विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1160, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंतानगोपालस्तोत्रम्
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥ १४ ॥
लक्ष्मीपते ! पद्मनाभ ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । मैं आपकी शरणमें आया हूँ ॥ १४ ॥
कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।
नमामि पुत्रलाभार्थं सुखदाय बुधाय ते ॥ १५ ॥
आप कार्य-कारणरूप, सुखदायक एवं विद्वान् हैं। मैं पुत्रकी प्राप्तिके लिये आप वासुदेवको सदा नमस्कार करता हूँ ॥ १५ ॥
राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।
तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥ १६ ॥
राजीवनेत्र ( कमलनयन ) ! रावणारे ( रावणके शत्रु ) ! हरे ! कवे ( विद्वन् ) ! देवेश्वर ! विष्णो ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आप मुझे पुत्र प्रदान कीजिये ॥ १६॥
अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥ १७ ॥
जगदीश्वर ! मै अपने लिये पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे आपकी आराधना करता हूँ । रमावल्लभ ! वासुदेव ! श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ १७ ॥
श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।
देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥ १८ ॥
मानिनी श्रीराधाके मानका अपहरण करनेवाले तथा अपनी आराधना करनेवाली गोपाङ्गनाओंके वस्त्रको यमुना-तटसे हटा ( कर उन्हे सुख प्रदान कर )नेवाले जगन्नाथ वासुदेव श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये ॥ १८ ॥
अस्माकं पुत्रसम्प्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।
रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥ १९ ॥
यदुनन्दन ! रमापते ! वासुदेव ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! हमें पुत्रकी प्राप्ति कराइये ॥ १९ ॥
वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।
पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥ २० ॥
वासुदेव ! मुझे बेटा दीजिये । माधव ! मुझे तनय ( संतान ) दीजिये । श्रीकृष्ण ! मुझे पुत्र दीजिये । महाप्रभो ! मुझे वत्स ( बच्चा ) दीजिये ॥ २० ॥
डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।
भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥ २१ ॥
श्रीकृष्ण ! मुझे डिम्भक ( पुत्र ) दीजिये । रघुनन्दन ! मुझे आत्मज ( औरस पुत्र ) दीजिये । भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरूप नन्दनन्दन ! मुझे तनय दीजिये ॥ २१ ॥
नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।
कमलानाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥ २२ ॥
श्रीकृष्ण ! वासुदेव ! जगत्पते ! कमलानाथ ! गोविन्द ! मुनिवन्दित मुकुन्द ! मुझे आनन्ददायक पुत्र प्रदान कीजिये ॥ २२ ॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।
सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥ २३ ॥
प्रभो ! यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं है । आप ही मेरे शरणदाता हैं । मुझे पुत्र दीजिये । सम्पत्ति दीजिये । सम्पत्ति और पुत्र दोनों प्रदान कीजिये ॥ २३ ॥
यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनम् ।
वन्देऽहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥ २४ ॥
यशोदाजीके स्तनोंके दुग्धपानके रसको जाननेवाले और उनका स्तनपान करनेवाले, भूरे नेत्रोंसे सुशोभित यदुनन्दन श्रीकृष्णकी मैं सदा वन्दना करता हूँ । इससे मुझे पुत्रकी प्राप्ति हो ॥ २४ ॥
नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।
रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥ २५ ॥
देवेश्वर ! नन्दनन्दन ! प्रभो ! मुझे आनन्ददायक पुत्र दीजिये । रमापते ! वासुदेव ! जगन्नाथ ! मुझे धन और पुत्र दीजिये ॥ २५ ॥
पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।
अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥ २६ ॥
माधव ! पुत्र और धन ( दीजिये ), धन और पुत्र ( दीजिये ), मुझे पुत्र प्रदान कीजिये । श्रीपते ! हमारे दीनता-पूर्ण वचनपर ध्यान दीजिये ॥ २६ ॥
गोपालडिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।
अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥ २७ ॥