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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
११६श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

—मूर्ख भी यदि भक्तिभावसे पूजित हो तो वह ज्ञानदाता गुरु हो जाता है। अर्थात् मन्त्रका भी यदि श्रद्धापूर्वक सेवन (जप) किया जाय तो वह फलदायक हो जाता है॥

श्रद्धया पूजितो देवो नीचस्यापि वरप्रदः।
अश्रद्धया कृता पूजा दानं यज्ञस्तपो व्रतम् ॥ १८ ॥
सर्वं निष्फलतां याति पुष्पं बन्धूकरोरिव।

यदि देवताकी श्रद्धापूर्वक पूजा की गयी तो वह नीच पुरुषको भी वर प्रदान करता है। अश्रद्धासे की हुई पूजा, दान, यज्ञ, तप और व्रत—ये सभी दुपहरियाके फूलकी भाँति निष्फल हो जाते हैं ॥ १८१/२ ॥

सर्वत्र संशयाविष्टः श्रद्धाहीनोऽतिचञ्चलः ॥ १९ ॥
परमार्थात् परिभ्रष्टः संसृतेर्न हि मुच्यते।

जो सर्वत्र संशययुक्त, श्रद्धाहीन और अत्यन्त चञ्चल होता है, वह परमार्थसे भ्रष्ट होकर संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो पाता ॥ १९१/२ ॥

मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ ॥ २० ॥
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।

मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषध और गुरुके विषयमें जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है ॥ २०१/२ ॥

अतो भावमयं विश्वं पुण्यपापं च भावतः ॥ २१ ॥
ते उभे भावहीनस्य न भवेतां कदाचन।
तस्मात् सर्वात्मना राजन्ञ्छ्रद्धाभक्ती समाश्रयेत् ॥ २२ ॥

यह सारा विश्व भावमय है। पुण्य और पाप भी भावसे ही होते हैं। जो भावसे हीन है, उसे वे दोनों पुण्य और पाप कभी नहीं प्राप्त होते हैं। अतः राजन्! सम्पूर्ण हृदयसे श्रद्धा और भक्तिका आश्रय लेना चाहिये ॥ २१-२२ ॥

आ सूर्योदयमारभ्य सार्धं त्रिप्रहरार्धकम्।
वाचनीया कथा सम्यग् धीरकण्ठं सुधीमता ॥ २३ ॥

बुद्धिमान् वक्ताको उचित है कि वह सूर्योदयसे लेकर साढ़े तीन प्रहरतक मध्यम-स्वरसे अच्छी तरह कथा बाँचे ॥ २३ ॥

कथाविरामः कर्तव्यो मध्याह्ने घटिकाद्वयम्।
तत् कथामनु कार्यं वै कीर्तनं वैष्णवैस्तदा ॥ २४ ॥
एवं श्रुत्वा विधानेन सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ २५ ॥

दोपहरके समय दो घड़ीतक कथा बंद रखे। कथा बंद होनेपर वैष्णव पुरुषोंको उस बीचमें कुछ देरतक कीर्तन करना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक कथा सुनकर मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करे ॥ २४-२५ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंश-माहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदि विधिक वर्णनाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥


चतुर्थोऽध्यायः

नवाहव्रती श्रोताओंके पालन करने योग्य नियम, उनके द्वारा त्याज्य वस्तुओंका उल्लेख, न्यायविरुद्ध कथा श्रवण करनेवालोंकी दुर्गति, कथामें विघ्न डालनेके कारण एक नारीको नरकयातना एवं राक्षसयोनिकी प्राप्ति तथा श्रोताओंके चौदह भेद

वैशम्पायन उवाच

नवाहव्रतिनां पुंसां नियमाञ्शृणु सत्तम।
एककालाशनश्चैव अधःशायी भवेन्नरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—साधुशिरोमणे! नवाह-कथा-श्रवणका व्रत लेनेवाले पुरुषोंके लिये जो आवश्यक नियम हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो! व्रती पुरुष एक समय भोजन करे और नीचे भूमिपर सोये ॥ १ ॥

स्थातव्यं ब्रह्मचर्येण यावद् ग्रन्थः समाप्यते।
हरिवंशे तथा राजन् पायसं चरुभोजनम् ॥ २ ॥
पारणे पारणे यातं यथावद् भरतर्षभ।

जबतक ग्रन्थ समाप्त न हो जाय, तबतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए रहना चाहिये। राजन्! भरतश्रेष्ठ! हरिवंशकी प्रत्येक पारणामे यथावत् रूपसे खीर अथवा चरुके भोजनका विधान प्राप्त होता है ॥ २१/२ ॥

मलमूत्रजयार्थं हि लघ्वाहारः सुखावहः ॥ ३ ॥
हविष्यान्नेन कर्तव्यमेकवारं कथार्थिना।
उपोष्या नवरात्रं वा शक्तिश्चेच्छृणुयात् तदा ॥ ४ ॥
घृतपानं पयःपानं कृत्वा वा शृणुयाद् सुखम्।

चतुर्थोऽध्यायः १११७

चतुर्थोऽध्यायः १११७

फलाहारेण वा भाव्यमेकभुक्तेन वा पुनः ॥ ५ ॥

कथाके समय मल-मूत्रके वेगको काबूमें रखनेके लिये हल्का भोजन करना सुखद होता है, अतः कथा सुननेकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको एक बार हविष्यान्न भोजन करना उचित है। यदि शक्ति हो तो नौ रात उपवास करके कथा सुने अथवा केवल घी अथवा दूध पीकर सुखपूर्वक कथा सुने। इससे काम न चले तो फलाहार अथवा एक समय भोजन करके कथा सुननी चाहिये ॥ ३-५ ॥

सुखसाध्यं भवेद् यत्तु कर्तव्यं श्रवणाय तत्। भोजनं तु वरं मन्ये कथाश्रवणकारकम् ॥ ६ ॥

तात्पर्य यह है कि जिससे जो नियम सुगमतापूर्वक निभ सके, वह उसीको कथा सुननेके लिये ग्रहण करे। मैं तो उपवासकी अपेक्षा भोजनको ही श्रेष्ठ मानता हूँ, यदि वह कथा-श्रवणमें सहायक हो सके ॥ ६ ॥

नोपवासो वरः प्रोक्तो कथाविघ्नकरो यदि। शृणुयाद् यः शुचिस्तिष्ठन्नेकचित्ततया सदा ॥ ७ ॥

यदि उपवाससे कथामें विघ्न पड़ता हो तो वह अच्छा नहीं बताया गया है। जो इस कथाको सुने, वह सदा पवित्र हो एकाग्र-चित्तसे सुननेके लिये बैठे ॥ ७ ॥

प्रातःस्नानादिकं कृत्वा पुत्रदारसमन्वितः। पुराणश्रवणं कुर्यात् कृष्णपूजनपूर्वकम् ॥ ८ ॥

श्रोता स्त्री-पुत्रोंके साथ प्रातःस्नान आदि कर्म करके पहले भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। तत्पश्चात् इस पुराणको सुने ॥ ८ ॥

पुष्पधूपफलैः सम्यङ् नैवेद्यैः श्रद्धयोद्धतैः। गुरोः शुश्रूषणं तेन कर्तव्यं फलकाङ्क्षिणा ॥ ९ ॥

अभीष्ट फलकी इच्छा रखनेवाला श्रोता श्रद्धापूर्वक अर्पित किये हुए पुष्प, धूप, फल और उत्तम नैवेद्यके द्वारा गुरुकी शुश्रूषा करे ॥ ९ ॥

श्रुत्वा यथेच्छया शौचं कार्यं पुण्येन वर्त्मना। सायंकाले गुरुश्रेष्ठं तोषयित्वा सबान्धवः ॥ १० ॥ स्वपरिग्रहसङ्गेन सुखं स्वपिति वै तदा। नियमादि प्रकर्तव्यं पापानां विनिवर्तने ॥ ११ ॥ यथासुखं व्यवहरेन्नित्यं विष्णुपरायणः।

कथा सुननेके पश्चात् अपनी इच्छाके अनुसार सायंकालमें पवित्र मार्गसे शौच-सम्बन्धी कार्य सम्पन्न करे, फिर बन्धु-बान्धवोंसहित सेवामें उपस्थित हो गुरुश्रेष्ठ व्यासको संतुष्ट करके अपनी स्त्रीके साथ घर जाकर पृथक् आसनपर सुखपूर्वक सोये। पापोंके निवारणके लिये शौच-, संतोष आदि नियमों और ब्रह्मचर्य आदि यमोंका दृढ़ताके साथ पालन करना चाहिये। नित्य-निरन्तर भगवान् विष्णुके चिन्तनमें तत्पर रहकर वह सुखपूर्वक पूर्वोक्त नियमोंका पालन करे ॥ १०-११½ ॥

शुचिः शुद्धमनास्तिष्ठन् पत्रावल्यां च भोजनम् ॥ १२ ॥ कथासमाप्तौ भुक्तिं च कुर्यान्नित्यं कथाव्रती।

कथाका व्रत लेनेवाला पुरुष पवित्र एवं शुद्ध-चित्त रहकर कथा सुने और प्रतिदिन कथा समाप्त होनेपर पत्तलमें ही भोजन करे ॥ १२½ ॥

द्विदलं मधु तैलं च गरिष्ठान्नं तथैव च ॥ १३ ॥ भावदुष्टं पर्युषितं जह्यान्नित्यं कथाव्रती।

कथा-श्रवणकालमें दाल, मधु, तेल, गरिष्ठ अन्न, भाव-दूषित पदार्थ और वासी अन्नको कथाव्रती पुरुष प्रतिदिन त्याग दे ॥ १३½ ॥

वृन्ताकं च कलिङ्गं च दग्धमन्नं मसूरिकाम् ॥ १४ ॥ निष्पावानामिषाद्यं च वर्जयेच्च कथाव्रती।

बैंगन, कलिंग (सिरस), जला हुआ अन्न, मसूर, निष्पाव (लौबिया या सेम) तथा मांस आदिको कथाव्रती सर्वथा त्याग दे ॥ १४½ ॥

पलाण्डुं लशुनं हिंगुं मूलकं गृञ्जनं तथा ॥ १५ ॥ नालिकामूलकूष्माण्डं नैवाद्याच्च कथाव्रती।

प्याज, लहसुन, हींग, मूली, गाजर, नालिका (नाड़ीका शाक), मूल (जमीनके अंदर पैदा होनेवाले कंद, आलू, अरवी आदि) और कुम्हड़ा—इन सबको कथा सुननेका व्रत लेनेवाला पुरुष कदापि न खाय ॥ १५½ ॥

कामं क्रोधं मदं मानं मत्सरं लोभमेव च ॥ १६ ॥ दम्भं मोहं तथा द्वेषं दूरयेच्च कथाव्रती।

कथाव्रती पुरुष काम, क्रोध, मद, मान, मत्सर, लोभ, दम्भ, मोह तथा द्वेषको अपने मनसे दूर कर दे ॥ १६½ ॥

वेदवैष्णवविप्राणां गुरुगोव्रतिनां तथा ॥ १७ ॥ स्त्रीराजमहतां निन्दां वर्जयेच्च कथाव्रती।

वह वेद, वैष्णव, ब्राह्मण, गुरु, गोसेवक, स्त्री, राजा और महापुरुषोंकी निन्दाको सर्वथा त्याग दे ॥ १७½ ॥

१११८ श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


रजस्वलान्त्यजम्लेच्छपतितव्रात्यकैः सह ॥ १८ ॥
द्विजद्विड्‌वेदबाह्यैश्च न वदेच्च कथाव्रती ।

कथाव्रती रजस्वला स्त्री, अन्त्यज (चाण्डाल आदि), म्लेच्छ, पतित, गायत्रीहीन द्विज, ब्राह्मणद्रोही तथा वेदको न माननेवाले पुरुषोंसे बात न करे ॥ १८½ ॥

सत्यं शौचं दया मौनमार्जवं विनयं तथा ॥ १९ ॥
उदारं मानसं तद्वत् कुर्यादेव कथाव्रती ।

नियमसे कथाका व्रत लेनेवाले पुरुषको सत्य, शौच, दया, मौन, सरलता तथा विनयका पालन करना चाहिये और अपने हृदयको उदार बनाये रखना चाहिये ॥ १९½ ॥

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः ॥ २० ॥
वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः ।

जो श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न हो, दूसरे किसी कार्यकी लालसा न रखते हुए पवित्र, मौन और शान्तभावसे कथा सुनते हैं, वे पुण्यके भागी होते हैं ॥ २०½ ॥

अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः ॥ २१ ॥
तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि ।

जो अधम मनुष्य भक्तिभावसे रहित होकर इस पुण्य कथाको सुनते हैं, उन्हें कभी पुण्य-फल नहीं प्राप्त होता और जन्म-जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है ॥ २१½ ॥

पुराणं ये तु सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः ॥ २२ ॥
शृण्वन्ति च कथां भक्त्या दरिद्राः स्युर्न पापिनः ।

जो ताम्बूल आदि उपहारोंसे पुराणका पूजन करके भक्तिभावसे इस कथाको सुनते हैं, वे दरिद्र और पापी नहीं होते हैं ॥ २२½ ॥

कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः ॥ २३ ॥
भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः ।

जो कथा होते समय उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी स्त्री और सम्पदाएँ भोगके बीचमें ही नष्ट हो जाती हैं (वह उनका पूर्णतः उपभोग नहीं कर पाता है) ॥ २३½ ॥

सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वन्ति पावनीम् ॥ २४ ॥
ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः ।

जो पापी नराधम सिरपर पगड़ी रखकर इस पावन कथाको सुनते हैं, वे बगुले होते हैं ॥ २४½ ॥

ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम् ॥ २५ ॥
स्वविष्ठां खादयन्त्येतान्नरके यमकिङ्कराः।
नार्या रजस्वलायाश्च योनितुल्यं मुखं भवेत् ॥ २६ ॥

जो लोग पान खाते हुए पुराणकी पावन कथाको सुनते हैं, उन्हें यमराजके दूत नरकमें डालकर अपनी ही विष्ठा खिलाते हैं । उनका मुख रजस्वला स्त्रीकी योनिके समान हो जाता है ॥ २५-२६ ॥

ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।
अक्षय्यान् नरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः ॥ २७ ॥

जो दम्भी मनुष्य ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे अक्षय नरकोंका उपभोग करके अन्तमें कौए होते हैं ॥ २७ ॥

ये च वीरासनारूढा ये च शय्यासनस्थिताः।
शृण्वन्ति तत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः ॥ २८ ॥

जो वीरासनपर आरूढ हो तथा जो शय्यारूप आसनपर बैठकर उस पुराण-कथाको सुनते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं ॥ २८ ॥

असम्प्रणम्य शृण्वन्तो विषवृक्षा भवन्ति ते।
तथा शयानाः शृण्वन्तो भवन्त्यजगरा नराः ॥ २९ ॥

जो कथाको प्रणाम किये बिना ही सुनते हैं, वे विषवृक्ष होते हैं। जो सोते हुए सुनते हैं, वे मनुष्य अजगर सर्प होते हैं ॥ २९ ॥

यः शृणोति कथां वक्रः समानासनमाश्रितः।
गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत् ॥ ३० ॥

जो वक्र स्वभाववाला मनुष्य वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरुपत्नीगमन-तुल्य पापका भागी होकर नरकमें पड़ता है ॥ ३० ॥

ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वा पापहारिणीम्।
ते वै जन्मशतं मर्त्याः शुनकाः सम्भवन्ति च ॥ ३१ ॥

जो लोग पुराणवेत्ताओं तथा पुराणकी पापहारिणी कथाकी निन्दा करते हैं, वे मनुष्य सौ जन्मोंतक कुत्ते होते हैं ॥ ३१ ॥

कथायां वर्तमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।
ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्ततः परम् ॥ ३२ ॥

  • चतुर्थोऽध्यायः १११९

जो कथा होते समय दूषित उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं, वे पहले तो गदहे होते हैं, तत्पश्चात् गिरगिटकी योनिमें जन्म पाते हैं ॥ ३२ ॥

कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।
ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनशूकराः ॥ ३३ ॥

जो कभी भी पुराणकी पुण्यमयी कथाको नहीं सुनते हैं, वे घोर नरकोंका कष्ट भोगकर वनैले सूअर होते हैं ॥ ३३॥

कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।
कोट्यव्दान् नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामशूकराः॥ ३४॥

जो शठ कथा-कीर्तनमें विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक भोगकर अन्तमें ग्रामसूकर होते हैं ॥ ३४ ॥

मध्ये वार्ता न कुर्वीत चेत् कुर्यान्निरयं व्रजेत्।
कथायां श्रूयमाणायां न कुर्याच्छिशुलालनम् ॥ ३५॥

कथा सुनते समय बीचमें बातचीत न करे। यदि कोई करे तो वह नरकमें जायगा । कथा-श्रवणकालमें बच्चोंका लाड़-प्यार भी न करे ॥ ३५ ॥

नर्मवादान् वदेन्नैव स्त्रिया सम्भाषणं तथा।
न कर्तव्यं प्रयत्नेन कथाविच्छेदकारणम् ॥ ३६ ॥

कथा होते समय हँसी-परिहासकी बातें न करे, स्त्रीके साथ वार्तालाप भी न करे। इन बातोंका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिये; क्योंकि ये सब बातें कथामें विच्छेद (विघ्न) डालनेवाली हैं ॥ ३६ ॥

विच्छेदेन कथायास्तु ब्रह्महत्यासमं त्वघम् ।
प्राप्नोति नृपशार्दूल कथाविच्छेदकः पुमान् ॥ ३७॥

राजसिंह ! कथामें विच्छेद पैदा करनेसे वह कथाविच्छेदक पुरुष ब्रह्महत्याके समान पापका भागी होता है ॥ ३७॥

न कुर्यात् तु कथामध्ये त्वन्यवार्ताः प्रयत्नतः।
नारी वा पुरुषो वापि कुर्यान्निरयमाप्नुयात् ॥ ३८॥

स्त्री हो या पुरुष, कथाके बीचमें दूसरी बातें न करे और इसके लिये सदा प्रयत्नशील रहे। यदि कोई बात करता है तो वह नरकमें पड़ता है ॥ ३८ ॥

इतिहासं वदाम्यत्र शृणुष्वैकं हि मानद।
यं श्रुत्वा न वदेद् वार्तां कथामध्ये कदाचन ॥ ३९ ॥

मानद ! इस विषयमें मैं एक इतिहास बताता हूँ, इसे सुनो। इसे सुन लेनेपर कोई भी मनुष्य कभी कथाके बीचमें वार्तालाप नहीं कर सकता ॥ ३९ ॥


जनस्थाने पुरा कश्चिद् ब्राह्मणो वेदपारगः।
धर्मशास्त्रेऽतिनिपुणः सदाचारपरायणः ॥ ४० ॥

प्राचीन कालकी बात है, जनस्थानमें कोई ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे। वे धर्म-शास्त्रमें अत्यन्त निपुण तथा सदाचारमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ ४० ॥

गङ्गास्नानं विधायादौ कृत्वा माध्याह्निकं तथा।
कृत्वा देवार्चनं चैव श्रवणे तत्परोऽभवत् ॥ ४१ ॥

वे प्रतिदिन पहले गङ्गा-स्नान और मध्याह्न-संध्या-वन्दन आदि करके देवपूजन करनेके पश्चात् कथा-श्रवणमें प्रवृत्त होते थे ॥ ४१ ॥

तस्य भार्यातिदुष्टा च कर्कशा कलहप्रिया।
असत्यालापनिपुणा परद्वेषपरायणा ॥ ४२ ॥

उनकी स्त्री बड़ी दुष्ट और कर्कशा थी। सदा कलह करना ही उसे प्रिय लगता था। वह झूठ बोलनेमें निपुण थी और दूसरोंसे द्वेष करनेमें ही लगी रहती थी ॥ ४२ ॥

हृत्वा चक्रे धनस्यापि संग्रहं पापनिश्चया।
दधि दुग्धं समानीय शर्करागुडमेव च ॥ ४३ ॥
घृतं च नवनीतं च स्वयमानीय सर्वदा।
एकान्ते भक्षणं चक्रे भर्तर्यन्नं प्रशुष्ककम् ॥ ४४ ॥

वह पापपूर्ण निश्चयवाली नारी चोरी-चोरी धनका भी संग्रह करने लगी। वह स्वयं दही, दूध, शक्कर, गुड़-घी और माखन खरीद लाती और एकान्तमें बैठकर अकेली ही खाती थी । पतिको केवल रूखा-सूखा अन्न परोस दिया करती थी ॥ ४३-४४ ॥

दुराग्रहा दुष्टमनाः पतिनिन्दापरायणा।
बहुपापप्रकर्त्री च परवेश्मोपवेशिनी ॥ ४५ ॥

उसका स्वभाव दुराग्रही था, मनमें दुष्टता भरी रहती थी। वह सदा अपने पतिकी निन्दामें ही लगी रहनेवाली और पाप करनेवाली थी, प्रायः दूसरेके घरमें ही बैठी रहती थी ॥ ४५ ॥

सुभाषणं वदेन्नैव द्विषः क्षेमविधायिनी ।
पंक्तिभेदं प्रकुर्वाणा सदा निष्ठुरभाषिणी ॥ ४६ ॥

वह अच्छी बात तो कभी बोलती ही नहीं थी। जो पतिके द्वेषी थे, उन्हींका वह भला किया करती थी। भोजनमें सदा पंक्तिभेद करती थी—किसीको कुछ परोसती और किसीको कुछ। सदा निष्ठुर बात ही बोलती थी ॥ ४६ ॥

अतिथिषु सदा वैरकारिणी धर्मनाशिनी ।

११२० | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


सज्जनोऽपि गुणी सौम्यस्तस्या भर्ता सुपूजितः ॥ ४७ ॥
अतिथियोंसे सदा वैर रखती और धर्मका नाश करती थी। उसके पति बड़े सज्जन, गुणवान्, सौम्य तथा सर्वत्र सम्मानित होनेवाले थे ॥ ४७ ॥

यदा भर्ता पुराणस्य श्रवणाय हि संस्थितः।
प्रत्यहं तत्र गत्वा तु तस्य निन्दां चकार ह ॥ ४८ ॥
जब उसके पति प्रतिदिन पुराण सुननेके लिये बैठते, तब वहाँ जाकर वह उनकी निन्दा करने लगती थी—॥४८॥

संन्यासिवत् कथं ह्यत्र श्रवणे व्यासवत् कृतः।
समुत्पन्ननिरुद्योग किं कर्तव्यं मया वद ॥ ४९ ॥
'संसारमें पैदा होकर भी जीवन-निर्वाहके लिये कोई उद्योग न करनेवाले आलसी ! यहाँ संन्यासीकी तरह कथा सुनने कैसे बैठे हो ? तुम तो यहाँ आकर व्यासबाबा बन गये, अब मुझे बताओ, मैं क्या करूँ ? ॥ ४९ ॥

शिशवो मां पीडयन्ति भक्षणाय दिने दिने।
किं तेषां च प्रकर्तव्यं भक्षणार्थं मया वद ॥ ५० ॥
'बच्चे प्रतिदिन भोजनके लिये मुझे तंग करते रहते हैं; बताओ, मैं उनके खानेके लिये क्या प्रबन्ध करूँ ? ॥ ५० ॥

नास्त्येवान्नं गृहे किञ्चिद् वस्त्रं चाप्यथ वा धनम्।
किं मया च प्रकर्तव्यं कुत्र गन्तव्यमेव च ॥ ५१ ॥
'मेरे घरमें न तो मुट्ठीभर अन्न है, न वस्त्र है और न धन ही है। मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? ॥ ५१ ॥

कथं विलिखितं दिष्टं धात्रा पापेन मे पुरा।
मूर्खश्चालस्यसंयुक्तो दरिद्रो निष्ठुरस्तथा ॥ ५२ ॥
स्नेहहीनः कुटुम्बे च कथायाः श्रवणे रतः।
एतादृशः पतिर्मह्यं धात्रा दत्तो दुरात्मना ॥ ५३ ॥
'न जाने पापी विधाताने पूर्वकालमें मेरा भाग्य कैसा लिख दिया ? दुरात्मा ब्रह्माने मुझे ऐसा पति दिया, जो मूर्ख, आलसी, दरिद्र और निष्ठुर है। इसका अपने कुटुम्ब-पर तनिक भी स्नेह नहीं है। यह सिर्फ कथा सुननेमें लगा रहता है ॥ ५२-५३ ॥

पृथिव्यां दुर्भगेकाहं दरिद्रगृहमागता।
उदरापूर्तिमात्रं हि नान्नं मे भक्षितं कदा ॥ ५४ ॥
'इस पृथ्वीपर एकमात्र मैं ही ऐसी अभागिनी हूँ, जो इस दरिद्रके घरमें आ गयी। यहाँ आकर कभी मैंने भरपेट भोजन भी नहीं किया ॥ ५४ ॥

सौभाग्यास्ताः स्त्रियो लोके यासामुद्योगशालिनः।
पतयो धनधान्यादिसमृद्धिपरिशोभिताः ॥ ५५ ॥
'संसारमें वे ही स्त्रियाँ सौभाग्यशालिनी हैं, जिनके पति उद्योगशील हैं, धन-धान्य आदिकी समृद्धिसे सुशोभित हैं ॥ ५५ ॥

ते वै स्त्रीणां वाक्यकराः शिशुपालनतत्पराः।
नित्यं गृहेषु तिष्ठन्ति स्त्रीणां संतोपकारकाः ॥ ५६ ॥
'वे अपनी स्त्रियोंकी आज्ञा मानते हैं, बच्चोंके लालन-पालनमें तत्पर रहते हैं, सदा घरमें रहते हैं और स्त्रियोंको संतुष्ट रखते हैं ॥ ५६ ॥

सदन्नभक्षणात् पुष्टा भार्याज्ञापरिपालकाः।
व्यवसायं च भार्याणां कुर्वन्ति बुद्धिशालिनः ॥ ५७ ॥
'वे उत्तम अन्न खाकर पुष्ट होते हैं, पत्नीकी आज्ञाका पालन करते हैं, बुद्धिशाली हैं और पत्नियोंका जैसा निश्चय होता है, वैसा ही वे करते हैं ॥ ५७ ॥

अयं मूर्खश्च जडधीरुपेक्षां कुरुते गृहे।
अद्य तैलं गृहे नास्ति चेन्धनं लवणं तथा ॥ ५८ ॥
'यह मेरा पति तो मूर्ख और जडबुद्धि है, घरके प्रति उपेक्षाका भाव रखता है। आज घरमें न नमक है, न तेल है और न लकड़ी ही है ॥ ५८ ॥

शाकश्च मम नास्त्येव धान्यलेशो न मद्गृहे।
किं मया तु प्रकर्तव्यं पतिरेतादृशो मम ॥ ५९ ॥
'साग भी मेरे घरमें नहीं है। अनाज तो लेशमात्र भी नहीं है। क्या करूँ ? मेरा पति ऐसा आलसी है' ॥ ५९ ॥

कथायां श्रूयमाणायां पत्या सन्मार्गमूर्तिना।
धान्यादौ विद्यमानेऽपि मिथ्याभाषणतत्परा ॥ ६० ॥
सन्मार्गकी मूर्तिरूप पतिके कथा सुनते समय वह घरमें अनाज आदिके रहते हुए भी वहाँ आकर इस प्रकार मिथ्या भाषण किया करती थी ॥ ६० ॥

कथाविघ्नं चकारासौ कर्कशा सा दिने दिने।
ततः कालेन मरणं प्राप्ता सा दुष्टमानसा ॥ ६१ ॥
वह कर्कशा स्त्री प्रतिदिन इसी तरह कथामें विघ्न डाला करती थी। उसका हृदय दुष्टतासे भरा था। तदनन्तर काल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ६१ ॥

यमदूतैस्तु बद्धा सा नीता च यममन्दिरे।
ततो यमाज्ञया तैस्तु नरके पातिता चिरम् ॥ ६२ ॥

पञ्चमोऽध्यायः ११२१


यमराजके दूत आये और उसे बाँधकर यमराजके घर ले गये। वहाँ यमकी आज्ञासे उन्होंने उसे चिरकालके लिये नरकमें गिरा दिया॥ ६२॥

पश्चात् सा राक्षसी जाता भैरवे जलवर्जिते।
अरण्ये क्षुत्तृषायुक्ता पूर्वपापप्रभावतः॥ ६३॥

नरकसे छूटनेपर वह पूर्व पापके प्रभावसे ही भयानक वनमें, जहाँ पानीका सर्वथा अभाव था, राक्षसी हुई और भूख-प्याससे पीड़ित रहने लगी॥ ६३॥

तस्माद् विघ्नं न कर्तव्यं भार्यया पुरुषेण वा।
श्रीहरेः सत्कथायास्तु तव सत्यं वदाम्यहम्॥ ६४॥

अतः स्त्री हो या पुरुष, किसीको भी श्रीहरिकी उत्तम कथामें विघ्न नहीं डालना चाहिये। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ॥ ६४॥

मीनालिनो महिषहंसवकस्वभावा
मार्जारकाकवृककङ्कजलौकतुल्याः।
सच्छिद्रकुम्भजलसिन्धुशिलोपमाश्च
ते श्रावकाश्च सुचतुर्दशधा भवन्ति॥ ६५॥

वे भले-बुरे श्रोता चौदह प्रकारके होते हैं—मीन, भ्रमर, महिष, हंस, बक, मार्जार, काक, वृक, कङ्क, जोंक, छिद्रयुक्त घट, जल, सिन्धु और शिला। इनके समान स्वभाववाले होनेके कारण वे इन्हीं नामोंसे कहे गये हैं॥ ६५॥

दरिद्रश्च क्षयी रोगी निर्भाग्यः पापकर्मवान्।
अनपत्यो मोक्षकामः शृणुयात् स कथामिमाम्॥ ६६॥

दरिद्र, क्षयका रोगी, अन्य किसी रोगसे पीड़ित, भाग्यहीन, पापाचारी, संतानहीन तथा मुमुक्षु पुरुष इस हरिवंश-कथाको अवश्य सुने॥ ६६॥

अपुष्पा काकवन्ध्या च वन्ध्या या च मृतार्भका।
स्रवद्गर्भा च या नारी तया श्राव्या प्रयत्नतः॥ ६७॥

जिस स्त्रीका मासिक धर्म रुक गया हो, जिसके एक ही संतान होकर रह गयी हो, जिसके बच्चे होते ही न हों, जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हों तथा जिसका गर्भ गिर जाता हो, उस स्त्रीको प्रयत्नपूर्वक इस हरिवंशकथाका श्रवण करना चाहिये॥ ६७॥

सुपुत्रं लभते राजन् व्यासस्य वचनं यथा।
सर्वान् कामानवाप्नोति कथां श्रुत्वा हरेरिमाम्॥ ६८॥

राजन्! नारी यह कथा सुनकर उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेती है। जैसा कि व्यासजीका वचन है। श्रीहरिकी इस कथाको सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है॥ ६८॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत कथा-श्रवण आदिकी विधिक वर्णन विषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ॥ ४॥


पञ्चमोऽध्यायः

हरिवंशके नवाह-पारायणका उद्यापन, उसमें किये जानेवाले दान, पुस्तकपूजा और वाचक-पूजन आदिका विधान एवं माहात्म्य

वैशम्पायन उवाच

एवं कृत्वा व्रतविधिमुद्यापनमथाचरेत्।
जन्माष्टमीव्रतमिव कर्तव्यं फलकाङ्क्षिभिः॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! इस प्रकार व्रतकी विधि पूर्ण करके उसका उद्यापन करे। उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको जन्माष्टमी-व्रतके समान इसका उद्यापन करना चाहिये॥ १॥

अकिञ्चनेषु भक्तेषु प्रायो नोद्यापनग्रहः।
श्रवणेनैव पूतास्ते निष्कामा वैष्णवा यतः॥ २॥

जो अकिंचन भक्त हैं, उनके लिये प्रायः उद्यापनका आग्रह नहीं है। वे कथा-श्रवणमात्रसे ही शुद्ध हो जाते हैं; क्योंकि वे निष्काम वैष्णव हैं॥ २॥

एवं नवाहयज्ञेऽस्मिन् समाप्ते श्रोतृभिस्तदा।
पुस्तकस्य च वक्तुश्च पूजा कार्यातिभक्तितः॥ ३॥
प्रसादतुलसीमाला श्रोतॄभ्यश्चाथ दीयताम्।

इस प्रकार नवाह-यज्ञ पूर्ण होनेपर श्रोताओंको बड़ी भक्तिके साथ पुस्तक तथा कथावाचककी पूजा करनी चाहिये और वक्ताको उचित है कि वह श्रोताओंको प्रसाद और तुलसीकी माला दे॥ ३॥


म० ह० ३६—

११२२श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

मृदङ्गतालललितं कीर्तनं कीर्त्यतां ततः॥ ४॥
जयशब्दो नमःशब्दः शङ्खशब्दश्च गीयताम्।
विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तमन्नं च दीयताम्॥ ५॥

तत्पश्चात् मृदंग बजाकर तालस्वरके साथ कीर्तन किया जाय, जय-जयकार और नमस्कार शब्दके साथ शङ्खोंकी ध्वनि हो तथा ब्राह्मण और याचकोंको अन्न और धन दिया जाय॥ ४-५॥

श्रवणान्ते हरेर्मूर्तिः सश्रीकस्य प्रदीयताम्।
सुवर्णस्य कृता सम्यग्लक्ष्म्यङ्का पलमानतः॥ ६॥

कथाश्रवणके अन्तमें एक पल सुवर्णकी बनी हुई लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी मूर्ति, जो श्रीवत्सचिह्नसे अङ्कित हो, वाचकके लिये देनी चाहिये॥ ६॥

समाप्तौ विधिवद् वस्त्रं क्षौमं दद्याच्च वाचके।
विशेषोऽयं समुद्दिष्टो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ७॥

कथा समाप्त होनेपर वाचकको विधिपूर्वक रेशमी वस्त्र भी देना चाहिये। तत्त्वदर्शी मुनियोंने यह विशेष बात बतायी है॥ ७॥

समाप्य सर्वं प्रयतः संहिताशास्त्रकोविदः।
शुभे दिने निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृतः॥ ८॥
शुक्लाम्बरधरस्तत्र शुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः।
अर्चयेत् तु यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक्पृथक्॥ ९॥
संहितापुस्तकं तत्र प्रयतः सुसमाहितः।
भक्ष्यैर्भोज्यैश्चापूपैश्च कौतुकैर्विविधैः शुभैः॥ १०॥

संहिताशास्त्रका विद्वान् वाचक पवित्र हो सम्पूर्ण हरिवंश-को समाप्त करके शुभ दिनमें पुस्तकको सिंहासनपर स्थापित-कर रेशमी वस्त्र ओढ़ श्वेत वस्त्र धारण करके पवित्र एवं विभूषित हो गन्ध, माल्य आदि पृथक्-पृथक् उपचारोंसे संहिता-पुस्तककी यथोचितरूपसे पूजा करे। उस समय चित्त शुद्ध एवं एकाग्र होना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य और पुआ आदि नैवेद्यों तथा नाना प्रकारके शुभ कौतुकोंद्वारा उस पूजनकर्मको सम्पन्न करना चाहिये॥ ८—१०॥

हिरण्यमन्यद् द्रव्यं च दक्षिणां तत्र दापयेत्।
ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकीं कथाम्॥ ११॥
कल्पकोटिशतं साग्रं यान्ति ते ब्रह्मणः पदे।

यजमान वहाँ सुवर्ण तथा अन्य द्रव्योंको दक्षिणारूपसे दे। जो लोग अपने यहाँ आयोजन करके लोगोंको पुण्यमयी पौराणिक कथा-सुनावाते हैं, वे सौ कोटि कल्पोंसे अधिक कालतक ब्रह्मधाममें विराजते हैं॥ १११/२॥

आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः॥ १२॥
कम्बलाजिनवासांसि मञ्चाफलकमेव च।
स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्॥१३॥
स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्।

जो मानव पुराणवेत्ता वाचकको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, शय्या और चौकी आदि प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करके ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास करते हुए अन्ततोगत्वा निरामय पद (वैकुण्ठ-धाम) को प्राप्त होते हैं॥१२-१३१/२॥

पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये सूत्रवसनं नवम्॥ १४॥
भोगिनो ज्ञानसम्पन्नास्ते भवन्ति भवे भवे।

जो पुराणके वेष्टनके लिये नया सूती वस्त्र देते हैं, वे जन्म-जन्ममें भोग और ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं॥ १४१/२॥

ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये॥ १५॥
पुराणश्रवणादेव ते यान्ति परमं पदम्।

जो महापातकों और उपपातकोंसे युक्त हैं, वे भी इस पुराणके श्रवणमात्रसे परमपदको प्राप्त कर लेते हैं॥ १५१/२॥

हरिवंशं लिखित्वा यो वाचकाय प्रदापयेत्॥ १६॥
यत् फलं भूमिदानस्य तत् फलं लभते हि सः।

जो हरिवंशको लिखकर उसका वाचकको दान करता है, उसे भूमिदानका फल प्राप्त होता है॥ १६१/२॥

राजसूयेन तेनेष्टमश्वमेधेन वै नृप॥ १७॥
दत्तानि सर्वदानानि हरिवंशे श्रुतेऽखिले।

नरेश्वर! जिसने सारा हरिवंश सुन लिया, उसने राजसूय और अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर लिया तथा सम्पूर्ण दान दे दिये॥ १७१/२॥

राजसूयाश्वमेघाद्या यज्ञाश्चैव युगे युगे॥ १८॥
श्रवणं हरिवंशस्य कलौ यज्ञफलप्रदम्।

राजसूय और अश्वमेध आदि यज्ञ प्रत्येक युगमें केवल अपना फल देते हैं, परंतु हरिवंशका श्रवण कलियुगमें समस्त यज्ञोंका फल देनेवाला है॥ १८१/२॥

श्रद्धावानास्तिको दान्तो हरिवंशं यदारभेत्॥ १९॥

पञ्चमोऽध्यायः ११२३


पातकानि प्रकम्पन्ते प्रत्युहानि ज्वलन्ति च।

श्रद्धालु, आस्तिक एवं जितेन्द्रिय पुरुष जब हरिवंश आरम्भ करता है, तब सारे पातक काँपने लगते हैं और समस्त विघ्न जल जाते हैं ॥ १९ १/२ ॥

समारभ्य नयेत् पारं हरिवंशं य आदितः ॥ २० ॥
स्पर्शानाद् दर्शनात् तस्य विष्णुदृष्टो भवेन्नृप।

नरेश्वर ! जो हरिवंशकी कथाको आदिसे आरम्भ करके अन्ततक पहुँचा देता है, उसके दर्शन और स्पर्शसे भगवान् विष्णुका ही दर्शन और स्पर्श हुआ ऐसा मानना चाहिये ॥ २० १/२ ॥

जन्मत्रयस्य निकषः पातकस्य क्षयो ध्रुवम् ॥ २१ ॥
फलाप्तिश्च समाप्तौ च हरिवंशस्य बुद्ध्यते।

हरिवंशकी समाप्ति होनेपर श्रोताके तीन जन्मोंके पातकोंका निश्चय ही नाश हो जाता है और अभीष्ट फलकी प्राप्तिका भी बोध होता है, यही इसकी सफलताकी कसौटी है ॥ २१ १/२ ॥

श्रोतुर्भारत विज्ञेयं पूर्वं सुकृतिलक्षणम् ॥ २२ ॥
येन संजायते बुद्धिर्हरिवंशावधारणे।

भरतनन्दन ! यह श्रोताके पूर्व पुण्यका लक्षण समझना चाहिये, जिससे उसके मनमें हरिवंश सुननेका विचार उत्पन्न होता है ॥ २२ १/२ ॥

सर्वाणि च पुराणानि वेदाश्च स्मृतयस्तथा ॥ २३ ॥
हरिवंशेन बद्धार्था व्यासेन च महर्षिणा।

महर्षि व्यासने समस्त पुराणों, वेदों और स्मृतियोंके भावोंको हरिवंशके साथ बाँध रखा है ॥ २३ १/२ ॥

श्रुतिस्मृतिपुराणानां निन्दकेभ्यः कथंचन ॥ २४ ॥
पापिभ्यश्च महाराज श्रावयेन्नैव वाचकः।

महाराज ! वाचकको उचित है कि वह श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणोंके निन्दकोंको तथा पापियोंको किसी तरह कथा न सुनावे ॥ २४ १/२ ॥

श्रुत्वा तुष्टेन मनसा वाचकं परिपूजयेत् ॥ २५ ॥
दान्तं यशस्विनं कान्तं शुचिं स्पष्टाक्षरब्रुवम्।
त्रिशुक्लमाचारपरमक्रोधनमवादिनम् ॥ २६ ॥

कथा सुनकर श्रोता संतुष्ट चित्तसे जितेन्द्रिय, यशस्वी, कान्तिमान्, पवित्र, अक्षरोंका सुस्पष्ट उच्चारण करनेवाले, जन्म, विद्या और संस्कार तीनोंसे शुद्ध, सदाचारपरायण, क्रोधहीन और वाद-विवादसे रहित वाचककी पूजा करे ॥ २५-२६ ॥

ग्रामं दद्यात् सुवसितं कुण्डलोष्णीषमालिकाम्।
पादुकोपानहौ छत्रं सवितानं मसूरिकाम् ॥ २७ ॥
एवं कृत्वा तु विधिवद् वाचकाय प्रदापयेत्।
यानं वार्षं हयगजौ क्षौमं मणिमयासनम् ॥ २८ ॥
पञ्च भाण्डानि ताम्रस्य ताम्रस्यैवाम्बुभाजनम्।

उसे भलीभाँति बसा हुआ ग्राम दे, कुण्डल, पगड़ी और माला अर्पित करे, खड़ाऊँ, जूता, छाता, चँदोवा और मसहरी—इन सबको एकत्र करके विधिपूर्वक वाचकको अर्पित करे। साथ ही बैलगाड़ी, घोड़ा, हाथी, रेशमी वस्त्र और मणिमय आसन, ताँबेके पाँच बर्तन तथा ताँबेका ही जलपात्र दे ॥ २७-२८ १/२ ॥

सकुटुम्बं च सस्त्रीकं वाचकं परया मुदा ॥ २९ ॥
विभूषणैरलंकृत्य परिधाय सुवाससी।
कृष्णद्वैपायनं ध्यायन् नमस्कुर्यात् भावतः ॥ ३० ॥

पत्नी और कुटुम्बसहित वाचकको बड़ी प्रसन्नताके साथ आभूषणोंद्वारा अलंकृत करके उन्हें दो सुन्दर वस्त्र पहनावे और श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका चिन्तन करते हुए उन्हें भक्तिभावसे नमस्कार करे ॥ २९-३० ॥

वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः।
वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं हरिवंशफलेप्सुभिः ॥ ३१ ॥

वाचकके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं, अतः हरिवंशके फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको धन खर्च करनेमें कंजूसी नहीं करनी चाहिये ॥ ३१ ॥

प्रदेया गौः शुभा चैका सवत्सा हेमपूरिता।
पलेन च पलार्धेन तदर्धं वाथ वा पुनः ॥ ३२ ॥

एक, आधे या चौथाई पल सुवर्णके साथ बछड़ेसहित एक सुन्दर गौ भी वाचकको देनी चाहिये ॥ ३२ ॥

वाचकं येन केनापि तोषयेत् सुसमाहितः।
तुष्टे तु वाचके राजंस्तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ३३ ॥
तुष्टेषु सर्वदेवेषु कार्यं तु सफलं भवेत्।

राजन् ! जिस किसी उपायसे सम्भव हो, एकाग्रचित्त हो वाचकको संतुष्ट करे। वाचकके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानका कार्य सफल होता है ॥ ३३ १/२ ॥

हरिवंशे समाप्ते तु वाचके परिपूजिते ॥ ३४ ॥

११२४श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

ऋणत्रयेण मुक्ताः स्युस्ते नरा जनमेजय ।
मोदन्ते पितरस्तेषां लोकान् प्राप्याक्षयान्नृप ॥ ३५ ॥

जनमेजय ! हरिवंश समाप्त होनेपर वाचककी भलीभाँति पूजा कर लेनेके पश्चात् मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाते हैं । नरेश्वर ! उनके पितर अक्षय लोकोंमें पहुँचकर आनन्द भोगते हैं ॥ ३४-३५ ॥

हरिवंशस्य प्रारम्भे समाप्तौ चैव तैः सह ।
सर्वान् कामानवाप्नोति विपाप्मा जायते नरः ॥ ३६ ॥

हरिवंशका आरम्भ करके उसकी पूर्ति हो जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अपने उन पितरोंके साथ सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥

एवं कृते विधाने तु प्रजां प्राप्नोति मानवः ।
धनमारोग्यमायुष्यं सौभाग्यं गुणगौरवम् ॥ ३७ ॥
प्राप्नोति मनुजः सम्यङ्नात्र कार्या विचारणा ॥ ३८ ॥

इस प्रकार विधि-विधानका पालन करनेपर मनुष्य उत्तम संतान तो पाता ही है, धन, आरोग्य, आयु, सौभाग्य, गुण-जनित गौरवको भी भलीभाँति प्राप्त कर लेता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदि विधिको वर्णन-विषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥


षष्ठोऽध्यायः

हरिवंश आरम्भ करनेके लिये उत्तम मास, तिथि, नक्षत्र आदिका निर्देश, देवपूजन, व्यासपूजन तथा कथा-समाप्तिपर दी जानेवाली दक्षिणा एवं दान आदिका उल्लेख तथा श्रवणका माहात्म्य

जनमेजय उवाच
प्रारम्भस्तु कथं कार्यः कथं पूजाविधिः स्मृतः ।
कथं विसर्जयेद्व्यासं कथं सम्यक् फलं लभेत् ॥ १ ॥
एतत् सर्वं समाचक्ष्व विस्तरान्मुनिसत्तम ।

जनमेजयने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! हरिवंशका प्रारम्भ कैसे करना चाहिये ? उसकी पूजाका विधान किस प्रकार बताया गया है ? व्यासका विसर्जन कैसे करे ? और किस प्रकार उत्तम फलकी प्राप्ति सम्भव है ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १॥

वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् यथा वन्ध्या संततिं लभते ध्रुवम् ॥ २ ॥
वैशाखे माघ ऊर्जे च अन्यस्मिञ्छुभमासके ।
शुक्लपक्षे तिथौ पूर्णानन्दाभद्राजयासु च ॥ ३ ॥
वारे गुरौ तथा शुक्रे चन्द्रे चन्द्रात्मजे तथा ।
नक्षत्रे श्रवणे हस्ते पुष्ये मूले पुनर्वसौ ॥ ४ ॥
वासवे तुहिनांशौ च पौष्णे च हयतारके ।
सौभाग्यादिषु योगेषु करणे विष्टिवर्जिते ॥ ५ ॥
श्रोतुश्चाथापि वक्तुश्च चन्द्रे च बलशालिनि ।
पूर्वाह्ने चापि मध्याह्ने प्रारम्भः क्रियते बुधैः ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! जिस प्रकार कथा सुननेसे वन्ध्या स्त्री निश्चय ही संतान प्राप्त कर लेती है, वह विधि बताता हूँ, सुनो—वैशाख, माघ, कार्तिक अथवा दूसरे किसी शुभ मासमें, शुक्ल पक्षमें, पूर्णा (५, १०, १५), नन्दा (१, ६, ११), भद्रा (२, ७, १२), तथा जया (३, ८, १३) तिथियोंमें, बृहस्पति, शुक्र, सोम तथा बुधवारको, श्रवण, हस्त, पुष्य, मूल, पुनर्वसु, धनिष्ठा, मृगशिरा, रेवती और अश्विनी नक्षत्रोंमें, सौभाग्य आदि शुभ योगों तथा विष्टिरहित करणोंमें, वक्ता और श्रोताके चन्द्रमा जब बलिष्ठ हों, उस समय पूर्वाह्न अथवा मध्याह्नकालमें विद्वान् पुरुष हरिवंश-कथाका आरम्भ करते हैं ॥ २--६ ॥

आदौ लम्बोदरः पूज्यः कलशस्तु ततः परम् ।
श्रीखण्डागुरुकर्पूरकुङ्कुमामोदलेपनैः ॥ ७ ॥
पङ्कजैश्चम्पकैरन्यैर्जातीपुष्पैः सुगन्धिभिः ।

षष्ठोऽध्यायः ११२५


तुलसीबिल्वधात्रीणां पत्रैर्नव्यैर्नवाङ्कुरैः ॥ ८ ॥
धूपैर्दीपैश्च विविधैर्नारिकेलफलादिभिः ।
ताम्बूलैर्मुखवासैश्चाखण्डितैः शुक्लतण्डुलैः ॥ ९ ॥
चामरैर्व्यजनैश्चैव घण्टावाद्यादिभिस्तथा ।
प्रत्यहं पूजयेद् देवं यावद् ग्रन्थः समाप्यते ॥ १० ॥

पहले गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये, तत्पश्चात् कलशकी। चन्दन, अगर, कपूर, कुङ्कुम, गन्ध, अनुलेपन, कमल, चम्पा, सुगन्धित चमेलीके फूल, तुलसीदल, बिल्वपत्र, आँवलेके पत्ते, दूर्वा आदिके नूतन अङ्कुर, धूप, दीप, नारियलके फल आदि विविध नैवेद्य, मुखको, सुवासित करनेवाले ताम्बूल, अखण्ड श्वेत तण्डुल, चँवर, व्यजन तथा घंटा-वाद्य आदि उपकरणोंसे श्रोता प्रतिदिन तबतक भगवान्‌का पूजन करता रहे, जबतक कि ग्रन्थ समाप्त न हो जाय ॥ ७-१० ॥

लत्तादिदोषरहिते वारे च शुभसंज्ञके ।
समर्पयेत् पुराणं तु ततः पूजां समाचरेत् ॥ ११ ॥

लत्ता आदि दोषसे रहित शुभ दिनको हरिवंशपुराण वक्ताके हाथमें समर्पित करे। तदनन्तर प्रारम्भिक पूजा आरम्भ करे ॥ ११ ॥

प्रारम्भे च यथा पूजा तथा कार्या विसर्जने ।
चन्दनागुरुकर्पूरकुङ्कुमैर्गन्धकादिभिः ॥ १२ ॥

कथाके आरम्भमें जैसी पूजा की जाय, उसके विसर्जनमें भी वैसी ही पूजा करनी चाहिये। चन्दन, अगर, कपूर, रोली और गन्ध आदिसे पूजन सम्पन्न करे ॥ १२ ॥

गीतवादित्रनृत्यैश्च राजन् कार्यो महोत्सवः ।
ततः पुराणपूजायां यथा दानं तथा शृणु ॥ १३ ॥

राजन् ! फिर गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा महान् उत्सव करना चाहिये। तदनन्तर पुराणपूजामें जैसा दान बताया गया है, वैसा सुनो ॥ १३ ॥


अष्टादशशतं दानं पुराणाय समर्पयेत् ।
अभावे द्वादशशतं पूजा वै जनमेजय ॥ १४ ॥
तदभावेऽपि राजेन्द्र षट्शतं परिकीर्तितम् ।
उत्तमं मध्यमं दानमधमं च प्रकीर्तितम् ॥ १५ ॥

जनमेजय ! पुराणके लिये अठारह सौ रुपयेकी दक्षिणा समर्पित करे। उसके अभावमें बारह सौ रुपयेकी पूजा चढ़ावे। राजेन्द्र ! उतना भी न बन सके तो कम-से-कम छः सौ रुपयेकी दक्षिणा बतायी गयी है। यह क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीका दान कहा गया है॥ १४-१५ ॥

सपत्नीकं ततो व्यासं दुकूलैरंशुकैर्नवैः ।
पूजयेत् सर्वभावेन स सम्यक् फलमश्नुते ॥ १६ ॥

तत्पश्चात् नूतन वस्त्रोंद्वारा पत्नीसहित व्यासका सम्पूर्ण भावसे पूजन करे। ऐसा करनेसे यजमानको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥

परिधेयानि देयानि कुण्डलानि शुभानि च ।
मुकुटाद्यैरलं कृत्य केयूराङ्गदभूषणैः ॥ १७ ॥

वाचकको केयूर और अंगद आदि आभूषणों तथा मुकुट आदिसे अलंकृत करके उन्हें पहिनने योग्य सुन्दर कुण्डल भी देने चाहिये ॥ १७ ॥

गावस्तु कपिला देयाः सवत्सा गर्भसंयुताः ।
यानमश्वादिकं राजन् दासीदासान् समर्पयेत् ॥ १८ ॥
आसनं पुरुषव्याघ्र धूपदीपादि भाजनम् ।
शय्या तूलादिकं सर्वं सोपधानं सलड्डुकम् ॥ १९ ॥
स्थाली पीठादिकं राजन्जलपात्रं तथैव च ।
अन्नं च बहु दातव्यं लवणं जनमेजय ॥ २० ॥
घृततैलादिकं राजन् यावद् वर्षं समाप्यते ।
एतत् सर्वं द्विजेन्द्राय व्यासासनगताय च ॥ २१ ॥

बछड़ेसहित तथा गर्भवती कपिला गौओंका भी दान करना चाहिये। राजन् ! पुरुषसिंह जनमेजय ! यजमान वाचकको अश्व आदि वाहन और दास-दासी भी समर्पित करे। आसन, धूप, दीप आदि वस्तुएँ, पात्र, शय्या, गद्दारजाई आदि, तकिया, लड्डू, वटलोई, पीढ़ा आदि, जलपात्र, बहुत-सा अन्न, नमक तथा घी, तेल आदि सामग्री भी, जो एक वर्षतक अँट सके, वाचककी सेवामें दे। ये सारी वस्तुएँ व्यासासनपर विराजमान हुए द्विजराज वक्ताको भेंट करनी चाहिये ॥ १८-२१ ॥


१. सूर्य, पूर्णचन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु यह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्रसे आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा नवें दैनिक नक्षत्रको लातोंसे दूषित करते हैं, इसलिये इसका नाम लत्ता दोष है। इनमें सूर्य अपनेसे आगे और पूर्णचन्द्र पीछे, फिर मङ्गल आगे और बुध पीछे, गुरु आगे और शुक्र पीछे तथा शनि आगे और राहु पीछेके नक्षत्रोंको दूषित करते हैं।

११२६श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

मनोऽभीष्टं वरं लब्ध्वा ततः कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।
पारणाम्ते तु राजेन्द्र द्विजेंद्रं रुद्रजापिनम् ॥ २२ ॥
वस्त्रादिभिरलंकृत्य मुद्रिकाभिस्तथैव च ।
नवीनं कम्बलं शुभ्रं ताम्रपात्रं तथैव च ॥ २३ ॥

फिर वाचकसे मनोवाञ्छित वर पाकर यजमान उनकी परिक्रमा करे। राजेन्द्र ! पारणा पूरी होनेपर रुद्रमन्त्रका जप करनेवाले द्विजराजको वस्त्र आदि तथा मुद्रिकाओंसे अलंकृत करके उसे नवीन कम्बल और सुन्दर ताम्रपात्र दे ॥ २२-२३ ॥

द्विजं द्विजं समुद्दिश्य दातव्या दक्षिणा बहु ।
ततोऽभिषेकसंयुक्तं गुरुं चैव पुरोधसम् ॥ २४ ॥
वस्त्रादिभिरलंकृत्य दक्षिणाभिश्च तोषयेत् ।

प्रत्येक द्विजके उद्देश्यसे बहुत-सी दक्षिणा देनी चाहिये। तत्पश्चात् अभिषेकयुक्त गुरु और पुरोहितको वस्त्र आदिसे विभूषित करके दक्षिणाओंसे संतुष्ट करे ॥ २४॥

ततोऽन्यान् ब्राह्मणान् सर्वान् दक्षिणाभिः समर्चयेत्। २५।
हवनं च तथा राजन् कर्तव्यं कर्मशान्तये ।
प्रतिश्लोकं च जुहुयाद् दशांशेनैव वा पुनः ॥ २६ ॥
पायसं मधु सर्पिंश्च तिलान्नादिकसंयुतम् ।

तदनन्तर अन्य सब ब्राह्मणोंको भी दक्षिणा देकर उनका सत्कार करे। राजन् ! कर्मकी शान्तिके लिये होम भी करना चाहिये। ग्रन्थके प्रत्येक श्लोकसे खीर, मधु, घी, तिल और अन्न आदिसे युक्त हवनसामग्रीकी आहुति दे अथवा ग्रन्थमें जितने श्लोक हों, उनके दशांशसे ही हवन करे ॥ २५-२६॥

अथवा हवनं कुर्याद् गायत्र्या सुसमाहितः ॥ २७॥
तन्मयत्वात् पुराणस्य परमस्यास्य तत्त्वतः ।

अथवा एकाग्रचित्त होकर गायत्रीमन्त्रसे हवन करे; क्योंकि वास्तवमें यह उत्कृष्ट पुराण गायत्रीमन्त्र ही है ॥ २७॥

होमाशक्तौ बुधो हेम दद्यात् तत्फलसिद्धये ॥ २८ ॥
नानाच्छिद्रनिरोधार्थं न्यूनताधिकताख्ययोः ।
दोषयोः प्रशमार्थं च पठेन्नामसहस्रकम् ॥ २९ ॥

यदि होम करानेकी शक्ति न हो तो विद्वान् पुरुष उसका फल प्राप्त करनेके लिये ब्राह्मणोंको कुछ सुवर्ण दान कर दे तथा कर्ममें जो नाना प्रकारकी त्रुटियाँ रह गयी हों, या विधिमें जो न्यूनता अथवा अधिकता हो गयी हो, उन दोषोंकी शान्तिके लिये विष्णुसहस्रनामका पाठ करे ॥ २८-२९॥

तेन स्यात् सफलं सर्वं नास्त्यस्मादधिकं यतः ।
भोजयेन्मिथुनान्येव चतुर्विंशतिमादरात् ॥ ३० ॥

उससे सभी कर्म सफल हो जाते हैं; क्योंकि इससे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। हवनके पश्चात् चौबीस सपत्नीक ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक भोजन करावे ॥ ३० ॥

ततो गन्धैश्च माल्यैश्च स्वलंकृत्य द्विजोत्तमान् ।
तोषयेद् दक्षिणाहेमध्यान्यै रत्नादिभिस्तथा ॥ ३१ ॥

तत्पश्चात् उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके सुवर्णमयी दक्षिणा धान्य और रत्न आदि देकर संतुष्ट करे ॥ ३१ ॥

भुक्तवत्सु च विप्रेषु यथावत् समया च तान् ।
वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम् ॥ ३२ ॥
सपत्नीकं च संतोष्य वस्त्रालङ्करणादिभिः ।
ब्राह्मणेषु प्रसन्नेषु प्रसन्नास्तस्य देवताः ॥ ३३ ॥

भरतश्रेष्ठ ! उन ब्राह्मणोंके यथावत् भोजन कर लेनेपर उन्हींके निकट सपत्नीक वाचकको भी भलीभाँति अलंकृत करके भोजन करावे और वस्त्र तथा आभूषणोंसे संतुष्ट करके नमस्कार करे। ब्राह्मणोंके प्रसन्न होनेपर यजमानके ऊपर देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ३२-३३ ॥

वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरनुत्तमा ।
दद्यात् सुवर्णे धेनुं च व्रतपूर्णत्वसिद्धये ॥ ३४ ॥

वाचकके संतुष्ट होनेपर श्रोताको शुभ एवं सर्वोत्तम प्रीति प्राप्त होती है। व्रतकी पूर्तिके लिये यजमान दूध देनेवाली गौ तथा सुवर्णका दान करे ॥ ३४ ॥

शक्तौ पलत्रयमितं स्वर्णसिंहं विधाय च ।
तत्रास्य पुस्तकं स्थाप्य लिखितं ललिताक्षरम् ॥ ३५ ॥
सम्पूज्यावाहनाद्यैश्च उपचारैः सदक्षिणैः ।
वस्त्रभूषणगन्धाद्यैः पूजिताय महात्मने ॥ ३६ ॥
आचार्याय सुधीर्दत्त्वा मुक्तः स्याद् भवबन्धनैः ।

यदि शक्ति हो तो तीन पल सोनेका एक सिंहासन

षष्ठोऽध्यायः ११२७


बनवाकर उसके ऊपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई हरिवंश-की पोथी रखे और आवाहन आदि दक्षिणासहित उपचारोंसे उसका पूजन करके वस्त्र, आभूषण और गन्ध आदिसे पूजित हुए महात्मा आचार्यको वह पुस्तक दान कर दे। इस प्रकार दान करके उत्तम बुद्धिवाला विद्वान् श्रोता संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाय ॥ ३५-३६ १/२ ॥

एवं कृते विधाने च सर्वपापनिवारणे ॥ ३७ ॥
फलदं स्यात् पुराणं तु सर्वकामार्थसिद्धिदम् ।

नवाह-यज्ञका यह विधान सम्पूर्ण पापोंका निवारण करनेवाला है। इसका इस प्रकार यथावत् रूपसे पालन करनेपर यह हरिवंशपुराण मनोवाञ्छित फल प्रदान करता है तथा समस्त कामनाओं और पुरुषार्थोंका साधक होता है ॥

अनेन विधिना राजन् यः पुराणं समापयेत् ॥ ३८ ॥
तस्य स्त्री लभते गर्भं मासेनेकेन भारत ।

राजन् ! भरतनन्दन ! जो इस विधिसे इस पुराणको समाप्त करता है, उसकी पत्नी एक ही महीनेमें गर्भ धारण कर लेती है ॥ ३८ १/२ ॥

अनेन विधिना राजन् व्यासं यस्तु समर्चयेत् ॥ ३९ ॥
पूजयेद् दानमानाभ्यां तस्य स्त्री गर्भिणी भवेत् ।

राजन् ! जो इस विधिसे व्यासकी पूजा करता है तथा दान-मानके द्वारा उसका सत्कार करता है, उसकी स्त्री अवश्य गर्भवती होती है ॥ ३९ १/२ ॥

यन्मया विविधं प्रोक्तं भक्तिपूजादिकं पुनः ॥ ४० ॥
तत् कृत्वा लभते नारी पुत्रं भास्करतेजसम् ।
तथा वन्ध्या लभेद‍्गर्भं व्यासस्य वचनं यथा ॥ ४१ ॥

मैंने जो नाना प्रकारके भजन-पूजन आदि बताये हैं, उन्हें करके नारी सूर्यतुल्य तेजस्वी पुत्र प्राप्त करती है तथा वन्ध्या नारी भी अवश्य गर्भ धारण कर लेती है। जैसा कि व्यासजीका वचन है ॥ ४०-४१ ॥

विप्ररत्नापहारी च सोऽनपत्यः प्रजायते ।
तेन कायविशुद्ध्यर्थं महारुद्रजपादिकम् ॥ ४२ ॥

जो ब्राह्मणके रत्नका अपहरण करता है, वह संतानहीन हो जाता है। उससे शरीरकी शुद्धिके लिये महारुद्र-मन्त्रके जप आदिका विधान है ॥ ४२ ॥


अथ पारिक्षितो राजा श्रद्धायुक्तेन चेतसा ।
भावतः सत्ययुक्तेन चैकाग्रमनसा तथा ॥ ४३ ॥
श्रुत्वान्ते निश्चयं कृत्वा दम्भशाठ्यविवर्जितः ।
श्रुत्वेमं हरिवंशं वै व्यासं सम्पूज्य भक्तितः ॥ ४४ ॥
दानं च बहुलं कृत्वा व्यासाशीर्गृह्य भारतः ।
प्रसन्नवदनो भूत्वा रमते रमणीययुतः ॥ ४५ ॥

(सूतजी कहते हैं—शौनक !) तदनन्तर भरतवंशी राजा जनमेजयने भक्ति-भाव एवं सत्यसे युक्त श्रद्धापूर्ण एकाग्र चित्तसे हरिवंशकी कथा सुनकर अन्तमें दृढ़ निश्चय करके दम्भ और शठता (कंजूसी) छोड़कर भक्तिपूर्वक व्यास (वक्ता) का पूजन किया। फिर वे बहुत-सा दान करके व्यासका आशीर्वाद ले प्रसन्नमुख होकर अपनी पत्नीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४३-४५ ॥

प्राग्जन्मजनिते पापे क्षीणे वै जनमेजय ।
ऋतावाद्ये तु संधत्ते गर्भं तस्य कुलाङ्गना ॥ ४६ ॥

(वैशम्पायनजी कहते हैं—) जनमेजय ! हरिवंशके श्रवणसे पूर्व जन्मके पापका नाश हो जानेपर यजमानकी कुलवती पत्नी प्रथम ऋतुकालमें ही गर्भ धारण कर लेती है ॥ ४६ ॥

द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थे मासि वै पुनः ।
पञ्चमे वापि षष्ठे वा सप्तमे अष्टमेऽपि वा ॥ ४७ ॥
नवमे दशमे मासि दोहदं निश्चयं भवेत् ।
व्यासेनोक्तमिदं पुण्यं वन्ध्यागर्भस्य लक्षणम् ॥ ४८ ॥

अथवा दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें, नवें या दसवें मासमे उसे निश्चय ही गर्भ रह जाता है। वन्ध्याके गर्भ-धारणका यह पवित्र लक्षण साक्षात् व्यासजीने कहा है ॥ ४७-४८ ॥

पितॄनुद्धरते सर्वान् दश पूर्वान् दशापरान् ।
हरिवंशं नरः श्रुत्वा सेतिहासं पुरातनम् ॥ ४९ ॥

इतिहाससहित इस पुरातन हरिवंशको सुनकर मनुष्य अपनी दस पीढ़ी पहलेके समस्त पितरों और दस पीढ़ी बादकी संतानोंका उद्धार कर देता है ॥ ४९ ॥

इदं मया तवाग्रे च सर्वं प्रोक्तं नरर्षभ ।
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५० ॥

११२८श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

नरश्रेष्ठ ! यह सब माहात्म्य मैंने तुम्हारे सामने कह सुनाया, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५०॥

अपुत्रः पुत्रमाप्नोति ह्यधनो धनमाप्नुयात्।
नरमेधाश्वमेधाभ्यां यत् फलं प्राप्यते नरैः ॥ ५१ ॥
तत् फलं लभ्यते सर्वं पुराणश्रवणाद्धरेः।

इससे पुत्रहीनको पुत्र और धनहीनको धनकी प्राप्ति होती है। नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह सारा फल श्रीहरिके हरिवंशपुराणका श्रवण करनेसे ही मिल जाता है॥ ५१$\frac{१}{२}$ ॥

ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः।
सकृत् पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा ॥ ५२ ॥

ब्रह्महत्यारा, गर्भघाती, गोहत्यारा, शराबी और गुरुपत्नीगामी पुरुष भी एक बार इस पुराणका श्रवण कर लेनेसे पवित्र हो जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ५२॥

इदं मया ते परिकीर्तितं मह-
च्छ्रीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् ।
शृण्वन् पठन्नाशु समाप्नुयात् फलं
यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभं महत् ॥ ५३ ॥

जनमेजय ! यह मैंने तुमसे श्रीकृष्णके अपार, अद्भुत एवं महान् माहात्म्यका वर्णन किया है। इसका श्रवण और पाठ करनेवाला पुरुष तीनों लोकोंमें जो अत्यन्त दुर्लभ है, उस महान् फलको भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ ५३ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणविधौ दानविधानकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवणविधिके प्रसङ्गमें दानविधिका वर्णनविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


॥ सविधि हरिवंशमाहात्म्य सम्पूर्ण ॥

११२९

संतानगोपालमन्त्रविधिः


( १ ) संतानगोपालमन्त्रविधिः

श्रीगणेशाय नमः। अब संतानगोपालमन्त्रके अनुष्ठानकी विधि दी जा रही है।

निम्नाङ्कित वाक्य पढ़कर विनियोग करे—

अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अङ्गन्यास

'देवकीसुत गोविन्द' हृदयाय नमः (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथकी मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे)। 'वासुदेव जगत्पते' शिरसे स्वाहा (इस वाक्यको बोलकर सिरका स्पर्श करे)। 'देहि मे तनयं कृष्ण' शिखायै वषट् (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथके अँगूठेसे शिखाका स्पर्श करे)। 'त्वामहं शरणं गतः' (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करे)। 'ॐ नमः' अस्त्राय फट् (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।

इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूपसे ध्यान करे—

वैकुण्ठादागतं कृष्णं रथस्थं करुणानिधिम् ।
किरीटिसारथिं पुत्रमानयन्तं परात्परम् ॥ १ ॥
आदाय तं जलस्थं च गुरवे वैदिकाय च।
अर्पयन्तं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्युतम् ॥ २ ॥

'पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करुणाके सागर हैं। वे जलमें डूबे हुए गुरु-पुत्रको लेकर आ रहे हैं। वे वैकुण्ठसे अभी-अभी पधारे हैं और रथपर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरु सान्दीपिनिको उनका पुत्र अर्पित कर रहे हैं—साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये इस रूपमें महाभाग भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे' ॥ १-२ ॥

मूल मन्त्र

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥'

यह सम्पूर्ण मन्त्र है। इसका तीन लाख जप करना चाहिये।

इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार है—सच्चिदानन्दस्वरूप, ऐश्वर्यशाली, शक्तिशाली, कामनापूरक, सौम्यस्वरूप, देवकीनन्दन ! गोविन्द ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे पुत्र प्रदान कीजिये।


( २ ) संतानगोपालमन्त्र

विनियोग

अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अङ्गन्यास

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं शिरसे स्वाहा। ह्रीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ॐ अस्त्राय फट्।

ध्यान

शङ्खचक्रगदापद्मं दधानं सूतिकागृहे।
अङ्के शयानं देवक्याः कृष्णं वन्दे विमुक्तये ॥

जो सूतिकागृहमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकीकी गोदमें सो रहे हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं (संतान एवं) मोक्षकी प्राप्तिके लिये वन्दना करता हूँ।

(मूल मन्त्र इस प्रकार है—)

'ॐ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः' (सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है)।

इसका भी तीन लाख जप करना चाहिये।


म० पृ० ३७—

११३० | संतानगोपालविधौ


( ३ ) सनत्कुमारोक्त संतानगोपालमन्त्र

विनियोग

ॐ अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अङ्गन्यास

इस मन्त्रका अङ्गन्यास ठीक वैसा ही है, जैसा कि द्वितीय-मन्त्रका है। अथवा—

'देवकीसुत गोविन्द' हृदयाय नमः। 'वासुदेव जगत्पते' शिरसे स्वाहा। 'देहि मे तनयं कृष्ण' शिखायै वषट्। 'त्वामहं शरणं गतः' कवचाय हुम्। 'देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥' अस्त्राय फट्।

ध्यान

शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम्।
अङ्के शयानं देवक्याः सूतिकामन्दिरे शुभे॥
एवं रूपं सदा कृष्णं सुतार्थे भावयेत् सुधीः॥

'उत्तम बुद्धिवाला साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये सदा ऐसे रूपवाले जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे, जो मङ्गलमय सूतिकागारमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये देवकीके अङ्कमें शयन करते हैं'।

सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥

इसका भी तीन लाख जप करे।

इस मन्त्रके पूजन आदिका विधान जैसा सनत्कुमारजीने बताया है, इस प्रकार है—वैष्णव¹ पीठपर देवताओंका आवाहन करके उनकी पूजा करे। प्रथम आवृत्ति (आवरण) में छः कोणोंमेंसे आग्नेय-कोणमें 'हृदयाय नमः' नैऋत्य कोणमें 'शिरसे स्वाहा', 'वायव्यकोणमें 'शिखायै वषट्', ईशानकोणमें 'कवचाय हुम्' अग्रभागमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा पूर्व आदि चारों दिशाओंमें 'अस्त्राय फट्' इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे।

दूसरे आवरणमें पीठकी पूर्व आदि आठ दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशानकी पूजा करे।

तथा तीसरे आवरणमें उन्हीं दिशाओंमें क्रमशः वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, अङ्कुश, गदा और शूलकी पूजा करे।

शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको आधी रातके समय भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। पूजाके लिये स्वस्तिककी रचना करके उसपर घीसे भरा हुआ सकोरा या कोसा स्थापित करे। फिर उसमें रूईकी बत्ती डालकर उत्तम दीप प्रज्वलित करे। तत्पश्चात् अष्टदल कमल बनाकर उसमें स्थापित हुए श्रीकृष्णकी पूजा करे। फिर दो कलशोंको जलसे भरकर उनकी विधिवत् स्थापना करके सम्पूर्ण उपचारोंसे युक्त पूजा करे। तत्पश्चात् उन कलशोंमें भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन करके पुनः उनका पूर्वोक्त रीतिसे पूजन करे। तदनन्तर उन दोनों कलशोंका स्पर्श करके अनन्यभावसे एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार उपर्युक्त मन्त्रका जप करे। इसके बाद द्वादशीको गोविन्दकी विधिवूर्वक पूजा करके अगहनीके चावलकी स्वादिष्ट खीर तथा गायके घी और गुड़से युक्त पकवानका भोग अर्पण करे। इन सबके साथ सामयिक फल भी होना चाहिये। इसके अतिरिक्त दाल, भात, स्वादिष्ट सुस्निग्ध व्यञ्जन, कपिला गायके दूधका दही और खाँड भी रहना चाहिये। इन समस्त भोज्य पदार्थोंको सोनेके पात्रमें रखकर इनके पात्रभूत भगवान् विष्णुको इन्हें निवेदन करे। साथ ही शीतल कर्पूर और गुलाबसे सुवासित तथा कपड़ेसे छाना हुआ स्वच्छ जल अर्पण करे।

इसके बाद अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार शुद्धबुद्धिसे भगवान् श्रीकृष्णमें श्रद्धा रखते हुए अपनी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्तिके लिये ब्राह्मणोंको भोजन दे। संस्कारयुक्त अग्निमें भगवान् विष्णुका आवाहन करके अर्घ्य आदिसे उनका पूजन करे। फिर १०८ बार या २८ बार हविष्य (खीर) की आहुति देकर शेष हविष्यको कहीं सुरक्षित रख दे। इसके बाद घीकी ८०० आहुतियाँ दे। हुतशेष घृतको उक्त दोनों कलशोंमें गिराकर उनके घृतमिश्रित जलद्वारा दम्पती (यजमान और उसकी पत्नी दोनों) का अभिषेक करे। तदनन्तर जलमय श्रीहरिका ध्यान करते हुए ब्राह्मण पुनः उन कलशोंके जलसे उन दोनोंका अभिषेक करके एक सौ आठ बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करनेके पश्चात् शेष रखे हुए हविष्यको यजमान-पत्नीके हाथमें दे दे।

यजमान-पत्नी उस हविष्यको लेकर श्रीकृष्णका ध्यान करती हुई एक सुखद आसनपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और उसका भक्षण करे; उस समय यह भावना करे कि इस हविष्यके साथ भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं मेरे उदरमें आकर विराजमान हुए हैं। फिर जब श्रेष्ठ ब्राह्मणलोग अच्छी तरह भोजन कर लें, तब यजमान पान और मोदक आदिसे उन्हें


१. वैष्णव पीठ एवं देवपूजनकी विधि कल्याणके नारद-विष्णु-पुराणाङ्कमें पृष्ठ ३५७ से ३६४ तक विस्तारपूर्वक दी गयी है, उसे पढ़कर उसीके अनुसार पूजन करना चाहिये।

संतानगोपालमन्त्रविधिः ११३१


तृत करे। तत्पश्चात् वह श्रीविष्णुके चिन्तनपूर्वक उन ब्राह्मणो-के चरणोंमें मस्तक झुकावे। उस समय ब्राह्मणलोग यजमान दम्पतीसे यह कहें कि 'आप दोनोंके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो।' फिर वे निष्पाप दम्पती यह भावना करते हुए कि 'अब हमारा मनोरथ सफल हो गया' अत्यन्त प्रसन्न हो स्वयं भी भोजन करें।

जो ब्राह्मण इस प्रकार धन खर्च करनेमें कंजूसी न करके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके प्रति भक्तिभावसे युक्त हो इस प्रकार पूजन आदि करता है, वह शीघ्र ही तेजस्वी एवं चिरायु पुत्र प्राप्त कर लेता है। उसका वह पुत्र भी वंश-परम्पराको चलानेवाला, विष्णुभक्त एवं परम बुद्धिमान् होता है।

जो श्रेष्ठ द्विज दरिद्र होनेके कारण ऐसा न कर सके, वह यदि पूर्वोक्त मन्त्रका जप एवं तर्पण करे तो उसे भी पुत्र प्राप्त हो सकता है।

मन्त्रसारोक्त संतानकर यन्त्र

पहले अष्टदल कमल बनाकर उसकी कर्णिकामें 'क्लीं' इस कामबीजका उल्लेख करे। फिर वहीं यजमान पति पत्नीके नाम और उसकी कामना भी लिख दे। यथा—'अमुकस्य धर्मपत्न्याः अमुकदेव्याः पुत्रं कुरु-कुरु।' फिर आठ दलोंके निम्न भागोंमें दो-दो करके अकारादि सोलह स्वरोंको अङ्कित करे तथा उन्हींके ऊपरी भागोंमें संतानगोपाल-मन्त्रके चार-चार अक्षरोंको लिखे। फिर उन दलोंके बाह्य भागमें एक गोल रेखा खींचकर उसे ककारादि वर्णोंसे अवेष्टित करे। तत्पश्चात् उस वृत्तके बाहर चतुष्कोण बनावे। किसी पात्रमें माखन रखकर उसपर यह यन्त्र अङ्कित करे अथवा सूक्ष्म स्वर्ण आदिके पत्रपर इस यन्त्रको लिखे। यन्त्रसे अङ्कित नवनीतको नारी खा जाय और स्वर्णादि पत्रोंपर लिखे हुए यन्त्रको वह धारण करे। इससे वह पुत्रको जन्म देती है।

(शारदातिलकमें बताये अनुसार यह संतान-गोपालके मन्त्रकी अनुष्ठानविधि यहाँ दी गयी है।)


[यन्त्र-विवरण]

दिशाएँ: पू (पूर्व - ऊपर), प (पश्चिम - नीचे), उ (उत्तर - बाएँ), द (दक्षिण - दाएँ)

  • मध्य (कर्णिका):
    अमुकनाम
    देव्याः पुत्रं
    क्लीं कुरु कुरु

  • अष्टदल (भीतर के स्वर):
    अ आ | इ ई | उ ऊ | ऋ ॠ | ऌ ॡ | ए ऐ | ओ औ | अं अः

  • अष्टदल (बाह्य मन्त्र-भाग):
    देवकीसु- | त गोविन्द | वासुदेव | जगत्पते । | देहि मे तन- | यं कृष्ण | त्वामहं श- | रणं गतः ॥

  • वृत्त-परिधि (मातृका-वर्ण):
    क ख ग घ ङ | च छ ज झ ञ | ट ठ ड ढ ण | त थ द ध न | प फ ब भ म | य र ल व | श ष स ह | क्ष त्र ज्ञ

११३२ | संतानगोपालविधौ


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

संतानगोपालस्तोत्रम्

श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम्।
सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम्॥ १॥
मैं पुत्रकी प्राप्तिके लिये लक्ष्मीपति, कमलनयन, देवकीनन्दन तथा सर्वपापहारी, मधुसूदन, श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ॥ १॥

नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम्।
यशोदाङ्कगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम्॥ २॥
मैं पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे उन वासुदेव श्रीहरिको प्रणाम करता हूँ, जो यशोदाके अङ्कमें बालगोपालरूपसे विराजमान हैं और नन्दको आनन्द दे रहे हैं॥ २॥

अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम्।
नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा॥ ३॥
अपनेको पुत्रकी प्राप्तिके लिये मैं मुनिवन्दित वसुदेव-देवकीनन्दन गोविन्दकी सदा वन्दना करता हूँ॥ ३॥

गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम्।
पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुङ्गवम्॥ ४॥
मैं पुत्र पानेकी कामनासे उन यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जो साक्षात् कमलापति अच्युत (विष्णु) होकर भी गोपबालकरूपसे गौओंकी रक्षामें लगे हुए हैं॥ ४॥

पुत्रकामेष्टिफलदं कञ्जाक्षं कमलापतिम्।
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम॥ ५॥
मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो, इसके लिये मैं पुत्रेष्टियज्ञका फल देनेवाले कमलनयन लक्ष्मीपति देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी वन्दना करता हूँ॥ ५॥

पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन।
देहि मे तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते॥ ६॥
पद्मापते! कमलनयन! पद्मनाभ! जनार्दन! श्रीश! वासुदेव! जगत्पते! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये॥ ६॥

यशोदाङ्कगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम्।
अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम्॥ ७॥
यशोदाके अङ्कमें बालरूपसे विराजमान तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले मुनिवन्दित लक्ष्मीपति गोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ। ऐसा करनेसे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो॥ ७॥

श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत।
गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन॥ ८॥
श्रीपते! देवदेवेश्वर! दीन-दुःखियोंकी पीड़ा दूर करनेवाले अच्युत! गोविन्द! मुझे पुत्र दीजिये। जनार्दन! मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ८॥

भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो॥ ९॥
भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले गोविन्द! भक्तकी रक्षा कीजिये। शुभदायक! रुक्मिणीवल्लभ! प्रभो! श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये॥ ९॥

रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा।
भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गतः॥ १०॥
रुक्मिणीनाथ! सर्वेश्वर! मुझे सदाके लिये पुत्र दीजिये। भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षरूप कमलनयन श्रीकृष्ण! मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १०॥

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥ ११॥
देवकीपुत्र! गोविन्द! वासुदेव! जगन्नाथ! श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र दीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ ११॥

वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥ १२॥
विश्ववन्द्य वासुदेव! लक्ष्मीपते! पुरुषोत्तम! श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र दीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १२॥

कञ्जाक्ष कमलानाथ परकारुणिकोत्तम।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥ १३॥
कमलनयन! कमलाकान्त! दूसरोंपर दया करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १३॥

लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित।

संतानगोपालस्तोत्रम्

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ १४ ॥

लक्ष्मीपते ! पद्मनाभ ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १४ ॥

कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।
नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ॥ १५ ॥

आप कार्य-कारणरूप, सुखदायक एवं विद्वान् हैं। मैं पुत्रकी प्राप्तिके लिये आप वासुदेवको सदा नमस्कार करता हूँ ॥ १५ ॥

राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।
तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥ १६ ॥

राजीवनेत्र ( कमलनयन ) ! रावणारे ( रावणके शत्रु ) ! हरे ! कवे ( विद्वन् ) ! देवेश्वर ! विष्णो ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आप मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ १६॥

अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥ १७ ॥

जगदीश्वर ! मै अपने लिये पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे आपकी आराधना करता हूँ । रमावल्लभ ! वासुदेव ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ १७ ॥

श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥ १८ ॥

मानिनी श्रीराधाके मानका अपहरण करनेवाले तथा अपनी आराधना करनेवाली गोपाङ्गनाओंके वस्त्रको यमुना-तटसे हटा ( कर उन्हे सुख प्रदान कर )नेवाले जगन्नाथ वासुदेव श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ १८ ॥

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।
रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥ १९ ॥

यदुनन्दन ! रमापते ! वासुदेव ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! हमें पुत्रकी प्राप्ति कराइये ॥ १९ ॥

वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।
पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥ २० ॥

वासुदेव ! मुझे बेटा दीजिये । माधव ! मुझे तनय ( संतान ) दीजिये । श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । महाप्रभो ! मुझे वत्स ( बच्चा ) दीजिये ॥ २० ॥

डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥ २१ ॥

श्रीकृष्ण ! मुझे डिम्भक ( पुत्र ) दीजिये । रघुनन्दन ! मुझे आत्मज ( औरस पुत्र ) दीजिये । भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरूप नन्दनन्दन ! मुझे तनय दीजिये ॥ २१ ॥

नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।
कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥ २२ ॥

श्रीकृष्ण ! वासुदेव ! जगत्पते ! कमलानाथ ! गोविन्द ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! मुझे आनन्ददायक पुत्र प्रदान कीजिये ॥ २२ ॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥ २३ ॥

प्रभो ! यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं है । आप ही मेरे शरणदाता हैं । मुझे पुत्र दीजिये । सम्पत्ति दीजिये । सम्पत्ति और पुत्र दोनों प्रदान कीजिये ॥ २३ ॥

यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।
वन्देऽहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥ २४ ॥

यशोदाजीके स्तनोंके दुग्धपानके रसको जाननेवाले और उनका स्तनपान करनेवाले, भूरे नेत्रोंसे सुशोभित यदुनन्दन श्रीकृष्णकी मैं सदा वन्दना करता हूँ । इससे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो ॥ २४ ॥

नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।
रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥ २५ ॥

देवेश्वर ! नन्दनन्दन ! प्रभो ! मुझे आनन्ददायक पुत्र दीजिये । रमापते ! वासुदेव ! जगन्नाथ ! मुझे धन और पुत्र दीजिये ॥ २५ ॥

पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।
अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥ २६ ॥

माधव ! पुत्र और धन ( दीजिये ), धन और पुत्र ( दीजिये ), मुझे पुत्र प्रदान कीजिये । श्रीपते ! हमारे दीनता-पूर्ण वचनपर ध्यान दीजिये ॥ २६ ॥

गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।
अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥ २७ ॥

११३४संतानगोपालविधौ

गोपकुमार गोविन्द ! रमावल्लभ वासुदेव ! जगन्नाथ ! मुझे पुत्र दीजिये, सम्पत्ति दीजिये ॥ २७ ॥

मद्वाञ्छितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।
मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ॥ २८ ॥
देवकीनन्दन ! अच्युत ! मुझे मनोवाञ्छित फल (पुत्र) दीजिये। यदुनन्दन ! मेरी पुत्रविषयक प्रार्थनाको सफल एवं धन्य कीजिये ॥ २८ ॥

याचेऽहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।
भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ॥ २९ ॥
भक्तोंके लिये चिन्तामणिस্বরূপ राम ! भक्तवाञ्छाकल्प-तरो ! महाप्रभो ! मैं आपसे धन और पुत्रकी याचना करता हूँ। मुझे पुत्र और धन-सम्पत्ति दीजिये ॥ २९ ॥

आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।
अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ॥ ३० ॥
रघुनन्दन ! आप सदा मुझे आनन्ददायक आत्मज, पुत्र, कुमार, डिम्भक (बालक), सुत, अर्भक (बच्चा) एवं तनय (बेटा) दीजिये ॥ ३० ॥

वन्दे संतानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।
अस्माकं पुत्रसंप्राप्त्यै सदा गोविन्दमच्युतम् ॥ ३१ ॥
मैं अपने लिये पुत्रकी प्राप्तिके उद्देश्यसे संतानप्रद गोपाल, माधव, भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेवाले अच्युत गोविन्दकी वन्दना करता हूँ ॥ ३१ ॥

ॐकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।
क्लींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ॥ ३२ ॥
ॐकारयुक्त गोपाल, श्रीयुक्त यदुनन्दन तथा क्लींयुक्त देवकीपुत्र यदुनाथको मैं प्रणाम करता हूँ (अर्थात् 'ॐ श्रीं क्लीं' इन तीनों बीजोंसे युक्त 'देवकीसुत गोविन्द...' इत्यादि मन्त्रका मैं आश्रय लेता हूँ) ॥ ३२ ॥

वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।
देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ॥ ३३ ॥
वासुदेव ! मुकुन्द ! ईश्वर ! गोविन्द ! माधव ! अच्युत ! श्रीकृष्ण ! रमानाथ ! महाप्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ३३ ॥

राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।
समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ॥ ३४ ॥
राजीवनयन (कमल-सदृश नेत्रवाले) ! गोविन्द ! कपिलाक्ष ! हरे ! प्रभो ! सम्पूर्ण कमनीय मनोरथोंकी सिद्धिके लिये वर देनेवाले श्रीकृष्ण ! मुझे सदाके लिये पुत्र दीजिये ॥

अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।
देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ॥ ३५ ॥
नीलकमलसमूहके समान श्यामसुन्दर रूपवाले जगन्नाथ ! रमानायक ! माधव ! मुझे जलज कमलके सदृश मनोहर एवं श्रेष्ठ सत्पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३५ ॥

नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥ ३६ ॥
अजगर और वरुणके दूतोंसे नन्दजीकी रक्षा करनेवाले ! पृथ्वीपालक ! यदुनन्दन ! गोविन्द ! प्रभो ! रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३६ ॥

दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।
गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ॥ ३७ ॥
अपने सेवकोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्ष-स्वरूप ! गोविन्द ! मुकुन्द ! माधव ! अच्युत ! गोपाल ! पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) ! मुझे संतान और सम्पत्ति दीजिये ॥ ३७ ॥

यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।
देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ॥ ३८ ॥
यदुनायक ! लक्ष्मीपते ! यशोदानन्दन ! श्रीधर ! प्राणवल्लभ ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३८ ॥

अस्माकं वाञ्छितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।
भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ॥ ३९ ॥
रमापते ! भगवन् ! सर्वेश्वर ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! हमें मनोवाञ्छित वस्तु दीजिये । पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३९ ॥

रमाहृदयसम्भार सत्यभामामनःप्रिय ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥ ४० ॥
रमा (लक्ष्मी) को अपने वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले ! सत्यभामाके हृदयवल्लभ ! तथा रुक्मिणीके प्राणनाथ ! प्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४० ॥

संतानगोपालस्तोत्रम्११३५


चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।
अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥ ४१ ॥
चन्द्रमा और सूर्यरूप नेत्र धारण करनेवाले गोविन्द ! कमलनयन माधव ! देव ! जगदीश्वर ! हमें भाग्यशाली श्रेष्ठ पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४१ ॥

कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥ ४२ ॥
करुणामय ! कमलनयन ! पद्मनाभ श्रीविष्णुसे सम्मानित देवकीनन्दनन्दन श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४२ ॥

देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।
समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥ ४३ ॥
देवकीपुत्र ! श्रीनाथ ! वासुदेव ! जगत्पते ! समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाले श्रीकृष्ण ! मुझे सदा पुत्र दीजिये ॥ ४३ ॥

भक्तमन्दार गम्भीर शङ्कराच्युत माधव ।
देहि मे तनयं गोपवालवत्सल श्रीपते ॥ ४४ ॥
भक्तवाञ्छाकल्पतरो ! गम्भीर स्वभाववाले कल्याणकारी अच्युत ! माधव ! ग्वाल-बालोंपर स्नेह करनेवाले श्रीपते ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४४ ॥

श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥ ४५ ॥
श्रीकान्त ! वसुदेवनन्दन ! ईश्वर ! देवकीके प्रिय पुत्र ! भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष रूप ! जगत्प्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४५ ॥

जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।
वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥ ४६ ॥
जगन्नाथ ! रमानाथ ! पृथ्वीनाथ ! दयानिधे ! वासुदेव ! ईश्वर ! सर्वेश्वर ! प्रभो ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४६ ॥

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४७ ॥
श्रीनाथ ! कमलदललोचन ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥

दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४८ ॥
अपने दासोंके लिये कल्पवृक्ष ! गोविन्द ! भक्तोंकी इच्छा-पूर्तिके लिये चिन्तामणि-स्वरूप प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ; मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४८ ॥

गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४९ ॥
गोविन्द ! पुण्डरीकाक्ष ! रमानाथ ! महाप्रभो ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।
मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥ ५० ॥
श्रीनाथ ! कमलदललोचन ! गोविन्द ! मधुसूदन ! जनार्दन ! मैं अपने लिये पुत्ररूप फलकी सिद्धिके निमित्त आपकी आराधना करता हूँ ॥ ५० ॥

स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं
विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलाङ्गम् ।
स्पृशन्तमन्यस्तनमङ्गुलीभि-
र्वन्दे यशोदाङ्कगतं मुकुन्दम् ॥ ५१ ॥
जो मैया यशोदाके मुखारविन्दकी ओर देखते हुए मन्द मुसकराहटके साथ उनके एक स्तनका दूध पी रहे हैं और दूसरे स्तनका अङ्गुलियोंसे स्पर्श कर रहे हैं तथा जिनका प्रत्येक अङ्ग उज्ज्वल आभासे प्रकाशित होता है, मैया यशोदा-के अङ्कमें बैठे हुए उन बाल-मुकुन्दकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ५१ ॥

याचेऽहं पुत्रसंतानं भवन्तं पद्मलोचन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ५२ ॥
कमललोचन ! मैं आपसे पुत्र-संततिकी याचना करता हूँ । श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ५२ ॥

अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।
शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥ ५३ ॥
जगत्पते ! हमें पुत्रकी प्राप्ति हो, इस उद्देश्यसे हम आपका चिन्तन करते हैं। आप मुझे शीघ्र पुत्र प्रदान कीजिये। मुनिवन्दित श्रीकृष्ण ! आपको मुझे अवश्य मेरी प्रार्थित वस्तु संतान देनी चाहिये ॥ ५३ ॥

वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।
कुरु मां पुत्रवन्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥ ५४ ॥