भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1136, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1136

श्रीपरमात्मने नमः

श्रीहरिवंशमाहात्म्यम्


प्रथमोऽध्यायः

हरिवंश-श्रवणका माहात्म्य, नारीके पाँच दोष और हरिवंशश्रवणसे उनकी निवृत्ति, पाठके उत्तम, मध्यम आदि भेद तथा गोत्रतकी विधि

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (इतिहास-पुराण एवं महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥

जयति पराशरस्नुः सत्यवतीहृदयनन्दनोव्यासः।
यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत् पिवति ॥ २ ॥
सत्यवतीके हृदयको आनन्दित करनेवाले उन पराशर-पुत्र व्यासजीकी जय हो, जिनके मुखारविन्दसे निकले हुए वाङ्मय अमृतका सारा जगत् पान करता है ॥ २ ॥

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ३ ॥
मैं अज्ञानरूपी तिमिररोग (रतौंधी) से अन्धा हो रहा था, उस दशामें जिन्होंने ज्ञानरूपी अञ्जनकी शलाकासे मेरे बुद्धिरूपी नेत्रको खोल दिया है—उसमें ज्ञानका प्रकाश भर दिया है, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ ३ ॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत् पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ४ ॥
जिससे यह अखण्ड मण्डलाकार चराचर जगत् व्याप्त है, उस परमात्माके पद (स्वरूप) का जिन्होंने साक्षात्कार कराया है, उन श्रीगुरुदेवको नमस्कार है ॥ ४ ॥

जनमेजय उवाच
त्वया मे भगवन् प्रोक्तो भारतश्रवणे विधिः ।
श्रवणे हरिवंशस्य विशेषाद् वद मे विधिम् ॥ ५ ॥
जनमेजय बोले— भगवन् ! आपने मुझे महाभारत-श्रवणकी विधि बतायी है। अब हरिवंश सुननेकी जो विधि है, उसे विशेषरूपसे मुझे बताइये ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मविष्णुमहेशानां हरिवंशं जगुर्बुधः।
शब्दब्रह्ममयं विद्धि हरिवंशं सनातनम् ॥ ६ ॥
शब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! ऋषि-मुनि हरिवंश-को ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीका स्वरूप बताते हैं। तुम यह समझ लो कि हरिवंश सनातन शब्द ब्रह्ममय है। इस शब्दब्रह्ममें निष्णात हुआ पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ ६½ ॥

हरिवंशपुराणे तु श्रुते वै राजसत्तम ॥ ७ ॥
कायिकं वाचिकं पापं मनसा समुपार्जितम् ।
तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ ! हरिवंशपुराण सुन लेनेपर शरीर, वाणी और मनके द्वारा संचित किये हुए सारे पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार ॥ ७-८ ॥

अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं लभेत् ।
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥ ९ ॥
अठारह पुराणोंका श्रवण करनेसे जो फल मिलता है, उसीको वैष्णवभक्त पुरुष केवल हरिवंश सुनकर प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।
जम्बूद्वीपं समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभाः कलौ ॥ १० ॥
भविष्यन्ति नरा राजन् सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।
स्त्रियाँ और पुरुष इसे सुनकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। राजन् ! कलियुगमें जम्बूद्वीपका आश्रय लेकर रहनेवाले लोगोंमें इस ग्रन्थके श्रोता दुर्लभ हो जायेंगे, यह मैं सत्य-सत्य बता रहा हूँ ॥ १०½ ॥

स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥ ११ ॥
बालघाती च पुरुषो मृतवत्सः प्रजायते ।
श्रवणं हरिवंशस्य कर्तव्यं च यथाविधि ॥ १२ ॥
पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान् विष्णुके इस यशका श्रवण करना चाहिये। बालकोंकी हत्या करने-वाले पुरुषके पुत्र हो-होकर मर जाते हैं। ऐसे मनुष्यको विधिपूर्वक हरिवंश सुनना चाहिये ॥ ११-१२ ॥