विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ११२५
तुलसीबिल्वधात्रीणां पत्रैर्नव्यैर्नवाङ्कुरैः ॥ ८ ॥
धूपैर्दीपैश्च विविधैर्नारिकेलफलादिभिः ।
ताम्बूलैर्मुखवासैश्चाखण्डितैः शुक्लतण्डुलैः ॥ ९ ॥
चामरैर्व्यजनैश्चैव घण्टावाद्यादिभिस्तथा ।
प्रत्यहं पूजयेद् देवं यावद् ग्रन्थः समाप्यते ॥ १० ॥
पहले गणेशजीकी पूजा करनी चाहिये, तत्पश्चात् कलशकी। चन्दन, अगर, कपूर, कुङ्कुम, गन्ध, अनुलेपन, कमल, चम्पा, सुगन्धित चमेलीके फूल, तुलसीदल, बिल्वपत्र, आँवलेके पत्ते, दूर्वा आदिके नूतन अङ्कुर, धूप, दीप, नारियलके फल आदि विविध नैवेद्य, मुखको, सुवासित करनेवाले ताम्बूल, अखण्ड श्वेत तण्डुल, चँवर, व्यजन तथा घंटा-वाद्य आदि उपकरणोंसे श्रोता प्रतिदिन तबतक भगवान्का पूजन करता रहे, जबतक कि ग्रन्थ समाप्त न हो जाय ॥ ७-१० ॥
लत्तादिदोषरहिते वारे च शुभसंज्ञके ।
समर्पयेत् पुराणं तु ततः पूजां समाचरेत् ॥ ११ ॥
लत्ता आदि दोषसे रहित शुभ दिनको हरिवंशपुराण वक्ताके हाथमें समर्पित करे। तदनन्तर प्रारम्भिक पूजा आरम्भ करे ॥ ११ ॥
प्रारम्भे च यथा पूजा तथा कार्या विसर्जने ।
चन्दनागुरुकर्पूरकुङ्कुमैर्गन्धकादिभिः ॥ १२ ॥
कथाके आरम्भमें जैसी पूजा की जाय, उसके विसर्जनमें भी वैसी ही पूजा करनी चाहिये। चन्दन, अगर, कपूर, रोली और गन्ध आदिसे पूजन सम्पन्न करे ॥ १२ ॥
गीतवादित्रनृत्यैश्च राजन् कार्यो महोत्सवः ।
ततः पुराणपूजायां यथा दानं तथा शृणु ॥ १३ ॥
राजन् ! फिर गीत, वाद्य और नृत्यके द्वारा महान् उत्सव करना चाहिये। तदनन्तर पुराणपूजामें जैसा दान बताया गया है, वैसा सुनो ॥ १३ ॥
अष्टादशशतं दानं पुराणाय समर्पयेत् ।
अभावे द्वादशशतं पूजा वै जनमेजय ॥ १४ ॥
तदभावेऽपि राजेन्द्र षट्शतं परिकीर्तितम् ।
उत्तमं मध्यमं दानमधमं च प्रकीर्तितम् ॥ १५ ॥
जनमेजय ! पुराणके लिये अठारह सौ रुपयेकी दक्षिणा समर्पित करे। उसके अभावमें बारह सौ रुपयेकी पूजा चढ़ावे। राजेन्द्र ! उतना भी न बन सके तो कम-से-कम छः सौ रुपयेकी दक्षिणा बतायी गयी है। यह क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीका दान कहा गया है॥ १४-१५ ॥
सपत्नीकं ततो व्यासं दुकूलैरंशुकैर्नवैः ।
पूजयेत् सर्वभावेन स सम्यक् फलमश्नुते ॥ १६ ॥
तत्पश्चात् नूतन वस्त्रोंद्वारा पत्नीसहित व्यासका सम्पूर्ण भावसे पूजन करे। ऐसा करनेसे यजमानको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥
परिधेयानि देयानि कुण्डलानि शुभानि च ।
मुकुटाद्यैरलं कृत्य केयूराङ्गदभूषणैः ॥ १७ ॥
वाचकको केयूर और अंगद आदि आभूषणों तथा मुकुट आदिसे अलंकृत करके उन्हें पहिनने योग्य सुन्दर कुण्डल भी देने चाहिये ॥ १७ ॥
गावस्तु कपिला देयाः सवत्सा गर्भसंयुताः ।
यानमश्वादिकं राजन् दासीदासान् समर्पयेत् ॥ १८ ॥
आसनं पुरुषव्याघ्र धूपदीपादि भाजनम् ।
शय्या तूलादिकं सर्वं सोपधानं सलड्डुकम् ॥ १९ ॥
स्थाली पीठादिकं राजन्जलपात्रं तथैव च ।
अन्नं च बहु दातव्यं लवणं जनमेजय ॥ २० ॥
घृततैलादिकं राजन् यावद् वर्षं समाप्यते ।
एतत् सर्वं द्विजेन्द्राय व्यासासनगताय च ॥ २१ ॥
बछड़ेसहित तथा गर्भवती कपिला गौओंका भी दान करना चाहिये। राजन् ! पुरुषसिंह जनमेजय ! यजमान वाचकको अश्व आदि वाहन और दास-दासी भी समर्पित करे। आसन, धूप, दीप आदि वस्तुएँ, पात्र, शय्या, गद्दारजाई आदि, तकिया, लड्डू, वटलोई, पीढ़ा आदि, जलपात्र, बहुत-सा अन्न, नमक तथा घी, तेल आदि सामग्री भी, जो एक वर्षतक अँट सके, वाचककी सेवामें दे। ये सारी वस्तुएँ व्यासासनपर विराजमान हुए द्विजराज वक्ताको भेंट करनी चाहिये ॥ १८-२१ ॥
१. सूर्य, पूर्णचन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु यह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्रसे आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा नवें दैनिक नक्षत्रको लातोंसे दूषित करते हैं, इसलिये इसका नाम लत्ता दोष है। इनमें सूर्य अपनेसे आगे और पूर्णचन्द्र पीछे, फिर मङ्गल आगे और बुध पीछे, गुरु आगे और शुक्र पीछे तथा शनि आगे और राहु पीछेके नक्षत्रोंको दूषित करते हैं।