भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 1122

भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९५


स्वस्थ वाचक स्वाधीन और एकाग्रचित्त हो इस तरह कथा बाँचे कि विलम्बसे या रुक-रुककर शब्द न निकले (धारावाहिकरूपसे कथा चलती रहे), कठोर अक्षरका उच्चारण न करे, जल्दबाजी न करे, अस्पष्ट रूपसे शब्दोंका उच्चारण न करे—इस तरह बोले कि कोई अक्षर या पद टूटने न पावे, मनमें कोई विशेष अभिप्राय (लोभ आदि) रखकर कथा न बाँचे । आठ स्थानोंसे उच्चरित होनेवाले तिरसठ वर्णोंसे युक्त महाभारतका इस तरह पाठ करे कि प्रत्येक वर्णका स्पष्टतः विवेक होता रहे ॥ २१-२२ ॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ २३ ॥
वाचक पहले अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (इतिहास, पुराण एवं महाभारत) का पाठ आरम्भ करे ॥ २३ ॥

ईदृशाद् वाचकाद् राजञ्छ्रुत्वा भारत भारतम् ।
नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन् स फलमश्नुते ॥ २४ ॥
राजन्! भरतनन्दन! जो श्रोता शौच, संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर एवं पवित्र रहकर ऐसे वाचकसे महाभारत सुनता है, वह उसके पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥

पारणां प्रथमां प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयेत् ।
अग्निष्टोमस्य यागस्य फलं वै लभते नरः ॥ २५ ॥
प्रथम बार नियमपूर्वक हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण पूरा करके ब्राह्मणोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंसे तृप्त करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य अग्निष्टोम यागका फल पाता है ॥ २५ ॥

अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत् ।
प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः ॥ २६ ॥
उसे अप्सराओंसे भरा हुआ महान् विमान प्राप्त होता है और वह हर्षसे उत्फुल्ल एवं एकाग्रचित्त होकर देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २६ ॥

द्वितीयां पारणां प्राप्य अतिरात्रफलं लभेत् ।
सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥ २७ ॥
दूसरी बार हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण कर लेनेपर श्रोताको अतिरात्रयज्ञका फल मिलता है तथा वह सम्पूर्ण रत्नोंसे बने हुए दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ २७ ॥

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषितः ।
दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते ॥ २८ ॥
वहाँ वह दिव्य माला और वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे विभूषित हो, दिव्य अङ्गद आदि आभूषण पहनकर सदा देवलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ ॥

तृतीयां पारणां प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् ।
वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि ॥ २९ ॥
तीसरी पारणा पूरी करनेपर उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह देवताओंके समान तेजस्वी रूप धारण करके दस हजार वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है ॥

चतुर्थ्यां वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् ।
उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम् ॥ ३० ॥
विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति ।
वर्षाण्ययुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते ॥ ३१ ॥
चौथी पारणापर वाजपेय यज्ञका और पाँचवींपर उससे दूना फल मिलता है। वह उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर देवताओंके साथ आरूढ़ हो देवलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥ ३०-३१ ॥

षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् ।
कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम् ॥ ३२ ॥
परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् ।
विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम् ॥ ३३ ॥
सर्वलोकान् विचरते द्वितीय इव भास्करः ।


पाद-टिप्पणी:

१. कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्वामूल और हृदय—ये वर्णोंके उच्चारणके आठ स्थान हैं।

२. पाणिनीय शिक्षामें तिरसठ वर्णोंकी गणना इस प्रकार दी गयी है—इकीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, ᳵ क, ᳶ प तथा दुःस्पृष्ट—ये सब मिलाकर तिरसठ वर्ण हैं। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है—‘अ इ उ ऋ’ ये चार स्वर ह्रस्व, दीर्घ और प्लुतके भेदसे तीन-तीन तरहके माने गये हैं, अतः ये बारह हुए। लृकारका केवल ह्रस्वरूप ही ग्रहण किया गया है—इस प्रकार ये तेरह स्वर हुए। इनके सिवा, ‘ए ओ ऐ औ’ ये दीर्घ और प्लुतके भेदसे दो-दो प्रकारके हैं, अतः आठ हुए। पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ स्वर होते हैं। ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके २५ अक्षर स्पर्श कहलाते हैं। इनको मिलानेसे ४६ अक्षर हुए। ‘य’ से लेकर ‘ह’ तकके आठ अक्षरोंको जोड़ लेनेपर इनकी संख्या ५४ होती है। प्रातिशाख्यके अनुसार चार यम होते हैं। यथा—‘प॒लिक्नी’ ‘च॒ख्नतुः’ ‘अ॒ग्निः’ ‘घ्॒घ्नन्ति’ इन उदाहरणोंमें क् ख् ग् घ्’ से परे जो इन्हींके सदृश वर्ण हैं, इन्हींकी ‘यम’ संज्ञा है। इन चार यमोंको जोड़ लेनेसे अक्षरोंकी संख्या ५८ तक पहुँचती है। इनके सिवा, अनुस्वार (अं), विसर्ग (अः) ᳵ क (जिह्वामूलीय), ᳶ प (उपध्मानीय) तथा दुःस्पृष्टवर्ण (दो स्वरोंके मध्यमें वर्तमान ळकार)—ये पाँच अक्षर और हैं। इन सबका योग तिरसठ होता है। ये ही तिरसठ अक्षर हैं।