भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1139, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 1139

१११२ | श्रीहरिवंशमाहात्म्ये


घरकी सारी सामग्री उठाकर एक कोनेमें रख दे और कथाके लिये एक ऊँचा मण्डप तैयार कराये, जो केलेके खम्भोंसे सुशोभत हो ॥ ९ ॥
फलपुष्पदलैर्बिम्बैश्चवितानैन विराजितः ।
चतुर्दिक्षु ध्वजारोपस्तोरणेन विराजितः ॥ १० ॥
उसे सब ओर फल, फूल, पल्लव और चंदोवेसे अलंकृत करे । चारों दिशाओंमें ध्वजारोपण करे । उस मण्डपमें सुन्दर फाटक लगाकर उसकी शोभा बढ़ाये ॥ १० ॥
ऊर्ध्वं सप्तैव लोकाश्च सप्ताधः परिकल्पयेत् ।
तेषु विप्रा विरक्ताश्च स्थापनीयाः प्रबोध्य वै ॥ ११ ॥
उस मण्डपमें कुछ ऊँचाईपर सात विशाल लोकोंकी कल्पना करे और उनमें विरक्त ब्राह्मणोंको बुला-बुलाकर समझा-बुझाकर बैठाये । इसी प्रकार नीचे भी सात लोकोंकी कल्पना करे (और उनमें साधारण जनताको बिठाये) ॥ ११ ॥
पूर्वं तेषामासनानि कर्तव्यानि यथोत्तरम् ।
वक्तुश्चापि तथा दिव्यमासनं परिकल्पयेत् ॥ १२ ॥
पहले उन विरक्त ब्राह्मणोंके लिये उत्तमोत्तम आसनोंका प्रबन्ध करना चाहिये । फिर वक्ता (वाचक) के लिये भी दिव्य आसनकी व्यवस्था करे ॥ १२ ॥
उदङ्मुखो भवेद् वक्ता श्रोता वै प्राङ्मुखस्तथा ।
प्राङ्मुखोऽथ भवेद् वक्ता श्रोता चोदङ्मुखस्तथा ॥
जब वक्ताका मुँह उत्तरकी ओर रहे, तब श्रोताका मुख पूर्वकी ओर होना चाहिये और यदि वक्ताका मुख पूर्वकी ओर हो तब श्रोताको उत्तराभिमुख होकर बैठना चाहिये ॥ १३ ॥
विरक्तो वैष्णवो विप्रो वेदशास्त्रविशारदः ।
दृष्टान्तकुशलो धीरो वक्ता कार्यों दयान्वितः ॥ १४ ॥
जो विरक्त, विष्णुभक्त, वेदशास्त्रविशारद, जातिका ब्राह्मण, भाँति-भाँतिके दृष्टान्त देकर ग्रन्थके भावको हृदयङ्गम करानेमें कुशल, धीर और दयालु हो, ऐसे पुरुषको ही वक्ता बनाना चाहिये ॥ १४ ॥
वेदवेदान्ततत्त्वज्ञैर्गुरुभिर्ब्रह्मवादिभिः ।
नृणां कृतोपदेशानां सद्यः सिद्धिर्हि जायते ॥ १५ ॥
जिन मनुष्योंको वेद-वेदान्तके तत्त्वज्ञ, ब्रह्मवादी गुरुओंसे उपदेश प्राप्त होता है, उन्हें तत्काल सिद्धि सुलभ होती है ॥ १५ ॥
अथान्यजनसामान्यैर्गुरुभिर्नीतिकोविदैः ।
नृणां कृतोपदेशानां सिद्धिर्भवति कीदृशी ॥ १६ ॥
जो गुरु अन्य सामान्य लोगोंके समान ही नीतिकुशल हैं, उनसे जिन मनुष्योंको उपदेश प्राप्त होता है; उनको कैसी सिद्धि मिलेगी ? ॥ १६ ॥


अनेकधर्मविभ्रान्ताः स्त्रैणाः पाखण्डवादिनः ।
धर्मशास्त्रकथोद्वारेत्याज्यास्ते यदि पण्डिताः ॥ १७ ॥
जो अनेक मत मतान्तरोंके चक्करमें पड़कर भ्रान्त हो रहे हों, स्त्रीलम्पट हों और पाखण्डकी बातें करते हों, ऐसे लोग यदि पण्डित भी हों तो उन्हें धर्ममय शास्त्र-इतिहास-पुराणकी कथा कहनेके लिये वक्ता न बनावे, उन्हें ऐसे कार्यसे दूर ही रखे ॥ १७ ॥
वक्तुः पार्श्वे सहायार्थमन्यः स्थाप्यस्तथाविधः ।
पण्डितः संशयच्छेत्ता लोकबोधनतत्परः ॥ १८ ॥
वक्ताके पास उसकी सहायताके लिये उसी योग्यताका एक और विद्वान् रखे । वह भी संशय-निवारण करनेमें समर्थ और लोगोंको समझानेमें कुशल होना चाहिये ॥ १८ ॥
वक्त्रा क्षौरं प्रकर्तव्यं दिनादर्वाग् व्रताप्तये ।
वक्तुः श्रोतुश्चन्द्रशुद्धौ दम्पत्योः शुभतारके ॥ १९ ॥
वक्ताको उचित है कि वह कथा आरम्भ होनेसे एक दिन पहले क्षौर करा ले, जिससे व्रतका पूर्णतया निर्वाह हो सके । जब वक्ता और श्रोता दोनोंके चन्द्रबल ठीक हों और सुननेवाले दम्पतिके ग्रह एवं ताराबल भी अनुकूल हों, तब कथा आरम्भ करनी चाहिये ॥ १९ ॥
अरुणोदये विनिर्वर्त्य शौचं स्नानं समाचरेत् ।
नित्यं संक्षेपतः कृत्वा संध्याद्यं प्रयतस्ततः ॥ २० ॥
सुक्षालितपाणिपादः स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ।
गोमयोपलिप्तदेशे सर्वतोभद्रकल्पनम् ॥ २१ ॥
स्वीयशक्त्यनुसारेण पूजनं सर्वमाचरेत् ।
कथाविघ्नविनाशाय गणनाथं प्रपूजयेत् ॥ २२ ॥
श्रोता अरुणोदयकालमे—दिन निकलनेसे दो घड़ी पहले शौच आदिसे निवृत्त होकर विधिपूर्वक स्नान करे । प्रतिदिन मनको संयममें रखकर संक्षेपसे संध्या-वन्दन आदि करके हाथ-पैरोंको अच्छी तरह धोकर पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन करावे । फिर गोबरसे लिपे-पुते स्थानपर सर्वतोभद्रमण्डलकी रचना करे और अपने शक्तिके अनुसार सम्पूर्ण पूजन कर्म सम्पन्न करे । कथाके विघ्नोंका निवारण करनेके लिये श्रीगणेशजीकी पूजा करे ॥ २०—२२ ॥
सलक्ष्मीपुत्रसहितं गोपालं स्थापयेत् ततः ।
निर्विघ्नेनैव सिद्ध्यर्थं देवपूजनपूर्वकम् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् लक्ष्मी (रुक्मिणी) तथा (प्रद्युम्न आदि) पुत्रोंसहित गोपालक भगवान् श्रीकृष्णकी स्थापना करे । कथाकी निर्विघ्नतापूर्वक सिद्धिके लिये ही देवपूजनपूर्वक पत्नी और पुत्रसहित भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे ॥ २३ ॥
संकल्पं कुर्यात्—
इसके बाद निम्नाङ्कितरूपसे संकल्प करना चाहिये—

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