विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ११२८ | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये |
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नरश्रेष्ठ ! यह सब माहात्म्य मैंने तुम्हारे सामने कह सुनाया, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५०॥
अपुत्रः पुत्रमाप्नोति ह्यधनो धनमाप्नुयात्।
नरमेधाश्वमेधाभ्यां यत् फलं प्राप्यते नरैः ॥ ५१ ॥
तत् फलं लभ्यते सर्वं पुराणश्रवणाद्धरेः।
इससे पुत्रहीनको पुत्र और धनहीनको धनकी प्राप्ति होती है। नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह सारा फल श्रीहरिके हरिवंशपुराणका श्रवण करनेसे ही मिल जाता है॥ ५१$\frac{१}{२}$ ॥
ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः।
सकृत् पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा ॥ ५२ ॥
ब्रह्महत्यारा, गर्भघाती, गोहत्यारा, शराबी और गुरुपत्नीगामी पुरुष भी एक बार इस पुराणका श्रवण कर लेनेसे पवित्र हो जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ५२॥
इदं मया ते परिकीर्तितं मह-
च्छ्रीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् ।
शृण्वन् पठन्नाशु समाप्नुयात् फलं
यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभं महत् ॥ ५३ ॥
जनमेजय ! यह मैंने तुमसे श्रीकृष्णके अपार, अद्भुत एवं महान् माहात्म्यका वर्णन किया है। इसका श्रवण और पाठ करनेवाला पुरुष तीनों लोकोंमें जो अत्यन्त दुर्लभ है, उस महान् फलको भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ ५३ ॥
इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणविधौ दानविधानकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवणविधिके प्रसङ्गमें दानविधिका वर्णनविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥