भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1141
१११४श्रीहरिवंशमाहात्म्ये

स्थानमें कुशासनपर बैठकर प्रतिदिन उल्लासपूर्ण प्रसन्नचित्त हो कथा श्रवण करे ॥ ३१ ॥

बालो युवाथ वृद्धो वा दरिद्रो दुर्बलोऽपि वा ।
पुराणज्ञः सदा वन्द्यः पूज्यश्च सुकृतार्थिभिः ॥ ३२ ॥
पुराणज्ञ पुरुष बालक हो या जवान, बूढ़ा हो या दरिद्र एवं दुर्बल, पुण्यकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके लिये वह सदा ही वन्दनीय एवं पूजनीय है ॥ ३२ ॥

नीचबुद्धिं न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन ।
यस्य वक्त्रोद्गता वाणी कामधेनुः शरीरिणाम् ॥ ३३ ॥
जिसके मुखसे निकली हुई वाणी देहधारियोंके लिये कामधेनुके तुल्य है, उस पुराणवेत्ता विद्वान्‌के प्रति कभी नीचबुद्धि न करे ॥ ३३ ॥

गुरवः सन्ति लोकस्य जन्मतौ गुणतश्च ये ।
तेषामपि च सर्वेषां पुराणज्ञः परो गुरुः ॥ ३४ ॥
जगत्‌के मनुष्योंके लिये जो जन्मसे और गुणोंकी शिक्षा देनेके कारण गुरु हैं, पुराणका विद्वान् उन सबका भी परम गुरु है ॥ ३४ ॥

भवकोटिसहस्रेषु भूत्वा भूत्वा च सीदते ।
यो ददाति पुण्यवृत्तिं कोऽन्यस्तस्मात् परो गुरुः ॥ ३५ ॥
कोटि सहस्र जन्मोंमें बारंबार उत्पन्न होकर कष्ट पानेवाले जीवको जो पुराणकथा सुनाकर पुण्यवृत्ति प्रदान करता है, उससे श्रेष्ठ गुरु दूसरा कौन है ? ॥ ३५ ॥

पुराणज्ञः शुचिर्दान्तः शान्तोऽपि जितमत्सरः ।
साधुः कारुण्यवान् वाग्मी वदेत् पुण्यकथां सुधीः ॥ ३६ ॥
जो पुराणोंका ज्ञाता, पवित्र, जितेन्द्रिय, शान्त, मात्सर्यरहित, साधु और दयालु है, वह विद्वान् वक्ता पुराणोंकी पुण्यकथा कहे ॥ ३६ ॥

व्यासासनसमारूढो यदा पौराणिकौ द्विजः ।
आ समाप्तैः प्रसंगस्य नमस्कुर्यान्न कस्यचित् ॥ ३७ ॥
पुराणवेत्ता द्विज जब व्यासासनपर आरूढ हो जाय, तबसे कथा-प्रसंगकी समाप्तितक वह दूसरे किसीको नमस्कार न करे ॥ ३७ ॥

ये धूर्ता ये च दुर्वृत्ता ये चान्ये विजिगीषवः ।
तेषां कुटिलवृत्तीनामग्रे नैव वदेत् कथाम् ॥ ३८ ॥
जो धूर्त हों, जो दुराचारी हों तथा दूसरे जो-जो तर्कसे हरानेकी इच्छा रखकर आये हों, उन कुटिल वृत्तिवाले मनुष्योंके सामने कभी कथा न कहे ॥ ३८ ॥

न दुर्जनसमाकीर्णे न शूद्रश्वापदावृते ।
देशे नापूतसद्मने वदेत् पुण्यकथां सुधीः ॥ ३९ ॥
जो स्थान दुर्जनोंसे भरा हो, शूद्रों और हिंसक जन्तुओंसे आवृत्त हो वहाँ और अपवित्र गृहमें विद्वान् पुरुष कभी पुराणोंकी पवित्र कथा न कहे ॥ ३९ ॥

सद्ग्रामे सुजनाकीर्णे सुक्षेत्रे देवालये ।
पुण्ये नदनदीतीरे वदेत् पुण्यकथां सुधीः ॥ ४० ॥
सज्जनोंसे भरे हुए अच्छे ग्राममें, उत्तम क्षेत्रमें, देवताके मन्दिरमें तथा नदों और नदियोंके पावन तटपर विद्वान् वक्ता पुण्यकथाका उपदेश करे ॥ ४० ॥

ईदृशाद् वाचकाद् राजञ्छ्रुत्वा फलमवाप्नुयात् ।
ऐहिकामुष्मिकं शर्म पुण्यं पुत्रादिसिद्धिदम् ॥ ४१ ॥
महापापादिशमनं पुराणं हरिवंशकम् ।
राजन् ! ऐसे वाचकसे कथा सुनकर मनुष्य अभीष्ट फलको पा लेता है। हरिवंशपुराण इहलोक और परलोकमें भी कल्याणकारी, पुण्यदायक, पुत्र आदि अभीष्ट वस्तुओंकी सिद्धि देनेवाला तथा बड़े-बड़े पाप आदिका शमन करने-वाला है ॥ ४१½ ॥

योज्यं पुत्रादिसिद्ध्यर्थं हरिवंशं जितेन्द्रियैः ॥ ४२ ॥
शृणुयात् सर्वभावेन पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥ ४३ ॥
जितेन्द्रिय पुरुषोंको पुत्र आदिकी सिद्धिके लिये हरिवंशका सहारा लेना चाहिये । इस पुण्यदायक और पापनाशक पुराणको पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रताके साथ सुनना चाहिये ॥ ४२-४३ ॥


इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणमें हरिवंशमाहात्म्यके अन्तर्गत श्रवण आदिकी विधिक प्रतिपादनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥


तृतीयोऽध्यायः

( २ ) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल

वैशम्पायन उवाच
जपादिश्ववणं प्रोक्तं हरिवंशस्य सूरिभिः ।
पितॄन् संतर्प्य शुद्धयर्थं प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन् ! विद्वान् पुरुषोंनि...