विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1118, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः १०९१
डिम्भकने यमुनाजीके महान् कुण्डमें अपने शरीरको त्याग देनेका विचार किया ॥ १०१/२ ॥
निमज्ज्योन्मज्ज्य सहसा मरणे कृतनिश्चयः ॥ ११ ॥
हस्तेन जिह्वामाकृष्य भूयो भूयो विलप्य च ।
ततः समूलामाकृष्य जिह्वां साहसकृत् स्वयम् ॥ १२ ॥
ममारान्तर्जले राजन् डिम्भको नरकाय वै ।
सहसा गोता लगाकर वह जलसे ऊपरको उठा और मरनेका निश्चय करके बारंबार विलाप करनेके पश्चात् स्वयं दुःसाहस करनेवाला वह डिम्भक हाथसे जिह्वाको जड़सहित बाहर खींचकर जलके भीतर मर गया। राजन्! उसका यह दुर्मरण नरककी प्राप्ति करानेवाला था ॥ ११-१२१/२ ॥
एवं तु निहते हंसे डिम्भके वीर्यशालिनि ॥ १३ ॥
आगमत् पुण्डरीकाक्षो भूतान् विस्मापयन्निव ।
इस प्रकार पराक्रमशाली हंस और डिम्भकके मारे जाने पर कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण भूतोंको विस्मयमें डालते हुए-से लौट आये ॥ १३१/२ ॥
ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ १४ ॥
गोवर्धनेऽथ विश्रम्य वलभद्रसहायवान् ।
कंचित् कालं महाराज पूर्वभुक्तमुवास ह ॥ १५ ॥
महाराज ! इससे प्रीतियुक्त और प्रसन्नचित्त हुए प्रतापी भगवान् वासुदेवने वलभद्रजीके साथ गोवर्धन पर्वतपर विश्राम करके अपने पूर्वभुक्त स्थानपर कुछ कालतक निवास किया ॥ १४-१५ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि डिम्भकमरणे एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें डिम्भकका मरणविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२९ ॥
त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और वलभद्रसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
यशोदा नन्दगोपश्च कृष्णदर्शनलालसौ ।
गोवर्धनगतं श्रुत्वा वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ १ ॥
नवनीतं च दधि च पायसं कृसरं तथा ।
वन्यं पुष्पं महाराज मयूराङ्गमथैव च ॥ २ ॥
वल्लवैरपरैः सार्धं गोपिभिश्च समन्ततः ।
जग्मतुः सहसा प्रीतौ गोवर्धनमथो नृप ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! यशोदा और नन्दगोपके मनमें श्रीकृष्णको देखनेके लिये बड़ी लालसा थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाईके साथ गोवर्धन पर्वतपर आये हैं, तब वे दोनों सहसा बड़े प्रसन्न हुए और मक्खन, दही, खीर, खिचड़ी, जंगली फूल तथा मोरपंखके बाजूबंद लेकर सब ओरसे एकत्र हुए दूसरे गोपों और गोपियोंके साथ गोवर्धन पर्वतपर गये ॥ १-३ ॥
क्वचिद् वृक्षे समासक्तं कृष्णं कृष्णमृगेक्षणम् ।
ददर्शतुरमहाबाहुं वासुदेवं सहाग्रजम् ॥ ४ ॥
वहाँ उन्होंने कृष्णमृगके समान विशाल नेत्रवाले वसुदेव-नन्दन महाबाहु श्रीकृष्णको अपने बड़े भाईके साथ कहीं वृक्षके नीचे उससे सटकर बैठे देखा ॥ ४ ॥
प्रणेमतुः सुसंहृष्टौ तत्र दृष्ट्वा महाबलौ ।
दर्शयामासतुर्देवौ पायसानि महान्ति च ॥ ५ ॥
उन्हें देखकर नन्द और यशोदा बड़े प्रसन्न हुए, फिर उन महाबली देवता श्रीकृष्ण-बलदेवने नन्द और यशोदाको प्रणाम किया। इसके बाद यशोदा और नन्दने खीर आदि महत्त्वपूर्ण उपहार उनके सामने प्रस्तुत किया ॥ ५ ॥
तात मातर्व्रजे गोष्ठे कुशलं वा स्वगोधनम् ।
अपि गावः क्षीरवत्यो वत्सा वत्सतराः पितः ॥ ६ ॥
उस समय श्रीकृष्णने पूछा—चाचा! मैया! व्रजके गोष्ठमें अपने सभी गोधन सकुशल तो हैं न? पिताजी! गौएँ दूध देती हैं न? उनके बड़े-छोटे बछड़े सुखी हैं न ॥ ६ ॥
अपि वा सुशुभं क्षीरमपि गावः सुशोभनाः ।
अपि वा दारका मातर्वत्सपालाः पिबन्ति च ॥ ७ ॥
'क्या व्रजकी गोओंका दूध शुद्ध एवं मङ्गलकारी होता है? क्या अपने यहाँ सुन्दर शोभामयी गौएँ हैं! मैया! छोटे-छोटे बच्चे और बछड़े चरानेवाले बालक भरपूर दूध पीते हैं न ? ॥ ७ ॥
बहूनि चापि दामानि कीलका अपि वा बहु ।
तृणानि बहुरूपाणि किं वा सन्ति पितः सदा ॥ ८ ॥
'तात! क्या अपने यहाँ बहुत-सी रस्सियाँ, बहुतेरे खूँटे तथा अनेक प्रकारकी घासें सदा प्रस्तुत रहती हैं? ॥ ८ ॥
शकटानि सुगन्धीनि किं वा सन्ति पितुर्गृहम् ।
अपि गोप्यः पुत्रवत्यो दारकान् किमजीजनन् ॥ ९ ॥
'पिताजी! क्या छकड़े सदा गोरससे सुगन्धित रहते हैं? क्या गोपियाँ पुत्रवती हुई हैं? क्या उन्होंने बच्चोंको जन्म दिया है ? ॥ ९ ॥