विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1117, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०९० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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अकरोद् राजसूयं च तव पूर्वपितामहः।
यदि जीवेदसौ हंसः को नमस्यति तं क्रतुम् ॥ १० ॥
तदनन्तर जगदीश्वर श्रीकृष्ण पूर्ववत् रथपर आ गये। महाराज ! हंसके मारे जानेपर ही तुम्हारे पूर्वपितामह धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञ किया था। यदि हंस जीवित होता तो कौन उस यज्ञके सामने मस्तक झुकाता ॥ ९-१० ॥
स च सर्वास्त्रविन्नित्यं रुद्राल्लब्धवरः प्रभो।
क्षणादेव महाराज वार्तेयं गामगाहत ॥ ११ ॥
हतो हंसो हतो हंसः कृष्णेन रिपुमर्दिना।
जगुर्गन्धर्वपतयो देवलोके दिवानिशम् ॥ १२ ॥
प्रभो ! वह भगवान् रुद्रसे वर पाकर सदाके लिये सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता हो गया था। महाराज ! क्षणभरमें यह समाचार भूमण्डलमें फैल गया। 'शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णने हंसको मार डाला, हंसको मार डाला'—यह गन्धर्वराजगण देवलोकमें दिन-रात गान करने लगे ॥ ११-१२ ॥
कृष्णेन लोकनाथेन विष्णुना प्रभविष्णुना।
यमुनाया ह्रदे घोरे हंसो निहत इत्यपि ॥ १३ ॥
'सम्पूर्ण जगत्के स्वामी प्रभावशाली विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाके भयंकर ह्रदमें हंसको मार डाला।' इस प्रकार उनके यशका सर्वत्र गान होने लगा ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवधे अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें हंसका वधविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२८ ॥
एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
डिम्भककी आत्महत्या
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा निहतमत्युग्रं भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
बलदेवं परित्यज्य युध्यमानं महारणे ॥ १ ॥
डिम्भको वीर्यसम्पन्नो यमुनामनुजग्मिवान्।
तमन्वधावद् वेगेन बलभद्रो हलायुधः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय ! अपने पराक्रमशाली भाई अत्यन्त उग्र हंसको उस महासमरमें मारा गया सुनकर बलवान् डिम्भक जूझते हुए बलभद्रको वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर गया। उस समय हलधर बलभद्रने बड़े वेगसे उसका पीछा किया ॥ १-२ ॥
हंसो हि यत्र पतितस्तत्रासौ निपपात ह।
यमुनायां महाराज विलोड्य जलसंचयम् ॥ ३ ॥
महाराज ! हंस जहाँ यमुनाजीमें कूदा था, वहीं डिम्भक भी कूद पड़ा। उसने यमुनाकी जलराशिको मथ डाला ॥ ३ ॥
अथ क्रुद्धः स डिम्भको भ्रामयित्वा जलं बहु।
उन्मज्ज्योन्मज्ज्य सहसा निमज्ज्य च पुनः पुनः ॥ ४ ॥
न ददर्श तदा राजन् भ्रातरं वीर्यशालिनम्।
क्रोधमें भरा हुआ डिम्भक उस जलमें चक्कर लगाकर सहसा गोता लगाता और ऊपरको निकल आता था। राजन् ! इस प्रकार बारंबार डुबकी लगानेपर भी उसने अपने पराक्रमशाली भाईको वहाँ नहीं देखा ॥ ४ ॥
उन्मज्ज्याथ महाबाहुर्वासुदेवं विलोक्य च ॥ ५ ॥
उवाच वचनं राजन् डिम्भको वीर्यवत्तमः।
राजन् ! तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु डिम्भक जलसे ऊपर आकर वासुदेव श्रीकृष्णको सामने देख उनसे इस प्रकार बोला—॥ ५½ ॥
अरे गोपप्रदायाद क्वासौ हंस इति स्थितः ॥ ६ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा यमुनां पृच्छ राजक।
'अरे गोपपुत्र ! वह हंस कहाँ है ?' धर्मात्मा वासुदेवने भी उत्तर दिया—'नीच नरेश ! यमुनाजीसे पूछ' ॥ ६½ ॥
इत्यब्रवीत् प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान् ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा यमुनां भूयः प्रविश्य डिम्भकः किल।
बहुप्रकारमुद्वीक्ष्य भ्रातरं भ्रातृवत्सलः ॥ ८ ॥
विललाप ततो राजा डिम्भको भ्रान्तमानसः।
प्रतापी वासुदेवने जब प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार कहा, तब भ्रातृवत्सल डिम्भकने उनकी बात सुनकर पुनः यमुनामें प्रवेश किया और नाना प्रकारसे अपने भाईकी खोज करके भ्रान्तचित्त हुआ वह राजा विलाप करने लगा ॥ ७-८½ ॥
क्व नु गच्छसि राजेन्द्र विहायैनमबान्धवम् ॥ ९ ॥
कुतो भ्रातरितो गच्छेः परित्यज्यैव मामिह।
'राजेन्द्र ! इस बन्धुहीन डिम्भकको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? भैया ! मुझे यहीं छोड़कर यहाँसे कहाँ चले जा रहे हो ?' ॥ ९½ ॥
विलप्यैवं नृपश्रेष्ठ डिम्भको भ्रातृवत्सलः ॥ १० ॥
आत्मत्यागे मनः कुर्वन् यमुनाया महाह्रदे।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! इस प्रकार विलाप करके भ्रातृवत्सल