विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1143, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११६ | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये |
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—मूर्ख भी यदि भक्तिभावसे पूजित हो तो वह ज्ञानदाता गुरु हो जाता है। अर्थात् मन्त्रका भी यदि श्रद्धापूर्वक सेवन (जप) किया जाय तो वह फलदायक हो जाता है॥
श्रद्धया पूजितो देवो नीचस्यापि वरप्रदः।
अश्रद्धया कृता पूजा दानं यज्ञस्तपो व्रतम् ॥ १८ ॥
सर्वं निष्फलतां याति पुष्पं बन्धूकरोरिव।
यदि देवताकी श्रद्धापूर्वक पूजा की गयी तो वह नीच पुरुषको भी वर प्रदान करता है। अश्रद्धासे की हुई पूजा, दान, यज्ञ, तप और व्रत—ये सभी दुपहरियाके फूलकी भाँति निष्फल हो जाते हैं ॥ १८१/२ ॥
सर्वत्र संशयाविष्टः श्रद्धाहीनोऽतिचञ्चलः ॥ १९ ॥
परमार्थात् परिभ्रष्टः संसृतेर्न हि मुच्यते।
जो सर्वत्र संशययुक्त, श्रद्धाहीन और अत्यन्त चञ्चल होता है, वह परमार्थसे भ्रष्ट होकर संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता ॥ १९१/२ ॥
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ॥ २० ॥
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।
मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषध और गुरुके विषयमें जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है ॥ २०१/२ ॥
अतो भावमयं विश्वं पुण्यपापं च भावतः ॥ २१ ॥
ते उभे भावहीनस्य न भवेतां कदाचन।
तस्मात् सर्वात्मना राजन्ञ्छ्रद्धाभक्ती समाश्रयेत् ॥ २२ ॥
यह सारा विश्व भावमय है। पुण्य और पाप भी भावसे ही होते हैं। जो भावसे हीन है, उसे वे दोनों पुण्य और पाप कभी नहीं प्राप्त होते हैं। अतः राजन्! सम्पूर्ण हृदयसे श्रद्धा और भक्तिका आश्रय लेना चाहिये ॥ २१-२२ ॥
आ सूर्योदयमारभ्य सार्धं त्रिप्रहरार्धकम्।
वाचनीया कथा सम्यग् धीरकण्ठं सुधीमता ॥ २३ ॥
बुद्धिमान् वक्ताको उचित है कि वह सूर्योदयसे लेकर साढ़े तीन प्रहरतक मध्यम-स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे ॥ २३ ॥
कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयम्।
तत् कथामनु कार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा ॥ २४ ॥
एवं श्रुत्वा विधानेन सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ २५ ॥
दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे। कथा बंद होनेपर वैष्णव पुरुषोंको उस बीचमें कुछ देरतक कीर्तन करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक कथा सुनकर मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करे ॥ २४-२५ ॥
इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंश-माहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदि विधिक वर्णनाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
नवाहव्रती श्रोताओंके पालन करने योग्य नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुओंका उल्लेख, न्यायविरुद्ध कथा श्रवण करनेवालोंकी दुर्गति, कथामें विघ्न डालनेके कारण एक नारीको नरकयातना एवं राक्षसयोनिकी प्राप्ति तथा श्रोताओंके चौदह भेद
वैशम्पायन उवाच
नवाहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्शृणु सत्तम।
एककालाशनश्चैव अधःशायी भवेन्नरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—साधुशिरोमणे! नवाह-कथा-श्रवणका व्रत लेनेवाले पुरुषोंके लिये जो आवश्यक नियम हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो! व्रती पुरुष एक समय भोजन करे और नीचे भूमिपर सोये ॥ १ ॥
स्थातव्यं ब्रह्मचर्येण यावद् ग्रन्थः समाप्यते।
हरिवंशे तथा राजन् पायसं चरुभोजनम् ॥ २ ॥
पारणे पारणे यातं यथावद् भरतर्षभ।
जबतक ग्रन्थ समाप्त न हो जाय, तबतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए रहना चाहिये। राजन्! भरतश्रेष्ठ! हरिवंशकी प्रत्येक पारणामे यथावत् रूपसे खीर अथवा चरुके भोजनका विधान प्राप्त होता है ॥ २१/२ ॥
मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः ॥ ३ ॥
हविष्यान्नेन कर्तव्यमेकवारं कथार्थिना।
उपोष्या नवरात्रं वा शक्तिश्चेच्छृणुयात् तदा ॥ ४ ॥
घृतपानं पयःपानं कृत्वा वा शृणुयाद् सुखम्।