भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 1109, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1109

१०८२ श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

पुनः शतसहस्रेण प्रत्यविध्यत सात्यकिम् ॥ ५ ॥ तब सात शीघ्रगामी बाणोंसे घायल होकर कुपित हुए नृपश्रेष्ठ डिम्भकने पुनः एक लाख बाणोंसे सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५ ॥

सात्यकिस्त्वथ विक्रान्तो धनुश्चिच्छेद तस्य तत् । अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन डिम्भकस्य स यादवः ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् पराक्रमी यादव वीर सात्यकिने एक तीखे अर्धचन्द्राकार बाणसे डिम्भकके उस धनुषको काट डाला ॥ ६ ॥

आजघ्ने डिम्भको वीरश्चापमादाय चापरम् । क्षुरप्रेणाथ रौद्रेण तैलधौतेन विक्रमी ॥ ७ ॥ तब पराक्रमी वीर डिम्भकने दूसरा धनुष लेकर तेलसे धुले हुए भयंकर क्षुरप्रके द्वारा सात्यकिको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७ ॥

स तेन विद्धो बाणेन वमञ्छोणितकं नृप । अतीव शुशुभे राजन् वसन्ते किंशुको यथा ॥ ८ ॥ राजन् ! उस बाणसे घायल हो रक्त वमन करते हुए सात्यकि वसन्तमें खिले हुए पलाशके समान बड़ी शोभा पाने लगे ॥ ८ ॥

धनुश्चिच्छेद भूयस्तु गृहीतं यत् पुनर्महत् । ततोऽन्यद् धनुरादाय डिम्भको यादवेश्वरम् ॥ ९ ॥ जघान निशितैर्बाणैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । तब उन्होंने पुनः डिम्भकके उस विशाल धनुषको काट डाला, जिसको उसने दुबारा हाथमें लिया था। तदनन्तर डिम्भकने पुनः दूसरा धनुष हाथमें लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते यादवेश्वर सात्यकिको पैने बाणोंसे घायल करना आरम्भ किया ॥ ९ १/२ ॥

स धनुः पुनरत्युग्रं चिच्छेद युधि सात्यकिः ॥ १० ॥ शरेण तीक्ष्णपुङ्खेन डिम्भकस्य दुरात्मनः । सात्यकिने युद्धस्थलमें दुरात्मा डिम्भकके उस अत्यन्त भयंकर धनुषको तीखे पंखवाले बाणसे पुनः काट डाला ॥ १० १/२ ॥

ततोऽन्यद् धनुरादाय सत्वरं स नृपोत्तमः ॥ ११ ॥ धनुषा तेन राजेन्द्र सात्यकिं विव्यधे पुनः । राजेन्द्र ! फिर नृपश्रेष्ठ डिम्भकने तुरंत दूसरा धनुष लेकर उसके द्वारा सात्यकिको पुनः बींधना आरम्भ किया ॥ ११ १/२ ॥

एवं धनूंषि राजेन्द्र शतं पञ्च च पञ्च च ॥ १२ ॥ छित्त्वा ननाद शैनेयः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः । राजाधिराज जनमेजय ! इस प्रकार सात्यकिने सब क्षत्रियोंके देखते-देखते डिम्भकके एक सौ दस धनुष काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १२ १/२ ॥

धनुषी तौ परित्यज्य वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १३ ॥ खड्गौ प्रगृह्य बाल्यग्रौ युद्धाय समुपस्थितौ । तौ हि खड्गविदां श्रेष्ठौ वीरौ डिम्भकसात्यकी ॥ १४ ॥ तब डिम्भक और सात्यकि दोनों वीर अपने धनुषोंको त्यागकर अत्यन्त भयंकर खड्ग हाथमें ले परस्पर युद्धके लिये उपस्थित हुए। वे दोनों वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे ॥ १३-१४ ॥

दौःशासनिर्महाभागः सोमदत्तिस्तथैव च । अभिमन्युश्च विक्रान्तो नकुलश्च तथैव च ॥ १५ ॥ एते खड्गविदां श्रेष्ठाः कीर्तिता युधि सत्समाः । महाभाग दुःशासनकुमार, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, पराक्रमी अभिमन्यु तथा नकुल (और डिम्भक, सात्यकि)—ये युद्धस्थलके छः श्रेष्ठतम वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें उत्कृष्ट माने गये हैं ॥ १५ १/२ ॥

एतेष्वेतो नृपश्रेष्ठौ षट्सु वै नृपसत्तम ॥ १६ ॥ तावेतावासिना युद्धं चक्रतुर्युद्धलालसौ । नृपश्रेष्ठ ! इन छहोंमें भी ये दोनों श्रेष्ठ नरेश सर्वोत्तम कहे गये हैं। वे ही दोनों युद्धकी लालसा लेकर खड्गद्वारा परस्पर जूझने लगे ॥ १६ १/२ ॥

भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धं प्रविद्धं बाहुनिःसृतम् ॥ १७ ॥ आकरं विकरं भिन्नं निर्मर्यादममानुषम् । संकोचितं कुलचितं सव्यजानु विजानु च ॥ १८ ॥ आह्निकं चित्रकं क्षिप्तं कुसुम्यं लम्बनं धुतम् । सर्वबाहु विनिर्बाहु सव्येतरमथोत्तरम् ॥ १९ ॥ त्रिबाहु तुङ्गबाहुञ्च सन्योन्नसमुदासि च । पट्टिकं मौष्टिकं चैव यौधिकं प्रथितं तथा ॥ २० ॥ इति प्रकारान् द्वात्रिंशच्चक्रतुः खड्गयोधिनौ । पुनः पुनः प्रहरन्तौ न च श्रममुपेयतुः ॥ २१ ॥ पुष्करस्थौ महाराज युद्धाय कृतनिश्चयौ । भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, प्रविद्ध, बाहुनिःसृत, आकर, विकर, भिन्न, निर्मर्याद, अमानुष, संकोचित, कुलचित, सव्यजानु, विजानु, आह्निक, चित्रक, क्षिप्त, कुसुम्य, लम्बन, धुत, सर्वबाहु, विनिर्बाहु, दक्षिण, उत्तर, त्रिबाहु, तुङ्गबाहु, सन्योन्नत, उदासि, पट्टिक, मौष्टिक, यौधिक और प्रथित--ये खड्गयुद्धके बत्तीस पैंतरे हैं। खड्गयुद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंने ये सभी पैंतरे वहाँ प्रकट किये। वे बारंवार प्रहार करते हुए भी थकते नहीं थे। महाराज ! पुष्करमें रहकर उन दोनों वीरोंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था ॥ १७--२१ १/२ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ २२ ॥ तुष्टुवुस्तौ महाराज जये कृतपरिश्रमौ । जनमेजय ! तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि विजयके लिये परिश्रम करनेवाले उन दोनों वीरोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे- ॥ २२ १/२ ॥

अहो वीर्यमहो धैर्यमनयोर्बाहुशालिनोः ॥ २३ ॥