विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1119, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०९२ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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घटाः किं बहवो मातरभिन्नाः सर्वतो व्रजे ।
किं गावः क्षीरमतुलं स्रवन्त्यहरहः पितः ॥ १० ॥
'मैया ! क्या ब्रजमें सब ओर बिना फूटे हुए बहुत-से घड़े हैं ? बाबा ! क्या गौएँ प्रतिदिन अतुलनीय दुग्ध प्रदान करती हैं ? ॥ १० ॥
हैयङ्गवीनं क्षीराणि दधि वा किमजीजनन् ।
गोधनं सर्वमेवेदं नीरोगं प्रतिपद्यते ॥ ११ ॥
'क्या अपनी गौओंने दूध-दही और मक्खनकी उपज बढ़ायी है ? अपना सारा गोधन नीरोग तो है न ?' ॥ ११ ॥
नन्द उवाच
सर्वमेतद् यदुश्रेष्ठ नीरोगं बहुशः प्रभो ।
कुशलं गोधनस्यैव सर्वकालेषु केशव ॥ १२ ॥
नन्द बोले--'प्रभो ! यदुश्रेष्ठ ! अपना यह सारा गोधन प्रायः नीरोग ही है । केशव ! गोधन तो सदा ही सकुशल है ॥ १२ ॥
रक्षणात् तव देवेश सदा कुशलिनो वयम् ।
सगोधनाः सवत्साश्च नीरोगा इव केशव ॥ १३ ॥
देवेश्वर ! तुम्हारे संरक्षणसे हमलोग सदा कुशलपूर्वक रहते हैं । केशव ! हम गोधन और बछड़ोंसहित नीरोग-से ही हैं ॥ १३ ॥
एकमेव सदा दुःखं न त्वां द्रक्ष्यामि केशव ।
यदेतत् केवलं दुःखमिति धीः शीर्यते सदा ॥ १४ ॥
श्रीकृष्ण ! मुझे तो सदा एक ही दुःख बना रहता है कि मैं तुम्हें भर आँख देख नहीं पाता हूँ । यह जो एक ही दुःख है, इससे सदा मेरा अन्तःकरण व्यथित रहता है ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमादि विलप्यन्तं गच्छेत्याह स केशवः ।
यशोदां पुनराहेदं मातर्गच्छ गृहं प्रति ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! इस तरह विलाप करते हुए नन्दसे भगवान् श्रीकृष्णने कहा--'बाबा ! रोओ मत ! अपने घरको जाओ।' फिर उन्होंने यशोदासे कहा--'मैया ! तुम भी घर जाओ ॥ १५ ॥
ये च त्वां कीर्तयिष्यन्ति ते च स्वर्गमवाप्नुयुः ।
ये केचित् त्वां नमस्यन्ति ते मे प्रियतराः सदा ॥ १६ ॥
मद्भक्ताः सर्वदा सन्तु गच्छेत्याह च तां हरिः ।
'जो लोग तुम्हारा कीर्तन करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायेंगे तथा जो कोई तुम्हे नमस्कार करेंगे, वे सदा-सर्वदा मेरे परम प्रिय भक्त होंगे।' ऐसा कहकर श्रीहरिने मैयासे कहा--'तुम जाओ' ॥ १६ १/२ ॥
इत्युक्त्वा पितरौ देवो वासुदेवः सनातनः ॥ १७ ॥
गाढमालिङ्ग्य तौ प्रीतौ प्रेषयामास केशवः ।
यशोदा नन्दगोपश्च जग्मतुः स्वगृहं प्रति ॥ १८ ॥
माता-पितासे ऐसा कहकर सनातन भगवान् वासुदेवने प्रसन्नतापूर्वक उनके गलेसे लगकर उन्हें विदा किया। तत्पश्चात् यशोदा और नन्दगोप अपने घरको लौट गये ॥ १७-१८ ॥
ततः कृष्णो हृषीकेशो यादवैः सह वृष्णिभिः ।
गन्तुमैच्छत् तदा विष्णुः पुरीं द्वारवतीं किल ॥ १९ ॥
तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक विष्णुरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवों तथा वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीको लौट जानेकी इच्छा की ॥ १९ ॥
य एतच्छृणुयान्नित्यं पठेद् वापि समाहितः ।
पुत्रवान् धनवांश्चैव अन्ते मोक्षं च गच्छति ॥ २० ॥
जो एकाग्रचित्त हो सदा इस प्रसंगको सुनता अथवा पढ़ता है, वह इस लोकमें पुत्रवान् और धनवान् होता है तथा अन्तमे मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि यशोदानन्दगोपबलभद्रकृष्णसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें यशोदा, नन्दगोप, बलभद्र और श्रीकृष्णका समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥
एकत्रिशदधिकशततमोऽध्यायः
द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन
| वैशम्पायन उवाच<br>गच्छन्नथ महाविष्णुः पुष्करं प्राप्य यादवैः ।<br>अपश्यन्मुनिमुख्यांस्तु पुष्करस्थान् नृपोत्तम ॥ १ ॥<br><br>वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! वहाँसे जाते हुए महाविष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंके साथ पुष्करमें पहुँचकर वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ मुनियोंका दर्शन किया ॥ १ ॥ | ते समेत्य महादेवमुपयो वीतमत्सराः ।<br>अर्घ्यादिसमुदाचारं कृत्वैनं यादवोत्तमम् ॥ २ ॥<br>प्रोचुर्विश्वेश्वरं विष्णुं भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।<br><br>उन मात्सर्यरहित ऋषियोंने इन यदुकुलतिलक महान् देव श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें अर्घ्य आदि निवेदन करनेके पश्चात् भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी जगदीश्वर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा--॥ २ १/२ ॥ |