विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1135, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११०८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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जो श्रद्धापूर्वक हरिवंशके आधे या चौथाई श्लोकको भी सुनते हैं, वे भगवान् विष्णुके धाममें चले जाते हैं ॥ ४ १/२ ॥
जम्बूद्वीपं समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभाः कलौ ॥ ५ ॥
भविष्यन्ति नरा राजन् सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।
स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥ ६ ॥
राजन् ! कलियुगमें जम्बूद्वीपका आश्रय लेकर रहनेवाले लोगोंमें इस ग्रन्थके श्रोता दुर्लभ हो जायेंगे, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ । पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान् विष्णुके सुयशसे भरे हुए इस ग्रन्थका अवश्य श्रवण करना चाहिये ॥ ५-६ ॥
दक्षिणा चात्र देया वै निष्कत्रयसुवर्णकम् ।
वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता ॥ ७ ॥
जो शास्त्रोक्त फलको प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हो, उस श्रोताको चाहिये कि वह अपनी शक्तिके अनुसार वाचकको हरिवंश सुननेकी दक्षिणाके रूपमें तीन निष्क¹ सुवर्ण प्रदान करे ॥ ७ ॥
स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंयुताम् ।
वाचकाय प्रदद्याद् वै आत्मनः श्रेयकाङ्क्षया ॥ ८ ॥
अपने कल्याणकी इच्छासे वह वाचकको वस्त्र और बछड़ेसहित एक कपिला गौ भी दे, जिसके सींगोंमें सोना मढ़ा हुआ हो ॥ ८ ॥
अलंकारं प्रदद्याच्च पाण्योर्वै भरतर्षभ ।
कर्णस्याभरणं दद्याद् यानं च सविशेषतः ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ ! वह दोनों हाथोंके लिये अलंकार (कड़े, बाजूबन्द, अँगूठी आदि) भी दे तथा कानके आभूषण (कुण्डल आदि) भी अर्पित करे; विशेषतः, शिविका आदि कोई सवारी अवश्य दे ॥ ९ ॥
भूमिदानं समादद्याद् ब्राह्मणाय नराधिप ।
भूमिदानसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ १० ॥
नरेश्वर ! उसे ब्राह्मणके लिये भूमिको दान भी देना चाहिये; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न तो हुआ है और न होगा ही ॥ १० ॥
शृणोति श्रावयेद् वापि हरिवंशं तु यो नरः ।
सर्वथा पापनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥ ११ ॥
जो मनुष्य हरिवंशको सुनता और सुनाता है, वह सब प्रकारसे पापमुक्त होकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥
पितॄनुद्धरते सर्वानैकादशसमुद्भवान् ।
आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ॥ १२ ॥
भरतश्रेष्ठ ! वह अपनी ग्यारह पीढ़ीके समस्त पितरोंका उद्धार कर देता है। साथ ही अपना, अपने पुत्रका तथा अपनी पत्नीका भी उद्धार करता है ॥ १२ ॥
दशांशाञ्चात्र होमो वै कार्यः श्रोत्रा नराधिप ।
इदं मया तवाग्रे च सर्वं प्रोक्तं नरर्षभ ॥ १३ ॥
नरेश्वर ! नरश्रेष्ठ ! श्रोताको इस हरिवंश-श्रवणके उपलक्ष्यमें इसकी श्लोकसंख्याका दशांश हवन करना चाहिये। यह सब कुछ मैंने तुम्हारे सामने कह दिया ॥ १३ ॥
यस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
अपुत्रः पुत्रमाप्नोति अधनो धनमाप्नुयात् ॥ १४ ॥
इसके स्मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥
नरमेधाश्वमेधाभ्यां यत् फलं प्राप्यते नरैः।
तत् फलं लभते नूनं पुराणश्रवणाद्धरेः ॥ १५ ॥
नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, उसीको श्रीहरिके इस पुराणका श्रवण करनेसे मनुष्य निश्चय ही प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥
ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः ।
सकृत्पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा ॥ १६ ॥
ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, गोहत्या, सुरापान और गुरुपत्नी-गमन—इन महापातकोंसे युक्त मनुष्य भी इस पुराणको एक बार पूर्वोक्त विधिसे सुन लेनेपर पवित्र हो जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
इदं मया ते परिकीर्तितं मह-
च्छ्रीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् ।
शृण्वन् पठन्नाशु समाप्नुयात् फलं
यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभं महत् ॥ १७ ॥
यह मैंने तुमसे श्रीकृष्णके अपार, अद्भुत एवं महान् माहात्म्यका वर्णन किया है। जो इसे सुनता और पढ़ता है, वह लोकमें जो परम दुर्लभ और महान् फल है, उसे भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि श्रवणफलकथने पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतमें व्यासनिर्मित एक लाख श्लोकोंकी संख्याके अन्तर्गत उसके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रवणफलका वर्णनविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥
॥ हरिवंशपर्व सम्पूर्ण ॥
१. सोलह मासे वजनका एक निष्क होता है। (संस्कृत शब्दार्थकौस्तुभ)