विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1134, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ ११०७
भानोश्च दुहितुर्भानुमत्या हरणकीर्तनम् ॥ २६ ॥
शम्बरस्य वधश्चैव धन्योपाख्यानमेव च ।
वासुदेवस्य माहात्म्यं बाणयुद्धं प्रपञ्चितम् ॥ २७ ॥
इसके बाद षट्पुर-वधकी कथा, अन्धकासुर-संहार, श्रीकृष्णकी समुद्रयात्रा और जलक्रीड़ा-कौतूहल, भीमवंशी वीरोंकी मधुपानमें प्रवृत्ति, श्रीहरिकी इच्छासे छालिक्य गान्धर्वका भूतलपर आनयन, भानुपुत्री भानुमतीके हरणकी कथा, शम्बरासुरका वध, धन्योपाख्यान, वासुदेव-माहात्म्य तथा बाणासुरके युद्ध आदि विषयोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है ॥ २४—२७ ॥
भविष्यं पुष्करं चैव प्रपञ्चेनैव कीर्तितम् ।
वाराहं नारसिंहं च वामनं बहुविस्तरम् ॥ २८ ॥
(तीसरे भविष्यपर्वमें) भविष्य राजवंश एवं भावी कलियुगका वर्णन, फिर पुष्कर-प्रादुर्भावका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् भगवान्के वराह, नृसिंह और वामन अवतारकी कथाका अधिक विस्तृत वर्णन है ॥ २८ ॥
कैलासयात्रा कृष्णस्य पौण्ड्रकस्य वधस्ततः ।
हंसस्य डिम्भकस्यैव वधश्चैव प्रकीर्तितः ॥ २९ ॥
तदनन्तर श्रीकृष्णकी कैलासयात्रा, पौण्ड्रक-वध तथा हंस और डिम्भकके मारे जानेके प्रसंगका वर्णन आया है ॥ २९ ॥
पुरत्रयस्य संहार इति वृत्तान्तसंग्रहः ।
कथितो नृपशार्दूल सर्वपापप्रणाशनः ॥ ३० ॥
नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् महादेवजीके द्वारा त्रिपुरके संहारकी कथा है। इस प्रकार हरिवंशके वृत्तान्तोंका यह संक्षिप्त संग्रह बताया गया है। यह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ३० ॥
वृत्तान्तं शृणुयाद् यस्तु सायं प्रातः समाहितः ।
स याति वैष्णवं धाम लब्धकामः कुरूद्वह ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ३१ ॥
कुरुश्रेष्ठ ! जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल इस वृत्तान्तको सुनता है, वह सफलमनोरथ होकर भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। यह वृत्तान्त धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला तथा भोग और मोक्षरूपी फलको देनेवाला है ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वृत्तान्तसंग्रहे चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वृत्तान्तसंग्रहविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
हरिवंश-श्रवणकी दक्षिणा, फल एवं माहात्म्यका वर्णन
जनमेजय उवाच
हरिवंशे पुराणे तु श्रुते मुनिवरोत्तम ।
किं फलं किं च देयं वै तद् ब्रूहि त्वं ममाग्रतः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुनिवरोत्तम ! अब आप मेरे सामने यह बताइये कि हरिवंश-पुराण सुन लेनेपर क्या फल होता है और उस समय क्या दान देना चाहिये ? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
हरिवंशे पुराणे तु श्रुते च भरतोत्तम ।
कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् ॥ २ ॥
तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ।
वैशम्पायनजीने कहा— भरतवंशशिरोमणे ! हरिवंशपुराण सुन लेनेपर शरीर, वाणी और मनके द्वारा उपार्जित सारे पापोंका उसी प्रकार नाश हो जाता है, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार ॥ २ ॥
अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं भवेत् ॥ ३ ॥
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ।
अठारह पुराणोंके श्रवणसे जो फल प्राप्त होता है, उसे विष्णुभक्त पुरुष केवल हरिवंश सुनकर प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥
श्लोकार्धं श्लोकपादं वा हरिवंशसमुद्भवम् ॥ ४ ॥
शृण्वन्ति श्रद्धया युक्ता वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।