विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११३० | संतानगोपालविधौ
( ३ ) सनत्कुमारोक्त संतानगोपालमन्त्र
विनियोग
ॐ अस्य श्रीसंतानगोपालमन्त्रस्य श्रीनारद ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीकृष्णो देवता, ग्लौं बीजम्, नमः शक्तिः, पुत्रार्थे जपे विनियोगः।
अङ्गन्यास
इस मन्त्रका अङ्गन्यास ठीक वैसा ही है, जैसा कि द्वितीय-मन्त्रका है। अथवा—
'देवकीसुत गोविन्द' हृदयाय नमः। 'वासुदेव जगत्पते' शिरसे स्वाहा। 'देहि मे तनयं कृष्ण' शिखायै वषट्। 'त्वामहं शरणं गतः' कवचाय हुम्। 'देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥' अस्त्राय फट्।
ध्यान
शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम्।
अङ्के शयानं देवक्याः सूतिकामन्दिरे शुभे॥
एवं रूपं सदा कृष्णं सुतार्थे भावयेत् सुधीः॥
'उत्तम बुद्धिवाला साधक पुत्रकी प्राप्तिके लिये सदा ऐसे रूपवाले जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करे, जो मङ्गलमय सूतिकागारमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये देवकीके अङ्कमें शयन करते हैं'।
सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है—
ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥
इसका भी तीन लाख जप करे।
इस मन्त्रके पूजन आदिका विधान जैसा सनत्कुमारजीने बताया है, इस प्रकार है—वैष्णव¹ पीठपर देवताओंका आवाहन करके उनकी पूजा करे। प्रथम आवृत्ति (आवरण) में छः कोणोंमेंसे आग्नेय-कोणमें 'हृदयाय नमः' नैऋत्य कोणमें 'शिरसे स्वाहा', 'वायव्यकोणमें 'शिखायै वषट्', ईशानकोणमें 'कवचाय हुम्' अग्रभागमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा पूर्व आदि चारों दिशाओंमें 'अस्त्राय फट्' इस प्रकार मन्त्रोच्चारणपूर्वक क्रमशः हृदय आदि अङ्गोंकी पूजा करे।
दूसरे आवरणमें पीठकी पूर्व आदि आठ दिशाओंमें क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशानकी पूजा करे।
तथा तीसरे आवरणमें उन्हीं दिशाओंमें क्रमशः वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, पाश, अङ्कुश, गदा और शूलकी पूजा करे।
शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको आधी रातके समय भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। पूजाके लिये स्वस्तिककी रचना करके उसपर घीसे भरा हुआ सकोरा या कोसा स्थापित करे। फिर उसमें रूईकी बत्ती डालकर उत्तम दीप प्रज्वलित करे। तत्पश्चात् अष्टदल कमल बनाकर उसमें स्थापित हुए श्रीकृष्णकी पूजा करे। फिर दो कलशोंको जलसे भरकर उनकी विधिवत् स्थापना करके सम्पूर्ण उपचारोंसे युक्त पूजा करे। तत्पश्चात् उन कलशोंमें भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन करके पुनः उनका पूर्वोक्त रीतिसे पूजन करे। तदनन्तर उन दोनों कलशोंका स्पर्श करके अनन्यभावसे एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार उपर्युक्त मन्त्रका जप करे। इसके बाद द्वादशीको गोविन्दकी विधिवूर्वक पूजा करके अगहनीके चावलकी स्वादिष्ट खीर तथा गायके घी और गुड़से युक्त पकवानका भोग अर्पण करे। इन सबके साथ सामयिक फल भी होना चाहिये। इसके अतिरिक्त दाल, भात, स्वादिष्ट सुस्निग्ध व्यञ्जन, कपिला गायके दूधका दही और खाँड भी रहना चाहिये। इन समस्त भोज्य पदार्थोंको सोनेके पात्रमें रखकर इनके पात्रभूत भगवान् विष्णुको इन्हें निवेदन करे। साथ ही शीतल कर्पूर और गुलाबसे सुवासित तथा कपड़ेसे छाना हुआ स्वच्छ जल अर्पण करे।
इसके बाद अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार शुद्धबुद्धिसे भगवान् श्रीकृष्णमें श्रद्धा रखते हुए अपनी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्तिके लिये ब्राह्मणोंको भोजन दे। संस्कारयुक्त अग्निमें भगवान् विष्णुका आवाहन करके अर्घ्य आदिसे उनका पूजन करे। फिर १०८ बार या २८ बार हविष्य (खीर) की आहुति देकर शेष हविष्यको कहीं सुरक्षित रख दे। इसके बाद घीकी ८०० आहुतियाँ दे। हुतशेष घृतको उक्त दोनों कलशोंमें गिराकर उनके घृतमिश्रित जलद्वारा दम्पती (यजमान और उसकी पत्नी दोनों) का अभिषेक करे। तदनन्तर जलमय श्रीहरिका ध्यान करते हुए ब्राह्मण पुनः उन कलशोंके जलसे उन दोनोंका अभिषेक करके एक सौ आठ बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करनेके पश्चात् शेष रखे हुए हविष्यको यजमान-पत्नीके हाथमें दे दे।
यजमान-पत्नी उस हविष्यको लेकर श्रीकृष्णका ध्यान करती हुई एक सुखद आसनपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और उसका भक्षण करे; उस समय यह भावना करे कि इस हविष्यके साथ भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं मेरे उदरमें आकर विराजमान हुए हैं। फिर जब श्रेष्ठ ब्राह्मणलोग अच्छी तरह भोजन कर लें, तब यजमान पान और मोदक आदिसे उन्हें
१. वैष्णव पीठ एवं देवपूजनकी विधि कल्याणके नारद-विष्णु-पुराणाङ्कमें पृष्ठ ३५७ से ३६४ तक विस्तारपूर्वक दी गयी है, उसे पढ़कर उसीके अनुसार पूजन करना चाहिये।