विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1144, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः १११७
फलाहारेण वा भाव्यमेकभुक्तेन वा पुनः ॥ ५ ॥
कथाके समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिये हल्का भोजन करना सुखद होता है, अतः कथा सुननेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको एक बार हविष्यान्न भोजन करना उचित है। यदि शक्ति हो तो नौ रात उपवास करके कथा सुने अथवा केवल घी अथवा दूध पीकर सुखपूर्वक कथा सुने। इससे काम न चले तो फलाहार अथवा एक समय भोजन करके कथा सुननी चाहिये ॥ ३-५ ॥
सुखसाध्यं भवेद् यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत्। भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम् ॥ ६ ॥
तात्पर्य यह है कि जिससे जो नियम सुगमतापूर्वक निभ सके, वह उसीको कथा सुननेके लिये ग्रहण करे। मैं तो उपवासकी अपेक्षा भोजनको ही श्रेष्ठ मानता हूँ, यदि वह कथा-श्रवणमें सहायक हो सके ॥ ६ ॥
नोपवासो वरः प्रोक्तो कथाविघ्नकरो यदि। शृणुयाद् यः शुचिस्तिष्ठन्नेकचित्ततया सदा ॥ ७ ॥
यदि उपवाससे कथामें विघ्न पड़ता हो तो वह अच्छा नहीं बताया गया है। जो इस कथाको सुने, वह सदा पवित्र हो एकाग्र-चित्तसे सुननेके लिये बैठे ॥ ७ ॥
प्रातःस्नानादिकं कृत्वा पुत्रदारसमन्वितः। पुराणश्रवणं कुर्यात् कृष्णपूजनपूर्वकम् ॥ ८ ॥
श्रोता स्त्री-पुत्रोंके साथ प्रातःस्नान आदि कर्म करके पहले भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। तत्पश्चात् इस पुराणको सुने ॥ ८ ॥
पुष्पधूपफलैः सम्यङ् नैवेद्यैः श्रद्धयोद्धतैः। गुरोः शुश्रूषणं तेन कर्तव्यं फलकाङ्क्षिणा ॥ ९ ॥
अभीष्ट फलकी इच्छा रखनेवाला श्रोता श्रद्धापूर्वक अर्पित किये हुए पुष्प, धूप, फल और उत्तम नैवेद्यके द्वारा गुरुकी शुश्रूषा करे ॥ ९ ॥
श्रुत्वा यथेच्छया शौचं कार्यं पुण्येन वर्त्मना। सायंकाले गुरुश्रेष्ठं तोषयित्वा सबान्धवः ॥ १० ॥ स्वपरिग्रहसङ्गेन सुखं स्वपिति वै तदा। नियमादि प्रकर्तव्यं पापानां विनिवर्तने ॥ ११ ॥ यथासुखं व्यवहरेन्नित्यं विष्णुपरायणः।
कथा सुननेके पश्चात् अपनी इच्छाके अनुसार सायंकालमें पवित्र मार्गसे शौच-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करे, फिर बन्धु-बान्धवोंसहित सेवामें उपस्थित हो गुरुश्रेष्ठ व्यासको संतुष्ट करके अपनी स्त्रीके साथ घर जाकर पृथक् आसनपर सुखपूर्वक सोये। पापोंके निवारणके लिये शौच-, संतोष आदि नियमों और ब्रह्मचर्य आदि यमोंका दृढ़ताके साथ पालन करना चाहिये। नित्य-निरन्तर भगवान् विष्णुके चिन्तनमें तत्पर रहकर वह सुखपूर्वक पूर्वोक्त नियमोंका पालन करे ॥ १०-११½ ॥
शुचिः शुद्धमनास्तिष्ठन् पत्रावल्यां च भोजनम् ॥ १२ ॥ कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाव्रती।
कथाका व्रत लेनेवाला पुरुष पवित्र एवं शुद्ध-चित्त रहकर कथा सुने और प्रतिदिन कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें ही भोजन करे ॥ १२½ ॥
द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च ॥ १३ ॥ भावदुष्टं पर्युषितं जह्यान्नित्यं कथाव्रती।
कथा-श्रवणकालमें दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भाव-दूषित पदार्थ और वासी अन्नको कथाव्रती पुरुष प्रतिदिन त्याग दे ॥ १३½ ॥
वृन्ताकं च कलिङ्गं च दग्धमन्नं मसूरिकाम् ॥ १४ ॥ निष्पावानामिषाद्यं च वर्जयेच्च कथाव्रती।
बैंगन, कलिंग (सिरस), जला हुआ अन्न, मसूर, निष्पाव (लौबिया या सेम) तथा मांस आदिको कथाव्रती सर्वथा त्याग दे ॥ १४½ ॥
पलाण्डुं लशुनं हिंगुं मूलकं गृञ्जनं तथा ॥ १५ ॥ नालिकामूलकूष्माण्डं नैवाद्याच्च कथाव्रती।
प्याज, लहसुन, हींग, मूली, गाजर, नालिका (नाड़ीका शाक), मूल (जमीनके अंदर पैदा होनेवाले कंद, आलू, अरवी आदि) और कुम्हड़ा—इन सबको कथा सुननेका व्रत लेनेवाला पुरुष कदापि न खाय ॥ १५½ ॥
कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च ॥ १६ ॥ दम्भं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती।
कथाव्रती पुरुष काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दम्भ, मोह तथा द्वेषको अपने मनसे दूर कर दे ॥ १६½ ॥
वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा ॥ १७ ॥ स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेच्च कथाव्रती।
वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक, स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दाको सर्वथा त्याग दे ॥ १७½ ॥