भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1138

द्वितीयोऽध्यायः । ११११


गोव्रतं नियतं कार्यं निराहारं निरूदकम् ॥ २७ ॥
सूर्यास्तकालपर्यन्तं यावद्गोमागमौ भवेत्।
इसका आरम्भ करके अन्ततोगत्वा एक मासतक इस शुभ व्रतका अनुष्ठान करना उचित है। स्त्रीको चाहिये कि वह मनमें अत्यन्त प्रसन्न हो चतुर्थी तिथिको प्रातःकाल उठकर नियमपूर्वक गोव्रत आरम्भ करे। प्रातःकालसे सूर्यास्ततक जबतक चरनेको गयी हुई गौएँ गाँवमें लौट न आयें, तबतक अन्न और जल ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २६—२७ १/२ ॥

आगतां च सवत्सां हि पूजयित्वा यथाविधि ॥ २८ ॥
यवसं पुष्कलं दत्त्वा यवान्नं कुरुते स्वयम्।
जब गौ द्वारपर आ जाय, तब बछड़ेसहित उसकी विधिवत् पूजा करके उसे प्रचुरमात्रामें घास-भूसा देकर स्वयं भी यवान्न ग्रहण करे ॥ २८ १/२ ॥

एवं मासे चतुर्थ्यां सा शुक्लायां व्रतमाचरेत् ॥ २९ ॥
स्त्रीव्रतं कथितं राजन् पुरुषस्य तथैव च।
एवं मासवतं कृत्वा सुपुत्रं लभते ध्रुवम् ॥ ३० ॥
इस प्रकार किसी भी मासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीको नारी यह व्रत आरम्भ करे और उसे एक मासतक निभाये। राजन् ! इस तरह यह स्त्री और पुरुषके लिये व्रत बताया गया है। इसका इसी प्रकार एक मासतक आचरण करके मनुष्य निश्चय ही उत्तम पुत्र प्राप्त कर लेता है ॥ २९-३० ॥

इति श्रीपद्मपुराणे हरिवंशमाहात्म्ये श्रवणादिविधिकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीपद्मपुराणके अन्तर्गत हरिवंशमाहात्म्यमें श्रवण आदिकी विधिका वर्णनविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥


द्वितीयोऽध्यायः

( १ ) हरिवंशश्रवणकी विधि और फल

वैशम्पायन उवाच
अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि नवाहश्रवणे विधिम् ।
सहायैर्बहुभिश्चैव प्रायः साध्यो विधिस्त्वयम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन् ! अब मैं तुम्हें हरिवंशके नवाह-श्रवणकी विधि बताऊँगा। यह विधि प्रायः बहुत-से सहायकोंकी सहायतासे ही सिद्ध होनेवाली है ॥ १ ॥

दैवज्ञं तु समाहूय मुहूर्तं पृच्छद्य यत्नतः।
विवाहे यादृशं वित्तं तादृशं परिकल्प्य च ॥ २ ॥
पहले यत्नपूर्वक ज्योतिषीको बुलाकर मुहूर्त पूछना चाहिये तथा विवाहके लिये जितने धनका प्रबन्ध किया जाता है, उतने धनकी व्यवस्था इसके लिये करनी चाहिये ॥ २ ॥

नभस्यश्चाश्विनोजौं च मार्गशीर्षः शुचिर्नभः ।
एते मासाः कथारम्भे श्रोतॄणां कामसूचकाः ॥ ३ ॥
भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, आषाढ़ और श्रावण—ये छः मास कथा आरम्भ करनेमें श्रोताओंके लिये अभीष्ट सिद्धिके सूचक हैं ॥ ३ ॥

सहायाश्च त एवात्र कर्तव्याः सोद्यमाश्च ये।
देशे देशे तथा सेयं वार्ता प्रोच्या प्रयत्नतः ॥ ४ ॥
भविष्यति कथा चात्र आगन्तव्यं कुटुम्बिभिः ।
इस कार्यमें उन्हीं लोगोंको सहायक बनाना चाहिये, जो उद्योगी हों। फिर प्रयत्न करके देश-देशान्तरों (विभिन्न स्थानों) मे यह संदेश कहला देना चाहिये कि यहाँ कथा होगी, अतः आप सब स्वजनोंको सपरिवार पधारना चाहिये ॥ ४ १/२ ॥

देशे देशे विरक्ता ये वैष्णवाः कीर्तनोत्सुकाः ॥ ५ ॥
तेष्वेव पत्रं प्रेष्यं च तल्लेखनमितीरितम्।
सतां समाजो भविता नवरात्रं सुदुर्लभः ॥ ६ ॥
भिन्न-भिन्न स्थानोंमें हरिकीर्तनके लिये उत्सुक रहनेवाले जो विरक्त वैष्णव हों, उनके पास अवश्य निमन्त्रण-पत्र भेजना चाहिये। उस पत्रके लेखनकी विधि इस प्रकार बतायी गयी है—‘महानुभावो ! यहाँ नौ दिनोंतक सत्पुरुषोंका समागम—सत्संगका सुअवसर रहेगा, जो सबके लिये परम दुर्लभ है (अतः आपलोग हरिवंश-कथामृतका पान करनेके लिये अवश्य पधारनेकी कृपा करें)' ॥ ५-६ ॥

आगन्तुकानां सर्वेषां वासस्थानानि कल्पयेत् ।
तीर्थे वापि वने वापि गृहे वा श्रवणं स्मृतम् ॥ ७ ॥
जो लोग आवे, उन सबके रहनेके लिये स्थानका यथोचित प्रबन्ध करे। कथाका श्रवण किसी तीर्थमें, वनमें अथवा अपने घरपर भी अच्छा माना गया है ॥ ७ ॥

विशाला वसुधा यत्र कर्तव्यं तत् कथास्थलम्।
शोधनं मार्जनं भूमेर्लेपनं धातुमण्डनम् ॥ ८ ॥
जहाँ लंबा-चौड़ा मैदान हो, वहीं कथा-स्थल बनाना चाहिये। उस भूमिका शोधन, मार्जन और लेपन करके रंग-बिरंगी धातुओंसे वहाँ चौक पूरे ॥ ८ ॥

गृहोपस्करमुद्धृत्य गृहकोणे निवेशयेत् ।
कर्तव्यो मण्डपः प्रोच्चैः कदलीस्तम्भमण्डितः ॥ ९ ॥