूसरी संतति न हो वह), कन्याप्रजा (केवल कन्या पैदा करनेवाली) तथा स्रावयुक्ता (जिसका गर्भ ही गिर जाता हो, ऐसी) ॥

तासां दोषापहारार्थं हरिवंशोऽभिगर्जति।
मदीयश्रवणात् सद्यो दोषा नश्यन्ति सत्वरम् ॥ १७ ॥

उन सभी स्त्रियोंके दोषोंका निवारण करनेके लिये हरिवंश गर्जता रहता है। वह कहता है, मेरा श्रवण करनेसे सारे दोष तत्काल नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥

नरः सुवर्णं सर्पिंश्च पददानैः समन्वितम्।
दशावृत्तीः शृणोत्येवं बीजसाफल्यमाप्नुयात् ॥ १८ ॥

जो मनुष्य सुवर्णदान, घृतदान और पददानके साथ हरिवंशको दस बार सुनता है, उसका वीर्य सफल होता है ॥ १८ ॥

दशावृत्तीरपुष्पार्थं मृतवत्सा तु सप्त वै।
पञ्चावृत्तीः स्रवद्गर्भा काकवन्ध्या त्रयं तथा ॥ १९ ॥

अपुष्पा—रजोधर्शनसे रहित नारीके लिये दस आवृत्ति हरिवंश सुननेका विधान है। जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हों, वह सात बार हरिवंश सुने। जिसके गर्भ गिर जाते हों, वह पाँच बार और जो काकवन्ध्या हो, वह तीन बार हरिवंशकी कथा सुने ॥ १९ ॥

कन्याप्रसूश्चैकावृत्तिं श्रुत्वा पुत्रमवाप्नुयात्।
जीवितावधिकं श्राव्यं सर्वदोषोपशान्तये ॥ २० ॥
भविष्यं जन्म सम्प्राप्य न भवेत् तादृशी पुनः।

केवल कन्या पैदा करनेवाली स्त्री एक ही आवृत्ति हरिवंशकी कथा सुनकर पुत्र प्राप्त कर सकती है। सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये जीवनभर हरिवंश सुनते रहना चाहिये, जिससे भावी जन्म पाकर वह फिर उन दोषोंसे युक्त न हो ॥ २०½ ॥

उत्तमं सार्थपाठं च मध्यमं च निरर्थकम् ॥ २१ ॥

हरिवंशका पाठ उत्तम और मध्यमके भेदसे दो प्रकारका होता है। यदि अर्थसहित इसका पाठ या श्रवण किया जाय तो वह उत्तम है। बिना अर्थका पाठ मध्यम श्रेणीका माना गया है ॥ २१ ॥

विनार्थं शुद्धपाठश्चेदूत्तमेन समो भवेत्।
नवाहमुत्तमं प्रोक्तमेकविंशाहं मध्यमम् ॥ २२ ॥
निकृष्टमेकत्रिंशाहं सुखसाध्यं समाचरेत्।

बिना अर्थके भी यदि शुद्ध पाठ हो तो वह उत्तमके ही समान होता है। (दिनोंकी संख्याके भेदसे इसके पाठकी उत्तम, मध्यम और अधम तीन श्रेणियाँ हैं—) नौ दिनोंमें इसका पाठ हो तो वह उत्तम कहा गया है, इक्कीस दिनोंमें हो तो मध्यम माना गया है और इकतीस दिनोंमें हो तो उसे निकृष्ट श्रेणीका पाठ बताया गया है। जो भी सुगमतापूर्वक साध्य हो, वही पाठ करना चाहिये ॥ २२½ ॥

बहुभिर्दिवसै राजन् साध्यानां साधनं कलौ ॥ २३ ॥
तेन पारायणं साध्यं प्रोक्तं नारायणात्मना।

राजन् ! कलियुगमें बहुत दिनोंके प्रयत्नसे साध्य फलोंकी सिद्धि होती है, अतः नारायणस्वरूप व्यासजीने हरिवंशका यह पारायण साध्यरूप बताया है ॥ २३½ ॥

नवाहो गर्जति कलौ चैकविंशाधिकस्तथा ॥ २४ ॥
एकत्रिंशाहिको यज्ञो वन्ध्यादोषविनाशकः।

कलियुगमें नवाहपारायण और इक्कीस दिनोंका पारायण श्रोताके अभीष्टकी सिद्धि करनेके लिये गर्जना करता है। इकतीस दिनोंमें पूर्ण होनेवाला हरिवंशपारायण-यज्ञ नारीके वन्ध्यात्व दोषका नाश करनेवाला है ॥ २४½ ॥

गोव्रतं तु स्त्रिया कार्यं पारणं पुरुषेण च ॥ २५ ॥
श्रवणारम्भणे राजन् यथावत् कथयामि ते।

राजन् ! हरिवंश-कथा श्रवण आरम्भ करना हो तो पहले स्त्री और पुरुषको भी गोव्रत करना चाहिये, फिर व्रतके अन्तमें उसका पारण भी स्त्री और पुरुष दोनोंको करना चाहिये। इसकी विधि मैं तुम्हें यथावत्रूपसे बता रहा हूँ ॥ २५½ ॥

अवसायान्तपर्यन्तं कार्यं मासमतं शुभम् ॥ २६ ॥
चतुर्थ्यां प्रातरुत्थाय स्त्रिया हृष्टेन चेतसा।

द्वितीयोऽध्यायः । ११११

द्वितीयोऽध्यायः । ११११


गोव्रतं नियतं कार्यं निराहारं निरूदकम् ॥ २७ ॥
सूर्यास्तकालपर्यन्तं यावद्गोमागमौ भवेत्।
इसका आरम्भ करके अन्ततोगत्वा एक मासतक इस शुभ व्रतका अनुष्ठान करना उचित है। स्त्रीको चाहिये कि वह मनमें अत्यन्त प्रसन्न हो चतुर्थी तिथिको प्रातःकाल उठकर नियमपूर्वक गोव्रत आरम्भ करे। प्रातःकालसे सूर्यास्ततक जबतक चरनेको गयी हुई गौएँ गाँवमें लौट न आयें, तबतक अन्न और जल ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २६—२७ १/२ ॥

आगतां च सवत्सां हि पूजयित्वा यथाविधि ॥ २८ ॥
यवसं पुष्कलं दत्त्वा यवान्नं कुरुते स्वयम्।
जब गौ द्वारपर आ जाय, तब बछड़ेसहित उसकी विधिवत् पूजा करके उसे प्रचुरमात्रामें घास-भूसा देकर स्वयं भी यवान्न ग्रहण करे ॥ २८ १/२ ॥

एवं मासे चतुर्थ्यां सा शुक्लायां व्रतमाचरेत् ॥ २९ ॥
स्त्रीव्रतं कथितं राजन् पुरुषस्य तथैव च।
एवं मासवतं कृत्वा सुपुत्रं लभते ध्रुवम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार किसी भी मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीको नारी यह व्रत आरम्भ करे और उसे एक मासतक निभाये। राजन् ! इस तरह यह स्त्री और पुरुषके लिये व्रत बताया गया है। इसका इसी प्रकार एक मासतक आचरण करके मनुष्य निश्चय ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेता है ॥ २९-३० ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणके अन्तर्गत हरिवंशमाहात्म्यमें श्रवण आदिकी विधिका वर्णनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

( १ ) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल

वैशम्पायन उवाच
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि नवाहश्रवणे विधिम् ।
सहायैर्बहुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिस्त्वयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! अब मैं तुम्हें हरिवंशके नवाह-श्रवणकी विधि बताऊँगा। यह विधि प्रायः बहुत-से सहायकोंकी सहायतासे ही सिद्ध होनेवाली है ॥ १ ॥

दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छद्य यत्नतः।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्प्य च ॥ २ ॥
पहले यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जितने धनका प्रबन्ध किया जाता है, उतने धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिये ॥ २ ॥

नभस्यश्चाश्विनोजौं च मार्गशीर्षः शुचिर्नभः ।
एते मासाः कथारम्भे श्रोतॄणां कामसूचकाः ॥ ३ ॥
भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण—ये छः मास कथा आरम्भ करनेमें श्रोताओंके लिये अभीष्ट सिद्धिके सूचक हैं ॥ ३ ॥

सहायाश्च त एवात्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये।
देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रोच्या प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्यं कुटुम्बिभिः ।
इस कार्यमें उन्हीं लोगोंको सहायक बनाना चाहिये, जो उद्योगी हों। फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरों (विभिन्न स्थानों) मे यह संदेश कहला देना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, अतः आप सब स्वजनोंको सपरिवार पधारना चाहिये ॥ ४ १/२ ॥

देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः ॥ ५ ॥
तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम्।
सतां समाजो भविता नवरात्रं सुदुर्लभः ॥ ६ ॥
भिन्न-भिन्न स्थानोंमें हरिकीर्तनके लिये उत्सुक रहनेवाले जो विरक्त वैष्णव हों, उनके पास अवश्य निमन्त्रण-पत्र भेजना चाहिये। उस पत्रके लेखनकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—‘महानुभावो ! यहाँ नौ दिनोंतक सत्पुरुषोंका समागम—सत्संगका सुअवसर रहेगा, जो सबके लिये परम दुर्लभ है (अतः आपलोग हरिवंश-कथामृतका पान करनेके लिये अवश्य पधारनेकी कृपा करें)' ॥ ५-६ ॥

आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ।
तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं स्मृतम् ॥ ७ ॥
जो लोग आवे, उन सबके रहनेके लिये स्थानका यथोचित प्रबन्ध करे। कथाका श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है ॥ ७ ॥

विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत् कथास्थलम्।
शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् ॥ ८ ॥
जहाँ लंबा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथा-स्थल बनाना चाहिये। उस भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे वहाँ चौक पूरे ॥ ८ ॥

गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् ।
कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीस्तम्भमण्डितः ॥ ९ ॥

१११२ | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे और कथाके लिये एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये, जो केलेके खम्भोंसे सुशोभत हो ॥ ९ ॥
फलपुष्पदलैर्बिम्बैश्चवितानैन विराजितः ।
चतुर्दिक्षु ध्वजारोपस्तोरणेन विराजितः ॥ १० ॥
उसे सब ओर फल, फूल, पल्लव और चंदोवेसे अलंकृत करे । चारों दिशाओंमें ध्वजारोपण करे । उस मण्डपमें सुन्दर फाटक लगाकर उसकी शोभा बढ़ाये ॥ १० ॥
ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च सप्ताधः परिकल्पयेत् ।
तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य वै ॥ ११ ॥
उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर समझा-बुझाकर बैठाये । इसी प्रकार नीचे भी सात लोकोंकी कल्पना करे (और उनमें साधारण जनताको बिठाये) ॥ ११ ॥
पूर्वं तेषामासनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम् ।
वक्तुश्चापि तथा दिव्यमासनं परिकल्पयेत् ॥ १२ ॥
पहले उन विरक्त ब्राह्मणोंके लिये उत्तमोत्तम आसनोंका प्रबन्ध करना चाहिये । फिर वक्ता (वाचक) के लिये भी दिव्य आसनकी व्यवस्था करे ॥ १२ ॥
उदङ्मुखो भवेद् वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तथा ।
प्राङ्मुखोऽथ भवेद् वक्ता श्रोता चोदङ्मुखस्तथा ॥
जब वक्ताका मुँह उत्तरकी ओर रहे, तब श्रोताका मुख पूर्वकी ओर होना चाहिये और यदि वक्ताका मुख पूर्वकी ओर हो तब श्रोताको उत्तराभिमुख होकर बैठना चाहिये ॥ १३ ॥
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशारदः ।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्यों दयान्वितः ॥ १४ ॥
जो विरक्त, विष्णुभक्त, वेदशास्त्रविशारद, जातिका ब्राह्मण, भाँति-भाँतिके दृष्टान्त देकर ग्रन्थके भावको हृदयङ्गम करानेमें कुशल, धीर और दयालु हो, ऐसे पुरुषको ही वक्ता बनाना चाहिये ॥ १४ ॥
वेदवेदान्ततत्त्वज्ञैर्गुरुभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
नृणां कृतोपदेशानां सद्यः सिद्धिर्हि जायते ॥ १५ ॥
जिन मनुष्योंको वेद-वेदान्तके तत्त्वज्ञ, ब्रह्मवादी गुरुओंसे उपदेश प्राप्त होता है, उन्हें तत्काल सिद्धि सुलभ होती है ॥ १५ ॥
अथान्यजनसामान्यैर्गुरुभिर्नीतिकोविदैः ।
नृणां कृतोपदेशानां सिद्धिर्भवति कीदृशी ॥ १६ ॥
जो गुरु अन्य सामान्य लोगोंके समान ही नीतिकुशल हैं, उनसे जिन मनुष्योंको उपदेश प्राप्त होता है; उनको कैसी सिद्धि मिलेगी ? ॥ १६ ॥


अनेकधर्मविभ्रान्ताः स्त्रैणाः पाखण्डवादिनः ।
धर्मशास्त्रकथोद्वारेत्याज्यास्ते यदि पण्डिताः ॥ १७ ॥
जो अनेक मत मतान्तरोंके चक्करमें पड़कर भ्रान्त हो रहे हों, स्त्रीलम्पट हों और पाखण्डकी बातें करते हों, ऐसे लोग यदि पण्डित भी हों तो उन्हें धर्ममय शास्त्र-इतिहास-पुराणकी कथा कहनेके लिये वक्ता न बनावे, उन्हें ऐसे कार्यसे दूर ही रखे ॥ १७ ॥
वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः ।
पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः ॥ १८ ॥
वक्ताके पास उसकी सहायताके लिये उसी योग्यताका एक और विद्वान् रखे । वह भी संशय-निवारण करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल होना चाहिये ॥ १८ ॥
वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग् व्रताप्तये ।
वक्तुः श्रोतुश्चन्द्रशुद्धौ दम्पत्योः शुभतारके ॥ १९ ॥
वक्ताको उचित है कि वह कथा आरम्भ होनेसे एक दिन पहले क्षौर करा ले, जिससे व्रतका पूर्णतया निर्वाह हो सके । जब वक्ता और श्रोता दोनोंके चन्द्रबल ठीक हों और सुननेवाले दम्पतिके ग्रह एवं ताराबल भी अनुकूल हों, तब कथा आरम्भ करनी चाहिये ॥ १९ ॥
अरुणोदये विनिर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत् ।
नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं प्रयतस्ततः ॥ २० ॥
सुक्षालितपाणिपादः स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ।
गोमयोपलिप्तदेशे सर्वतोभद्रकल्पनम् ॥ २१ ॥
स्वीयशक्त्यनुसारेण पूजनं सर्वमाचरेत् ।
कथाविघ्नविनाशाय गणनाथं प्रपूजयेत् ॥ २२ ॥
श्रोता अरुणोदयकालमे—दिन निकलनेसे दो घड़ी पहले शौच आदिसे निवृत्त होकर विधिपूर्वक स्नान करे । प्रतिदिन मनको संयममें रखकर संक्षेपसे संध्या-वन्दन आदि करके हाथ-पैरोंको अच्छी तरह धोकर पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन करावे । फिर गोबरसे लिपे-पुते स्थानपर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करे और अपने शक्तिके अनुसार सम्पूर्ण पूजन कर्म सम्पन्न करे । कथाके विघ्नोंका निवारण करनेके लिये श्रीगणेशजीकी पूजा करे ॥ २०—२२ ॥
सलक्ष्मीपुत्रसहितं गोपालं स्थापयेत् ततः ।
निर्विघ्नेनैव सिद्ध्यर्थं देवपूजनपूर्वकम् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् लक्ष्मी (रुक्मिणी) तथा (प्रद्युम्न आदि) पुत्रोंसहित गोपालक भगवान् श्रीकृष्णकी स्थापना करे । कथाकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धिके लिये ही देवपूजनपूर्वक पत्नी और पुत्रसहित भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे ॥ २३ ॥
संकल्पं कुर्यात्—
इसके बाद निम्नाङ्कितरूपसे संकल्प करना चाहिये—

द्वितीयोऽध्यायः ११९३

द्वितीयोऽध्यायः ११९३

अद्येहेत्यादिदेशकालौ स्मृत्वा अमुकगोत्रस्यामुकप्रवरस्यामुकशर्मणः सपत्नीकस्य मम जन्मनि जन्मनि संचितमहापातकरूपढलनाशपूर्वकं तेन पापसंचयेन कृतसंतानबाधकताविनाशपूर्वकमिह जन्मनि संतानोत्पत्तिहेतवे तस्य संतानस्य शरदां शतमायुषो वृद्धयर्थमात्मनश्च सकलसुखाप्तिहेतवे इह शरीरशुद्धयर्थं परत्र चेन्द्रादिलोकातिक्रमणपूर्वकं श्रीमद्विष्णुभक्त्युद्रेकजनितकल्पावधितल्लोकगमनतत्रवासपूर्वकत्तत्स्वरूपावाप्तिहेतवे आवां दम्पती श्रीमद्धरिवंशपुराणश्रवणं कर्तृकतया करिष्यावहे । अन्यतरकर्तृत्वे करिष्ये इत्येवसंकल्पः ।

आज यहाँ इत्यादिरूपसे वर्तमान देशकालका स्मरण करके यजमान यों कहे—अमुक गोत्र, अमुक प्रवर और अमुक नाम और जातिवाले मुझ सपत्नीक यजमानके जन्म-जन्मान्तरोंमे संचित महापातकसमूहोंके नाशपूर्वक उस पापसंचयसे होनेवाली संतानबाधाका निवारण करके इस जन्ममें संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे और उस संतानकी आयु बढ़कर सौ वर्षोंकी हो जाय—इस अभिलाषासे अपनेको भी सम्पूर्ण सुखोंकी प्राप्ति हो—इस कामनासे इहलोकमें शरीरकी शुद्धिके लिये और परलोकमें इन्द्रादि लोकोंको लाँघकर भगवान् विष्णुकी भक्तिके उद्रेकसे सुलभ विष्णुलोकमें गमन और वहाँ एक कल्पतक निवासपूर्वक अन्ततोगत्वा भगवत्स्वरूपकी प्राप्तिके लिये हम दोनों दम्पती यज्ञकर्तारूपसे हरिवंशपुराणका श्रवण करेंगे। यदि पति और पत्नीमेंसे कोई एक ही कथाश्रवणका कर्ता हो तो एकवचन 'करिष्ये' (करूँगा) ऐसी क्रिया बोलकर संकल्प करना चाहिये ।

इति कृत्वा तु संकल्पं वक्तारं वृणुयात्ततः ।
श्रुताध्ययनसम्पन्नं पूजयित्वा यथाविधि ॥ २४ ॥

इस प्रकार संकल्प करनेके अनन्तर वेद-शास्त्रोंके अध्ययनसे सम्पन्न वक्ताका विधिपूर्वक पूजन करके उसका वरण करे ॥ २४ ॥

सुवर्णमुद्रिकां गृह्य कुण्डले च विशेषतः ।
धौतवस्त्रं सोत्तरीयं चोष्णीषेण समन्वितम् ॥ २५ ॥
सुवर्णषोडशपलं पुष्पताम्बूलसंयुतम् ।
पूगीफलं चाक्षतान् वै गृहीत्वा शुद्धमानसः ॥ २६ ॥

सोनेकी अँगूठी, विशेषतः दो सुवर्णमय कुण्डल, धोती, चादर, पगड़ी, सोलह पल सुवर्ण, फूल, पान, सुपारी और अक्षत लेकर शुद्ध-चित्त हो निम्नांकितरूपसे संकल्प बोलकर वक्ताका वरण करे ॥ २५-२६ ॥

**संकल्प:—**अद्येहेत्यादिअमुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणनेभिश्चन्दनताम्बूलसुवर्णवस्त्रादिभिर्हरिवंशश्रवणे वाचकत्वेनावां दम्पती त्वां वृणीवहे ।

( १ ) वरणका संकल्प इस प्रकार है—आज यहाँ इत्यादिरूपसे वर्तमान देशकालका स्मरण करके यजमान यों कहे—हम दोनों दम्पती अमुकगोत्रवाले, अमुक शर्मा ब्राह्मणका इन चन्दन, ताम्बूल, सुवर्ण और वस्त्र आदि उपकरणोंद्वारा हरिवंश सुनानेके लिये वाचक (व्यास) रूपसे वरण करते हैं।

वृतोऽस्मीति तेनोक्ते—

( २ ) फिर वाचक कहे—'मेरा वरण हो गया' उसके ऐसा कहनेपर—

व्रतेन दीक्षामानोति इति मन्त्रेण वक्तुर्दक्षिणकरमूले रक्षाबन्धनं कार्यम् । ब्राह्मणेन श्रोतॄणां रक्षाबन्धनं कार्यम् ।

( ३ ) यजमान 'व्रतेन दीक्षामानोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्, दक्षिणा श्रद्धामानोति श्रद्धया सत्यमाप्यते' अर्थात् 'साधक व्रतसे दीक्षाको पाता है, दीक्षासे दक्षिणाको और दक्षिणासे श्रद्धाको पा लेता है। फिर उस श्रद्धासे सत्यकी प्राप्ति होती है।' इस मन्त्रसे वक्ताके दाहिने हाथके मूलभागमें रक्षाबन्धन करे, तत्पश्चात् ब्राह्मणको श्रोताओंके हाथमें भी रक्षाबन्धन करना चाहिये।

चन्दनाद्युपचारैस्तु वस्त्रपुष्पाक्षतैस्तथा ।
हेमालंकरणैः पूगैः फलैर्ऋतुसमुद्भवैः ॥ २७ ॥
पुराणपूजनं प्रोक्तं विधिना षोडशेन तु ।

( ४ ) तदनन्तर चन्दनादि उपचारोंसे तथा वस्त्र, पुष्प, अक्षत, सुवर्णमय आभूषण, सुपारी और ऋतुफल आदिसे षोडशोपचारकी विधिद्वारा पुराणका पूजन करना आवश्यक बताया गया है ॥ २७ ॥

पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठाञ्छ्रवणं फलदं स्मृतम् ॥ २८ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्रोतव्यं विधिपूर्वकम् ।

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके हरिवंशका श्रवण करना अभीष्ट फलदायक माना गया है, इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके विधिपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये ॥ २८३ ॥

अथ व्यासं नमस्कुर्युर्मन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥ २९ ॥
नमस्ते भगवन् व्यास सर्वशास्त्रार्थकोविद ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानमूर्ते सत्यवतीसुत ॥ ३० ॥

तदनन्तर सभी श्रोता व्यासको नमस्कार करें ! उस समय यजमान इस मन्त्रका उच्चारण करे—'समस्त शास्त्रोंके अर्थको जाननेवाले, ब्रह्मा, विष्णु, शिवस्वरूप, सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास ! आपको नमस्कार है' ॥ २९-३० ॥

इति व्यासं नमस्कृत्य शुभदेशे कुशासने ।
उपविश्य प्रतिदिनमुल्लसत्प्रीतमानसः ॥ ३१ ॥

इस प्रकार व्यासको नमस्कार करके सुन्दर पवित्र

१११४श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

स्थानमें कुशासनपर बैठकर प्रतिदिन उल्लासपूर्ण प्रसन्नचित्त हो कथा श्रवण करे ॥ ३१ ॥

बालो युवाथ वृद्धो वा दरिद्रो दुर्बलोऽपि वा ।
पुराणज्ञः सदा वन्द्यः पूज्यश्च सुकृतार्थिभिः ॥ ३२ ॥
पुराणज्ञ पुरुष बालक हो या जवान, बूढ़ा हो या दरिद्र एवं दुर्बल, पुण्यकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके लिये वह सदा ही वन्दनीय एवं पूजनीय है ॥ ३२ ॥

नीचबुद्धिं न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन ।
यस्य वक्त्रोद्गता वाणी कामधेनुः शरीरिणाम् ॥ ३३ ॥
जिसके मुखसे निकली हुई वाणी देहधारियोंके लिये कामधेनुके तुल्य है, उस पुराणवेत्ता विद्वान्‌के प्रति कभी नीचबुद्धि न करे ॥ ३३ ॥

गुरवः सन्ति लोकस्य जन्मतौ गुणतश्च ये ।
तेषामपि च सर्वेषां पुराणज्ञः परो गुरुः ॥ ३४ ॥
जगत्‌के मनुष्योंके लिये जो जन्मसे और गुणोंकी शिक्षा देनेके कारण गुरु हैं, पुराणका विद्वान् उन सबका भी परम गुरु है ॥ ३४ ॥

भवकोटिसहस्रेषु भूत्वा भूत्वा च सीदते ।
यो ददाति पुण्यवृत्तिं कोऽन्यस्तस्मात् परो गुरुः ॥ ३५ ॥
कोटि सहस्र जन्मोंमें बारंबार उत्पन्न होकर कष्ट पानेवाले जीवको जो पुराणकथा सुनाकर पुण्यवृत्ति प्रदान करता है, उससे श्रेष्ठ गुरु दूसरा कौन है ? ॥ ३५ ॥

पुराणज्ञः शुचिर्दान्तः शान्तोऽपि जितमत्सरः ।
साधुः कारुण्यवान् वाग्मी वदेत् पुण्यकथां सुधीः ॥ ३६ ॥
जो पुराणोंका ज्ञाता, पवित्र, जितेन्द्रिय, शान्त, मात्सर्यरहित, साधु और दयालु है, वह विद्वान् वक्ता पुराणोंकी पुण्यकथा कहे ॥ ३६ ॥

व्यासासनसमारूढो यदा पौराणिकौ द्विजः ।
आ समाप्तैः प्रसंगस्य नमस्कुर्यान्न कस्यचित् ॥ ३७ ॥
पुराणवेत्ता द्विज जब व्यासासनपर आरूढ हो जाय, तबसे कथा-प्रसंगकी समाप्तितक वह दूसरे किसीको नमस्कार न करे ॥ ३७ ॥

ये धूर्ता ये च दुर्वृत्ता ये चान्ये विजिगीषवः ।
तेषां कुटिलवृत्तीनामग्रे नैव वदेत् कथाम् ॥ ३८ ॥
जो धूर्त हों, जो दुराचारी हों तथा दूसरे जो-जो तर्कसे हरानेकी इच्छा रखकर आये हों, उन कुटिल वृत्तिवाले मनुष्योंके सामने कभी कथा न कहे ॥ ३८ ॥

न दुर्जनसमाकीर्णे न शूद्रश्वापदावृते ।
देशे नापूतसद्मने वदेत् पुण्यकथां सुधीः ॥ ३९ ॥
जो स्थान दुर्जनोंसे भरा हो, शूद्रों और हिंसक जन्तुओंसे आवृत्त हो वहाँ और अपवित्र गृहमें विद्वान् पुरुष कभी पुराणोंकी पवित्र कथा न कहे ॥ ३९ ॥

सद्ग्रामे सुजनाकीर्णे सुक्षेत्रे देवालये ।
पुण्ये नदनदीतीरे वदेत् पुण्यकथां सुधीः ॥ ४० ॥
सज्जनोंसे भरे हुए अच्छे ग्राममें, उत्तम क्षेत्रमें, देवताके मन्दिरमें तथा नदों और नदियोंके पावन तटपर विद्वान् वक्ता पुण्यकथाका उपदेश करे ॥ ४० ॥

ईदृशाद् वाचकाद् राजञ्छ्रुत्वा फलमवाप्नुयात् ।
ऐहिकामुष्मिकं शर्म पुण्यं पुत्रादिसिद्धिदम् ॥ ४१ ॥
महापापादिशमनं पुराणं हरिवंशकम् ।
राजन् ! ऐसे वाचकसे कथा सुनकर मनुष्य अभीष्ट फलको पा लेता है। हरिवंशपुराण इहलोक और परलोकमें भी कल्याणकारी, पुण्यदायक, पुत्र आदि अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि देनेवाला तथा बड़े-बड़े पाप आदिका शमन करने-वाला है ॥ ४१½ ॥

योज्यं पुत्रादिसिद्ध्यर्थं हरिवंशं जितेन्द्रियैः ॥ ४२ ॥
शृणुयात् सर्वभावेन पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥ ४३ ॥
जितेन्द्रिय पुरुषोंको पुत्र आदिकी सिद्धिके लिये हरिवंशका सहारा लेना चाहिये । इस पुण्यदायक और पापनाशक पुराणको पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रताके साथ सुनना चाहिये ॥ ४२-४३ ॥


इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदिकी विधिक प्रतिपादनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥


तृतीयोऽध्यायः

( २ ) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल

वैशम्पायन उवाच
जपादिश्ववणं प्रोक्तं हरिवंशस्य सूरिभिः ।
पितॄन् संतर्प्य शुद्धयर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! विद्वान् पुरुषोंनि...

तृतीयोऽध्यायः

तृतीयोऽध्यायः ११५५

जपसे हरिवंश-श्रवणकी सफलता बतायी है। पहले पितरोंका तर्पण करके आत्मशुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करे ॥ १ ॥

सुमण्डपं च कर्तव्यं तत्र स्थाप्यो हरिस्तथा।
कृष्णमुद्दिश्य मन्त्रेण चरेत् पूजाविधिं क्रमात् ॥ २ ॥

उत्तम मण्डप बनावे और उसमें श्रीहरिकी स्थापना करे, फिर भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे मन्त्रद्वारा क्रमशः पूजा-विधि सम्पन्न करे ॥ २ ॥

प्रदक्षिणानमस्कारान् पूजान्ते स्तुतिमाचरेत्।
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे ॥ ३ ॥
कर्मग्राहगृहीतोऽहं मामुद्धर भवार्णवात्।

पूजाके अन्तमें प्रदक्षिणा और नमस्कार करके इस प्रकार स्तुति करे—'करुणानिधे ! मैं इस संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। मुझे कर्मरूपी ग्राहने पकड़ रखा है। आप मुझ दीनका इस भवसागरसे उद्धार कीजिये ॥ ३३ ॥

ततः श्रीहरिवंशस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
विधिना षोडशेनैव धूपदीपसमन्विता।

तदनन्तर धूप, दीप आदि सामग्रियोंसे षोडशोपचारकी विधिके अनुसार प्रयत्नपूर्वक श्रीहरिवंशकी भी पूजा करनी चाहिये ॥ ४ ॥

ततस्तु श्रीफलं धृत्वा नमस्कारं समाचरेत् ॥ ५ ॥
स्तुतिः प्रसन्नचित्तेन कर्तव्या केवलं तदा।

तदनन्तर पुस्तकके आगे श्रीफल ( नारियल ) रखकर नमस्कार करे और उस समय प्रसन्नचित्तसे अनन्यभावपूर्वक इस प्रकार स्तुति करे—॥ ५३ ॥

स्वीकृतोऽसि मया नाथ पुत्रार्थं भवसागरे ॥ ६ ॥
मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ॥ ७ ॥

'नाथ ! मैंने इस भवसागरमें पुत्रकी प्राप्तिके लिये आपकी शरण ली है। केशव ! मेरे इस मनोरथको किसी विघ्न-बाधाके बिना ही आप सब प्रकारसे सफल करें। मैं आपका दास हूँ' ॥ ६-७ ॥

एवं दीनबचः प्रोक्त्वा वक्तारं चाथ पूजयेत्।
सम्पूज्य वस्त्रभूषाभिः पूजान्ते तं च संस्तवेत् ॥ ८ ॥

इस प्रकार दीन वचन कहकर वक्ताको वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित करके उसका पूजन करे और पूजनके पश्चात् उसकी इस प्रकार स्तुति करे—॥ ८ ॥

व्यासरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ॥ ९ ॥

'व्यासरूप महानुभाव ! आप समझानेकी कलामें निपुण और समस्त शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं। इस हरिवंशकी कथाको प्रकाशित करके आप मेरे अज्ञानको दूर कीजिये' ॥

तदग्रे नियमः पश्चात् कर्तव्यः श्रेयसे मुदा।
नवरात्रं यथाशक्त्या धारणीयः स एव हि ॥ १० ॥
वरणं पञ्चविप्राणां कथाभङ्गनिवृत्तये।
कर्तव्यं तैर्हरेर्जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया ॥ ११ ॥
संतानगोपालमन्त्रो महारुद्रजपस्तथा।
पूजनं पार्थिवस्यैव गणनाथमन्त्रोजपः ॥ १२ ॥

तदनन्तर वक्ताके आगे अपने कल्याणके लिये प्रसन्नता-पूर्वक नियम ग्रहण करे और यथाशक्ति नौ दिनोंतक निश्चय ही उसका पालन करे। कथामें कोई विघ्न न पड़े, इसके लिये पाँच ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये और उन ब्राह्मणों-को द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) का जप, संतानगोपालमन्त्रका जप, महारुद्रमन्त्रका जप, पार्थिवपूजन तथा गणेशमन्त्रका जप करना चाहिये ॥ १०-१२ ॥

ब्राह्मणान् वैष्णवांश्चान्यांस्तथा कीर्तनकारिणः।
नत्वा सम्पूज्य दत्ताज्ञः स्वयमासनमाविशेत् ॥ १३ ॥

इसके बाद वहाँ उपस्थित हुए ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा कीर्तन करनेवाले अन्य लोगोंको भी नमस्कार करके उनकी पूजा करे और उनसे आज्ञा लेकर स्वयं श्रोताके आसन-पर बैठे ॥ १३ ॥

लोकवित्तधनागारसर्वचिन्ता व्युदस्य च।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत् फलमुत्तमम् ॥ १४ ॥

जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन और घर आदिकी सारी चिन्ता छोड़कर शुद्ध बुद्धिसे केवल कथामें ही मन लगाये रहता है, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

दम्पती शुद्धमनसौ श्रद्धाभक्तिसमन्वितौ।
श्रद्धैव सर्वधर्माणां मातेव हितकारिणी ॥ १५ ॥

कथा सुननेवाले पति-पत्नी शुद्ध हृदयसे श्रद्धा और भक्तिके साथ कथा सुनें। सब धर्मोंमें श्रद्धा ही माताके समान हितकारिणी है ॥ १५ ॥

श्रद्धयैव नृणां सिद्धिर्जायते लोकयोर्द्वयोः।
श्रद्धया भजतः पुंसः शिलापि फलदायिनी ॥ १६ ॥

श्रद्धासे ही मनुष्योंको इहलोक और परलोकमें सिद्धि प्राप्त होती है। श्रद्धापूर्वक आराधना करनेवाले पुरुषको शिला भी अभीष्ट फल देनेवाली है ॥ १६ ॥

मूर्खोऽपि पूजितो भक्त्या गुरुर्भवति ज्ञानदः।
श्रद्धया भजतो मन्त्रस्त्वसद् योऽपि फलप्रदः ॥ १७ ॥

११६श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

—मूर्ख भी यदि भक्तिभावसे पूजित हो तो वह ज्ञानदाता गुरु हो जाता है। अर्थात् मन्त्रका भी यदि श्रद्धापूर्वक सेवन (जप) किया जाय तो वह फलदायक हो जाता है॥

श्रद्धया पूजितो देवो नीचस्यापि वरप्रदः।
अश्रद्धया कृता पूजा दानं यज्ञस्तपो व्रतम् ॥ १८ ॥
सर्वं निष्फलतां याति पुष्पं बन्धूकरोरिव।

यदि देवताकी श्रद्धापूर्वक पूजा की गयी तो वह नीच पुरुषको भी वर प्रदान करता है। अश्रद्धासे की हुई पूजा, दान, यज्ञ, तप और व्रत—ये सभी दुपहरियाके फूलकी भाँति निष्फल हो जाते हैं ॥ १८१/२ ॥

सर्वत्र संशयाविष्टः श्रद्धाहीनोऽतिचञ्चलः ॥ १९ ॥
परमार्थात् परिभ्रष्टः संसृतेर्न हि मुच्यते।

जो सर्वत्र संशययुक्त, श्रद्धाहीन और अत्यन्त चञ्चल होता है, वह परमार्थसे भ्रष्ट होकर संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता ॥ १९१/२ ॥

मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ॥ २० ॥
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।

मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषध और गुरुके विषयमें जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है ॥ २०१/२ ॥

अतो भावमयं विश्वं पुण्यपापं च भावतः ॥ २१ ॥
ते उभे भावहीनस्य न भवेतां कदाचन।
तस्मात् सर्वात्मना राजन्ञ्छ्रद्धाभक्ती समाश्रयेत् ॥ २२ ॥

यह सारा विश्व भावमय है। पुण्य और पाप भी भावसे ही होते हैं। जो भावसे हीन है, उसे वे दोनों पुण्य और पाप कभी नहीं प्राप्त होते हैं। अतः राजन्! सम्पूर्ण हृदयसे श्रद्धा और भक्तिका आश्रय लेना चाहिये ॥ २१-२२ ॥

आ सूर्योदयमारभ्य सार्धं त्रिप्रहरार्धकम्।
वाचनीया कथा सम्यग् धीरकण्ठं सुधीमता ॥ २३ ॥

बुद्धिमान् वक्ताको उचित है कि वह सूर्योदयसे लेकर साढ़े तीन प्रहरतक मध्यम-स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे ॥ २३ ॥

कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयम्।
तत् कथामनु कार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा ॥ २४ ॥
एवं श्रुत्वा विधानेन सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ २५ ॥

दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे। कथा बंद होनेपर वैष्णव पुरुषोंको उस बीचमें कुछ देरतक कीर्तन करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक कथा सुनकर मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करे ॥ २४-२५ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंश-माहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदि विधिक वर्णनाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


चतुर्थोऽध्यायः

नवाहव्रती श्रोताओंके पालन करने योग्य नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुओंका उल्लेख, न्यायविरुद्ध कथा श्रवण करनेवालोंकी दुर्गति, कथामें विघ्न डालनेके कारण एक नारीको नरकयातना एवं राक्षसयोनिकी प्राप्ति तथा श्रोताओंके चौदह भेद

वैशम्पायन उवाच

नवाहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्शृणु सत्तम।
एककालाशनश्चैव अधःशायी भवेन्नरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—साधुशिरोमणे! नवाह-कथा-श्रवणका व्रत लेनेवाले पुरुषोंके लिये जो आवश्यक नियम हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो! व्रती पुरुष एक समय भोजन करे और नीचे भूमिपर सोये ॥ १ ॥

स्थातव्यं ब्रह्मचर्येण यावद् ग्रन्थः समाप्यते।
हरिवंशे तथा राजन् पायसं चरुभोजनम् ॥ २ ॥
पारणे पारणे यातं यथावद् भरतर्षभ।

जबतक ग्रन्थ समाप्त न हो जाय, तबतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए रहना चाहिये। राजन्! भरतश्रेष्ठ! हरिवंशकी प्रत्येक पारणामे यथावत् रूपसे खीर अथवा चरुके भोजनका विधान प्राप्त होता है ॥ २१/२ ॥

मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः ॥ ३ ॥
हविष्यान्नेन कर्तव्यमेकवारं कथार्थिना।
उपोष्या नवरात्रं वा शक्तिश्चेच्छृणुयात् तदा ॥ ४ ॥
घृतपानं पयःपानं कृत्वा वा शृणुयाद् सुखम्।

चतुर्थोऽध्यायः १११७

चतुर्थोऽध्यायः १११७

फलाहारेण वा भाव्यमेकभुक्तेन वा पुनः ॥ ५ ॥

कथाके समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिये हल्का भोजन करना सुखद होता है, अतः कथा सुननेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको एक बार हविष्यान्न भोजन करना उचित है। यदि शक्ति हो तो नौ रात उपवास करके कथा सुने अथवा केवल घी अथवा दूध पीकर सुखपूर्वक कथा सुने। इससे काम न चले तो फलाहार अथवा एक समय भोजन करके कथा सुननी चाहिये ॥ ३-५ ॥

सुखसाध्यं भवेद् यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत्। भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम् ॥ ६ ॥

तात्पर्य यह है कि जिससे जो नियम सुगमतापूर्वक निभ सके, वह उसीको कथा सुननेके लिये ग्रहण करे। मैं तो उपवासकी अपेक्षा भोजनको ही श्रेष्ठ मानता हूँ, यदि वह कथा-श्रवणमें सहायक हो सके ॥ ६ ॥

नोपवासो वरः प्रोक्तो कथाविघ्नकरो यदि। शृणुयाद् यः शुचिस्तिष्ठन्नेकचित्ततया सदा ॥ ७ ॥

यदि उपवाससे कथामें विघ्न पड़ता हो तो वह अच्छा नहीं बताया गया है। जो इस कथाको सुने, वह सदा पवित्र हो एकाग्र-चित्तसे सुननेके लिये बैठे ॥ ७ ॥

प्रातःस्नानादिकं कृत्वा पुत्रदारसमन्वितः। पुराणश्रवणं कुर्यात् कृष्णपूजनपूर्वकम् ॥ ८ ॥

श्रोता स्त्री-पुत्रोंके साथ प्रातःस्नान आदि कर्म करके पहले भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। तत्पश्चात् इस पुराणको सुने ॥ ८ ॥

पुष्पधूपफलैः सम्यङ् नैवेद्यैः श्रद्धयोद्धतैः। गुरोः शुश्रूषणं तेन कर्तव्यं फलकाङ्क्षिणा ॥ ९ ॥

अभीष्ट फलकी इच्छा रखनेवाला श्रोता श्रद्धापूर्वक अर्पित किये हुए पुष्प, धूप, फल और उत्तम नैवेद्यके द्वारा गुरुकी शुश्रूषा करे ॥ ९ ॥

श्रुत्वा यथेच्छया शौचं कार्यं पुण्येन वर्त्मना। सायंकाले गुरुश्रेष्ठं तोषयित्वा सबान्धवः ॥ १० ॥ स्वपरिग्रहसङ्गेन सुखं स्वपिति वै तदा। नियमादि प्रकर्तव्यं पापानां विनिवर्तने ॥ ११ ॥ यथासुखं व्यवहरेन्नित्यं विष्णुपरायणः।

कथा सुननेके पश्चात् अपनी इच्छाके अनुसार सायंकालमें पवित्र मार्गसे शौच-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करे, फिर बन्धु-बान्धवोंसहित सेवामें उपस्थित हो गुरुश्रेष्ठ व्यासको संतुष्ट करके अपनी स्त्रीके साथ घर जाकर पृथक् आसनपर सुखपूर्वक सोये। पापोंके निवारणके लिये शौच-, संतोष आदि नियमों और ब्रह्मचर्य आदि यमोंका दृढ़ताके साथ पालन करना चाहिये। नित्य-निरन्तर भगवान् विष्णुके चिन्तनमें तत्पर रहकर वह सुखपूर्वक पूर्वोक्त नियमोंका पालन करे ॥ १०-११½ ॥

शुचिः शुद्धमनास्तिष्ठन् पत्रावल्यां च भोजनम् ॥ १२ ॥ कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाव्रती।

कथाका व्रत लेनेवाला पुरुष पवित्र एवं शुद्ध-चित्त रहकर कथा सुने और प्रतिदिन कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें ही भोजन करे ॥ १२½ ॥

द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च ॥ १३ ॥ भावदुष्टं पर्युषितं जह्यान्नित्यं कथाव्रती।

कथा-श्रवणकालमें दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भाव-दूषित पदार्थ और वासी अन्नको कथाव्रती पुरुष प्रतिदिन त्याग दे ॥ १३½ ॥

वृन्ताकं च कलिङ्गं च दग्धमन्नं मसूरिकाम् ॥ १४ ॥ निष्पावानामिषाद्यं च वर्जयेच्च कथाव्रती।

बैंगन, कलिंग (सिरस), जला हुआ अन्न, मसूर, निष्पाव (लौबिया या सेम) तथा मांस आदिको कथाव्रती सर्वथा त्याग दे ॥ १४½ ॥

पलाण्डुं लशुनं हिंगुं मूलकं गृञ्जनं तथा ॥ १५ ॥ नालिकामूलकूष्माण्डं नैवाद्याच्च कथाव्रती।

प्याज, लहसुन, हींग, मूली, गाजर, नालिका (नाड़ीका शाक), मूल (जमीनके अंदर पैदा होनेवाले कंद, आलू, अरवी आदि) और कुम्हड़ा—इन सबको कथा सुननेका व्रत लेनेवाला पुरुष कदापि न खाय ॥ १५½ ॥

कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च ॥ १६ ॥ दम्भं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती।

कथाव्रती पुरुष काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दम्भ, मोह तथा द्वेषको अपने मनसे दूर कर दे ॥ १६½ ॥

वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा ॥ १७ ॥ स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेच्च कथाव्रती।

वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक, स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दाको सर्वथा त्याग दे ॥ १७½ ॥

१११८ श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


रजस्वलान्त्यजम्लेच्छपतितव्रात्यकैः सह ॥ १८ ॥
द्विजद्विड्‌वेदबाह्यैश्च न वदेच्च कथाव्रती ।

कथाव्रती रजस्वला स्त्री, अन्त्यज (चाण्डाल आदि), म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणद्रोही तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात न करे ॥ १८½ ॥

सत्यं शौचं दया मौनमार्जवं विनयं तथा ॥ १९ ॥
उदारं मानसं तद्वत् कुर्यादेव कथाव्रती ।

नियमसे कथाका व्रत लेनेवाले पुरुषको सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता तथा विनयका पालन करना चाहिये और अपने हृदयको उदार बनाये रखना चाहिये ॥ १९½ ॥

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः ॥ २० ॥
वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः ।

जो श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न हो, दूसरे किसी कार्यकी लालसा न रखते हुए पवित्र, मौन और शान्तभावसे कथा सुनते हैं, वे पुण्यके भागी होते हैं ॥ २०½ ॥

अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः ॥ २१ ॥
तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि ।

जो अधम मनुष्य भक्तिभावसे रहित होकर इस पुण्य कथाको सुनते हैं, उन्हें कभी पुण्य-फल नहीं प्राप्त होता और जन्म-जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है ॥ २१½ ॥

पुराणं ये तु सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः ॥ २२ ॥
शृण्वन्ति च कथां भक्त्या दरिद्राः स्युर्न पापिनः ।

जो ताम्बूल आदि उपहारोंसे पुराणका पूजन करके भक्तिभावसे इस कथाको सुनते हैं, वे दरिद्र और पापी नहीं होते हैं ॥ २२½ ॥

कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः ॥ २३ ॥
भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ।

जो कथा होते समय उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी स्त्री और सम्पदाएँ भोगके बीचमें ही नष्ट हो जाती हैं (वह उनका पूर्णतः उपभोग नहीं कर पाता है) ॥ २३½ ॥

सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वन्ति पावनीम् ॥ २४ ॥
ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः ।

जो पापी नराधम सिरपर पगड़ी रखकर इस पावन कथाको सुनते हैं, वे बगुले होते हैं ॥ २४½ ॥

ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम् ॥ २५ ॥
स्वविष्ठां खादयन्त्येतान्नरके यमकिङ्कराः।
नार्या रजस्वलायाश्च योनितुल्यं मुखं भवेत् ॥ २६ ॥

जो लोग पान खाते हुए पुराणकी पावन कथाको सुनते हैं, उन्हें यमराजके दूत नरकमें डालकर अपनी ही विष्ठा खिलाते हैं । उनका मुख रजस्वला स्त्रीकी योनिके समान हो जाता है ॥ २५-२६ ॥

ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।
अक्षय्यान् नरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः ॥ २७ ॥

जो दम्भी मनुष्य ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे अक्षय नरकोंका उपभोग करके अन्तमें कौए होते हैं ॥ २७ ॥

ये च वीरासनारूढा ये च शय्यासनस्थिताः।
शृण्वन्ति तत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः ॥ २८ ॥

जो वीरासनपर आरूढ हो तथा जो शय्यारूप आसनपर बैठकर उस पुराण-कथाको सुनते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं ॥ २८ ॥

असम्प्रणम्य शृण्वन्तो विषवृक्षा भवन्ति ते।
तथा शयानाः शृण्वन्तो भवन्त्यजगरा नराः ॥ २९ ॥

जो कथाको प्रणाम किये बिना ही सुनते हैं, वे विषवृक्ष होते हैं। जो सोते हुए सुनते हैं, वे मनुष्य अजगर सर्प होते हैं ॥ २९ ॥

यः शृणोति कथां वक्रः समानासनमाश्रितः।
गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत् ॥ ३० ॥

जो वक्र स्वभाववाला मनुष्य वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरुपत्नीगमन-तुल्य पापका भागी होकर नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥

ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम्।
ते वै जन्मशतं मर्त्याः शुनकाः सम्भवन्ति च ॥ ३१ ॥

जो लोग पुराणवेत्ताओं तथा पुराणकी पापहारिणी कथाकी निन्दा करते हैं, वे मनुष्य सौ जन्मोंतक कुत्ते होते हैं ॥ ३१ ॥

कथायां वर्तमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।
ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्ततः परम् ॥ ३२ ॥

  • चतुर्थोऽध्यायः १११९

जो कथा होते समय दूषित उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं, वे पहले तो गदहे होते हैं, तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जन्म पाते हैं ॥ ३२ ॥

कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।
ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनशूकराः ॥ ३३ ॥

जो कभी भी पुराणकी पुण्यमयी कथाको नहीं सुनते हैं, वे घोर नरकोंका कष्ट भोगकर वनैले सूअर होते हैं ॥ ३३॥

कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।
कोट्यव्दान् नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामशूकराः॥ ३४॥

जो शठ कथा-कीर्तनमें विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ३४ ॥

मध्ये वार्ता न कुर्वीत चेत् कुर्यान्निरयं व्रजेत्।
कथायां श्रूयमाणायां न कुर्याच्छिशुलालनम् ॥ ३५॥

कथा सुनते समय बीचमें बातचीत न करे। यदि कोई करे तो वह नरकमें जायगा । कथा-श्रवणकालमें बच्चोंका लाड़-प्यार भी न करे ॥ ३५ ॥

नर्मवादान् वदेन्नैव स्त्रिया सम्भाषणं तथा।
न कर्तव्यं प्रयत्नेन कथाविच्छेदकारणम् ॥ ३६ ॥

कथा होते समय हँसी-परिहासकी बातें न करे, स्त्रीके साथ वार्तालाप भी न करे। इन बातोंका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये; क्योंकि ये सब बातें कथामें विच्छेद (विघ्न) डालनेवाली हैं ॥ ३६ ॥

विच्छेदेन कथायास्तु ब्रह्महत्यासमं त्वघम् ।
प्राप्नोति नृपशार्दूल कथाविच्छेदकः पुमान् ॥ ३७॥

राजसिंह ! कथामें विच्छेद पैदा करनेसे वह कथाविच्छेदक पुरुष ब्रह्महत्याके समान पापका भागी होता है ॥ ३७॥

न कुर्यात् तु कथामध्ये त्वन्यवार्ताः प्रयत्नतः।
नारी वा पुरुषो वापि कुर्यान्निरयमाप्नुयात् ॥ ३८॥

स्त्री हो या पुरुष, कथाके बीचमें दूसरी बातें न करे और इसके लिये सदा प्रयत्नशील रहे। यदि कोई बात करता है तो वह नरकमें पड़ता है ॥ ३८ ॥

इतिहासं वदाम्यत्र शृणुष्वैकं हि मानद।
यं श्रुत्वा न वदेद् वार्तां कथामध्ये कदाचन ॥ ३९ ॥

मानद ! इस विषयमें मैं एक इतिहास बताता हूँ, इसे सुनो। इसे सुन लेनेपर कोई भी मनुष्य कभी कथाके बीचमें वार्तालाप नहीं कर सकता ॥ ३९ ॥


जनस्थाने पुरा कश्चिद् ब्राह्मणो वेदपारगः।
धर्मशास्त्रेऽतिनिपुणः सदाचारपरायणः ॥ ४० ॥

प्राचीन कालकी बात है, जनस्थानमें कोई ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे। वे धर्म-शास्त्रमें अत्यन्त निपुण तथा सदाचारमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ ४० ॥

गङ्गास्नानं विधायादौ कृत्वा माध्याह्निकं तथा।
कृत्वा देवार्चनं चैव श्रवणे तत्परोऽभवत् ॥ ४१ ॥

वे प्रतिदिन पहले गङ्गा-स्नान और मध्याह्न-संध्या-वन्दन आदि करके देवपूजन करनेके पश्चात् कथा-श्रवणमें प्रवृत्त होते थे ॥ ४१ ॥

तस्य भार्यातिदुष्टा च कर्कशा कलहप्रिया।
असत्यालापनिपुणा परद्वेषपरायणा ॥ ४२ ॥

उनकी स्त्री बड़ी दुष्ट और कर्कशा थी। सदा कलह करना ही उसे प्रिय लगता था। वह झूठ बोलनेमें निपुण थी और दूसरोंसे द्वेष करनेमें ही लगी रहती थी ॥ ४२ ॥

हृत्वा चक्रे धनस्यापि संग्रहं पापनिश्चया।
दधि दुग्धं समानीय शर्करागुडमेव च ॥ ४३ ॥
घृतं च नवनीतं च स्वयमानीय सर्वदा।
एकान्ते भक्षणं चक्रे भर्तर्यन्नं प्रशुष्ककम् ॥ ४४ ॥

वह पापपूर्ण निश्चयवाली नारी चोरी-चोरी धनका भी संग्रह करने लगी। वह स्वयं दही, दूध, शक्कर, गुड़-घी और माखन खरीद लाती और एकान्तमें बैठकर अकेली ही खाती थी । पतिको केवल रूखा-सूखा अन्न परोस दिया करती थी ॥ ४३-४४ ॥

दुराग्रहा दुष्टमनाः पतिनिन्दापरायणा।
बहुपापप्रकर्त्री च परवेश्मोपवेशिनी ॥ ४५ ॥

उसका स्वभाव दुराग्रही था, मनमें दुष्टता भरी रहती थी। वह सदा अपने पतिकी निन्दामें ही लगी रहनेवाली और पाप करनेवाली थी, प्रायः दूसरेके घरमें ही बैठी रहती थी ॥ ४५ ॥

सुभाषणं वदेन्नैव द्विषः क्षेमविधायिनी ।
पंक्तिभेदं प्रकुर्वाणा सदा निष्ठुरभाषिणी ॥ ४६ ॥

वह अच्छी बात तो कभी बोलती ही नहीं थी। जो पतिके द्वेषी थे, उन्हींका वह भला किया करती थी। भोजनमें सदा पंक्तिभेद करती थी—किसीको कुछ परोसती और किसीको कुछ। सदा निष्ठुर बात ही बोलती थी ॥ ४६ ॥

अतिथिषु सदा वैरकारिणी धर्मनाशिनी ।

११२० | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


सज्जनोऽपि गुणी सौम्यस्तस्या भर्ता सुपूजितः ॥ ४७ ॥
अतिथियोंसे सदा वैर रखती और धर्मका नाश करती थी। उसके पति बड़े सज्जन, गुणवान्, सौम्य तथा सर्वत्र सम्मानित होनेवाले थे ॥ ४७ ॥

यदा भर्ता पुराणस्य श्रवणाय हि संस्थितः।
प्रत्यहं तत्र गत्वा तु तस्य निन्दां चकार ह ॥ ४८ ॥
जब उसके पति प्रतिदिन पुराण सुननेके लिये बैठते, तब वहाँ जाकर वह उनकी निन्दा करने लगती थी—॥४८॥

संन्यासिवत् कथं ह्यत्र श्रवणे व्यासवत् कृतः।
समुत्पन्ननिरुद्योग किं कर्तव्यं मया वद ॥ ४९ ॥
'संसारमें पैदा होकर भी जीवन-निर्वाहके लिये कोई उद्योग न करनेवाले आलसी ! यहाँ संन्यासीकी तरह कथा सुनने कैसे बैठे हो ? तुम तो यहाँ आकर व्यासबाबा बन गये, अब मुझे बताओ, मैं क्या करूँ ? ॥ ४९ ॥

शिशवो मां पीडयन्ति भक्षणाय दिने दिने।
किं तेषां च प्रकर्तव्यं भक्षणार्थं मया वद ॥ ५० ॥
'बच्चे प्रतिदिन भोजनके लिये मुझे तंग करते रहते हैं; बताओ, मैं उनके खानेके लिये क्या प्रबन्ध करूँ ? ॥ ५० ॥

नास्त्येवान्नं गृहे किञ्चिद् वस्त्रं चाप्यथ वा धनम्।
किं मया च प्रकर्तव्यं कुत्र गन्तव्यमेव च ॥ ५१ ॥
'मेरे घरमें न तो मुट्ठीभर अन्न है, न वस्त्र है और न धन ही है। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? ॥ ५१ ॥

कथं विलिखितं दिष्टं धात्रा पापेन मे पुरा।
मूर्खश्चालस्यसंयुक्तो दरिद्रो निष्ठुरस्तथा ॥ ५२ ॥
स्नेहहीनः कुटुम्बे च कथायाः श्रवणे रतः।
एतादृशः पतिर्मह्यं धात्रा दत्तो दुरात्मना ॥ ५३ ॥
'न जाने पापी विधाताने पूर्वकालमें मेरा भाग्य कैसा लिख दिया ? दुरात्मा ब्रह्माने मुझे ऐसा पति दिया, जो मूर्ख, आलसी, दरिद्र और निष्ठुर है। इसका अपने कुटुम्ब-पर तनिक भी स्नेह नहीं है। यह सिर्फ कथा सुननेमें लगा रहता है ॥ ५२-५३ ॥

पृथिव्यां दुर्भगेकाहं दरिद्रगृहमागता।
उदरापूर्तिमात्रं हि नान्नं मे भक्षितं कदा ॥ ५४ ॥
'इस पृथ्वीपर एकमात्र मैं ही ऐसी अभागिनी हूँ, जो इस दरिद्रके घरमें आ गयी। यहाँ आकर कभी मैंने भरपेट भोजन भी नहीं किया ॥ ५४ ॥

सौभाग्यास्ताः स्त्रियो लोके यासामुद्योगशालिनः।
पतयो धनधान्यादिसमृद्धिपरिशोभिताः ॥ ५५ ॥
'संसारमें वे ही स्त्रियाँ सौभाग्यशालिनी हैं, जिनके पति उद्योगशील हैं, धन-धान्य आदिकी समृद्धिसे सुशोभित हैं ॥ ५५ ॥

ते वै स्त्रीणां वाक्यकराः शिशुपालनतत्पराः।
नित्यं गृहेषु तिष्ठन्ति स्त्रीणां संतोपकारकाः ॥ ५६ ॥
'वे अपनी स्त्रियोंकी आज्ञा मानते हैं, बच्चोंके लालन-पालनमें तत्पर रहते हैं, सदा घरमें रहते हैं और स्त्रियोंको संतुष्ट रखते हैं ॥ ५६ ॥

सदन्नभक्षणात् पुष्टा भार्याज्ञापरिपालकाः।
व्यवसायं च भार्याणां कुर्वन्ति बुद्धिशालिनः ॥ ५७ ॥
'वे उत्तम अन्न खाकर पुष्ट होते हैं, पत्नीकी आज्ञाका पालन करते हैं, बुद्धिशाली हैं और पत्नियोंका जैसा निश्चय होता है, वैसा ही वे करते हैं ॥ ५७ ॥

अयं मूर्खश्च जडधीरुपेक्षां कुरुते गृहे।
अद्य तैलं गृहे नास्ति चेन्धनं लवणं तथा ॥ ५८ ॥
'यह मेरा पति तो मूर्ख और जडबुद्धि है, घरके प्रति उपेक्षाका भाव रखता है। आज घरमें न नमक है, न तेल है और न लकड़ी ही है ॥ ५८ ॥

शाकश्च मम नास्त्येव धान्यलेशो न मद्गृहे।
किं मया तु प्रकर्तव्यं पतिरेतादृशो मम ॥ ५९ ॥
'साग भी मेरे घरमें नहीं है। अनाज तो लेशमात्र भी नहीं है। क्या करूँ ? मेरा पति ऐसा आलसी है' ॥ ५९ ॥

कथायां श्रूयमाणायां पत्या सन्मार्गमूर्तिना।
धान्यादौ विद्यमानेऽपि मिथ्याभाषणतत्परा ॥ ६० ॥
सन्मार्गकी मूर्तिरूप पतिके कथा सुनते समय वह घरमें अनाज आदिके रहते हुए भी वहाँ आकर इस प्रकार मिथ्या भाषण किया करती थी ॥ ६० ॥

कथाविघ्नं चकारासौ कर्कशा सा दिने दिने।
ततः कालेन मरणं प्राप्ता सा दुष्टमानसा ॥ ६१ ॥
वह कर्कशा स्त्री प्रतिदिन इसी तरह कथामें विघ्न डाला करती थी। उसका हृदय दुष्टतासे भरा था। तदनन्तर काल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ६१ ॥

यमदूतैस्तु बद्धा सा नीता च यममन्दिरे।
ततो यमाज्ञया तैस्तु नरके पातिता चिरम् ॥ ६२ ॥

पञ्चमोऽध्यायः ११२१


यमराजके दूत आये और उसे बाँधकर यमराजके घर ले गये। वहाँ यमकी आज्ञासे उन्होंने उसे चिरकालके लिये नरकमें गिरा दिया॥ ६२॥

पश्चात् सा राक्षसी जाता भैरवे जलवर्जिते।
अरण्ये क्षुत्तृषायुक्ता पूर्वपापप्रभावतः॥ ६३॥

नरकसे छूटनेपर वह पूर्व पापके प्रभावसे ही भयानक वनमें, जहाँ पानीका सर्वथा अभाव था, राक्षसी हुई और भूख-प्याससे पीड़ित रहने लगी॥ ६३॥

तस्माद् विघ्नं न कर्तव्यं भार्यया पुरुषेण वा।
श्रीहरेः सत्कथायास्तु तव सत्यं वदाम्यहम्॥ ६४॥

अतः स्त्री हो या पुरुष, किसीको भी श्रीहरिकी उत्तम कथामें विघ्न नहीं डालना चाहिये। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ॥ ६४॥

मीनालिनो महिषहंसवकस्वभावा
मार्जारकाकवृककङ्कजलौकतुल्याः।
सच्छिद्रकुम्भजलसिन्धुशिलोपमाश्च
ते श्रावकाश्च सुचतुर्दशधा भवन्ति॥ ६५॥

वे भले-बुरे श्रोता चौदह प्रकारके होते हैं—मीन, भ्रमर, महिष, हंस, बक, मार्जार, काक, वृक, कङ्क, जोंक, छिद्रयुक्त घट, जल, सिन्धु और शिला। इनके समान स्वभाववाले होनेके कारण वे इन्हीं नामोंसे कहे गये हैं॥ ६५॥

दरिद्रश्च क्षयी रोगी निर्भाग्यः पापकर्मवान्।
अनपत्यो मोक्षकामः शृणुयात् स कथामिमाम्॥ ६६॥

दरिद्र, क्षयका रोगी, अन्य किसी रोगसे पीड़ित, भाग्यहीन, पापाचारी, संतानहीन तथा मुमुक्षु पुरुष इस हरिवंश-कथाको अवश्य सुने॥ ६६॥

अपुष्पा काकवन्ध्या च वन्ध्या या च मृतार्भका।
स्रवद्गर्भा च या नारी तया श्राव्या प्रयत्नतः॥ ६७॥

जिस स्त्रीका मासिक धर्म रुक गया हो, जिसके एक ही संतान होकर रह गयी हो, जिसके बच्चे होते ही न हों, जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हों तथा जिसका गर्भ गिर जाता हो, उस स्त्रीको प्रयत्नपूर्वक इस हरिवंशकथाका श्रवण करना चाहिये॥ ६७॥

सुपुत्रं लभते राजन् व्यासस्य वचनं यथा।
सर्वान् कामानवाप्नोति कथां श्रुत्वा हरेरिमाम्॥ ६८॥

राजन्! नारी यह कथा सुनकर उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेती है। जैसा कि व्यासजीका वचन है। श्रीहरिकी इस कथाको सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है॥ ६८॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत कथा-श्रवण आदिकी विधिक वर्णन विषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ॥ ४॥


पञ्चमोऽध्यायः

हरिवंशके नवाह-पारायणका उद्यापन, उसमें किये जानेवाले दान, पुस्तकपूजा और वाचक-पूजन आदिका विधान एवं माहात्म्य

वैशम्पायन उवाच

एवं कृत्वा व्रतविधिमुद्यापनमथाचरेत्।
जन्माष्टमीव्रतमिव कर्तव्यं फलकाङ्क्षिभिः॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार व्रतकी विधि पूर्ण करके उसका उद्यापन करे। उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको जन्माष्टमी-व्रतके समान इसका उद्यापन करना चाहिये॥ १॥

अकिञ्चनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनग्रहः।
श्रवणेनैव पूतास्ते निष्कामा वैष्णवा यतः॥ २॥

जो अकिंचन भक्त हैं, उनके लिये प्रायः उद्यापनका आग्रह नहीं है। वे कथा-श्रवणमात्रसे ही शुद्ध हो जाते हैं; क्योंकि वे निष्काम वैष्णव हैं॥ २॥

एवं नवाहयज्ञेऽस्मिन् समाप्ते श्रोतृभिस्तदा।
पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्यातिभक्तितः॥ ३॥
प्रसादतुलसीमाला श्रोतॄभ्यश्चाथ दीयताम्।

इस प्रकार नवाह-यज्ञ पूर्ण होनेपर श्रोताओंको बड़ी भक्तिके साथ पुस्तक तथा कथावाचककी पूजा करनी चाहिये और वक्ताको उचित है कि वह श्रोताओंको प्रसाद और तुलसीकी माला दे॥ ३॥


म० ह० ३६—

११२२श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

मृदङ्गतालललितं कीर्तनं कीर्त्यतां ततः॥ ४॥
जयशब्दो नमःशब्दः शङ्खशब्दश्च गीयताम्।
विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तमन्नं च दीयताम्॥ ५॥

तत्पश्चात् मृदंग बजाकर तालस्वरके साथ कीर्तन किया जाय, जय-जयकार और नमस्कार शब्दके साथ शङ्खोंकी ध्वनि हो तथा ब्राह्मण और याचकोंको अन्न और धन दिया जाय॥ ४-५॥

श्रवणान्ते हरेर्मूर्तिः सश्रीकस्य प्रदीयताम्।
सुवर्णस्य कृता सम्यग्लक्ष्म्यङ्का पलमानतः॥ ६॥

कथाश्रवणके अन्तमें एक पल सुवर्णकी बनी हुई लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी मूर्ति, जो श्रीवत्सचिह्नसे अङ्कित हो, वाचकके लिये देनी चाहिये॥ ६॥

समाप्तौ विधिवद् वस्त्रं क्षौमं दद्याच्च वाचके।
विशेषोऽयं समुद्दिष्टो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ७॥

कथा समाप्त होनेपर वाचकको विधिपूर्वक रेशमी वस्त्र भी देना चाहिये। तत्त्वदर्शी मुनियोंने यह विशेष बात बतायी है॥ ७॥

समाप्य सर्वं प्रयतः संहिताशास्त्रकोविदः।
शुभे दिने निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृतः॥ ८॥
शुक्लाम्बरधरस्तत्र शुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः।
अर्चयेत् तु यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक्पृथक्॥ ९॥
संहितापुस्तकं तत्र प्रयतः सुसमाहितः।
भक्ष्यैर्भोज्यैश्चापूपैश्च कौतुकैर्विविधैः शुभैः॥ १०॥

संहिताशास्त्रका विद्वान् वाचक पवित्र हो सम्पूर्ण हरिवंश-को समाप्त करके शुभ दिनमें पुस्तकको सिंहासनपर स्थापित-कर रेशमी वस्त्र ओढ़ श्वेत वस्त्र धारण करके पवित्र एवं विभूषित हो गन्ध, माल्य आदि पृथक्-पृथक् उपचारोंसे संहिता-पुस्तककी यथोचितरूपसे पूजा करे। उस समय चित्त शुद्ध एवं एकाग्र होना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य और पुआ आदि नैवेद्यों तथा नाना प्रकारके शुभ कौतुकोंद्वारा उस पूजनकर्मको सम्पन्न करना चाहिये॥ ८—१०॥

हिरण्यमन्यद् द्रव्यं च दक्षिणां तत्र दापयेत्।
ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकीं कथाम्॥ ११॥
कल्पकोटिशतं साग्रं यान्ति ते ब्रह्मणः पदे।

यजमान वहाँ सुवर्ण तथा अन्य द्रव्योंको दक्षिणारूपसे दे। जो लोग अपने यहाँ आयोजन करके लोगोंको पुण्यमयी पौराणिक कथा-सुनावाते हैं, वे सौ कोटि कल्पोंसे अधिक कालतक ब्रह्मधाममें विराजते हैं॥ १११/२॥

आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः॥ १२॥
कम्बलाजिनवासांसि मञ्चाफलकमेव च।
स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्॥१३॥
स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्।

जो मानव पुराणवेत्ता वाचकको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, शय्या और चौकी आदि प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करके ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास करते हुए अन्ततोगत्वा निरामय पद (वैकुण्ठ-धाम) को प्राप्त होते हैं॥१२-१३१/२॥

पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये सूत्रवसनं नवम्॥ १४॥
भोगिनो ज्ञानसम्पन्नास्ते भवन्ति भवे भवे।

जो पुराणके वेष्टनके लिये नया सूती वस्त्र देते हैं, वे जन्म-जन्ममें भोग और ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं॥ १४१/२॥

ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये॥ १५॥
पुराणश्रवणादेव ते यान्ति परमं पदम्।

जो महापातकों और उपपातकोंसे युक्त हैं, वे भी इस पुराणके श्रवणमात्रसे परमपदको प्राप्त कर लेते हैं॥ १५१/२॥

हरिवंशं लिखित्वा यो वाचकाय प्रदापयेत्॥ १६॥
यत् फलं भूमिदानस्य तत् फलं लभते हि सः।

जो हरिवंशको लिखकर उसका वाचकको दान करता है, उसे भूमिदानका फल प्राप्त होता है॥ १६१/२॥

राजसूयेन तेनेष्टमश्वमेधेन वै नृप॥ १७॥
दत्तानि सर्वदानानि हरिवंशे श्रुतेऽखिले।

नरेश्वर! जिसने सारा हरिवंश सुन लिया, उसने राजसूय और अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर लिया तथा सम्पूर्ण दान दे दिये॥ १७१/२॥

राजसूयाश्वमेघाद्या यज्ञाश्चैव युगे युगे॥ १८॥
श्रवणं हरिवंशस्य कलौ यज्ञफलप्रदम्।

राजसूय और अश्वमेध आदि यज्ञ प्रत्येक युगमें केवल अपना फल देते हैं, परंतु हरिवंशका श्रवण कलियुगमें समस्त यज्ञोंका फल देनेवाला है॥ १८१/२॥

श्रद्धावानास्तिको दान्तो हरिवंशं यदारभेत्॥ १९॥

पञ्चमोऽध्यायः ११२३


पातकानि प्रकम्पन्ते प्रत्युहानि ज्वलन्ति च।

श्रद्धालु, आस्तिक एवं जितेन्द्रिय पुरुष जब हरिवंश आरम्भ करता है, तब सारे पातक काँपने लगते हैं और समस्त विघ्न जल जाते हैं ॥ १९ १/२ ॥

समारभ्य नयेत् पारं हरिवंशं य आदितः ॥ २० ॥
स्पर्शानाद् दर्शनात् तस्य विष्णुदृष्टो भवेन्नृप।

नरेश्वर ! जो हरिवंशकी कथाको आदिसे आरम्भ करके अन्ततक पहुँचा देता है, उसके दर्शन और स्पर्शसे भगवान् विष्णुका ही दर्शन और स्पर्श हुआ ऐसा मानना चाहिये ॥ २० १/२ ॥

जन्मत्रयस्य निकषः पातकस्य क्षयो ध्रुवम् ॥ २१ ॥
फलाप्तिश्च समाप्तौ च हरिवंशस्य बुद्ध्यते।

हरिवंशकी समाप्ति होनेपर श्रोताके तीन जन्मोंके पातकोंका निश्चय ही नाश हो जाता है और अभीष्ट फलकी प्राप्तिका भी बोध होता है, यही इसकी सफलताकी कसौटी है ॥ २१ १/२ ॥

श्रोतुर्भारत विज्ञेयं पूर्वं सुकृतिलक्षणम् ॥ २२ ॥
येन संजायते बुद्धिर्हरिवंशावधारणे।

भरतनन्दन ! यह श्रोताके पूर्व पुण्यका लक्षण समझना चाहिये, जिससे उसके मनमें हरिवंश सुननेका विचार उत्पन्न होता है ॥ २२ १/२ ॥

सर्वाणि च पुराणानि वेदाश्च स्मृतयस्तथा ॥ २३ ॥
हरिवंशेन बद्धार्था व्यासेन च महर्षिणा।

महर्षि व्यासने समस्त पुराणों, वेदों और स्मृतियोंके भावोंको हरिवंशके साथ बाँध रखा है ॥ २३ १/२ ॥

श्रुतिस्मृतिपुराणानां निन्दकेभ्यः कथंचन ॥ २४ ॥
पापिभ्यश्च महाराज श्रावयेन्नैव वाचकः।

महाराज ! वाचकको उचित है कि वह श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणोंके निन्दकोंको तथा पापियोंको किसी तरह कथा न सुनावे ॥ २४ १/२ ॥

श्रुत्वा तुष्टेन मनसा वाचकं परिपूजयेत् ॥ २५ ॥
दान्तं यशस्विनं कान्तं शुचिं स्पष्टाक्षरब्रुवम्।
त्रिशुक्लमाचारपरमक्रोधनमवादिनम् ॥ २६ ॥

कथा सुनकर श्रोता संतुष्ट चित्तसे जितेन्द्रिय, यशस्वी, कान्तिमान्, पवित्र, अक्षरोंका सुस्पष्ट उच्चारण करनेवाले, जन्म, विद्या और संस्कार तीनोंसे शुद्ध, सदाचारपरायण, क्रोधहीन और वाद-विवादसे रहित वाचककी पूजा करे ॥ २५-२६ ॥

ग्रामं दद्यात् सुवसितं कुण्डलोष्णीषमालिकाम्।
पादुकोपानहौ छत्रं सवितानं मसूरिकाम् ॥ २७ ॥
एवं कृत्वा तु विधिवद् वाचकाय प्रदापयेत्।
यानं वार्षं हयगजौ क्षौमं मणिमयासनम् ॥ २८ ॥
पञ्च भाण्डानि ताम्रस्य ताम्रस्यैवाम्बुभाजनम्।

उसे भलीभाँति बसा हुआ ग्राम दे, कुण्डल, पगड़ी और माला अर्पित करे, खड़ाऊँ, जूता, छाता, चँदोवा और मसहरी—इन सबको एकत्र करके विधिपूर्वक वाचकको अर्पित करे। साथ ही बैलगाड़ी, घोड़ा, हाथी, रेशमी वस्त्र और मणिमय आसन, ताँबेके पाँच बर्तन तथा ताँबेका ही जलपात्र दे ॥ २७-२८ १/२ ॥

सकुटुम्बं च सस्त्रीकं वाचकं परया मुदा ॥ २९ ॥
विभूषणैरलंकृत्य परिधाय सुवाससी।
कृष्णद्वैपायनं ध्यायन् नमस्कुर्यात् भावतः ॥ ३० ॥

पत्नी और कुटुम्बसहित वाचकको बड़ी प्रसन्नताके साथ आभूषणोंद्वारा अलंकृत करके उन्हें दो सुन्दर वस्त्र पहनावे और श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका चिन्तन करते हुए उन्हें भक्तिभावसे नमस्कार करे ॥ २९-३० ॥

वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः।
वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं हरिवंशफलेप्सुभिः ॥ ३१ ॥

वाचकके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं, अतः हरिवंशके फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको धन खर्च करनेमें कंजूसी नहीं करनी चाहिये ॥ ३१ ॥

प्रदेया गौः शुभा चैका सवत्सा हेमपूरिता।
पलेन च पलार्धेन तदर्धं वाथ वा पुनः ॥ ३२ ॥

एक, आधे या चौथाई पल सुवर्णके साथ बछड़ेसहित एक सुन्दर गौ भी वाचकको देनी चाहिये ॥ ३२ ॥

वाचकं येन केनापि तोषयेत् सुसमाहितः।
तुष्टे तु वाचके राजंस्तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ३३ ॥
तुष्टेषु सर्वदेवेषु कार्यं तु सफलं भवेत्।

राजन् ! जिस किसी उपायसे सम्भव हो, एकाग्रचित्त हो वाचकको संतुष्ट करे। वाचकके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानका कार्य सफल होता है ॥ ३३ १/२ ॥

हरिवंशे समाप्ते तु वाचके परिपूजिते ॥ ३४ ॥

११२४श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

ऋणत्रयेण मुक्ताः स्युस्ते नरा जनमेजय ।
मोदन्ते पितरस्तेषां लोकान् प्राप्याक्षयान्नृप ॥ ३५ ॥

जनमेजय ! हरिवंश समाप्त होनेपर वाचककी भलीभाँति पूजा कर लेनेके पश्चात् मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाते हैं । नरेश्वर ! उनके पितर अक्षय लोकोंमें पहुँचकर आनन्द भोगते हैं ॥ ३४-३५ ॥

हरिवंशस्य प्रारम्भे समाप्तौ चैव तैः सह ।
सर्वान् कामानवाप्नोति विपाप्मा जायते नरः ॥ ३६ ॥

हरिवंशका आरम्भ करके उसकी पूर्ति हो जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अपने उन पितरोंके साथ सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥

एवं कृते विधाने तु प्रजां प्राप्नोति मानवः ।
धनमारोग्यमायुष्यं सौभाग्यं गुणगौरवम् ॥ ३७ ॥
प्राप्नोति मनुजः सम्यङ्नात्र कार्या विचारणा ॥ ३८ ॥

इस प्रकार विधि-विधानका पालन करनेपर मनुष्य उत्तम संतान तो पाता ही है, धन, आरोग्य, आयु, सौभाग्य, गुण-जनित गौरवको भी भलीभाँति प्राप्त कर लेता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदि विधिको वर्णन-विषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥


षष्ठोऽध्यायः

हरिवंश आरम्भ करनेके लिये उत्तम मास, तिथि, नक्षत्र आदिका निर्देश, देवपूजन, व्यासपूजन तथा कथा-समाप्तिपर दी जानेवाली दक्षिणा एवं दान आदिका उल्लेख तथा श्रवणका माहात्म्य

जनमेजय उवाच
प्रारम्भस्तु कथं कार्यः कथं पूजाविधिः स्मृतः ।
कथं विसर्जयेद्व्यासं कथं सम्यक् फलं लभेत् ॥ १ ॥
एतत् सर्वं समाचक्ष्व विस्तरान्मुनिसत्तम ।

जनमेजयने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! हरिवंशका प्रारम्भ कैसे करना चाहिये ? उसकी पूजाका विधान किस प्रकार बताया गया है ? व्यासका विसर्जन कैसे करे ? और किस प्रकार उत्तम फलकी प्राप्ति सम्भव है ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् यथा वन्ध्या संततिं लभते ध्रुवम् ॥ २ ॥
वैशाखे माघ ऊर्जे च अन्यस्मिञ्छुभमासके ।
शुक्लपक्षे तिथौ पूर्णानन्दाभद्राजयासु च ॥ ३ ॥
वारे गुरौ तथा शुक्रे चन्द्रे चन्द्रात्मजे तथा ।
नक्षत्रे श्रवणे हस्ते पुष्ये मूले पुनर्वसौ ॥ ४ ॥
वासवे तुहिनांशौ च पौष्णे च हयतारके ।
सौभाग्यादिषु योगेषु करणे विष्टिवर्जिते ॥ ५ ॥
श्रोतुश्चाथापि वक्तुश्च चन्द्रे च बलशालिनि ।
पूर्वाह्ने चापि मध्याह्ने प्रारम्भः क्रियते बुधैः ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! जिस प्रकार कथा सुननेसे वन्ध्या स्त्री निश्चय ही संतान प्राप्त कर लेती है, वह विधि बताता हूँ, सुनो—वैशाख, माघ, कार्तिक अथवा दूसरे किसी शुभ मासमें, शुक्ल पक्षमें, पूर्णा (५, १०, १५), नन्दा (१, ६, ११), भद्रा (२, ७, १२), तथा जया (३, ८, १३) तिथियोंमें, बृहस्पति, शुक्र, सोम तथा बुधवारको, श्रवण, हस्त, पुष्य, मूल, पुनर्वसु, धनिष्ठा, मृगशिरा, रेवती और अश्विनी नक्षत्रोंमें, सौभाग्य आदि शुभ योगों तथा विष्टिरहित करणोंमें, वक्ता और श्रोताके चन्द्रमा जब बलिष्ठ हों, उस समय पूर्वाह्न अथवा मध्याह्नकालमें विद्वान् पुरुष हरिवंश-कथाका आरम्भ करते हैं ॥ २--६ ॥

आदौ लम्बोदरः पूज्यः कलशस्तु ततः परम् ।
श्रीखण्डागुरुकर्पूरकुङ्कुमामोदलेपनैः ॥ ७ ॥
पङ्कजैश्चम्पकैरन्यैर्जातीपुष्पैः सुगन्धिभिः ।

षष्ठोऽध्यायः ११२५


तुलसीबिल्वधात्रीणां पत्रैर्नव्यैर्नवाङ्कुरैः ॥ ८ ॥
धूपैर्दीपैश्च विविधैर्नारिकेलफलादिभिः ।
ताम्बूलैर्मुखवासैश्चाखण्डितैः शुक्लतण्डुलैः ॥ ९ ॥
चामरैर्व्यजनैश्चैव घण्टावाद्यादिभिस्तथा ।
प्रत्यहं पूजयेद् देवं यावद् ग्रन्थः समाप्यते ॥ १० ॥

पहले गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये, तत्पश्चात् कलशकी। चन्दन, अगर, कपूर, कुङ्कुम, गन्ध, अनुलेपन, कमल, चम्पा, सुगन्धित चमेलीके फूल, तुलसीदल, बिल्वपत्र, आँवलेके पत्ते, दूर्वा आदिके नूतन अङ्कुर, धूप, दीप, नारियलके फल आदि विविध नैवेद्य, मुखको, सुवासित करनेवाले ताम्बूल, अखण्ड श्वेत तण्डुल, चँवर, व्यजन तथा घंटा-वाद्य आदि उपकरणोंसे श्रोता प्रतिदिन तबतक भगवान्‌का पूजन करता रहे, जबतक कि ग्रन्थ समाप्त न हो जाय ॥ ७-१० ॥

लत्तादिदोषरहिते वारे च शुभसंज्ञके ।
समर्पयेत् पुराणं तु ततः पूजां समाचरेत् ॥ ११ ॥

लत्ता आदि दोषसे रहित शुभ दिनको हरिवंशपुराण वक्ताके हाथमें समर्पित करे। तदनन्तर प्रारम्भिक पूजा आरम्भ करे ॥ ११ ॥

प्रारम्भे च यथा पूजा तथा कार्या विसर्जने ।
चन्दनागुरुकर्पूरकुङ्कुमैर्गन्धकादिभिः ॥ १२ ॥

कथाके आरम्भमें जैसी पूजा की जाय, उसके विसर्जनमें भी वैसी ही पूजा करनी चाहिये। चन्दन, अगर, कपूर, रोली और गन्ध आदिसे पूजन सम्पन्न करे ॥ १२ ॥

गीतवादित्रनृत्यैश्च राजन् कार्यो महोत्सवः ।
ततः पुराणपूजायां यथा दानं तथा शृणु ॥ १३ ॥

राजन् ! फिर गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा महान् उत्सव करना चाहिये। तदनन्तर पुराणपूजामें जैसा दान बताया गया है, वैसा सुनो ॥ १३ ॥


अष्टादशशतं दानं पुराणाय समर्पयेत् ।
अभावे द्वादशशतं पूजा वै जनमेजय ॥ १४ ॥
तदभावेऽपि राजेन्द्र षट्शतं परिकीर्तितम् ।
उत्तमं मध्यमं दानमधमं च प्रकीर्तितम् ॥ १५ ॥

जनमेजय ! पुराणके लिये अठारह सौ रुपयेकी दक्षिणा समर्पित करे। उसके अभावमें बारह सौ रुपयेकी पूजा चढ़ावे। राजेन्द्र ! उतना भी न बन सके तो कम-से-कम छः सौ रुपयेकी दक्षिणा बतायी गयी है। यह क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीका दान कहा गया है॥ १४-१५ ॥

सपत्नीकं ततो व्यासं दुकूलैरंशुकैर्नवैः ।
पूजयेत् सर्वभावेन स सम्यक् फलमश्नुते ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् नूतन वस्त्रोंद्वारा पत्नीसहित व्यासका सम्पूर्ण भावसे पूजन करे। ऐसा करनेसे यजमानको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥

परिधेयानि देयानि कुण्डलानि शुभानि च ।
मुकुटाद्यैरलं कृत्य केयूराङ्गदभूषणैः ॥ १७ ॥

वाचकको केयूर और अंगद आदि आभूषणों तथा मुकुट आदिसे अलंकृत करके उन्हें पहिनने योग्य सुन्दर कुण्डल भी देने चाहिये ॥ १७ ॥

गावस्तु कपिला देयाः सवत्सा गर्भसंयुताः ।
यानमश्वादिकं राजन् दासीदासान् समर्पयेत् ॥ १८ ॥
आसनं पुरुषव्याघ्र धूपदीपादि भाजनम् ।
शय्या तूलादिकं सर्वं सोपधानं सलड्डुकम् ॥ १९ ॥
स्थाली पीठादिकं राजन्जलपात्रं तथैव च ।
अन्नं च बहु दातव्यं लवणं जनमेजय ॥ २० ॥
घृततैलादिकं राजन् यावद् वर्षं समाप्यते ।
एतत् सर्वं द्विजेन्द्राय व्यासासनगताय च ॥ २१ ॥

बछड़ेसहित तथा गर्भवती कपिला गौओंका भी दान करना चाहिये। राजन् ! पुरुषसिंह जनमेजय ! यजमान वाचकको अश्व आदि वाहन और दास-दासी भी समर्पित करे। आसन, धूप, दीप आदि वस्तुएँ, पात्र, शय्या, गद्दारजाई आदि, तकिया, लड्डू, वटलोई, पीढ़ा आदि, जलपात्र, बहुत-सा अन्न, नमक तथा घी, तेल आदि सामग्री भी, जो एक वर्षतक अँट सके, वाचककी सेवामें दे। ये सारी वस्तुएँ व्यासासनपर विराजमान हुए द्विजराज वक्ताको भेंट करनी चाहिये ॥ १८-२१ ॥


१. सूर्य, पूर्णचन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु यह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्रसे आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा नवें दैनिक नक्षत्रको लातोंसे दूषित करते हैं, इसलिये इसका नाम लत्ता दोष है। इनमें सूर्य अपनेसे आगे और पूर्णचन्द्र पीछे, फिर मङ्गल आगे और बुध पीछे, गुरु आगे और शुक्र पीछे तथा शनि आगे और राहु पीछेके नक्षत्रोंको दूषित करते हैं।