भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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११३८ | संतान गोपाल विधौ


कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८७ ॥
भावार्थ : कल्याणप्रद गोविन्द ! मुनिवन्दित मुरशत्रु श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥८७॥

पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८८ ॥
भावार्थ : पुत्रदाता मुकुन्द ! ईश्वर ! रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८८ ॥

पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ८९ ॥
भावार्थ : पुण्डरीकाक्ष ! गोविन्द ! वासुदेव ! जगदीश्वर! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ८९ ॥

दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ९० ॥
भावार्थ : दयानिधे ! वासुदेव ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥९०॥

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।
वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्रलाभप्रदायिनम् ॥ ९१ ॥
भावार्थ : पुत्र और सम्पत्तिके दाता, पुत्र-लाभदायक, देवपूजित गोविन्द श्रीकृष्णकी हम सदा वन्दना करते हैं ॥ ९१ ॥

कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।
नमस्ते पुत्रलाभार्थं देहि मे तनयं विभो ॥ ९२ ॥
भावार्थ : प्रभो ! आप करुणाके सागर, गोपियोंके प्राणवल्लभ और मुरनामक दैत्यके शत्रु हैं, पुत्रकी प्राप्तिके लिये आपको मेरा नमस्कार है, मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ९२ ॥

नमस्तस्मै रमेशाय रुक्मिणीवल्लभाय ते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ९३ ॥
भावार्थ : लक्ष्मीके स्वामी तथा रुक्मिणीके प्राणवल्लभ ! आप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है । गोपबालकोंके नायक श्री-कान्त ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ ९३ ॥

नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।
पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रङ्गशायिने ॥ ९४ ॥
भावार्थ : सदा ही श्रीजीकी कामना रखनेवाले आप वासुदेवको नमस्कार है । आप पुत्रदायक, नागराज शेषकी शय्यापर शयन करनेवाले तथा श्रीरङ्ग-क्षेत्रमें सोनेवाले हैं, आपको नमस्कार है ॥ ९४ ॥

रङ्गशायिन् रमानाथ मङ्गलप्रद माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥ ९५ ॥
भावार्थ : रङ्गशायी रमानाथ ! मङ्गलदायक माधव ! गोपबालक-नायक श्रीपते ! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ९५ ॥

दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।
सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ॥ ९६ ॥
भावार्थ : दीनोंके लिये कल्पवृक्षस्वरूप रघुनन्दन ! मुझ दासको पुत्र दीजिये । रमापते ! पुत्र दीजिये । पुत्र दीजिये !! पुत्र दीजिये !!! ॥ ९६ ॥

यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरतः सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ९७ ॥
भावार्थ : सदा मनोवाञ्छित पुत्र देनेमें तत्पर रहनेवाले यशोदा-नन्दन श्रीकृष्ण ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ ९७ ॥

मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ ९८ ॥
भावार्थ : मेरे इष्टदेव गोविन्द ! वासुदेव ! जनार्दन ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ ९८ ॥

नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजायते ।
भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ॥ ९९ ॥
भावार्थ : भगवान् ! इन्द्रपूजित वासुदेव ! आपकी कृपासे नीतिज्ञ, धनवान् और विद्वान् पुत्र उत्पन्न होता है ॥ ९९ ॥

यः पठेत् पुत्रशतकं सोऽपि सत्पुत्रवान् भवेत् ।
श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ॥ १०० ॥
भावार्थ : जो श्रीवासुदेवकथित पुत्रशतकका पाठ करता है, वह भी उत्तम पुत्रसे सम्पन्न होता है । यह स्तोत्ररत्न सुखकी भी प्राप्ति करानेवाला है ॥ १०० ॥

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं धियम् ।
ऐश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशयः ॥ १०१ ॥
भावार्थ : जो प्रतिदिन जपके समय इसका पाठ करता है, उसे तत्काल पुत्रलाभ होता है तथा वह शीघ्र ही धन, सम्पत्ति, ऐश्वर्य एवं राजसम्मान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १०१ ॥

॥ इति श्रीसंतानगोपालस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥