विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१११० श्रीहरिवंशमाहात्म्ये
गुरुचन्द्राग्निसूर्याणां सम्मुखे मेहते च यः।
बीजमुत्सृज्यते तेन त्यक्तरेता नरो भवेत् ॥ १३ ॥
जो गुरु, चन्द्रमा, अग्नि और सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करता है अथवा वीर्य छोड़ता है, वह पुरुष जन्मान्तरमें वीर्यहीन (नपुंसक) हो जाता है ॥ १३ ॥
योषित्पुष्पफलानां च बालानां घातिनी तथा।
फलानां कर्तनकरी मातापितृवियोगिनी ॥ १४ ॥
स्राविणी परगर्भाणां तत् तत् प्रायोपजोषिणी।
ईदृग्विधा भविष्यन्ति पञ्चदोषयुताः स्त्रियः ॥ १५ ॥
अपुष्पा मृतवत्साश्च काकवन्ध्यास्तथैव च।
कन्याप्रजात्वं च तथा स्रावयुक्ताः स्वपातकैः ॥ १६ ॥
जो स्त्री फूलों और फलोंका नाश तथा बालकोंकी हत्या करनेवाली होती है, जो फलोंको काटती तथा बालकोंका माता-पितासे वियोग करा देती है, जो दूसरी स्त्रियोंके गर्भ गिरानेवाली और प्रायः ऐसी ही स्त्रियोंके सम्पर्कमें रहनेवाली है, इस तरहकी सारी स्त्रियाँ अपने पापोंके कारण पाँच प्रकारके दोषोंसे युक्त होती हैं—अपुष्पा (रजोधर्शनसे रहित), मृतवत्सा (जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हों ऐसी), काकवन्ध्या (जिसके एक ही संतान होकर रह जाय, दूसरी संतति न हो वह), कन्याप्रजा (केवल कन्या पैदा करनेवाली) तथा स्रावयुक्ता (जिसका गर्भ ही गिर जाता हो, ऐसी) ॥
तासां दोषापहारार्थं हरिवंशोऽभिगर्जति।
मदीयश्रवणात् सद्यो दोषा नश्यन्ति सत्वरम् ॥ १७ ॥
उन सभी स्त्रियोंके दोषोंका निवारण करनेके लिये हरिवंश गर्जता रहता है। वह कहता है, मेरा श्रवण करनेसे सारे दोष तत्काल नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥
नरः सुवर्णं सर्पिंश्च पददानैः समन्वितम्।
दशावृत्तीः शृणोत्येवं बीजसाफल्यमाप्नुयात् ॥ १८ ॥
जो मनुष्य सुवर्णदान, घृतदान और पददानके साथ हरिवंशको दस बार सुनता है, उसका वीर्य सफल होता है ॥ १८ ॥
दशावृत्तीरपुष्पार्थं मृतवत्सा तु सप्त वै।
पञ्चावृत्तीः स्रवद्गर्भा काकवन्ध्या त्रयं तथा ॥ १९ ॥
अपुष्पा—रजोधर्शनसे रहित नारीके लिये दस आवृत्ति हरिवंश सुननेका विधान है। जिसके बच्चे पैदा होकर मर जाते हों, वह सात बार हरिवंश सुने। जिसके गर्भ गिर जाते हों, वह पाँच बार और जो काकवन्ध्या हो, वह तीन बार हरिवंशकी कथा सुने ॥ १९ ॥
कन्याप्रसूश्चैकावृत्तिं श्रुत्वा पुत्रमवाप्नुयात्।
जीवितावधिकं श्राव्यं सर्वदोषोपशान्तये ॥ २० ॥
भविष्यं जन्म सम्प्राप्य न भवेत् तादृशी पुनः।
केवल कन्या पैदा करनेवाली स्त्री एक ही आवृत्ति हरिवंशकी कथा सुनकर पुत्र प्राप्त कर सकती है। सम्पूर्ण दोषोंकी शान्तिके लिये जीवनभर हरिवंश सुनते रहना चाहिये, जिससे भावी जन्म पाकर वह फिर उन दोषोंसे युक्त न हो ॥ २०½ ॥
उत्तमं सार्थपाठं च मध्यमं च निरर्थकम् ॥ २१ ॥
हरिवंशका पाठ उत्तम और मध्यमके भेदसे दो प्रकारका होता है। यदि अर्थसहित इसका पाठ या श्रवण किया जाय तो वह उत्तम है। बिना अर्थका पाठ मध्यम श्रेणीका माना गया है ॥ २१ ॥
विनार्थं शुद्धपाठश्चेदूत्तमेन समो भवेत्।
नवाहमुत्तमं प्रोक्तमेकविंशाहं मध्यमम् ॥ २२ ॥
निकृष्टमेकत्रिंशाहं सुखसाध्यं समाचरेत्।
बिना अर्थके भी यदि शुद्ध पाठ हो तो वह उत्तमके ही समान होता है। (दिनोंकी संख्याके भेदसे इसके पाठकी उत्तम, मध्यम और अधम तीन श्रेणियाँ हैं—) नौ दिनोंमें इसका पाठ हो तो वह उत्तम कहा गया है, इक्कीस दिनोंमें हो तो मध्यम माना गया है और इकतीस दिनोंमें हो तो उसे निकृष्ट श्रेणीका पाठ बताया गया है। जो भी सुगमतापूर्वक साध्य हो, वही पाठ करना चाहिये ॥ २२½ ॥
बहुभिर्दिवसै राजन् साध्यानां साधनं कलौ ॥ २३ ॥
तेन पारायणं साध्यं प्रोक्तं नारायणात्मना।
राजन् ! कलियुगमें बहुत दिनोंके प्रयत्नसे साध्य फलोंकी सिद्धि होती है, अतः नारायणस्वरूप व्यासजीने हरिवंशका यह पारायण साध्यरूप बताया है ॥ २३½ ॥
नवाहो गर्जति कलौ चैकविंशाधिकस्तथा ॥ २४ ॥
एकत्रिंशाहिको यज्ञो वन्ध्यादोषविनाशकः।
कलियुगमें नवाहपारायण और इक्कीस दिनोंका पारायण श्रोताके अभीष्टकी सिद्धि करनेके लिये गर्जना करता है। इकतीस दिनोंमें पूर्ण होनेवाला हरिवंशपारायण-यज्ञ नारीके वन्ध्यात्व दोषका नाश करनेवाला है ॥ २४½ ॥
गोव्रतं तु स्त्रिया कार्यं पारणं पुरुषेण च ॥ २५ ॥
श्रवणारम्भणे राजन् यथावत् कथयामि ते।
राजन् ! हरिवंश-कथा श्रवण आरम्भ करना हो तो पहले स्त्री और पुरुषको भी गोव्रत करना चाहिये, फिर व्रतके अन्तमें उसका पारण भी स्त्री और पुरुष दोनोंको करना चाहिये। इसकी विधि मैं तुम्हें यथावत्रूपसे बता रहा हूँ ॥ २५½ ॥
अवसायान्तपर्यन्तं कार्यं मासमतं शुभम् ॥ २६ ॥
चतुर्थ्यां प्रातरुत्थाय स्त्रिया हृष्टेन चेतसा।