भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1149
११२२श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

मृदङ्गतालललितं कीर्तनं कीर्त्यतां ततः॥ ४॥
जयशब्दो नमःशब्दः शङ्खशब्दश्च गीयताम्।
विप्रेभ्यो याचकेभ्यश्च वित्तमन्नं च दीयताम्॥ ५॥

तत्पश्चात् मृदंग बजाकर तालस्वरके साथ कीर्तन किया जाय, जय-जयकार और नमस्कार शब्दके साथ शङ्खोंकी ध्वनि हो तथा ब्राह्मण और याचकोंको अन्न और धन दिया जाय॥ ४-५॥

श्रवणान्ते हरेर्मूर्तिः सश्रीकस्य प्रदीयताम्।
सुवर्णस्य कृता सम्यग्लक्ष्म्यङ्का पलमानतः॥ ६॥

कथाश्रवणके अन्तमें एक पल सुवर्णकी बनी हुई लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी मूर्ति, जो श्रीवत्सचिह्नसे अङ्कित हो, वाचकके लिये देनी चाहिये॥ ६॥

समाप्तौ विधिवद् वस्त्रं क्षौमं दद्याच्च वाचके।
विशेषोऽयं समुद्दिष्टो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः॥ ७॥

कथा समाप्त होनेपर वाचकको विधिपूर्वक रेशमी वस्त्र भी देना चाहिये। तत्त्वदर्शी मुनियोंने यह विशेष बात बतायी है॥ ७॥

समाप्य सर्वं प्रयतः संहिताशास्त्रकोविदः।
शुभे दिने निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृतः॥ ८॥
शुक्लाम्बरधरस्तत्र शुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः।
अर्चयेत् तु यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक्पृथक्॥ ९॥
संहितापुस्तकं तत्र प्रयतः सुसमाहितः।
भक्ष्यैर्भोज्यैश्चापूपैश्च कौतुकैर्विविधैः शुभैः॥ १०॥

संहिताशास्त्रका विद्वान् वाचक पवित्र हो सम्पूर्ण हरिवंश-को समाप्त करके शुभ दिनमें पुस्तकको सिंहासनपर स्थापित-कर रेशमी वस्त्र ओढ़ श्वेत वस्त्र धारण करके पवित्र एवं विभूषित हो गन्ध, माल्य आदि पृथक्-पृथक् उपचारोंसे संहिता-पुस्तककी यथोचितरूपसे पूजा करे। उस समय चित्त शुद्ध एवं एकाग्र होना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य और पुआ आदि नैवेद्यों तथा नाना प्रकारके शुभ कौतुकोंद्वारा उस पूजनकर्मको सम्पन्न करना चाहिये॥ ८—१०॥

हिरण्यमन्यद् द्रव्यं च दक्षिणां तत्र दापयेत्।
ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकीं कथाम्॥ ११॥
कल्पकोटिशतं साग्रं यान्ति ते ब्रह्मणः पदे।

यजमान वहाँ सुवर्ण तथा अन्य द्रव्योंको दक्षिणारूपसे दे। जो लोग अपने यहाँ आयोजन करके लोगोंको पुण्यमयी पौराणिक कथा-सुनावाते हैं, वे सौ कोटि कल्पोंसे अधिक कालतक ब्रह्मधाममें विराजते हैं॥ १११/२॥

आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः॥ १२॥
कम्बलाजिनवासांसि मञ्चाफलकमेव च।
स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्॥१३॥
स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्।

जो मानव पुराणवेत्ता वाचकको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, शय्या और चौकी आदि प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर मनोवाञ्छित भोगोंका उपभोग करके ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास करते हुए अन्ततोगत्वा निरामय पद (वैकुण्ठ-धाम) को प्राप्त होते हैं॥१२-१३१/२॥

पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये सूत्रवसनं नवम्॥ १४॥
भोगिनो ज्ञानसम्पन्नास्ते भवन्ति भवे भवे।

जो पुराणके वेष्टनके लिये नया सूती वस्त्र देते हैं, वे जन्म-जन्ममें भोग और ज्ञानसे सम्पन्न होते हैं॥ १४१/२॥

ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये॥ १५॥
पुराणश्रवणादेव ते यान्ति परमं पदम्।

जो महापातकों और उपपातकोंसे युक्त हैं, वे भी इस पुराणके श्रवणमात्रसे परमपदको प्राप्त कर लेते हैं॥ १५१/२॥

हरिवंशं लिखित्वा यो वाचकाय प्रदापयेत्॥ १६॥
यत् फलं भूमिदानस्य तत् फलं लभते हि सः।

जो हरिवंशको लिखकर उसका वाचकको दान करता है, उसे भूमिदानका फल प्राप्त होता है॥ १६१/२॥

राजसूयेन तेनेष्टमश्वमेधेन वै नृप॥ १७॥
दत्तानि सर्वदानानि हरिवंशे श्रुतेऽखिले।

नरेश्वर! जिसने सारा हरिवंश सुन लिया, उसने राजसूय और अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर लिया तथा सम्पूर्ण दान दे दिये॥ १७१/२॥

राजसूयाश्वमेघाद्या यज्ञाश्चैव युगे युगे॥ १८॥
श्रवणं हरिवंशस्य कलौ यज्ञफलप्रदम्।

राजसूय और अश्वमेध आदि यज्ञ प्रत्येक युगमें केवल अपना फल देते हैं, परंतु हरिवंशका श्रवण कलियुगमें समस्त यज्ञोंका फल देनेवाला है॥ १८१/२॥

श्रद्धावानास्तिको दान्तो हरिवंशं यदारभेत्॥ १९॥

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