विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संतानगोपालमन्त्रविधिः
( १ ) संतानगोपालमन्त्रविधिः
श्रीगणेशाय नमः। अब संतानगोपालमन्त्रके अनुष्ठानकी विधि दी जा रही है।
निम्नाङ्कित वाक्य पढ़कर विनियोग करे—
अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।
अङ्गन्यास
'देवकीसुत गोविन्द' हृदयाय नमः (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथकी मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे)। 'वासुदेव जगत्पते' शिरसे स्वाहा (इस वाक्यको बोलकर सिरका स्पर्श करे)। 'देहि मे तनयं कृष्ण' शिखायै वषट् (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथके अँगूठेसे शिखाका स्पर्श करे)। 'त्वामहं शरणं गतः' (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करे)। 'ॐ नमः' अस्त्राय फट् (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।
इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूपसे ध्यान करे—
वैकुण्ठादागतं कृष्णं रथस्थं करुणानिधिम् ।
किरीटिसारथिं पुत्रमानयन्तं परात्परम् ॥ १ ॥
आदाय तं जलस्थं च गुरवे वैदिकाय च।
अर्पयन्तं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्युतम् ॥ २ ॥
'पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करुणाके सागर हैं। वे जलमें डूबे हुए गुरु-पुत्रको लेकर आ रहे हैं। वे वैकुण्ठसे अभी-अभी पधारे हैं और रथपर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरु सान्दीपिनिको उनका पुत्र अर्पित कर रहे हैं—साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये इस रूपमें महाभाग भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे' ॥ १-२ ॥
मूल मन्त्र
'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥'
यह सम्पूर्ण मन्त्र है। इसका तीन लाख जप करना चाहिये।
इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार है—सच्चिदानन्दस्वरूप, ऐश्वर्यशाली, शक्तिशाली, कामनापूरक, सौम्यस्वरूप, देवकीनन्दन ! गोविन्द ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे पुत्र प्रदान कीजिये।
( २ ) संतानगोपालमन्त्र
विनियोग
अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।
अङ्गन्यास
ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं शिरसे स्वाहा। ह्रीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ॐ अस्त्राय फट्।
ध्यान
शङ्खचक्रगदापद्मं दधानं सूतिकागृहे।
अङ्के शयानं देवक्याः कृष्णं वन्दे विमुक्तये ॥
जो सूतिकागृहमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकीकी गोदमें सो रहे हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं (संतान एवं) मोक्षकी प्राप्तिके लिये वन्दना करता हूँ।
(मूल मन्त्र इस प्रकार है—)
'ॐ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः' (सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है)।
इसका भी तीन लाख जप करना चाहिये।
म० पृ० ३७—