भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 1115
१०८८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

हंसश्च दृष्ट्वा तत्कर्म रोषात्ताम्रायतेक्षणः ॥ २६ ॥
उवाच वचनं हंसः शृण्वतां त्रिदिवौकसाम् ।
श्रीकृष्णका वह कर्म देखकर हंसके बड़े-बड़े नेत्र रोषसे लाल हो गये। उसने समस्त देवताओंके सुनते हुए यह बात कही—॥ २६ १/२ ॥

किमर्थं राजसूयस्य विघ्नं चरसि केशव ॥ २७ ॥
ब्रह्मदत्तो महीपालो यष्टा तस्य महाक्रतोः ।
करं दिश यथायोगं यदि प्राणान् हि रक्षसि ॥ २८ ॥
'केशव ! हमारे राजसूय यज्ञमें क्यों विघ्न डाल रहे हो ? महाराज ब्रह्मदत्त उस महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे। यदि अपने प्राणोंकी रक्षा चाहते हो तो उसमें यथायोग्य कर दो ॥

अथवा त्वं क्षणं तिष्ठ ततो ज्ञात्वा परं बहु ।
ददासि त्वं नन्दपुत्र ततो यष्टा स मे गुरुः ॥ २९ ॥
'अथवा नन्दपुत्र ! तुम क्षणभर मेरे सामने खड़े रहो, फिर मेरी श्रेष्ठताको जानकर स्वयं ही बहुत सा कर प्रदान करोगे; फिर मेरे पिता यज्ञका आरम्भ करेंगे ॥ २९ ॥

ईश्वरोऽहं सदा राज्ञां देवानामिव शूलभृत् ।
एष ते वीर्यमतुलं नाशयिष्यामि संयुगे ॥ ३० ॥
'जैसे देवताओंके ईश्वर शूलधारी महादेव हैं; उसी प्रकार सदा समस्त राजाओंका ईश्वर मैं हूँ। इस युद्धमें मैं तुम्हारे अनुपम बलको अभी नष्ट किये देता हूँ' ॥ ३० ॥

इत्युक्त्वा सशरं चापं शालतालोपमं नृप ।
आकृष्य च यथाप्राणं नाराचेन च केशवम् ॥ ३१ ॥
ललाटे विक्षिपे हंसो ललाम इव सोऽभवत् ।
नरेश्वर ! ऐसा कहकर हंसने शाल और तालके समान विशाल धनुष और बाण ले उसे बलपूर्वक खींचकर उस नाराचके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णके ललाटमें प्रहार किया । वह नाराच उनके लिये मनोहर आभूषण-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३१ १/२ ॥

उवाच सात्यकिं कृष्णो रथं वाहय मे प्रभो ॥ ३२ ॥
दारुकं पृष्ठवाहं तं कृत्वा देशं तमीश्वरः ।
अथ तेन समादिष्टः सात्यकिर्वाहयन् रथम् ॥ ३३ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसे कहा—'प्रभावशाली वीर ! तुम मेरा रथ हाँको।' भगवान्‌ने जब सात्यकिको इस प्रकार आदेश दिया, तब वे दारुकको पीछे करके उस स्थानपर बैठकर उनका रथ हाँकने लगे ॥ ३२-३३ ॥

मण्डलानि बहून्याजौ दर्शयामास सत्वरम् ।
अथ विद्धो दृढं तेन शरेण हरिरीश्वरः ॥ ३४ ॥
आग्नेयमस्त्रं संयोज्य शरे कस्मिंश्चिदव्ययः ।
उवाच हंसं राजेन्द्र सात्यकिं प्रेरयन् रणे ॥ ३५ ॥
राजेन्द्र ! सात्यकिने युद्धस्थलमें शीघ्रतापूर्वक रथके बहुत-से पैंतरे दिखाये। उधर हंसके बाणसे गहरी चोट खाकर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णने किसी बाणपर आग्नेयास्त्रका आधान करके सात्यकिको रणभूमिमें आगे बढ़नेके लिये प्रेरित करते हुए हंससे कहा—॥ ३४-३५ ॥

अनेन त्वां दहे पाप यदि शक्तोऽसि वारय ।
अलं ते बह्वबद्धेन क्षत्रियोऽसि सदा शठ ॥ ३६ ॥
'पापी ! शठ ! मैं इस बाणसे तुझे अभी दग्ध किये देता हूँ, यदि शक्ति हो तो इसे रोक । अब तेरे लिये बहुत-सी असङ्गत बातें बकनेसे कोई लाभ न होगा। तू क्षत्रिय है, सदा अपने कर्तव्यका पालन कर ॥ ३६ ॥

मत्तश्चेत् करमिच्छेस्त्वं दर्शयाद्य पराक्रमम् ।
यतयो बाधिता हंस पुष्करे संस्थितास्त्वया ॥ ३७ ॥
'यदि मुझसे कर लेना चाहता है तो आज दिखा अपना पराक्रम ! हंस ! तूने पुष्करमें रहनेवाले यतियोंको सताया है ॥

शास्ता त्वं खलु विप्राणां स्थिते मयि नराधम ।
स्थिते मयि जगन्नाथे हत्वा क्षत्रियकण्टकान् ॥ ३८ ॥
शास्तास्म्यद्य सतां लोके दुष्टानां ब्रह्मविद्विषाम् ।
'नराधम ! मैं इस सम्पूर्ण जगत्‌का ईश्वर हूँ। तू मेरे रहते ब्राह्मणोंपर शासन करता है। मैं तुझ-जैसे क्षत्रियरूपी कण्टकोंका वध करके सत्पुरुषोंके जगत्‌में ब्रह्मद्रोही दुष्टोंका शासन करनेवाला हूँ ॥ ३८ १/२ ॥

शापेन यतिमुख्यानां हत एव नराधम ॥ ३९॥
मृत्युवे त्वां नियोद्याद्य रक्षिता ब्राह्मणानहम् ।
'नराधम ! तू मुख्य-मुख्य यतियोंके शापसे ही मर चुका है। आज तुझे मृत्युके हवाले करके मैं ब्राह्मणोंकी रक्षा करूँगा' ॥ ३९ १/२ ॥

इति ब्रुवंस्तदस्त्रं तु मुमोच युधि केशवः ॥ ४० ॥
तदस्त्रं वारुणेनाथ हंसोऽपि प्रत्यपेधयत् ।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने युद्धमें हंसपर उस आग्नेयास्त्रको छोड़ दिया; तब हंसने भी वारुणास्त्रसे उस अस्त्रका निवारण कर दिया ॥ ४० १/२ ॥

वायव्यमथ गोविन्दो मुमोच युधि हंसके ॥ ४१ ॥
तदस्त्रं वारयामास माहेन्द्रेण नृपोत्तमः ।
यह देख गोविन्दने रणभूमिमें हंसपर वायव्यास्त्र चलाया, किंतु नृपश्रेष्ठ हंसने माहेन्द्रास्त्रसे उसका वारण कर दिया ॥ ४१ १/२ ॥

अथ माहेश्वरं कृष्णो मुमोचात्युग्रमाहवे ॥ ४२ ॥
रौद्रेण तत् ततो हंसो वारयामास तत्क्षणात् ।
तत्पश्चात् श्रीकृष्णने युद्धस्थलमें अत्यन्त भयंकर माहेश्वरास्त्रका प्रयोग किया, परंतु हंसने रौद्रास्त्रद्वारा तत्काल उसका निवारण कर दिया ॥ ४२ १/२ ॥

गान्धर्वं राक्षसं चैव पैशाचमथ केशवः ॥ ४३ ॥
ब्रह्मास्त्रमथ कौवेरमासुरं याम्यमेव च ।
चत्वार्येतानि हंसस्तु मुमोच युधि सत्वरम् ॥ ४४ ॥
वारणार्थं तदस्त्राणां चतुर्णां माधवस्य ह ।