विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंतानगोपालस्तोत्रम् । ११३५
चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।
अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥ ४१ ॥
चन्द्रमा और सूर्यरूप नेत्र धारण करनेवाले गोविन्द ! कमलनयन माधव ! देव ! जगदीश्वर ! हमें भाग्यशाली श्रेष्ठ पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४१ ॥
कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥ ४२ ॥
करुणामय ! कमलनयन ! पद्मनाभ श्रीविष्णुसे सम्मानित देवकीनन्दनन्दन श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४२ ॥
देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।
समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥ ४३ ॥
देवकीपुत्र ! श्रीनाथ ! वासुदेव ! जगत्पते ! समस्त मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाले श्रीकृष्ण ! मुझे सदा पुत्र दीजिये ॥ ४३ ॥
भक्तमन्दार गम्भीर शङ्कराच्युत माधव ।
देहि मे तनयं गोपवालवत्सल श्रीपते ॥ ४४ ॥
भक्तवाञ्छाकल्पतरो ! गम्भीर स्वभाववाले कल्याणकारी अच्युत ! माधव ! ग्वाल-बालोंपर स्नेह करनेवाले श्रीपते ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४४ ॥
श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥ ४५ ॥
श्रीकान्त ! वसुदेवनन्दन ! ईश्वर ! देवकीके प्रिय पुत्र ! भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष रूप ! जगत्प्रभो ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ४५ ॥
जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।
वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥ ४६ ॥
जगन्नाथ ! रमानाथ ! पृथ्वीनाथ ! दयानिधे ! वासुदेव ! ईश्वर ! सर्वेश्वर ! प्रभो ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४६ ॥
श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४७ ॥
श्रीनाथ ! कमलदललोचन ! वासुदेव ! जगत्पते ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥
दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४८ ॥
अपने दासोंके लिये कल्पवृक्ष ! गोविन्द ! भक्तोंकी इच्छा-पूर्तिके लिये चिन्तामणि-स्वरूप प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ; मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ४८ ॥
गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ४९ ॥
गोविन्द ! पुण्डरीकाक्ष ! रमानाथ ! महाप्रभो ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥
श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।
मत्पुत्रफलसिद्धयर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥ ५० ॥
श्रीनाथ ! कमलदललोचन ! गोविन्द ! मधुसूदन ! जनार्दन ! मैं अपने लिये पुत्ररूप फलकी सिद्धिके निमित्त आपकी आराधना करता हूँ ॥ ५० ॥
स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखाम्बुजं
विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलाङ्गम् ।
स्पृशन्तमन्यस्तनमङ्गुलीभि-
र्वन्दे यशोदाङ्कगतं मुकुन्दम् ॥ ५१ ॥
जो मैया यशोदाके मुखारविन्दकी ओर देखते हुए मन्द मुसकराहटके साथ उनके एक स्तनका दूध पी रहे हैं और दूसरे स्तनका अङ्गुलियोंसे स्पर्श कर रहे हैं तथा जिनका प्रत्येक अङ्ग उज्ज्वल आभासे प्रकाशित होता है, मैया यशोदा-के अङ्कमें बैठे हुए उन बाल-मुकुन्दकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ५१ ॥
याचेऽहं पुत्रसंतानं भवन्तं पद्मलोचन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ५२ ॥
कमललोचन ! मैं आपसे पुत्र-संततिकी याचना करता हूँ । श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ५२ ॥
अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।
शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥ ५३ ॥
जगत्पते ! हमें पुत्रकी प्राप्ति हो, इस उद्देश्यसे हम आपका चिन्तन करते हैं। आप मुझे शीघ्र पुत्र प्रदान कीजिये। मुनिवन्दित श्रीकृष्ण ! आपको मुझे अवश्य मेरी प्रार्थित वस्तु संतान देनी चाहिये ॥ ५३ ॥
वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।
कुरु मां पुत्रवन्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥ ५४ ॥