विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1142, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ११५५
जपसे हरिवंश-श्रवणकी सफलता बतायी है। पहले पितरोंका तर्पण करके आत्मशुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करे ॥ १ ॥
सुमण्डपं च कर्तव्यं तत्र स्थाप्यो हरिस्तथा।
कृष्णमुद्दिश्य मन्त्रेण चरेत् पूजाविधिं क्रमात् ॥ २ ॥
उत्तम मण्डप बनावे और उसमें श्रीहरिकी स्थापना करे, फिर भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे मन्त्रद्वारा क्रमशः पूजा-विधि सम्पन्न करे ॥ २ ॥
प्रदक्षिणानमस्कारान् पूजान्ते स्तुतिमाचरेत्।
संसारसागरे मग्नं दीनं मां करुणानिधे ॥ ३ ॥
कर्मग्राहगृहीतोऽहं मामुद्धर भवार्णवात्।
पूजाके अन्तमें प्रदक्षिणा और नमस्कार करके इस प्रकार स्तुति करे—'करुणानिधे ! मैं इस संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। मुझे कर्मरूपी ग्राहने पकड़ रखा है। आप मुझ दीनका इस भवसागरसे उद्धार कीजिये ॥ ३३ ॥
ततः श्रीहरिवंशस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
विधिना षोडशेनैव धूपदीपसमन्विता।
तदनन्तर धूप, दीप आदि सामग्रियोंसे षोडशोपचारकी विधिके अनुसार प्रयत्नपूर्वक श्रीहरिवंशकी भी पूजा करनी चाहिये ॥ ४ ॥
ततस्तु श्रीफलं धृत्वा नमस्कारं समाचरेत् ॥ ५ ॥
स्तुतिः प्रसन्नचित्तेन कर्तव्या केवलं तदा।
तदनन्तर पुस्तकके आगे श्रीफल ( नारियल ) रखकर नमस्कार करे और उस समय प्रसन्नचित्तसे अनन्यभावपूर्वक इस प्रकार स्तुति करे—॥ ५३ ॥
स्वीकृतोऽसि मया नाथ पुत्रार्थं भवसागरे ॥ ६ ॥
मनोरथो मदीयोऽयं सफलः सर्वथा त्वया।
निर्विघ्नेनैव कर्तव्यो दासोऽहं तव केशव ॥ ७ ॥
'नाथ ! मैंने इस भवसागरमें पुत्रकी प्राप्तिके लिये आपकी शरण ली है। केशव ! मेरे इस मनोरथको किसी विघ्न-बाधाके बिना ही आप सब प्रकारसे सफल करें। मैं आपका दास हूँ' ॥ ६-७ ॥
एवं दीनबचः प्रोक्त्वा वक्तारं चाथ पूजयेत्।
सम्पूज्य वस्त्रभूषाभिः पूजान्ते तं च संस्तवेत् ॥ ८ ॥
इस प्रकार दीन वचन कहकर वक्ताको वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित करके उसका पूजन करे और पूजनके पश्चात् उसकी इस प्रकार स्तुति करे—॥ ८ ॥
व्यासरूप प्रबोधज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।
एतत्कथाप्रकाशेन मदज्ञानं विनाशय ॥ ९ ॥
'व्यासरूप महानुभाव ! आप समझानेकी कलामें निपुण और समस्त शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं। इस हरिवंशकी कथाको प्रकाशित करके आप मेरे अज्ञानको दूर कीजिये' ॥
तदग्रे नियमः पश्चात् कर्तव्यः श्रेयसे मुदा।
नवरात्रं यथाशक्त्या धारणीयः स एव हि ॥ १० ॥
वरणं पञ्चविप्राणां कथाभङ्गनिवृत्तये।
कर्तव्यं तैर्हरेर्जाप्यं द्वादशाक्षरविद्यया ॥ ११ ॥
संतानगोपालमन्त्रो महारुद्रजपस्तथा।
पूजनं पार्थिवस्यैव गणनाथमन्त्रोजपः ॥ १२ ॥
तदनन्तर वक्ताके आगे अपने कल्याणके लिये प्रसन्नता-पूर्वक नियम ग्रहण करे और यथाशक्ति नौ दिनोंतक निश्चय ही उसका पालन करे। कथामें कोई विघ्न न पड़े, इसके लिये पाँच ब्राह्मणोंका वरण करना चाहिये और उन ब्राह्मणों-को द्वादशाक्षर मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) का जप, संतानगोपालमन्त्रका जप, महारुद्रमन्त्रका जप, पार्थिवपूजन तथा गणेशमन्त्रका जप करना चाहिये ॥ १०-१२ ॥
ब्राह्मणान् वैष्णवांश्चान्यांस्तथा कीर्तनकारिणः।
नत्वा सम्पूज्य दत्ताज्ञः स्वयमासनमाविशेत् ॥ १३ ॥
इसके बाद वहाँ उपस्थित हुए ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा कीर्तन करनेवाले अन्य लोगोंको भी नमस्कार करके उनकी पूजा करे और उनसे आज्ञा लेकर स्वयं श्रोताके आसन-पर बैठे ॥ १३ ॥
लोकवित्तधनागारसर्वचिन्ता व्युदस्य च।
कथाचित्तः शुद्धमतिः स लभेत् फलमुत्तमम् ॥ १४ ॥
जो पुरुष लोक, सम्पत्ति, धन और घर आदिकी सारी चिन्ता छोड़कर शुद्ध बुद्धिसे केवल कथामें ही मन लगाये रहता है, उसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
दम्पती शुद्धमनसौ श्रद्धाभक्तिसमन्वितौ।
श्रद्धैव सर्वधर्माणां मातेव हितकारिणी ॥ १५ ॥
कथा सुननेवाले पति-पत्नी शुद्ध हृदयसे श्रद्धा और भक्तिके साथ कथा सुनें। सब धर्मोंमें श्रद्धा ही माताके समान हितकारिणी है ॥ १५ ॥
श्रद्धयैव नृणां सिद्धिर्जायते लोकयोर्द्वयोः।
श्रद्धया भजतः पुंसः शिलापि फलदायिनी ॥ १६ ॥
श्रद्धासे ही मनुष्योंको इहलोक और परलोकमें सिद्धि प्राप्त होती है। श्रद्धापूर्वक आराधना करनेवाले पुरुषको शिला भी अभीष्ट फल देनेवाली है ॥ १६ ॥
मूर्खोऽपि पूजितो भक्त्या गुरुर्भवति ज्ञानदः।
श्रद्धया भजतो मन्त्रस्त्वसद् योऽपि फलप्रदः ॥ १७ ॥