विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1150, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः ११२३
पातकानि प्रकम्पन्ते प्रत्युहानि ज्वलन्ति च।
श्रद्धालु, आस्तिक एवं जितेन्द्रिय पुरुष जब हरिवंश आरम्भ करता है, तब सारे पातक काँपने लगते हैं और समस्त विघ्न जल जाते हैं ॥ १९ १/२ ॥
समारभ्य नयेत् पारं हरिवंशं य आदितः ॥ २० ॥
स्पर्शानाद् दर्शनात् तस्य विष्णुदृष्टो भवेन्नृप।
नरेश्वर ! जो हरिवंशकी कथाको आदिसे आरम्भ करके अन्ततक पहुँचा देता है, उसके दर्शन और स्पर्शसे भगवान् विष्णुका ही दर्शन और स्पर्श हुआ ऐसा मानना चाहिये ॥ २० १/२ ॥
जन्मत्रयस्य निकषः पातकस्य क्षयो ध्रुवम् ॥ २१ ॥
फलाप्तिश्च समाप्तौ च हरिवंशस्य बुद्ध्यते।
हरिवंशकी समाप्ति होनेपर श्रोताके तीन जन्मोंके पातकोंका निश्चय ही नाश हो जाता है और अभीष्ट फलकी प्राप्तिका भी बोध होता है, यही इसकी सफलताकी कसौटी है ॥ २१ १/२ ॥
श्रोतुर्भारत विज्ञेयं पूर्वं सुकृतिलक्षणम् ॥ २२ ॥
येन संजायते बुद्धिर्हरिवंशावधारणे।
भरतनन्दन ! यह श्रोताके पूर्व पुण्यका लक्षण समझना चाहिये, जिससे उसके मनमें हरिवंश सुननेका विचार उत्पन्न होता है ॥ २२ १/२ ॥
सर्वाणि च पुराणानि वेदाश्च स्मृतयस्तथा ॥ २३ ॥
हरिवंशेन बद्धार्था व्यासेन च महर्षिणा।
महर्षि व्यासने समस्त पुराणों, वेदों और स्मृतियोंके भावोंको हरिवंशके साथ बाँध रखा है ॥ २३ १/२ ॥
श्रुतिस्मृतिपुराणानां निन्दकेभ्यः कथंचन ॥ २४ ॥
पापिभ्यश्च महाराज श्रावयेन्नैव वाचकः।
महाराज ! वाचकको उचित है कि वह श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणोंके निन्दकोंको तथा पापियोंको किसी तरह कथा न सुनावे ॥ २४ १/२ ॥
श्रुत्वा तुष्टेन मनसा वाचकं परिपूजयेत् ॥ २५ ॥
दान्तं यशस्विनं कान्तं शुचिं स्पष्टाक्षरब्रुवम्।
त्रिशुक्लमाचारपरमक्रोधनमवादिनम् ॥ २६ ॥
कथा सुनकर श्रोता संतुष्ट चित्तसे जितेन्द्रिय, यशस्वी, कान्तिमान्, पवित्र, अक्षरोंका सुस्पष्ट उच्चारण करनेवाले, जन्म, विद्या और संस्कार तीनोंसे शुद्ध, सदाचारपरायण, क्रोधहीन और वाद-विवादसे रहित वाचककी पूजा करे ॥ २५-२६ ॥
ग्रामं दद्यात् सुवसितं कुण्डलोष्णीषमालिकाम्।
पादुकोपानहौ छत्रं सवितानं मसूरिकाम् ॥ २७ ॥
एवं कृत्वा तु विधिवद् वाचकाय प्रदापयेत्।
यानं वार्षं हयगजौ क्षौमं मणिमयासनम् ॥ २८ ॥
पञ्च भाण्डानि ताम्रस्य ताम्रस्यैवाम्बुभाजनम्।
उसे भलीभाँति बसा हुआ ग्राम दे, कुण्डल, पगड़ी और माला अर्पित करे, खड़ाऊँ, जूता, छाता, चँदोवा और मसहरी—इन सबको एकत्र करके विधिपूर्वक वाचकको अर्पित करे। साथ ही बैलगाड़ी, घोड़ा, हाथी, रेशमी वस्त्र और मणिमय आसन, ताँबेके पाँच बर्तन तथा ताँबेका ही जलपात्र दे ॥ २७-२८ १/२ ॥
सकुटुम्बं च सस्त्रीकं वाचकं परया मुदा ॥ २९ ॥
विभूषणैरलंकृत्य परिधाय सुवाससी।
कृष्णद्वैपायनं ध्यायन् नमस्कुर्यात् भावतः ॥ ३० ॥
पत्नी और कुटुम्बसहित वाचकको बड़ी प्रसन्नताके साथ आभूषणोंद्वारा अलंकृत करके उन्हें दो सुन्दर वस्त्र पहनावे और श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका चिन्तन करते हुए उन्हें भक्तिभावसे नमस्कार करे ॥ २९-३० ॥
वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः।
वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं हरिवंशफलेप्सुभिः ॥ ३१ ॥
वाचकके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं, अतः हरिवंशके फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको धन खर्च करनेमें कंजूसी नहीं करनी चाहिये ॥ ३१ ॥
प्रदेया गौः शुभा चैका सवत्सा हेमपूरिता।
पलेन च पलार्धेन तदर्धं वाथ वा पुनः ॥ ३२ ॥
एक, आधे या चौथाई पल सुवर्णके साथ बछड़ेसहित एक सुन्दर गौ भी वाचकको देनी चाहिये ॥ ३२ ॥
वाचकं येन केनापि तोषयेत् सुसमाहितः।
तुष्टे तु वाचके राजंस्तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ ३३ ॥
तुष्टेषु सर्वदेवेषु कार्यं तु सफलं भवेत्।
राजन् ! जिस किसी उपायसे सम्भव हो, एकाग्रचित्त हो वाचकको संतुष्ट करे। वाचकके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण देवताओंके संतुष्ट होनेपर यजमानका कार्य सफल होता है ॥ ३३ १/२ ॥
हरिवंशे समाप्ते तु वाचके परिपूजिते ॥ ३४ ॥