भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1146
  • चतुर्थोऽध्यायः १११९

जो कथा होते समय दूषित उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं, वे पहले तो गदहे होते हैं, तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जन्म पाते हैं ॥ ३२ ॥

कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।
ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनशूकराः ॥ ३३ ॥

जो कभी भी पुराणकी पुण्यमयी कथाको नहीं सुनते हैं, वे घोर नरकोंका कष्ट भोगकर वनैले सूअर होते हैं ॥ ३३॥

कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।
कोट्यव्दान् नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामशूकराः॥ ३४॥

जो शठ कथा-कीर्तनमें विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ३४ ॥

मध्ये वार्ता न कुर्वीत चेत् कुर्यान्निरयं व्रजेत्।
कथायां श्रूयमाणायां न कुर्याच्छिशुलालनम् ॥ ३५॥

कथा सुनते समय बीचमें बातचीत न करे। यदि कोई करे तो वह नरकमें जायगा । कथा-श्रवणकालमें बच्चोंका लाड़-प्यार भी न करे ॥ ३५ ॥

नर्मवादान् वदेन्नैव स्त्रिया सम्भाषणं तथा।
न कर्तव्यं प्रयत्नेन कथाविच्छेदकारणम् ॥ ३६ ॥

कथा होते समय हँसी-परिहासकी बातें न करे, स्त्रीके साथ वार्तालाप भी न करे। इन बातोंका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये; क्योंकि ये सब बातें कथामें विच्छेद (विघ्न) डालनेवाली हैं ॥ ३६ ॥

विच्छेदेन कथायास्तु ब्रह्महत्यासमं त्वघम् ।
प्राप्नोति नृपशार्दूल कथाविच्छेदकः पुमान् ॥ ३७॥

राजसिंह ! कथामें विच्छेद पैदा करनेसे वह कथाविच्छेदक पुरुष ब्रह्महत्याके समान पापका भागी होता है ॥ ३७॥

न कुर्यात् तु कथामध्ये त्वन्यवार्ताः प्रयत्नतः।
नारी वा पुरुषो वापि कुर्यान्निरयमाप्नुयात् ॥ ३८॥

स्त्री हो या पुरुष, कथाके बीचमें दूसरी बातें न करे और इसके लिये सदा प्रयत्नशील रहे। यदि कोई बात करता है तो वह नरकमें पड़ता है ॥ ३८ ॥

इतिहासं वदाम्यत्र शृणुष्वैकं हि मानद।
यं श्रुत्वा न वदेद् वार्तां कथामध्ये कदाचन ॥ ३९ ॥

मानद ! इस विषयमें मैं एक इतिहास बताता हूँ, इसे सुनो। इसे सुन लेनेपर कोई भी मनुष्य कभी कथाके बीचमें वार्तालाप नहीं कर सकता ॥ ३९ ॥


जनस्थाने पुरा कश्चिद् ब्राह्मणो वेदपारगः।
धर्मशास्त्रेऽतिनिपुणः सदाचारपरायणः ॥ ४० ॥

प्राचीन कालकी बात है, जनस्थानमें कोई ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे। वे धर्म-शास्त्रमें अत्यन्त निपुण तथा सदाचारमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ ४० ॥

गङ्गास्नानं विधायादौ कृत्वा माध्याह्निकं तथा।
कृत्वा देवार्चनं चैव श्रवणे तत्परोऽभवत् ॥ ४१ ॥

वे प्रतिदिन पहले गङ्गा-स्नान और मध्याह्न-संध्या-वन्दन आदि करके देवपूजन करनेके पश्चात् कथा-श्रवणमें प्रवृत्त होते थे ॥ ४१ ॥

तस्य भार्यातिदुष्टा च कर्कशा कलहप्रिया।
असत्यालापनिपुणा परद्वेषपरायणा ॥ ४२ ॥

उनकी स्त्री बड़ी दुष्ट और कर्कशा थी। सदा कलह करना ही उसे प्रिय लगता था। वह झूठ बोलनेमें निपुण थी और दूसरोंसे द्वेष करनेमें ही लगी रहती थी ॥ ४२ ॥

हृत्वा चक्रे धनस्यापि संग्रहं पापनिश्चया।
दधि दुग्धं समानीय शर्करागुडमेव च ॥ ४३ ॥
घृतं च नवनीतं च स्वयमानीय सर्वदा।
एकान्ते भक्षणं चक्रे भर्तर्यन्नं प्रशुष्ककम् ॥ ४४ ॥

वह पापपूर्ण निश्चयवाली नारी चोरी-चोरी धनका भी संग्रह करने लगी। वह स्वयं दही, दूध, शक्कर, गुड़-घी और माखन खरीद लाती और एकान्तमें बैठकर अकेली ही खाती थी । पतिको केवल रूखा-सूखा अन्न परोस दिया करती थी ॥ ४३-४४ ॥

दुराग्रहा दुष्टमनाः पतिनिन्दापरायणा।
बहुपापप्रकर्त्री च परवेश्मोपवेशिनी ॥ ४५ ॥

उसका स्वभाव दुराग्रही था, मनमें दुष्टता भरी रहती थी। वह सदा अपने पतिकी निन्दामें ही लगी रहनेवाली और पाप करनेवाली थी, प्रायः दूसरेके घरमें ही बैठी रहती थी ॥ ४५ ॥

सुभाषणं वदेन्नैव द्विषः क्षेमविधायिनी ।
पंक्तिभेदं प्रकुर्वाणा सदा निष्ठुरभाषिणी ॥ ४६ ॥

वह अच्छी बात तो कभी बोलती ही नहीं थी। जो पतिके द्वेषी थे, उन्हींका वह भला किया करती थी। भोजनमें सदा पंक्तिभेद करती थी—किसीको कुछ परोसती और किसीको कुछ। सदा निष्ठुर बात ही बोलती थी ॥ ४६ ॥

अतिथिषु सदा वैरकारिणी धर्मनाशिनी ।