विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1145, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१११८ श्रीहरिवंशमाहात्म्ये
रजस्वलान्त्यजम्लेच्छपतितव्रात्यकैः सह ॥ १८ ॥
द्विजद्विड्वेदबाह्यैश्च न वदेच्च कथाव्रती ।
कथाव्रती रजस्वला स्त्री, अन्त्यज (चाण्डाल आदि), म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणद्रोही तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात न करे ॥ १८½ ॥
सत्यं शौचं दया मौनमार्जवं विनयं तथा ॥ १९ ॥
उदारं मानसं तद्वत् कुर्यादेव कथाव्रती ।
नियमसे कथाका व्रत लेनेवाले पुरुषको सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता तथा विनयका पालन करना चाहिये और अपने हृदयको उदार बनाये रखना चाहिये ॥ १९½ ॥
श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः ॥ २० ॥
वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः ।
जो श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न हो, दूसरे किसी कार्यकी लालसा न रखते हुए पवित्र, मौन और शान्तभावसे कथा सुनते हैं, वे पुण्यके भागी होते हैं ॥ २०½ ॥
अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः ॥ २१ ॥
तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि ।
जो अधम मनुष्य भक्तिभावसे रहित होकर इस पुण्य कथाको सुनते हैं, उन्हें कभी पुण्य-फल नहीं प्राप्त होता और जन्म-जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है ॥ २१½ ॥
पुराणं ये तु सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः ॥ २२ ॥
शृण्वन्ति च कथां भक्त्या दरिद्राः स्युर्न पापिनः ।
जो ताम्बूल आदि उपहारोंसे पुराणका पूजन करके भक्तिभावसे इस कथाको सुनते हैं, वे दरिद्र और पापी नहीं होते हैं ॥ २२½ ॥
कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः ॥ २३ ॥
भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ।
जो कथा होते समय उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी स्त्री और सम्पदाएँ भोगके बीचमें ही नष्ट हो जाती हैं (वह उनका पूर्णतः उपभोग नहीं कर पाता है) ॥ २३½ ॥
सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वन्ति पावनीम् ॥ २४ ॥
ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः ।
जो पापी नराधम सिरपर पगड़ी रखकर इस पावन कथाको सुनते हैं, वे बगुले होते हैं ॥ २४½ ॥
ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम् ॥ २५ ॥
स्वविष्ठां खादयन्त्येतान्नरके यमकिङ्कराः।
नार्या रजस्वलायाश्च योनितुल्यं मुखं भवेत् ॥ २६ ॥
जो लोग पान खाते हुए पुराणकी पावन कथाको सुनते हैं, उन्हें यमराजके दूत नरकमें डालकर अपनी ही विष्ठा खिलाते हैं । उनका मुख रजस्वला स्त्रीकी योनिके समान हो जाता है ॥ २५-२६ ॥
ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।
अक्षय्यान् नरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः ॥ २७ ॥
जो दम्भी मनुष्य ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे अक्षय नरकोंका उपभोग करके अन्तमें कौए होते हैं ॥ २७ ॥
ये च वीरासनारूढा ये च शय्यासनस्थिताः।
शृण्वन्ति तत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः ॥ २८ ॥
जो वीरासनपर आरूढ हो तथा जो शय्यारूप आसनपर बैठकर उस पुराण-कथाको सुनते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं ॥ २८ ॥
असम्प्रणम्य शृण्वन्तो विषवृक्षा भवन्ति ते।
तथा शयानाः शृण्वन्तो भवन्त्यजगरा नराः ॥ २९ ॥
जो कथाको प्रणाम किये बिना ही सुनते हैं, वे विषवृक्ष होते हैं। जो सोते हुए सुनते हैं, वे मनुष्य अजगर सर्प होते हैं ॥ २९ ॥
यः शृणोति कथां वक्रः समानासनमाश्रितः।
गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत् ॥ ३० ॥
जो वक्र स्वभाववाला मनुष्य वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरुपत्नीगमन-तुल्य पापका भागी होकर नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥
ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम्।
ते वै जन्मशतं मर्त्याः शुनकाः सम्भवन्ति च ॥ ३१ ॥
जो लोग पुराणवेत्ताओं तथा पुराणकी पापहारिणी कथाकी निन्दा करते हैं, वे मनुष्य सौ जन्मोंतक कुत्ते होते हैं ॥ ३१ ॥
कथायां वर्तमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।
ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्ततः परम् ॥ ३२ ॥