विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११२४ | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये |
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ऋणत्रयेण मुक्ताः स्युस्ते नरा जनमेजय ।
मोदन्ते पितरस्तेषां लोकान् प्राप्याक्षयान्नृप ॥ ३५ ॥
जनमेजय ! हरिवंश समाप्त होनेपर वाचककी भलीभाँति पूजा कर लेनेके पश्चात् मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाते हैं । नरेश्वर ! उनके पितर अक्षय लोकोंमें पहुँचकर आनन्द भोगते हैं ॥ ३४-३५ ॥
हरिवंशस्य प्रारम्भे समाप्तौ चैव तैः सह ।
सर्वान् कामानवाप्नोति विपाप्मा जायते नरः ॥ ३६ ॥
हरिवंशका आरम्भ करके उसकी पूर्ति हो जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और अपने उन पितरोंके साथ सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३६ ॥
एवं कृते विधाने तु प्रजां प्राप्नोति मानवः ।
धनमारोग्यमायुष्यं सौभाग्यं गुणगौरवम् ॥ ३७ ॥
प्राप्नोति मनुजः सम्यङ्नात्र कार्या विचारणा ॥ ३८ ॥
इस प्रकार विधि-विधानका पालन करनेपर मनुष्य उत्तम संतान तो पाता ही है, धन, आरोग्य, आयु, सौभाग्य, गुण-जनित गौरवको भी भलीभाँति प्राप्त कर लेता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥
इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदि विधिको वर्णन-विषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
हरिवंश आरम्भ करनेके लिये उत्तम मास, तिथि, नक्षत्र आदिका निर्देश, देवपूजन, व्यासपूजन तथा कथा-समाप्तिपर दी जानेवाली दक्षिणा एवं दान आदिका उल्लेख तथा श्रवणका माहात्म्य
जनमेजय उवाच
प्रारम्भस्तु कथं कार्यः कथं पूजाविधिः स्मृतः ।
कथं विसर्जयेद्व्यासं कथं सम्यक् फलं लभेत् ॥ १ ॥
एतत् सर्वं समाचक्ष्व विस्तरान्मुनिसत्तम ।
जनमेजयने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! हरिवंशका प्रारम्भ कैसे करना चाहिये ? उसकी पूजाका विधान किस प्रकार बताया गया है ? व्यासका विसर्जन कैसे करे ? और किस प्रकार उत्तम फलकी प्राप्ति सम्भव है ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् यथा वन्ध्या संततिं लभते ध्रुवम् ॥ २ ॥
वैशाखे माघ ऊर्जे च अन्यस्मिञ्छुभमासके ।
शुक्लपक्षे तिथौ पूर्णानन्दाभद्राजयासु च ॥ ३ ॥
वारे गुरौ तथा शुक्रे चन्द्रे चन्द्रात्मजे तथा ।
नक्षत्रे श्रवणे हस्ते पुष्ये मूले पुनर्वसौ ॥ ४ ॥
वासवे तुहिनांशौ च पौष्णे च हयतारके ।
सौभाग्यादिषु योगेषु करणे विष्टिवर्जिते ॥ ५ ॥
श्रोतुश्चाथापि वक्तुश्च चन्द्रे च बलशालिनि ।
पूर्वाह्ने चापि मध्याह्ने प्रारम्भः क्रियते बुधैः ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन् ! जिस प्रकार कथा सुननेसे वन्ध्या स्त्री निश्चय ही संतान प्राप्त कर लेती है, वह विधि बताता हूँ, सुनो—वैशाख, माघ, कार्तिक अथवा दूसरे किसी शुभ मासमें, शुक्ल पक्षमें, पूर्णा (५, १०, १५), नन्दा (१, ६, ११), भद्रा (२, ७, १२), तथा जया (३, ८, १३) तिथियोंमें, बृहस्पति, शुक्र, सोम तथा बुधवारको, श्रवण, हस्त, पुष्य, मूल, पुनर्वसु, धनिष्ठा, मृगशिरा, रेवती और अश्विनी नक्षत्रोंमें, सौभाग्य आदि शुभ योगों तथा विष्टिरहित करणोंमें, वक्ता और श्रोताके चन्द्रमा जब बलिष्ठ हों, उस समय पूर्वाह्न अथवा मध्याह्नकालमें विद्वान् पुरुष हरिवंश-कथाका आरम्भ करते हैं ॥ २--६ ॥
आदौ लम्बोदरः पूज्यः कलशस्तु ततः परम् ।
श्रीखण्डागुरुकर्पूरकुङ्कुमामोदलेपनैः ॥ ७ ॥
पङ्कजैश्चम्पकैरन्यैर्जातीपुष्पैः सुगन्धिभिः ।