विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंतानगोपालमन्त्रविधिः ११३१
तृत करे। तत्पश्चात् वह श्रीविष्णुके चिन्तनपूर्वक उन ब्राह्मणो-के चरणोंमें मस्तक झुकावे। उस समय ब्राह्मणलोग यजमान दम्पतीसे यह कहें कि 'आप दोनोंके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो।' फिर वे निष्पाप दम्पती यह भावना करते हुए कि 'अब हमारा मनोरथ सफल हो गया' अत्यन्त प्रसन्न हो स्वयं भी भोजन करें।
जो ब्राह्मण इस प्रकार धन खर्च करनेमें कंजूसी न करके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके प्रति भक्तिभावसे युक्त हो इस प्रकार पूजन आदि करता है, वह शीघ्र ही तेजस्वी एवं चिरायु पुत्र प्राप्त कर लेता है। उसका वह पुत्र भी वंश-परम्पराको चलानेवाला, विष्णुभक्त एवं परम बुद्धिमान् होता है।
जो श्रेष्ठ द्विज दरिद्र होनेके कारण ऐसा न कर सके, वह यदि पूर्वोक्त मन्त्रका जप एवं तर्पण करे तो उसे भी पुत्र प्राप्त हो सकता है।
मन्त्रसारोक्त संतानकर यन्त्र
पहले अष्टदल कमल बनाकर उसकी कर्णिकामें 'क्लीं' इस कामबीजका उल्लेख करे। फिर वहीं यजमान पति पत्नीके नाम और उसकी कामना भी लिख दे। यथा—'अमुकस्य धर्मपत्न्याः अमुकदेव्याः पुत्रं कुरु-कुरु।' फिर आठ दलोंके निम्न भागोंमें दो-दो करके अकारादि सोलह स्वरोंको अङ्कित करे तथा उन्हींके ऊपरी भागोंमें संतानगोपाल-मन्त्रके चार-चार अक्षरोंको लिखे। फिर उन दलोंके बाह्य भागमें एक गोल रेखा खींचकर उसे ककारादि वर्णोंसे अवेष्टित करे। तत्पश्चात् उस वृत्तके बाहर चतुष्कोण बनावे। किसी पात्रमें माखन रखकर उसपर यह यन्त्र अङ्कित करे अथवा सूक्ष्म स्वर्ण आदिके पत्रपर इस यन्त्रको लिखे। यन्त्रसे अङ्कित नवनीतको नारी खा जाय और स्वर्णादि पत्रोंपर लिखे हुए यन्त्रको वह धारण करे। इससे वह पुत्रको जन्म देती है।
(शारदातिलकमें बताये अनुसार यह संतान-गोपालके मन्त्रकी अनुष्ठानविधि यहाँ दी गयी है।)
[यन्त्र-विवरण]
दिशाएँ: पू (पूर्व - ऊपर), प (पश्चिम - नीचे), उ (उत्तर - बाएँ), द (दक्षिण - दाएँ)
-
मध्य (कर्णिका):
अमुकनाम
देव्याः पुत्रं
क्लीं कुरु कुरु -
अष्टदल (भीतर के स्वर):
अ आ | इ ई | उ ऊ | ऋ ॠ | ऌ ॡ | ए ऐ | ओ औ | अं अः -
अष्टदल (बाह्य मन्त्र-भाग):
देवकीसु- | त गोविन्द | वासुदेव | जगत्पते । | देहि मे तन- | यं कृष्ण | त्वामहं श- | रणं गतः ॥ -
वृत्त-परिधि (मातृका-वर्ण):
क ख ग घ ङ | च छ ज झ ञ | ट ठ ड ढ ण | त थ द ध न | प फ ब भ म | य र ल व | श ष स ह | क्ष त्र ज्ञ