विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1120, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः [ १०९३
अत्यद्भुतमिदं विष्णो तव वीर्यं जनार्दन ॥ ३ ॥
येन तौ निहतौ युद्धे हंसो डिम्भक एव च।
'विष्णो ! जनार्दन ! आपका यह बल-पराक्रम अत्यन्त अद्भुत है, जिससे आपने युद्धमें हंस और डिम्भकको मार डाला ॥ ३½ ॥'
यो विचक्रो दुराधर्षो देवैरपि सुदुःसहः ॥ ४ ॥
संगरे निहतो देव दुःसाध्य इति नो मतिः ।
'देव ! जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह था। उस दुर्जय वीर विचक्रको भी आपने युद्धस्थलमें मार डाला ! उसे पराजित करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। ऐसा हमारा विश्वास है ॥ ४½ ॥'
क्षेमो नः सर्वकार्येषु चरतां तप उत्तमम् ॥ ५ ॥
निष्कल्मषा भविष्यामस्त्वत्संस्मरणाद्धरे ।
'अब उत्तम तपका आचरण करनेवाले हमलोगोंके सभी कार्योंमें क्षेम सुलभ हो गया। हरे ! हम आपके स्मरणसे सर्वथा निष्पाप हो जायेंगे ॥ ५½ ॥'
त्वं हि सर्वस्य दुःखस्य हर्तात्वां ध्यायतां सदा॥ ६ ॥
त्वदनुस्मरणं जन्तोः सदा पुण्यप्रदं प्रभो।
'जो सदा आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी दुःखोंको आप हर लेते हैं। प्रभो ! आपका वारंवार चिन्तन प्राणिमात्रके लिये सदा पुण्य-प्रदान करनेवाला है ॥ ६½ ॥'
त्वं हि नः सततं धाता विधाता तपसो हरे ॥ ७ ॥
त्वमोंकारो वषट्कारस्त्वं यज्ञस्त्वं पितामहः ।
'हरे ! आप ही सदा हमारी तपस्याके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही ओंकार हैं। आप ही वषट्कार हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही पितामह हैं ॥ ७½ ॥'
त्वं ज्योतिर्ब्रह्मणो मूर्तिंस्त्वं ब्रह्मा रुद्र एव च ॥ ८ ॥
प्राणस्त्वं सर्वभूतानामन्तरात्मेति कथ्यते।
उपास्यः सर्वभूतानां यज्ञैर्दानैर्जगत्पते ॥ ९ ॥
'आप ही ज्योति हैं। आप ही ब्रह्ममूर्ति हैं। आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके प्राण हैं। आप ही अन्तरात्मा कहलाते हैं। जगत्पते ! यज्ञों और दानोंद्वारा समस्त प्राणियोंके लिये उपासना करने योग्य आप ही हैं ॥ ८-९ ॥'
नमो विश्वसृजे देव नमस्ते विश्वमूर्तये ।
पाहि लोकमिमं देव हत्वा ब्रह्मद्विषः सदा ॥ १० ॥
'देव ! आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपकी मूर्ति है, आपको नमस्कार है। देव ! आप ब्रह्मद्रोहियोंका वध करके सदा इस विश्वका पालन कीजिये' ॥ १० ॥
स तथेति हरिर्विष्णुर्ययौ द्वारवतीं पुरीम् ।
अवसद् वृष्णिभिः सार्धं स्तूयमानः समागधैः ॥ ११ ॥
अथ 'बहुत अच्छा' कहकर श्रीविष्णु हरि द्वारकापुरीको गये और मागधोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वृष्णिवंशियोंके साथ वहाँ निवास करने लगे ॥ ११ ॥
इयं च देवदेवस्य चेष्टा हि जनमेजय ।
प्रोक्ता ते पृच्छते राजन् किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १२ ॥
राजा जनमेजय ! तुम्हारे पूछनेपर मैंने देवाधिदेव श्रीकृष्णकी यह लीला तुम्हें बतायी है। तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ १२ ॥
इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि द्वारकायां कृष्णस्य प्रत्यागमने एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रत्यागमन-विषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य
जनमेजय उवाच
भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः ।
फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्ठिषु ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—भगवन् ! विद्वान् पुरुषोंको महाभारतका श्रवण किस विधिसे करना चाहिये ? इसका फल क्या है ? तथा इसकी समाप्तिपर किन-किन देवताओंका पूजन करना चाहिये ? ॥ १ ॥
देयं समाप्तौ भगवन् किं च पर्वणि पर्वणि ।
वाचकः कीदृशश्चात्र यष्टव्यस्तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥
भगवन् ! प्रत्येक पर्वके समाप्त होनेपर क्या दान देना चाहिये ? तथा इसमे कैसे वाचकका पूजन करना चाहिये ? यह सब मुझे बताइये ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु राजन् विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात् ।
श्रुताद् भवति राजेन्द्र यत् त्वं मामनुपृच्छसि ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन् ! महाभारत सुननेकी इस विधिको सुनिये। राजेन्द्र ! महाभारत श्रवण करनेसे जो फल होता है, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वह भी बताता हूँ, सुनो ॥ ३ ॥