विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1140, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ११९३
अद्येहेत्यादिदेशकालौ स्मृत्वा अमुकगोत्रस्यामुकप्रवरस्यामुकशर्मणः सपत्नीकस्य मम जन्मनि जन्मनि संचितमहापातकरूपढलनाशपूर्वकं तेन पापसंचयेन कृतसंतानबाधकताविनाशपूर्वकमिह जन्मनि संतानोत्पत्तिहेतवे तस्य संतानस्य शरदां शतमायुषो वृद्धयर्थमात्मनश्च सकलसुखाप्तिहेतवे इह शरीरशुद्धयर्थं परत्र चेन्द्रादिलोकातिक्रमणपूर्वकं श्रीमद्विष्णुभक्त्युद्रेकजनितकल्पावधितल्लोकगमनतत्रवासपूर्वकत्तत्स्वरूपावाप्तिहेतवे आवां दम्पती श्रीमद्धरिवंशपुराणश्रवणं कर्तृकतया करिष्यावहे । अन्यतरकर्तृत्वे करिष्ये इत्येवसंकल्पः ।
आज यहाँ इत्यादिरूपसे वर्तमान देशकालका स्मरण करके यजमान यों कहे—अमुक गोत्र, अमुक प्रवर और अमुक नाम और जातिवाले मुझ सपत्नीक यजमानके जन्म-जन्मान्तरोंमे संचित महापातकसमूहोंके नाशपूर्वक उस पापसंचयसे होनेवाली संतानबाधाका निवारण करके इस जन्ममें संतानोत्पत्तिके उद्देश्यसे और उस संतानकी आयु बढ़कर सौ वर्षोंकी हो जाय—इस अभिलाषासे अपनेको भी सम्पूर्ण सुखोंकी प्राप्ति हो—इस कामनासे इहलोकमें शरीरकी शुद्धिके लिये और परलोकमें इन्द्रादि लोकोंको लाँघकर भगवान् विष्णुकी भक्तिके उद्रेकसे सुलभ विष्णुलोकमें गमन और वहाँ एक कल्पतक निवासपूर्वक अन्ततोगत्वा भगवत्स्वरूपकी प्राप्तिके लिये हम दोनों दम्पती यज्ञकर्तारूपसे हरिवंशपुराणका श्रवण करेंगे। यदि पति और पत्नीमेंसे कोई एक ही कथाश्रवणका कर्ता हो तो एकवचन 'करिष्ये' (करूँगा) ऐसी क्रिया बोलकर संकल्प करना चाहिये ।
इति कृत्वा तु संकल्पं वक्तारं वृणुयात्ततः ।
श्रुताध्ययनसम्पन्नं पूजयित्वा यथाविधि ॥ २४ ॥
इस प्रकार संकल्प करनेके अनन्तर वेद-शास्त्रोंके अध्ययनसे सम्पन्न वक्ताका विधिपूर्वक पूजन करके उसका वरण करे ॥ २४ ॥
सुवर्णमुद्रिकां गृह्य कुण्डले च विशेषतः ।
धौतवस्त्रं सोत्तरीयं चोष्णीषेण समन्वितम् ॥ २५ ॥
सुवर्णषोडशपलं पुष्पताम्बूलसंयुतम् ।
पूगीफलं चाक्षतान् वै गृहीत्वा शुद्धमानसः ॥ २६ ॥
सोनेकी अँगूठी, विशेषतः दो सुवर्णमय कुण्डल, धोती, चादर, पगड़ी, सोलह पल सुवर्ण, फूल, पान, सुपारी और अक्षत लेकर शुद्ध-चित्त हो निम्नांकितरूपसे संकल्प बोलकर वक्ताका वरण करे ॥ २५-२६ ॥
**संकल्प:—**अद्येहेत्यादिअमुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणनेभिश्चन्दनताम्बूलसुवर्णवस्त्रादिभिर्हरिवंशश्रवणे वाचकत्वेनावां दम्पती त्वां वृणीवहे ।
( १ ) वरणका संकल्प इस प्रकार है—आज यहाँ इत्यादिरूपसे वर्तमान देशकालका स्मरण करके यजमान यों कहे—हम दोनों दम्पती अमुकगोत्रवाले, अमुक शर्मा ब्राह्मणका इन चन्दन, ताम्बूल, सुवर्ण और वस्त्र आदि उपकरणोंद्वारा हरिवंश सुनानेके लिये वाचक (व्यास) रूपसे वरण करते हैं।
वृतोऽस्मीति तेनोक्ते—
( २ ) फिर वाचक कहे—'मेरा वरण हो गया' उसके ऐसा कहनेपर—
व्रतेन दीक्षामानोति इति मन्त्रेण वक्तुर्दक्षिणकरमूले रक्षाबन्धनं कार्यम् । ब्राह्मणेन श्रोतॄणां रक्षाबन्धनं कार्यम् ।
( ३ ) यजमान 'व्रतेन दीक्षामानोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्, दक्षिणा श्रद्धामानोति श्रद्धया सत्यमाप्यते' अर्थात् 'साधक व्रतसे दीक्षाको पाता है, दीक्षासे दक्षिणाको और दक्षिणासे श्रद्धाको पा लेता है। फिर उस श्रद्धासे सत्यकी प्राप्ति होती है।' इस मन्त्रसे वक्ताके दाहिने हाथके मूलभागमें रक्षाबन्धन करे, तत्पश्चात् ब्राह्मणको श्रोताओंके हाथमें भी रक्षाबन्धन करना चाहिये।
चन्दनाद्युपचारैस्तु वस्त्रपुष्पाक्षतैस्तथा ।
हेमालंकरणैः पूगैः फलैर्ऋतुसमुद्भवैः ॥ २७ ॥
पुराणपूजनं प्रोक्तं विधिना षोडशेन तु ।
( ४ ) तदनन्तर चन्दनादि उपचारोंसे तथा वस्त्र, पुष्प, अक्षत, सुवर्णमय आभूषण, सुपारी और ऋतुफल आदिसे षोडशोपचारकी विधिद्वारा पुराणका पूजन करना आवश्यक बताया गया है ॥ २७ ॥
पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठाञ्छ्रवणं फलदं स्मृतम् ॥ २८ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्रोतव्यं विधिपूर्वकम् ।
श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके हरिवंशका श्रवण करना अभीष्ट फलदायक माना गया है, इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके विधिपूर्वक इसका श्रवण करना चाहिये ॥ २८३ ॥
अथ व्यासं नमस्कुर्युर्मन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥ २९ ॥
नमस्ते भगवन् व्यास सर्वशास्त्रार्थकोविद ।
ब्रह्मविष्णुमहेशानमूर्ते सत्यवतीसुत ॥ ३० ॥
तदनन्तर सभी श्रोता व्यासको नमस्कार करें ! उस समय यजमान इस मन्त्रका उच्चारण करे—'समस्त शास्त्रोंके अर्थको जाननेवाले, ब्रह्मा, विष्णु, शिवस्वरूप, सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास ! आपको नमस्कार है' ॥ २९-३० ॥
इति व्यासं नमस्कृत्य शुभदेशे कुशासने ।
उपविश्य प्रतिदिनमुल्लसत्प्रीतमानसः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार व्यासको नमस्कार करके सुन्दर पवित्र