विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1123, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०९६ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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छठी पारणामें इससे दूना अर्थात् चार वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। सातवेंमे तीन गुने अर्थात् बारह वाजपेय यज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है। वह कैलास शिखरके समान उज्ज्वल एवं विशाल वैदूर्यमणिकी वेदीसे विभूषित, अनेक प्रकारके मण्डलाकार मागोंसे युक्त, मणियों और मूँगोंसे अलंकृत, अप्सराओंसे परिपूर्ण तथा इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दूसरे सूर्यके समान सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है॥ ३२-३३ १/२ ॥
अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् ॥ ३४ ॥
चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति ।
चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः ॥ ३५ ॥
आठवीं पारणा पूरी होनेपर उसे राजसूय यज्ञका फल मिलता है। वह चन्द्रोदयके समान रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है। जिसमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल और मनके समान वेगशाली घोड़े जुते होते हैं॥ ३४-३५॥
सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रकान्तरैर्मुखैः।
मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः ॥ ३६ ॥
अङ्के परमनारीणां सुखं सुप्तो विबुध्यते ।
वह देवसुन्दरीयोंके चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंसे, उनकी मेखलाओंकी ध्वनिसे तथा नूपुरोंकी झनकारोंसे सेवित हो दिव्याङ्गनाओंके अङ्कमें सुखपूर्वक सोता और जागता है॥ ३६ १/२ ॥
नवमं क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत ॥ ३७ ॥
काञ्चनस्तम्भनिर्व्यूहं वैदूर्यकृतवेदिकम् ।
जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम् ॥ ३८ ॥
सेवितं चाप्सरःसङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः ।
विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ३९ ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनभूषितः।
मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापरः ॥ ४० ॥
भरतनन्दन ! नवीं पारणा पूर्ण करके श्रोता यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल पाता है। वह सोनेके खंभों और कँगूरोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी वेदीसे अलंकृत, सब ओर बने हुए सुवर्णमय दिव्य गवाक्षोंसे आवृत तथा स्वर्गमें विचरनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंसे सेवित विमानपर बैठकर अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रकाशित होता है तथा दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य चन्दनसे चर्चित हो दूसरे देवताकी भाँति देवलोकमें देवगणोंके साथ आनन्द भोगता है ॥३७–४०॥
दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च।
किङ्किणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम् ॥ ४१ ॥
रत्नवेदिकसंकाशं वैदूर्यमणितोरणम् ।
हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम् ॥ ४२ ॥
गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिर्निषेवितम् ।
विमानं सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते ॥ ४३ ॥
दसवीं पारणा पूरी करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, ऐसा करके श्रोता पुण्यात्माओंके आवासस्थान दिव्य विमानको सुखपूर्वक पा लेता है। उस विमानमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती है। ध्वजा और पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। वह रत्नमयी वेदिकाओंसे प्रकाशित होता है। उसमें वैदूर्यमणि-के फाटक लगे होते हैं। वह सब ओरसे सोनेकी जालीसे घिरा रहता है। उसके छज्जोंका मुखभाग मूँगोंसे अलंकृत होता है तथा गीतकुशल गन्धर्व और अप्सराएँ उस विमानपर सेवाके लिये उपस्थित रहती हैं॥ ४१-४३॥
मुकुटेनाकंस्वर्णेन जाम्बूनदविभूषणः ।
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गो दिव्यमाल्यविभूषितः ॥ ४४ ॥
दिव्याँल्लोकान् प्रचरति दिव्यैर्भोगैः समन्वितः ।
विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युतः ॥ ४५ ॥
वह पुरुष अपने मस्तकपर सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुटसे सुशोभित हो जाम्बूनद (सुवर्ण) के आभूषण धारण करके सारे अङ्गोंमें दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य मालाओं-से विभूषित हो, दिव्य भोगों तथा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न होकर देवताओंके प्रसादसे दिव्य लोकोंमें विचरता है॥
अथ वर्षगणान्वेवं स्वर्गलोके महीयते ।
ततो गन्धर्वसहितः सहस्राण्येकविंशतिः ॥ ४६ ॥
पुरंदरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते ।
इस प्रकार बहुत वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमे प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर गन्धर्वोंके साथ रमणीय पुरन्दरपुरी अमरावतीमें रहकर इक्कीस हजार वर्षोंतक इन्द्रके साथ आनन्द भोगता है॥
दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च ॥ ४७ ॥
दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा ।
इसके बाद नाना प्रकारके पुण्यलोकोंमें दिव्य यानों और विमानोंपर दिव्य नारियोंसे घिरा रहकर वहाँ देवताके समान निवास करता है॥ ४७ १/२ ॥
ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा ॥ ४८ ॥
शिवस्य भवने राजन् विष्णोर्याति सलोकताम् ।
राजन् ! तत्पश्चात् वह क्रमशः सूर्यभवनमें, चन्द्रलोकमें तथा भगवान् शिवके धाममे निवास करके अन्तमे भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त कर लेता है॥ ४८ १/२ ॥
एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा ॥४९॥
श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।
महाराज ! यह ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमे अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। इसपर श्रद्धा करनी चाहिये। यह मेरे गुरु व्यासजीका कथन है॥ ४९ १/२ ॥
वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद् यदिच्छति ॥ ५० ॥
हस्त्यश्वरथयानादि वाहनं च विशेषतः ।