विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ११२७
बनवाकर उसके ऊपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई हरिवंश-की पोथी रखे और आवाहन आदि दक्षिणासहित उपचारोंसे उसका पूजन करके वस्त्र, आभूषण और गन्ध आदिसे पूजित हुए महात्मा आचार्यको वह पुस्तक दान कर दे। इस प्रकार दान करके उत्तम बुद्धिवाला विद्वान् श्रोता संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाय ॥ ३५-३६ १/२ ॥
एवं कृते विधाने च सर्वपापनिवारणे ॥ ३७ ॥
फलदं स्यात् पुराणं तु सर्वकामार्थसिद्धिदम् ।
नवाह-यज्ञका यह विधान सम्पूर्ण पापोंका निवारण करनेवाला है। इसका इस प्रकार यथावत् रूपसे पालन करनेपर यह हरिवंशपुराण मनोवाञ्छित फल प्रदान करता है तथा समस्त कामनाओं और पुरुषार्थोंका साधक होता है ॥
अनेन विधिना राजन् यः पुराणं समापयेत् ॥ ३८ ॥
तस्य स्त्री लभते गर्भं मासेनेकेन भारत ।
राजन् ! भरतनन्दन ! जो इस विधिसे इस पुराणको समाप्त करता है, उसकी पत्नी एक ही महीनेमें गर्भ धारण कर लेती है ॥ ३८ १/२ ॥
अनेन विधिना राजन् व्यासं यस्तु समर्चयेत् ॥ ३९ ॥
पूजयेद् दानमानाभ्यां तस्य स्त्री गर्भिणी भवेत् ।
राजन् ! जो इस विधिसे व्यासकी पूजा करता है तथा दान-मानके द्वारा उसका सत्कार करता है, उसकी स्त्री अवश्य गर्भवती होती है ॥ ३९ १/२ ॥
यन्मया विविधं प्रोक्तं भक्तिपूजादिकं पुनः ॥ ४० ॥
तत् कृत्वा लभते नारी पुत्रं भास्करतेजसम् ।
तथा वन्ध्या लभेद्गर्भं व्यासस्य वचनं यथा ॥ ४१ ॥
मैंने जो नाना प्रकारके भजन-पूजन आदि बताये हैं, उन्हें करके नारी सूर्यतुल्य तेजस्वी पुत्र प्राप्त करती है तथा वन्ध्या नारी भी अवश्य गर्भ धारण कर लेती है। जैसा कि व्यासजीका वचन है ॥ ४०-४१ ॥
विप्ररत्नापहारी च सोऽनपत्यः प्रजायते ।
तेन कायविशुद्ध्यर्थं महारुद्रजपादिकम् ॥ ४२ ॥
जो ब्राह्मणके रत्नका अपहरण करता है, वह संतानहीन हो जाता है। उससे शरीरकी शुद्धिके लिये महारुद्र-मन्त्रके जप आदिका विधान है ॥ ४२ ॥
अथ पारिक्षितो राजा श्रद्धायुक्तेन चेतसा ।
भावतः सत्ययुक्तेन चैकाग्रमनसा तथा ॥ ४३ ॥
श्रुत्वान्ते निश्चयं कृत्वा दम्भशाठ्यविवर्जितः ।
श्रुत्वेमं हरिवंशं वै व्यासं सम्पूज्य भक्तितः ॥ ४४ ॥
दानं च बहुलं कृत्वा व्यासाशीर्गृह्य भारतः ।
प्रसन्नवदनो भूत्वा रमते रमणीययुतः ॥ ४५ ॥
(सूतजी कहते हैं—शौनक !) तदनन्तर भरतवंशी राजा जनमेजयने भक्ति-भाव एवं सत्यसे युक्त श्रद्धापूर्ण एकाग्र चित्तसे हरिवंशकी कथा सुनकर अन्तमें दृढ़ निश्चय करके दम्भ और शठता (कंजूसी) छोड़कर भक्तिपूर्वक व्यास (वक्ता) का पूजन किया। फिर वे बहुत-सा दान करके व्यासका आशीर्वाद ले प्रसन्नमुख होकर अपनी पत्नीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४३-४५ ॥
प्राग्जन्मजनिते पापे क्षीणे वै जनमेजय ।
ऋतावाद्ये तु संधत्ते गर्भं तस्य कुलाङ्गना ॥ ४६ ॥
(वैशम्पायनजी कहते हैं—) जनमेजय ! हरिवंशके श्रवणसे पूर्व जन्मके पापका नाश हो जानेपर यजमानकी कुलवती पत्नी प्रथम ऋतुकालमें ही गर्भ धारण कर लेती है ॥ ४६ ॥
द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्थे मासि वै पुनः ।
पञ्चमे वापि षष्ठे वा सप्तमे अष्टमेऽपि वा ॥ ४७ ॥
नवमे दशमे मासि दोहदं निश्चयं भवेत् ।
व्यासेनोक्तमिदं पुण्यं वन्ध्यागर्भस्य लक्षणम् ॥ ४८ ॥
अथवा दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें, नवें या दसवें मासमे उसे निश्चय ही गर्भ रह जाता है। वन्ध्याके गर्भ-धारणका यह पवित्र लक्षण साक्षात् व्यासजीने कहा है ॥ ४७-४८ ॥
पितॄनुद्धरते सर्वान् दश पूर्वान् दशापरान् ।
हरिवंशं नरः श्रुत्वा सेतिहासं पुरातनम् ॥ ४९ ॥
इतिहाससहित इस पुरातन हरिवंशको सुनकर मनुष्य अपनी दस पीढ़ी पहलेके समस्त पितरों और दस पीढ़ी बादकी संतानोंका उद्धार कर देता है ॥ ४९ ॥
इदं मया तवाग्रे च सर्वं प्रोक्तं नरर्षभ ।
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५० ॥