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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ
११२८श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

नरश्रेष्ठ ! यह सब माहात्म्य मैंने तुम्हारे सामने कह सुनाया, जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५०॥

अपुत्रः पुत्रमाप्नोति ह्यधनो धनमाप्नुयात्।
नरमेधाश्वमेधाभ्यां यत् फलं प्राप्यते नरैः ॥ ५१ ॥
तत् फलं लभ्यते सर्वं पुराणश्रवणाद्धरेः।

इससे पुत्रहीनको पुत्र और धनहीनको धनकी प्राप्ति होती है। नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह सारा फल श्रीहरिके हरिवंशपुराणका श्रवण करनेसे ही मिल जाता है॥ ५१$\frac{१}{२}$ ॥

ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः।
सकृत् पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा ॥ ५२ ॥

ब्रह्महत्यारा, गर्भघाती, गोहत्यारा, शराबी और गुरुपत्नीगामी पुरुष भी एक बार इस पुराणका श्रवण कर लेनेसे पवित्र हो जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये॥ ५२॥

इदं मया ते परिकीर्तितं मह-
च्छ्रीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् ।
शृण्वन् पठन्नाशु समाप्नुयात् फलं
यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभं महत् ॥ ५३ ॥

जनमेजय ! यह मैंने तुमसे श्रीकृष्णके अपार, अद्भुत एवं महान् माहात्म्यका वर्णन किया है। इसका श्रवण और पाठ करनेवाला पुरुष तीनों लोकोंमें जो अत्यन्त दुर्लभ है, उस महान् फलको भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ ५३ ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणविधौ दानविधानकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥

इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवणविधिके प्रसङ्गमें दानविधिका वर्णनविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥


॥ सविधि हरिवंशमाहात्म्य सम्पूर्ण ॥

११२९

संतानगोपालमन्त्रविधिः


( १ ) संतानगोपालमन्त्रविधिः

श्रीगणेशाय नमः। अब संतानगोपालमन्त्रके अनुष्ठानकी विधि दी जा रही है।

निम्नाङ्कित वाक्य पढ़कर विनियोग करे—

अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अङ्गन्यास

'देवकीसुत गोविन्द' हृदयाय नमः (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथकी मध्यमा, अनामिका और तर्जनी अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे)। 'वासुदेव जगत्पते' शिरसे स्वाहा (इस वाक्यको बोलकर सिरका स्पर्श करे)। 'देहि मे तनयं कृष्ण' शिखायै वषट् (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथके अँगूठेसे शिखाका स्पर्श करे)। 'त्वामहं शरणं गतः' (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करे)। 'ॐ नमः' अस्त्राय फट् (इस वाक्यको बोलकर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।

इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूपसे ध्यान करे—

वैकुण्ठादागतं कृष्णं रथस्थं करुणानिधिम् ।
किरीटिसारथिं पुत्रमानयन्तं परात्परम् ॥ १ ॥
आदाय तं जलस्थं च गुरवे वैदिकाय च।
अर्पयन्तं महाभागं ध्यायेत् पुत्रार्थमच्युतम् ॥ २ ॥

'पार्थसारथि अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण करुणाके सागर हैं। वे जलमें डूबे हुए गुरु-पुत्रको लेकर आ रहे हैं। वे वैकुण्ठसे अभी-अभी पधारे हैं और रथपर विराजमान हैं। अपने वैदिक गुरु सान्दीपिनिको उनका पुत्र अर्पित कर रहे हैं—साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये इस रूपमें महाभाग भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे' ॥ १-२ ॥

मूल मन्त्र

'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥'

यह सम्पूर्ण मन्त्र है। इसका तीन लाख जप करना चाहिये।

इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार है—सच्चिदानन्दस्वरूप, ऐश्वर्यशाली, शक्तिशाली, कामनापूरक, सौम्यस्वरूप, देवकीनन्दन ! गोविन्द ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे पुत्र प्रदान कीजिये।


( २ ) संतानगोपालमन्त्र

विनियोग

अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्रीच्छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, क्लीं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अङ्गन्यास

ग्लौं हृदयाय नमः। क्लीं शिरसे स्वाहा। ह्रीं शिखायै वषट्। श्रीं कवचाय हुम्। ॐ अस्त्राय फट्।

ध्यान

शङ्खचक्रगदापद्मं दधानं सूतिकागृहे।
अङ्के शयानं देवक्याः कृष्णं वन्दे विमुक्तये ॥

जो सूतिकागृहमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये माता देवकीकी गोदमें सो रहे हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं (संतान एवं) मोक्षकी प्राप्तिके लिये वन्दना करता हूँ।

(मूल मन्त्र इस प्रकार है—)

'ॐ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः' (सम्पूर्ण जगत् जिनकी अपनी संतान है, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है)।

इसका भी तीन लाख जप करना चाहिये।


म० पृ० ३७—

११३० | संतानगोपालविधौ


( ३ ) सनत्कुमारोक्त संतानगोपालमन्त्र

विनियोग

ॐ अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।

अङ्गन्यास

इस मन्त्रका अङ्गन्यास ठीक वैसा ही है, जैसा कि द्वितीय-मन्त्रका है। अथवा—

'देवकीसुत गोविन्द' हृदयाय नमः। 'वासुदेव जगत्पते' शिरसे स्वाहा। 'देहि मे तनयं कृष्ण' शिखायै वषट्। 'त्वामहं शरणं गतः' कवचाय हुम्। 'देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥' अस्त्राय फट्।

ध्यान

शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम्।
अङ्के शयानं देवक्याः सूतिकामन्दिरे शुभे॥
एवं रूपं सदा कृष्णं सुतार्थे भावयेत् सुधीः॥

'उत्तम बुद्धिवाला साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये सदा ऐसे रूपवाले जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे, जो मङ्गलमय सूतिकागारमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये देवकीके अङ्कमें शयन करते हैं'।

सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥

इसका भी तीन लाख जप करे।

इस मन्त्रके पूजन आदिका विधान जैसा सनत्कुमारजीने बताया है, इस प्रकार है—वैष्णव¹ पीठपर देवताओंका आवाहन करके उनकी पूजा करे। प्रथम आवृत्ति (आवरण) में छः कोणोंमेंसे आग्नेय-कोणमें 'हृदयाय नमः' नैऋत्य कोणमें 'शिरसे स्वाहा', 'वायव्यकोणमें 'शिखायै वषट्', ईशानकोणमें 'कवचाय हुम्' अग्रभागमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा पूर्व आदि चारों दिशाओंमें 'अस्त्राय फट्' इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे।

दूसरे आवरणमें पीठकी पूर्व आदि आठ दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशानकी पूजा करे।

तथा तीसरे आवरणमें उन्हीं दिशाओंमें क्रमशः वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, अङ्कुश, गदा और शूलकी पूजा करे।

शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको आधी रातके समय भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। पूजाके लिये स्वस्तिककी रचना करके उसपर घीसे भरा हुआ सकोरा या कोसा स्थापित करे। फिर उसमें रूईकी बत्ती डालकर उत्तम दीप प्रज्वलित करे। तत्पश्चात् अष्टदल कमल बनाकर उसमें स्थापित हुए श्रीकृष्णकी पूजा करे। फिर दो कलशोंको जलसे भरकर उनकी विधिवत् स्थापना करके सम्पूर्ण उपचारोंसे युक्त पूजा करे। तत्पश्चात् उन कलशोंमें भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन करके पुनः उनका पूर्वोक्त रीतिसे पूजन करे। तदनन्तर उन दोनों कलशोंका स्पर्श करके अनन्यभावसे एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार उपर्युक्त मन्त्रका जप करे। इसके बाद द्वादशीको गोविन्दकी विधिवूर्वक पूजा करके अगहनीके चावलकी स्वादिष्ट खीर तथा गायके घी और गुड़से युक्त पकवानका भोग अर्पण करे। इन सबके साथ सामयिक फल भी होना चाहिये। इसके अतिरिक्त दाल, भात, स्वादिष्ट सुस्निग्ध व्यञ्जन, कपिला गायके दूधका दही और खाँड भी रहना चाहिये। इन समस्त भोज्य पदार्थोंको सोनेके पात्रमें रखकर इनके पात्रभूत भगवान् विष्णुको इन्हें निवेदन करे। साथ ही शीतल कर्पूर और गुलाबसे सुवासित तथा कपड़ेसे छाना हुआ स्वच्छ जल अर्पण करे।

इसके बाद अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार शुद्धबुद्धिसे भगवान् श्रीकृष्णमें श्रद्धा रखते हुए अपनी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्तिके लिये ब्राह्मणोंको भोजन दे। संस्कारयुक्त अग्निमें भगवान् विष्णुका आवाहन करके अर्घ्य आदिसे उनका पूजन करे। फिर १०८ बार या २८ बार हविष्य (खीर) की आहुति देकर शेष हविष्यको कहीं सुरक्षित रख दे। इसके बाद घीकी ८०० आहुतियाँ दे। हुतशेष घृतको उक्त दोनों कलशोंमें गिराकर उनके घृतमिश्रित जलद्वारा दम्पती (यजमान और उसकी पत्नी दोनों) का अभिषेक करे। तदनन्तर जलमय श्रीहरिका ध्यान करते हुए ब्राह्मण पुनः उन कलशोंके जलसे उन दोनोंका अभिषेक करके एक सौ आठ बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करनेके पश्चात् शेष रखे हुए हविष्यको यजमान-पत्नीके हाथमें दे दे।

यजमान-पत्नी उस हविष्यको लेकर श्रीकृष्णका ध्यान करती हुई एक सुखद आसनपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और उसका भक्षण करे; उस समय यह भावना करे कि इस हविष्यके साथ भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं मेरे उदरमें आकर विराजमान हुए हैं। फिर जब श्रेष्ठ ब्राह्मणलोग अच्छी तरह भोजन कर लें, तब यजमान पान और मोदक आदिसे उन्हें


१. वैष्णव पीठ एवं देवपूजनकी विधि कल्याणके नारद-विष्णु-पुराणाङ्कमें पृष्ठ ३५७ से ३६४ तक विस्तारपूर्वक दी गयी है, उसे पढ़कर उसीके अनुसार पूजन करना चाहिये।

संतानगोपालमन्त्रविधिः ११३१


तृत करे। तत्पश्चात् वह श्रीविष्णुके चिन्तनपूर्वक उन ब्राह्मणो-के चरणोंमें मस्तक झुकावे। उस समय ब्राह्मणलोग यजमान दम्पतीसे यह कहें कि 'आप दोनोंके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो।' फिर वे निष्पाप दम्पती यह भावना करते हुए कि 'अब हमारा मनोरथ सफल हो गया' अत्यन्त प्रसन्न हो स्वयं भी भोजन करें।

जो ब्राह्मण इस प्रकार धन खर्च करनेमें कंजूसी न करके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके प्रति भक्तिभावसे युक्त हो इस प्रकार पूजन आदि करता है, वह शीघ्र ही तेजस्वी एवं चिरायु पुत्र प्राप्त कर लेता है। उसका वह पुत्र भी वंश-परम्पराको चलानेवाला, विष्णुभक्त एवं परम बुद्धिमान् होता है।

जो श्रेष्ठ द्विज दरिद्र होनेके कारण ऐसा न कर सके, वह यदि पूर्वोक्त मन्त्रका जप एवं तर्पण करे तो उसे भी पुत्र प्राप्त हो सकता है।

मन्त्रसारोक्त संतानकर यन्त्र

पहले अष्टदल कमल बनाकर उसकी कर्णिकामें 'क्लीं' इस कामबीजका उल्लेख करे। फिर वहीं यजमान पति पत्नीके नाम और उसकी कामना भी लिख दे। यथा—'अमुकस्य धर्मपत्न्याः अमुकदेव्याः पुत्रं कुरु-कुरु।' फिर आठ दलोंके निम्न भागोंमें दो-दो करके अकारादि सोलह स्वरोंको अङ्कित करे तथा उन्हींके ऊपरी भागोंमें संतानगोपाल-मन्त्रके चार-चार अक्षरोंको लिखे। फिर उन दलोंके बाह्य भागमें एक गोल रेखा खींचकर उसे ककारादि वर्णोंसे अवेष्टित करे। तत्पश्चात् उस वृत्तके बाहर चतुष्कोण बनावे। किसी पात्रमें माखन रखकर उसपर यह यन्त्र अङ्कित करे अथवा सूक्ष्म स्वर्ण आदिके पत्रपर इस यन्त्रको लिखे। यन्त्रसे अङ्कित नवनीतको नारी खा जाय और स्वर्णादि पत्रोंपर लिखे हुए यन्त्रको वह धारण करे। इससे वह पुत्रको जन्म देती है।

(शारदातिलकमें बताये अनुसार यह संतान-गोपालके मन्त्रकी अनुष्ठानविधि यहाँ दी गयी है।)


[यन्त्र-विवरण]

दिशाएँ: पू (पूर्व - ऊपर), प (पश्चिम - नीचे), उ (उत्तर - बाएँ), द (दक्षिण - दाएँ)

  • मध्य (कर्णिका):
    अमुकनाम
    देव्याः पुत्रं
    क्लीं कुरु कुरु

  • अष्टदल (भीतर के स्वर):
    अ आ | इ ई | उ ऊ | ऋ ॠ | ऌ ॡ | ए ऐ | ओ औ | अं अः

  • अष्टदल (बाह्य मन्त्र-भाग):
    देवकीसु- | त गोविन्द | वासुदेव | जगत्पते । | देहि मे तन- | यं कृष्ण | त्वामहं श- | रणं गतः ॥

  • वृत्त-परिधि (मातृका-वर्ण):
    क ख ग घ ङ | च छ ज झ ञ | ट ठ ड ढ ण | त थ द ध न | प फ ब भ म | य र ल व | श ष स ह | क्ष त्र ज्ञ

११३२ | संतानगोपालविधौ


ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

संतानगोपालस्तोत्रम्

श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम्।
सुतसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम्॥ १॥
मैं पुत्रकी प्राप्तिके लिये लक्ष्मीपति, कमलनयन, देवकीनन्दन तथा सर्वपापहारी, मधुसूदन, श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ॥ १॥

नमाम्यहं वासुदेवं सुतसम्प्राप्तये हरिम्।
यशोदाङ्कगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम्॥ २॥
मैं पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे उन वासुदेव श्रीहरिको प्रणाम करता हूँ, जो यशोदाके अङ्कमें बालगोपालरूपसे विराजमान हैं और नन्दको आनन्द दे रहे हैं॥ २॥

अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम्।
नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा॥ ३॥
अपनेको पुत्रकी प्राप्तिके लिये मैं मुनिवन्दित वसुदेव-देवकीनन्दन गोविन्दकी सदा वन्दना करता हूँ॥ ३॥

गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम्।
पुत्रसम्प्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुङ्गवम्॥ ४॥
मैं पुत्र पानेकी कामनासे उन यदुकुलतिलक श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जो साक्षात् कमलापति अच्युत (विष्णु) होकर भी गोपबालकरूपसे गौओंकी रक्षामें लगे हुए हैं॥ ४॥

पुत्रकामेष्टिफलदं कञ्जाक्षं कमलापतिम्।
देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम॥ ५॥
मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो, इसके लिये मैं पुत्रेष्टियज्ञका फल देनेवाले कमलनयन लक्ष्मीपति देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी वन्दना करता हूँ॥ ५॥

पद्मापते पद्मनेत्र पद्मनाभ जनार्दन।
देहि मे तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते॥ ६॥
पद्मापते! कमलनयन! पद्मनाभ! जनार्दन! श्रीश! वासुदेव! जगत्पते! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये॥ ६॥

यशोदाङ्कगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम्।
अस्माकं पुत्रलाभाय नमामि श्रीशमच्युतम्॥ ७॥
यशोदाके अङ्कमें बालरूपसे विराजमान तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले मुनिवन्दित लक्ष्मीपति गोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ। ऐसा करनेसे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो॥ ७॥

श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिहरणाच्युत।
गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन॥ ८॥
श्रीपते! देवदेवेश्वर! दीन-दुःखियोंकी पीड़ा दूर करनेवाले अच्युत! गोविन्द! मुझे पुत्र दीजिये। जनार्दन! मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ८॥

भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो॥ ९॥
भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले गोविन्द! भक्तकी रक्षा कीजिये। शुभदायक! रुक्मिणीवल्लभ! प्रभो! श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये॥ ९॥

रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा।
भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गतः॥ १०॥
रुक्मिणीनाथ! सर्वेश्वर! मुझे सदाके लिये पुत्र दीजिये। भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षरूप कमलनयन श्रीकृष्ण! मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १०॥

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥ ११॥
देवकीपुत्र! गोविन्द! वासुदेव! जगन्नाथ! श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र दीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ ११॥

वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥ १२॥
विश्ववन्द्य वासुदेव! लक्ष्मीपते! पुरुषोत्तम! श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र दीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १२॥

कञ्जाक्ष कमलानाथ परकारुणिकोत्तम।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥ १३॥
कमलनयन! कमलाकान्त! दूसरोंपर दया करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ श्रीकृष्ण! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १३॥

लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित।

संतानगोपालस्तोत्रम्

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ १४ ॥

लक्ष्मीपते ! पद्मनाभ ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १४ ॥

कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।
नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ॥ १५ ॥

आप कार्य-कारणरूप, सुखदायक एवं विद्वान् हैं। मैं पुत्रकी प्राप्तिके लिये आप वासुदेवको सदा नमस्कार करता हूँ ॥ १५ ॥

राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।
तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥ १६ ॥

राजीवनेत्र ( कमलनयन ) ! रावणारे ( रावणके शत्रु ) ! हरे ! कवे ( विद्वन् ) ! देवेश्वर ! विष्णो ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आप मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ १६॥

अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥ १७ ॥

जगदीश्वर ! मै अपने लिये पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे आपकी आराधना करता हूँ । रमावल्लभ ! वासुदेव ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ १७ ॥

श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥ १८ ॥

मानिनी श्रीराधाके मानका अपहरण करनेवाले तथा अपनी आराधना करनेवाली गोपाङ्गनाओंके वस्त्रको यमुना-तटसे हटा ( कर उन्हे सुख प्रदान कर )नेवाले जगन्नाथ वासुदेव श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ १८ ॥

अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।
रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥ १९ ॥

यदुनन्दन ! रमापते ! वासुदेव ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! हमें पुत्रकी प्राप्ति कराइये ॥ १९ ॥

वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।
पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥ २० ॥

वासुदेव ! मुझे बेटा दीजिये । माधव ! मुझे तनय ( संतान ) दीजिये । श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । महाप्रभो ! मुझे वत्स ( बच्चा ) दीजिये ॥ २० ॥

डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥ २१ ॥

श्रीकृष्ण ! मुझे डिम्भक ( पुत्र ) दीजिये । रघुनन्दन ! मुझे आत्मज ( औरस पुत्र ) दीजिये । भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरूप नन्दनन्दन ! मुझे तनय दीजिये ॥ २१ ॥

नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।
कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥ २२ ॥

श्रीकृष्ण ! वासुदेव ! जगत्पते ! कमलानाथ ! गोविन्द ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! मुझे आनन्ददायक पुत्र प्रदान कीजिये ॥ २२ ॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥ २३ ॥

प्रभो ! यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं है । आप ही मेरे शरणदाता हैं । मुझे पुत्र दीजिये । सम्पत्ति दीजिये । सम्पत्ति और पुत्र दोनों प्रदान कीजिये ॥ २३ ॥

यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।
वन्देऽहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥ २४ ॥

यशोदाजीके स्तनोंके दुग्धपानके रसको जाननेवाले और उनका स्तनपान करनेवाले, भूरे नेत्रोंसे सुशोभित यदुनन्दन श्रीकृष्णकी मैं सदा वन्दना करता हूँ । इससे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो ॥ २४ ॥

नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।
रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥ २५ ॥

देवेश्वर ! नन्दनन्दन ! प्रभो ! मुझे आनन्ददायक पुत्र दीजिये । रमापते ! वासुदेव ! जगन्नाथ ! मुझे धन और पुत्र दीजिये ॥ २५ ॥

पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।
अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥ २६ ॥

माधव ! पुत्र और धन ( दीजिये ), धन और पुत्र ( दीजिये ), मुझे पुत्र प्रदान कीजिये । श्रीपते ! हमारे दीनता-पूर्ण वचनपर ध्यान दीजिये ॥ २६ ॥

गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।
अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥ २७ ॥

११३४संतानगोपालविधौ

गोपकुमार गोविन्द ! रमावल्लभ वासुदेव ! जगन्नाथ ! मुझे पुत्र दीजिये, सम्पत्ति दीजिये ॥ २७ ॥

मद्वाञ्छितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।
मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ॥ २८ ॥
देवकीनन्दन ! अच्युत ! मुझे मनोवाञ्छित फल (पुत्र) दीजिये। यदुनन्दन ! मेरी पुत्रविषयक प्रार्थनाको सफल एवं धन्य कीजिये ॥ २८ ॥

याचेऽहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसम्पदम् ।
भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ॥ २९ ॥
भक्तोंके लिये चिन्तामणिस্বরূপ राम ! भक्तवाञ्छाकल्प-तरो ! महाप्रभो ! मैं आपसे धन और पुत्रकी याचना करता हूँ। मुझे पुत्र और धन-सम्पत्ति दीजिये ॥ २९ ॥

आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।
अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ॥ ३० ॥
रघुनन्दन ! आप सदा मुझे आनन्ददायक आत्मज, पुत्र, कुमार, डिम्भक (बालक), सुत, अर्भक (बच्चा) एवं तनय (बेटा) दीजिये ॥ ३० ॥

वन्दे संतानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।
अस्माकं पुत्रसंप्राप्त्यै सदा गोविन्दमच्युतम् ॥ ३१ ॥
मैं अपने लिये पुत्रकी प्राप्तिके उद्देश्यसे संतानप्रद गोपाल, माधव, भक्तोंका मनोरथ पूर्ण करनेवाले अच्युत गोविन्दकी वन्दना करता हूँ ॥ ३१ ॥

ॐकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।
क्लींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ॥ ३२ ॥
ॐकारयुक्त गोपाल, श्रीयुक्त यदुनन्दन तथा क्लींयुक्त देवकीपुत्र यदुनाथको मैं प्रणाम करता हूँ (अर्थात् 'ॐ श्रीं क्लीं' इन तीनों बीजोंसे युक्त 'देवकीसुत गोविन्द...' इत्यादि मन्त्रका मैं आश्रय लेता हूँ) ॥ ३२ ॥

वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।
देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ॥ ३३ ॥
वासुदेव ! मुकुन्द ! ईश्वर ! गोविन्द ! माधव ! अच्युत ! श्रीकृष्ण ! रमानाथ ! महाप्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ३३ ॥

राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।
समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ॥ ३४ ॥
राजीवनयन (कमल-सदृश नेत्रवाले) ! गोविन्द ! कपिलाक्ष ! हरे ! प्रभो ! सम्पूर्ण कमनीय मनोरथोंकी सिद्धिके लिये वर देनेवाले श्रीकृष्ण ! मुझे सदाके लिये पुत्र दीजिये ॥

अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।
देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ॥ ३५ ॥
नीलकमलसमूहके समान श्यामसुन्दर रूपवाले जगन्नाथ ! रमानायक ! माधव ! मुझे जलज कमलके सदृश मनोहर एवं श्रेष्ठ सत्पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३५ ॥

नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥ ३६ ॥
अजगर और वरुणके दूतोंसे नन्दजीकी रक्षा करनेवाले ! पृथ्वीपालक ! यदुनन्दन ! गोविन्द ! प्रभो ! रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३६ ॥

दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।
गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ॥ ३७ ॥
अपने सेवकोंकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्ष-स्वरूप ! गोविन्द ! मुकुन्द ! माधव ! अच्युत ! गोपाल ! पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) ! मुझे संतान और सम्पत्ति दीजिये ॥ ३७ ॥

यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।
देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ॥ ३८ ॥
यदुनायक ! लक्ष्मीपते ! यशोदानन्दन ! श्रीधर ! प्राणवल्लभ ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३८ ॥

अस्माकं वाञ्छितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।
भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ॥ ३९ ॥
रमापते ! भगवन् ! सर्वेश्वर ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! हमें मनोवाञ्छित वस्तु दीजिये । पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ३९ ॥

रमाहृदयसम्भार सत्यभामामनःप्रिय ।
देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥ ४० ॥
रमा (लक्ष्मी) को अपने वक्षःस्थलमें धारण करनेवाले ! सत्यभामाके हृदयवल्लभ ! तथा रुक्मिणीके प्राणनाथ ! प्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४० ॥

संतानगोपालस्तोत्रम्११३५


चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।
अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥ ४१ ॥
चन्द्रमा और सूर्यरूप नेत्र धारण करनेवाले गोविन्द ! कमलनयन माधव ! देव ! जगदीश्वर ! हमें भाग्यशाली श्रेष्ठ पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४१ ॥

कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥ ४२ ॥
करुणामय ! कमलनयन ! पद्मनाभ श्रीविष्णुसे सम्मानित देवकीनन्दनन्दन श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४२ ॥

देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।
समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥ ४३ ॥
देवकीपुत्र ! श्रीनाथ ! वासुदेव ! जगत्पते ! समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाले श्रीकृष्ण ! मुझे सदा पुत्र दीजिये ॥ ४३ ॥

भक्तमन्दार गम्भीर शङ्कराच्युत माधव ।
देहि मे तनयं गोपवालवत्सल श्रीपते ॥ ४४ ॥
भक्तवाञ्छाकल्पतरो ! गम्भीर स्वभाववाले कल्याणकारी अच्युत ! माधव ! ग्वाल-बालोंपर स्नेह करनेवाले श्रीपते ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४४ ॥

श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥ ४५ ॥
श्रीकान्त ! वसुदेवनन्दन ! ईश्वर ! देवकीके प्रिय पुत्र ! भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष रूप ! जगत्प्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४५ ॥

जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।
वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥ ४६ ॥
जगन्नाथ ! रमानाथ ! पृथ्वीनाथ ! दयानिधे ! वासुदेव ! ईश्वर ! सर्वेश्वर ! प्रभो ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४६ ॥

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४७ ॥
श्रीनाथ ! कमलदललोचन ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥

दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४८ ॥
अपने दासोंके लिये कल्पवृक्ष ! गोविन्द ! भक्तोंकी इच्छा-पूर्तिके लिये चिन्तामणि-स्वरूप प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ; मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४८ ॥

गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४९ ॥
गोविन्द ! पुण्डरीकाक्ष ! रमानाथ ! महाप्रभो ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।
मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥ ५० ॥
श्रीनाथ ! कमलदललोचन ! गोविन्द ! मधुसूदन ! जनार्दन ! मैं अपने लिये पुत्ररूप फलकी सिद्धिके निमित्त आपकी आराधना करता हूँ ॥ ५० ॥

स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं
विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलाङ्गम् ।
स्पृशन्तमन्यस्तनमङ्गुलीभि-
र्वन्दे यशोदाङ्कगतं मुकुन्दम् ॥ ५१ ॥
जो मैया यशोदाके मुखारविन्दकी ओर देखते हुए मन्द मुसकराहटके साथ उनके एक स्तनका दूध पी रहे हैं और दूसरे स्तनका अङ्गुलियोंसे स्पर्श कर रहे हैं तथा जिनका प्रत्येक अङ्ग उज्ज्वल आभासे प्रकाशित होता है, मैया यशोदा-के अङ्कमें बैठे हुए उन बाल-मुकुन्दकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ५१ ॥

याचेऽहं पुत्रसंतानं भवन्तं पद्मलोचन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ५२ ॥
कमललोचन ! मैं आपसे पुत्र-संततिकी याचना करता हूँ । श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ५२ ॥

अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।
शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥ ५३ ॥
जगत्पते ! हमें पुत्रकी प्राप्ति हो, इस उद्देश्यसे हम आपका चिन्तन करते हैं। आप मुझे शीघ्र पुत्र प्रदान कीजिये। मुनिवन्दित श्रीकृष्ण ! आपको मुझे अवश्य मेरी प्रार्थित वस्तु संतान देनी चाहिये ॥ ५३ ॥

वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।
कुरु मां पुत्रवन्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥ ५४ ॥

११३६संतानगोपालविधौ

वासुदेव ! जगन्नाथ ! श्रीपते ! पुरुषोत्तम ! देवेन्द्रपूजित श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र-दान दीजिये ॥ ५४ ॥

कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दन ।
मह्यं च पुत्रसंतानं दातव्यं भवता हरे ॥ ५५ ॥
यशोदाके प्रिय नन्दन ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये । हरे ! आपको मुझे पुत्ररूप संतानका दान अवश्य करना चाहिये ॥ ५५ ॥

वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।
देहि मे तनयं राम कौसल्याप्रियनन्दन ॥ ५६ ॥
वासुदेव ! जगन्नाथ ! गोविन्द ! देवकीकुमार ! कौशल्याके प्रिय पुत्र राम ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ५६ ॥

पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।
देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ॥ ५७ ॥
कमलदललोचन ! गोविन्द ! विष्णो ! वामन ! माधव ! सीताके प्राणवल्लभ ! रघुनन्दन ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ५७ ॥

कञ्जाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।
लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ॥ ५८ ॥
कमलनयन श्रीकृष्ण ! देवराजसे अलंकृत एवं पूजित हरे ! लक्ष्मणके बड़े भैया मुनिवन्दित श्रीराम ! मुझे सदाके लिये पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ५८ ॥

देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।
सीतानायक कञ्जाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ॥ ५९ ॥
दशरथके प्रिय नन्दन श्रीराम ! सीतापते ! कमलनयन ! मुचुकुन्दको वर देनेवाले श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ५९ ॥

विभीषणस्य या लङ्का प्रदत्ता भवता पुरा ।
अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ॥ ६० ॥
माधव ! आपने पूर्वकालमें जो विभीषणको लङ्काका राज्य दिया था, उसी प्रकार हमें पुत्र दीजिये ॥ ६० ॥

भवदीयपदाम्भोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।
देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ॥ ६१ ॥
सीताके प्राणवल्लभ रघुनन्दन ! मैं आपके चरणारविन्दोंका निरन्तर चिन्तन करता हूँ, मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥

राम मत्कार्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।
देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ॥ ३२ ॥
मुझे मनोवाञ्छित वर और पुत्रोत्पत्तिरूप फल देनेवाले श्रीराम ! ब्रह्माजीके द्वारा वन्दित लक्ष्मीपते ! आप मुझे पुत्र दीजिये ॥ ६२ ॥


राम राघव सीतेश लक्ष्मणाsub/नुज देहि मे ।
भाग्यवत्पुत्रसंतानं दशरथात्मज श्रीपते ॥ ६३ ॥
लक्ष्मणके बड़े भाई ! सीताके प्राणवल्लभ ! दशरथकुमार ! रघुकुलनन्दन ! श्रीराम ! श्रीपते ! आप मुझे भाग्यशाली पुत्ररूप संतान दीजिये ॥ ६३ ॥

देवकीगर्भसंजात यशोदाप्रियनन्दन ।
देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ॥ ६४ ॥
देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए यशोदाके लाड़ले लाल ! गोपाल कृष्ण ! राम ! माधव ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ६४ ॥

कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शङ्कर ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ६५ ॥
माधव ! गोविन्द ! वामन ! अच्युत ! कल्याणकारी श्रीपते ! गोपबालकनायक ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ६५ ॥

गोपवाल महाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥ ६६ ॥
गोपकुमार ! सबसे बढ़कर धन्य ! गोविन्द ! अच्युत ! माधव ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ६६ ॥

दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोऽयं
दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।
दिशतु दिशतु श्रीशो राघवो रामचन्द्रो
दिशतु दिशतु पुत्रं वंशविस्तारहेतोः ॥ ६७ ॥
ये भगवान् देवकीनन्दन मुझे पुत्र दें, पुत्र दें । शीघ्र ही भाग्यवान् पुत्रकी प्राप्ति करावें । श्रीसीताके स्वामी ! रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्र ! मेरे वंशके विस्तारके लिये मुझे पुत्र प्रदान करें, पुत्र प्रदान करें ॥ ६७ ॥

दीयतां वासुदेवेन तनयो मत्प्रियः सुतः ।
कुमारो नन्दनः सीतानायकेन सदा मम ॥ ६८ ॥
वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण तथा सीतापते भगवान् श्रीराम सदा मुझे आनन्ददायक कुमारोपम प्रिय पुत्र प्रदान करें ॥ ६८ ॥

राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ६९ ॥
राघव ! गोविन्द ! देवकीपुत्र ! माधव ! श्रीपते ! गोपबालकनायक श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ६९ ॥

वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥ ७० ॥
मधुसूदन ! मुझे वंशका विस्तार करनेवाला पुत्र दीजिये ।


१. संवृता दीयते पुरा इति पाठान्तरम् ।

संतानगोपालस्तोत्रम् ११३७

पुत्र दीजिये !! पुत्र दीजिये !!! मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७० ॥

ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥ ७१ ॥

कंसारे ! माधव ! अच्युत ! मुझे मनोवाञ्छित पुत्र प्रदान कीजिये ! पुत्र दीजिये !! पुत्र दीजिये !!! मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७१ ॥

चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥ ७२ ॥

माधव ! जबतक चन्द्रमा, सूर्य और कल्पकी स्थिति रहे, तबतकके लिये मुझे पुत्रपरम्परा प्रदान कीजिये ! पुत्र दीजिये !! पुत्र दीजिये !!! मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७२ ॥

विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ॥ ७३ ॥

प्रभो ! देवकीनन्दन श्रीकृष्ण ! आप सदा मेरे लिये विद्वान्, बुद्धिमान् और धनसम्पन्न पुत्र प्रदान कीजिये ॥७३॥

नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।
मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ॥ ७४ ॥

कमलनयन श्रीकृष्ण ! मैं पुत्रकी प्राप्तिके लिये समस्त कामनाओंके दाता आप पुण्डरीकाक्ष श्रीकृष्ण मुकुन्द मधुसूदन गोविन्दको प्रणाम करता हूँ ॥ ७४ ॥

भगवन् कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।
देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गतः ॥ ७५ ॥

सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंके दाता ! गोविन्द ! स्वामिन् ! भगवन् ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७५ ॥

स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्ण माधव कामद ।
देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गतः ॥ ७६ ॥

स्वामिन् ! भगवन् ! राम ! कृष्ण ! कामनाओंके दाता माधव ! मुझे सदा पुत्र प्रदान कीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७६ ॥

तनयं देहि गोविन्द कञ्जाक्ष कमलापते ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥ ७७ ॥

गोविन्द ! कमलनयन ! कमलापते ! मुझे पुत्र दीजिये ! पुत्र दीजिये !! पुत्र दीजिये !!! मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७७ ॥

पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्नजनक प्रभो ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥ ७८ ॥

लक्ष्मीपते ! कमलोचन ! प्रद्युम्नको जन्म देनेवाले प्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ! पुत्र दीजिये !! मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७८ ॥

शङ्खचक्रगदाखङ्गशार्ङ्गपाणे रमापते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ७९ ॥

अपने हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा, खड्ग और शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले रमापते ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ७९ ॥

नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।
सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ॥ ८० ॥

नारायण ! रमानाथ ! कमलदललोचन ! देवेश्वर ! कमलालया लक्ष्मीसे वन्दित श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ८० ॥

राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।
रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ॥ ८१ ॥
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ८२ ॥

राम ! राघव ! गोविन्द ! देवकीके श्रेष्ठ पुत्र ! रुक्मिणीनाथ ! सर्वेश्वर ! नारदादि महर्षियों तथा देवताओंसे पूजित देवकीकुमार गोविन्द ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकान्त ! गोपबालकनायक ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ८१-८२ ॥

मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८३ ॥

मुनिवन्दित गोविन्द ! रुक्मिणीवल्लभ ! प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८३ ॥

गोपिकार्जितपङ्कजेमरन्दासक्तमानस ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८४ ॥

गोपियोंद्वारा लाकर समर्पित किये गये कमलोंके मकरन्दमें आसक्त चित्तवाले श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८४ ॥

रमाहृदयपङ्केजलोल माधव कामद ।
ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥ ८५ ॥

लक्ष्मीके हृदयकमलके लिये लोलुप माधव ! समस्त कामनाओंके दाता श्रीकृष्ण ! मुझे मनोवाञ्छित पुत्र प्रदान कीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८५ ॥

वासुदेव रमानाथ दासानां मङ्गलप्रद ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८६ ॥

अपने सेवकोंके लिये मङ्गलदायक रमानाथ वासुदेव श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८६ ॥

११३८ | संतान गोपाल विधौ


कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८७ ॥
भावार्थ : कल्याणप्रद गोविन्द ! मुनिवन्दित मुरशत्रु श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥८७॥

पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८८ ॥
भावार्थ : पुत्रदाता मुकुन्द ! ईश्वर ! रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८८ ॥

पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८९ ॥
भावार्थ : पुण्डरीकाक्ष ! गोविन्द ! वासुदेव ! जगदीश्वर! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८९ ॥

दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ९० ॥
भावार्थ : दयानिधे ! वासुदेव ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥९०॥

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।
वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्रलाभप्रदायिनम् ॥ ९१ ॥
भावार्थ : पुत्र और सम्पत्तिके दाता, पुत्र-लाभदायक, देवपूजित गोविन्द श्रीकृष्णकी हम सदा वन्दना करते हैं ॥ ९१ ॥

कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।
नमस्ते पुत्रलाभार्थं देहि मे तनयं विभो ॥ ९२ ॥
भावार्थ : प्रभो ! आप करुणाके सागर, गोपियोंके प्राणवल्लभ और मुरनामक दैत्यके शत्रु हैं, पुत्रकी प्राप्तिके लिये आपको मेरा नमस्कार है, मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ९२ ॥

नमस्तस्मै रमेशाय रुक्मिणीवल्लभाय ते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ९३ ॥
भावार्थ : लक्ष्मीके स्वामी तथा रुक्मिणीके प्राणवल्लभ ! आप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । गोपबालकोंके नायक श्री-कान्त ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ९३ ॥

नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।
पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रङ्गशायिने ॥ ९४ ॥
भावार्थ : सदा ही श्रीजीकी कामना रखनेवाले आप वासुदेवको नमस्कार है । आप पुत्रदायक, नागराज शेषकी शय्यापर शयन करनेवाले तथा श्रीरङ्ग-क्षेत्रमें सोनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ९४ ॥

रङ्गशायिन् रमानाथ मङ्गलप्रद माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ९५ ॥
भावार्थ : रङ्गशायी रमानाथ ! मङ्गलदायक माधव ! गोपबालक-नायक श्रीपते ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ९५ ॥

दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।
सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ॥ ९६ ॥
भावार्थ : दीनोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप रघुनन्दन ! मुझ दासको पुत्र दीजिये । रमापते ! पुत्र दीजिये । पुत्र दीजिये !! पुत्र दीजिये !!! ॥ ९६ ॥

यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरतः सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ९७ ॥
भावार्थ : सदा मनोवाञ्छित पुत्र देनेमें तत्पर रहनेवाले यशोदा-नन्दन श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ९७ ॥

मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ९८ ॥
भावार्थ : मेरे इष्टदेव गोविन्द ! वासुदेव ! जनार्दन ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ९८ ॥

नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजायते ।
भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ॥ ९९ ॥
भावार्थ : भगवान् ! इन्द्रपूजित वासुदेव ! आपकी कृपासे नीतिज्ञ, धनवान् और विद्वान् पुत्र उत्पन्न होता है ॥ ९९ ॥

यः पठेत् पुत्रशतकं सोऽपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।
श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ॥ १०० ॥
भावार्थ : जो श्रीवासुदेवकथित पुत्रशतकका पाठ करता है, वह भी उत्तम पुत्रसे सम्पन्न होता है । यह स्तोत्ररत्न सुखकी भी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १०० ॥

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं धियम् ।
ऐश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशयः ॥ १०१ ॥
भावार्थ : जो प्रतिदिन जपके समय इसका पाठ करता है, उसे तत्काल पुत्रलाभ होता है तथा वह शीघ्र ही धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य एवं राजसम्मान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १०१ ॥

॥ इति श्रीसंतानगोपालस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रम् ११३९


श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रम्

-नारद उवाच

ॐवासुदेवं हृषीकेशं वामनं जलशायिनम्।
जनार्दनं हरिं कृष्णं श्रीवत्सं गरुडध्वजम् ॥ १ ॥
वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं नरकान्तकम्।
अव्यक्तं शाश्वतं विष्णुमनन्तमजमव्ययम् ॥ २ ॥
नारायणं गदाध्यक्षं गोविन्दं कीर्तिभाजनम्।
गोवर्धनोद्धरं देवं भूधरं भुवनेश्वरम् ॥ ३ ॥
वेत्तारं यज्ञपुरुषं यज्ञेशं यज्ञवाहकम्।
चक्रपाणिं गदापाणिं शङ्खपाणिं नरोत्तमम् ॥ ४ ॥
वैकुण्ठं दुष्टदमनं भूगर्भं पीतवाससम्।
त्रिविक्रमं त्रिकालज्ञं त्रिमूर्तिं नन्दकेश्वरम् ॥ ५ ॥
रामं रामं हयग्रीवं भीमं रौद्रं भवोद्भवम्।
श्रीपतिं श्रीधरं श्रीशं मङ्गलं मङ्गलायुधम् ॥ ६ ॥
दामोदरं दमोपेतं केशवं केशिसूदनम्।
वरेण्यं वरदं विष्णुमानन्दं वसुदेवजम् ॥ ७ ॥
हिरण्यरेतसं दीप्तं पुराणं पुरुषोत्तमम्।
सकलं निष्कलं शुद्धं निर्गुणं गुणशाश्वतम् ॥ ८ ॥
हिरण्यतनुसंकाशं सूर्यायुतसमप्रभम्।
मेघश्यामं चतुर्बाहुं कुशलं कमलेक्षणम् ॥ ९ ॥
ज्योतीरूपमरूपं च स्वरूपं रूपसंस्थितम्।
सर्वज्ञं सर्वरूपस्थं सर्वेशं सर्वतोमुखम् ॥ १० ॥
ज्ञानं कूटस्थमचलं ज्ञानदं परमं प्रभुम्।
योगीशं योगनिष्णातं योगिनं योगरूपिणम् ॥ ११ ॥
ईश्वरं सर्वभूतानां वन्दे भूतमयं प्रभुम्।

नारदजी कहते हैं— १- ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) वासुदेव, २-हृषीकेश, ३-वामन, ४-जलशायी, ५-जनार्दन, ६-हरि, ७-कृष्ण, ८-श्रीवत्स, ९-गरुडध्वज, १०-वाराह, ११-पुण्डरीकाक्ष, १२-नृसिंह, १३-नरकान्तक, १४-अव्यक्त, १५-शाश्वत, १६-विष्णु, १७-अनन्त, १८-अज, १९-अव्यय, २०-नारायण, २१-गदाध्यक्ष, २२-गोविन्द, २३-कीर्तिभाजन, २४-गोवर्धनोद्धर, २५-देव, २६-भूधर, २७-भुवनेश्वर, २८-वेत्ता (ज्ञानी), २९-यज्ञपुरुष, ३०-यज्ञेश, ३१-यज्ञवाहक, ३२-चक्रपाणि, ३३-गदापाणि, ३४-शङ्खपाणि, ३५-नरोत्तम, ३६-वैकुण्ठ, ३७-दुष्टदमन, ३८-भूगर्भ, ३९-पीतवासा, ४०-त्रिविक्रम, ४१-त्रिकालज्ञ, ४२-त्रिमूर्ति, ४३-नन्दकेश्वर, ४४-राम (परशुराम), ४५-राम (रामचन्द्र), ४६-हयग्रीव, ४७-भीम, ४८-रौद्र, ४९-भवोद्भव, ५०-श्रीपति, ५१-श्रीधर, ५२-श्रीश, ५३-मङ्गल, ५४-मङ्गलायुध, ५५-दामोदर, ५६-दमोपेत, ५७-केशव, ५८-केशिसूदन, ५९-वरेण्य, ६०-वरद, ६१-विष्णु, ६२-आनन्द, ६३-वसुदेवज, ६४-हिरण्यरेता, ६५-दीप्त, ६६-पुराण, ६७-पुरुषोत्तम, ६८-सकल, ६९-निष्कलं, ७०-शुद्ध, ७१-निर्गुण, ७२-गुणशाश्वत, ७३-हिरण्यतनुसंकाश, ७४-सूर्यायुतसमप्रभ, ७५-मेघश्याम, ७६-चतुर्बाहु, ७७-कुशल, ७८-कमलेक्षण, ७९-ज्योतीरूप, ८०-अरूप, ८१-स्वरूप, ८२-रूपसंस्थित, ८३-सर्वज्ञ, ८४-सर्वरूपस्थ, ८५-सर्वेश, ८६-सर्वतोमुख, ८७-ज्ञान, ८८-कूटस्थ, ८९-अचल, ९०-ज्ञानद, ९१-परम, ९२-प्रभु, ९३-योगीश, ९४-योगनिष्णात्, ९५-योगी, ९६-योगरूपी, ९७-ईश्वर, ९८-सर्वभूतेश्वर, ९९-भूतमय और १००-प्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १—११½॥

इति नामशतं दिव्यं वैष्णवं खलु पापहम् ॥ १२ ॥
व्यासेन कथितं पूर्वं सर्वपापप्रणाशनम्।

भगवान् विष्णुके ये सौ दिव्य नाम निश्चय ही पापोंका नाश करनेवाले हैं। व्यासजीने सर्वप्रथम इनका उपदेश दिया है। इसके पाठसे समस्त पापोंका नाश हो जाता है ॥ १२½॥

यः पठेत् प्रातरुत्थाय स भवेद् वैष्णवो नरः ॥ १३ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्।

जो प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करेगा, वह मनुष्य भगवान् विष्णुका भक्त हो जायगा। उसके हृदयके सारे पाप धुल जायेंगे और वह शुद्धचित्त होकर भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेगा ॥ १३½॥

चान्द्रायणसहस्राणि कन्यादानशतानि च ॥ १४ ॥
गवां लक्षसहस्राणि मुक्तिभागी भवेन्नरः।
अश्वमेधायुतं पुण्यं फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १५ ॥

इसके पाठसे सहस्रों चान्द्रायण व्रत, सैकड़ों कन्यादान-जनित पुण्य तथा सहस्रों लक्ष गोदानोंका फल पाकर मनुष्य मोक्षका भागी होता है; उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका पुण्य फल प्राप्त होता है ॥ १४-१५ ॥

॥ इति श्रीविष्णुशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णं ॥

११४० | संतानगोपालविधौ

वन्ध्यानां पुत्रोत्पत्त्यर्थं संतानगोपालमन्त्रविधिः

अथ वन्ध्यानां पुत्रोत्पत्त्यर्थं संतानगोपालविधानम् ॥ मन्त्रसारे—आदौ शरीरशुद्ध्यर्थं कर्माधिकारार्थं जन्मान्तरीयसंततिप्रतिबन्धकदुरदृष्टजनितदोषपरिहारार्थं कर्माधिकारसिद्धयर्थं द्वादशाब्दषडब्दत्र्यब्दसार्द्धाब्दादीनि यथाशक्त्यनुसारेण प्रायश्चित्तानि दद्यात्—

“प्रायः पापं विजानीयाच्चित्तं तस्य विशोधनम् ।
कृत्वा शुद्धिं तु देहस्य ततः कर्माणि कारयेत् ॥”
—इति नियमात् ॥

अर्धादिप्रायश्चित्तलक्षणं तु महार्णवादावुक्तम्
“त्रिंशद्भिश्श्च तथा गोभिरर्धं तु मुनिभिः स्मृतम्”
इत्यादिना द्रष्टव्यम् । उक्तविधानेन प्रायश्चित्ते कृते वन्ध्यात्वनिरासार्थं महार्णवोक्तं सुवर्णधेनुदानं तथा षोडशशूर्पसौभाग्यद्रव्यं वस्त्रालंकारसहितयज्ञोपवीतदानं च विधेयम् । उक्तं च—

“वन्ध्यात्वस्य निरासार्थं धेनुं दद्याच्च हेमजाम् ।
तथा यज्ञोपवीतं तु दद्याद्धेममयं शुभम् ।
षोडशानि च शूर्पाणि फलयुक्तानि दापयेत् ॥
एवं कृते विधानेन वन्ध्यत्वात् प्रतिमुच्यते ।
सत्पुत्रं लभते नूनमेतत् कर्म प्रयोजयेत् ॥”
—इति नियमात् ।

अथ प्रयोगः—आचार्यहस्तेन देयमिति नियमात् तस्मादादौ आचार्यवरणं कार्यं “सर्वमाचार्यः प्रतिजानीते” इति नियमात् । तत्र धेनुमानमाह सूर्यार्णवे—

“धेनुं निष्कचतुष्कस्य तदर्द्धं स्यात्तदर्द्धकम् ।
तदर्द्धस्य च वा तत्र चतुर्थांशेन वत्सकम् ॥”
—इति हेमाद्रिवचनानुसारेण विदध्यात् । एवं यज्ञोपवीतमपि देयम् । सोमो धेनुमिति मन्त्रेण होमाचरणं कुर्यात् । तद्विशेषविधानं महार्णवादौ द्रष्टव्यम् । एवं पूर्वोक्तमादौ निर्वर्त्य प्रायश्चित्तोत्तरं पूर्वाणि दशस्नानानि कृत्वा तत्प्रोक्तानि गोदानानि दत्त्वा पञ्चगव्यं प्राश्य तद्दिने उपोषणं कार्यम् । अशक्तश्चेद्धविष्यान्नं भुञ्जीत । ततः सुदिने चन्द्रतारानुकूल्ये पुरुषनक्षत्रे संतानगोपालविधानं कार्यम् ।

अथ विधानम् । पुरश्चरणस्य लक्षसंख्या नियमः, तथापि कलौ चतुर्गुणं कार्यं तदुक्तम् “कलौ चतुर्गुणः प्रोक्तः पुरश्चरणके विधिः ॥” इति वचनात् । तत्रादौ ऋत्विग्वरणं तत्र मूलमन्त्रजपार्थमष्टौ ब्राह्मणान् वृणुयाच्चतुरो वा । तत्र सर्वकर्माधिकारार्थं शान्तं तद्विद्विप्रमाचार्यं वृणुयात् । ततः तदङ्गत्वेन चतुर्विधवन्ध्यात्वदोषपरिहारार्थं च लक्षसंख्याकपार्थिवलिङ्गपूजनं च शतचण्डीपाठं मन्युसूक्तजपं नवग्रहजपं रुद्राध्यायजपं हरिवंशश्रवणं च कुर्यात् । तत्र ऋत्विजः स्वशक्त्यनुसारेण जपं कुर्युुरेवं मन्युसूक्तजपं लक्षसंख्याकं तदर्द्धं वा तदर्द्धं वा तदर्द्धं वा कुर्यात् । नित्यं तद्दशार्शमन्त्रितदशघटैः जलपूर्णैः दम्पती स्नायाताम् ।

‘देवकीसुत गोविन्द’ अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
‘वासुदेव जगत्पते’ तर्जनीभ्यां नमः। ‘देहि मे तनयं कृष्ण’ मध्यमाभ्यां नमः । ‘त्वामहं शरणं गतः’ अनामिकाभ्यां नमः । ‘ॐ क्लीं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।’ कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ‘देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः’ करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादि न्यासः । एवं न्यासं विधाय मूलेन त्रिव्यापकं कुर्यात् । अथ ध्यानम्—

शान्तं सम्मुखसन्निषण्णममलं रक्ताम्बुजे बालकं
माणिक्योज्ज्वलमालभूषणलसत्पीतहेमद्युतिम् ।
प्रेम्णालिंग्य मुहुर्मुहुः सुखवशात् सम्भावितं स्वात्मना
ध्यायेत् पुत्रतया पुराणपुरुषं पुत्राभिलाषी पुमान् ॥
—एवं ध्यात्वा यथोकजपं कुर्यात् ।

जपान्ते दशांशहोमं कुर्यात् । तर्पणं ब्राह्मणभोजनं च सम्पाद्य दानान्तं कृत्वा कुण्डं पूजयित्वा पुनर्मण्डलदेवतानि सम्पूज्य ( तत्र योनिकुण्डं मुख्यम् ) एवं कुण्डमण्डपादि निर्वर्त्य गणेशादिलोकपालादिवास्तुयोगिनीनवग्रहमातृकाणां स्थापनं मूलदेवतास्थापनं मण्डलदेवतास्थापनं तोरणद्वारध्वजपताकानां स्थापनं कृत्वा तत्तन्मन्त्रैः तत्तत्स्थाने सम्पूज्य कुण्डसंस्कारं कृत्वा अग्निं प्रतिष्ठाप्य दशांशेन हुत्वा तर्पणं ब्राह्मण-

वन्ध्यानां पुत्रोत्पत्त्यर्थं संतानगोपालमन्त्रविधिः ११४१


भोजनं मार्जनं मण्डलदेवतास्थापनं लोकपालानां नवग्रहादिमण्डलचतुष्टयदेवतानां च यथाशक्त्या हेमप्रतिमाः कृत्वा मूलदेवताप्रतिमां च निष्काष्टकेन वा निष्कत्रयेण सम्पाद्य अग्न्युत्तारणं कृत्वा अधिवासनादि विसर्जन्तान्तं पूजयित्वा आचार्याय निवेद्य दक्षिणां दद्यात् ।

शक्तश्चेत् कृष्णविग्रहः कर्तव्यः । पद्मोपरि निविष्टो बालकरूपेण सुवर्णनिष्काष्टकस्य सुवर्णादिनिर्मितकलशे देवतानां प्रतिकलशं स्थापयित्वा एकादशकलशांस्तदुपरि आच्छादनपात्राणि वस्त्रफलसंयुतानि संस्थाप्य कलशपूजाविधानं कृत्वा महीद्यौरिति भूमिं प्रार्थ्य तण्डुलादिधान्यराशिं कृत्वा कलशं संस्थाप्य आकलशेष्विति इमं मे गङ्गे इत्यादिना उदकं पूरयित्वा तन्मध्ये पञ्चनद्येत्यादि तीर्थोदकं दत्त्वा पञ्चरत्नानि निक्षिप्य पञ्चामृतं पञ्चगव्यं पञ्चपल्लवान् पञ्चत्वचः सप्तमृत्तिका फलानि हिरण्यं च तत्तन्मन्त्रैर्निधायाच्छाद्यासनं दत्त्वा भूमौ स्थापयेत् ।

तासां प्रतिमानामग्न्युत्तारणं विधाय प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात् तत्तन्नाम्ना पृथक्पृथक्प्राणान् संस्थाप्य इष्टदेवैः सह स्नानं कारयित्वा ततः पुरुषसूक्तादिनाऽऽऽवाहनाद्युपचारैः सम्पूज्य—

आगच्छ देव भगवन्क्लींगोपाल नमोऽस्तु ते ।
मम संतानसिद्धयर्थं सान्निध्यं कुरु सर्वदा ॥

—एवमावाहनादिषोडशोपचारैः सम्पूज्य तिलसर्पिः फलपुष्पनैवेद्यान्तं विधाय एवं नियमो द्रष्टव्यः । तिलघृतपायसेन हुत्वा देवस्य शयनार्थमान्दोलकं चामरं छत्रमादर्शं पादुकान्तं षोडशोपचारान्तपूजां विधाय पूर्णाहुतिं कृत्वा तर्पणमार्जनादि विधाय श्रेयःसम्पादनं सम्पाद्य आचार्यादिऋत्विग्भ्यो वस्त्रालङ्कारादिना संतोष्य आचार्याय मूर्तिदानं कृत्वा जापकेभ्यो दक्षिणां दत्त्वा दानपत्रे ब्राह्मणाय दक्षिणा देया—

देवतानां व्रतैर्युक्तं संतुष्टहृदयान्वितम् ।
वेदाध्ययनसंयुक्तं सपत्नीकं सपुत्रकम् ॥
सुगन्धवस्त्रमाल्याद्यैः कुण्डलैरण्डुलीयकैः ।
तस्मिन् संतानगोपालदानं भक्त्या समाचरेत् ॥

अथ दानमन्त्रः—

करुणाकर देवेश नवनीताशन प्रिय ।
देहि मे पुत्रसंतानं कुलवृद्धिकरं मम ॥

—इति दत्त्वा सुवर्णदक्षिणां दद्यात् । आचार्याय द्विगुणां गोमिथुनं दत्त्वा संतोष्य ब्राह्मणान् भोजयित्वा आशिषो गृहीत्वा यथासुखं विहरेत् । एवं कृते पुत्रवान् भवति, गोपालः स्वयमेवावतरिष्यति ।

अथ मन्त्रचन्द्रिकावचनम् । होमस्तु जीवपुत्रवृक्षस्य समिद्भिर्वा फलैः कार्यः । तदभावे तिलसर्पिषा पायसेन वा कार्यः । अत्र पार्थिवपूजनं तु एकोत्तरवृद्धिलक्षं पृथक्पृथक् कार्यं तदभावे लक्षादिविधानैः सहैकतन्त्रेण वा कार्यम् । तदुक्तं लिङ्गार्चनविधाने एकोत्तरविधाने तु पृथक्पृथक्पूजनं च कार्यं लक्षलिङ्गप्रकारे तु सहैकतन्त्रेण कारयेत् । लिङ्गविधाने होमे तु दशांशनियमो नास्ति किंतु यत्संख्याकानि लिङ्गानि पूजयेत्तावदेव तु होमयेत् ॥ तदुक्तं मन्त्रमहोदधौ—‘यत्संख्याके यजेल्लिङ्गं तत्संख्यं होममाचरेत्’ इति लिङ्गार्चनदीपिकोक्तं कुर्यात् ।

आचार्यादिवरणप्रकारः—देशकालौ संकीर्त्य अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहममुकशर्माहमाचार्यत्वेन त्वामहं वृणे । तत आचार्यः—अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहम् अमुकशर्माहं वृतोऽस्मि करिष्यामीति प्रतिवचनम् । तं वासोऽलङ्कारादिभिः पूजयेत् । एवमृत्विजोऽपि पूजयेत् ।

अथ जपविधिः ॥ स्नात्वाऽऽचम्य प्राणानायम्य देशकालौ सङ्कीर्त्य अमुकगोत्रस्य अमुकशर्मणो यजमानस्य धर्मपत्नयां चिरञ्जीवशुभसंतानप्राप्त्यर्थं लक्षादिसंख्यान्तर्गतयथोक्तसंख्यां प्रारभ्यैतत्संख्यापर्यन्तं संतानगोपालमन्त्रस्य जपमहं करिष्ये ॥ इति सङ्कल्प्य आसने उपविश्य भूशुद्धिं भूतशुद्धिं प्राणप्रतिष्ठामन्तर्मातृकाबहिर्मातृकान्यासांश्च कृत्वा तदुपरि षडङ्गानि कुर्यात् । यथा ॐक्लां हृदि । ॐ क्लीं शिरसि । ॐ क्लूं शिखायै । ॐ क्लैं कवचम् । ॐ क्लौं नेत्रम् । ॐ क्लः अस्त्रम् । एवं करन्यासादि विधाय । ॐ भूर्भुवः स्वरोमिति दिग्बन्धं कृत्वा मूलमन्त्रन्यासं च

११४२संतानगोपालविधौ
कुर्यात्। यथा क्लीं देवकीसुतसंतानगोपालस्यायुधध्यानम्—चतुर्भुजमित्यनेन गदाम्बुजे सूचिते। वामाधर्ध्वयोराद्ये तदाद्यन्ययोरन्ये इत्यायुधध्यानम्॥
शङ्खचक्रधरं देवं श्यामवर्णं चतुर्भुजम्।<br>सर्वाभरणसंदीप्तं पीतवासःसमन्वितम्॥<br>मयूरपिच्छसंयुक्तं विष्णुतेजोपवृंहितम्।<br>समर्पयन्तं विप्राय नष्टानानीय बालकान्॥<br>करुणामृतसम्पूर्णं चेष्टैकनिलयं त्वजम्॥स्त्रीभिस्तु-स्वान्ते सम्मुखसन्निविष्टममले रक्ताम्बुजे बालकं माणिक्योज्ज्वलबालभूषणगणं संतप्तहेमद्युतिम्॥ प्रेम्णाऽऽलिङ्ग्य मुहुर्मुहुः सुखवशात् संलालितं स्वात्मना पुत्रत्वेन विभावयेन्मुररिपुं पुत्रार्थिनी कामिनी॥ इति ध्यात्वा पूजादि विधाय मन्त्रो जप्यः।
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इति संतानगोपालमन्त्रानुष्ठानविधानपद्धतिः ॥

शुभम्भवतु ॥