विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 1103, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०७६ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
अन्यद्भूतं महारौद्रं त्रैलोक्यभयदायकम् ॥ १४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णपर चढ़ाईके लिये जाते हुए हंस और डिम्भककी विशाल सेना वहाँ सब ओरसे दैत्यसमूहों तथा राक्षसोंसे मिश्रित हो गयी। वह अत्यन्त अद्भुत और महा-भयंकर सेना तीनों लोकोंको भय देनेवाली थी ॥ १३-१४॥
दैत्येन सहितौ तौ हि जग्मतुः पुष्करं प्रति ।
तावेतो हंसडिम्भकौ हन्तुं केशवमञ्जसा ॥ १५ ॥
विचक्र नामक दैत्यके साथ ये दोनों हंस और डिम्भक श्रीकृष्णका अनायास वध करनेके लिये पुष्करतीर्थको गये ॥ १५ ॥
ततः श्रुत्वा जरासंधो विग्रहं यदुभिः सह ।
नाकरोन्नृपसाहाय्यं पापं मे भवितेति ह ॥ १६ ॥
तदनन्तर यादवोंके साथ हंस और डिम्भकके युद्धका समाचार सुनकर जरासंधने उन दोनों नरेशोंकी सहायता नहीं की । उसने सोचा कि ऐसा करनेसे मुझे पाप लगेगा*॥ १६ ॥
गच्छतोः समितिं राजन् हंसस्य डिम्भकस्य च ।
अतित्वरितविक्रान्तास्ते ययुः पुष्करं प्रति ॥ १७ ॥
राजन् ! युद्धमें जाते हुए हंस और डिम्भकके साथ वे शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेशगण भी पुष्करको गये ॥ १७ ॥
सिंहनादं विमुञ्चन्तः कथयन्तः परस्परम् ।
अहमेव नृपा युद्धं करोमि प्रथमं हरेः ॥ १८ ॥
वे सब-के-सब सिंहनाद करते हुए परस्पर कहते थे कि 'राजाओ ! पहले मैं ही श्रीकृष्णके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १८ ॥
इत्यब्रुवन् नृपा राजञ्छतशः केशवं प्रति ।
सम्प्राप्तास्ते नृपश्रेष्ठाः पुष्करं पुण्यवर्धनम् ॥ १९ ॥
राजन् ! इस तरह सैकड़ों नरेशोंने श्रीकृष्णसे युद्ध करनेकी बात कही । इस प्रकार बातचीत करते हुए वे श्रेष्ठ नरेश पुण्यवर्धक पुष्करतीर्थमें जा पहुँचे ॥ १९ ॥
मुनिजुष्टं तपोवृद्धैर्ऋषिभिश्च निषेवितम् ।
अत्यन्तभद्रं लोकेषु पुष्करं प्रथमं नृप ॥ २० ॥
नरेश्वर ! तपस्यामें बढ़े-चढ़े ऋषि-मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। पुष्कर ही वह प्रथम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें अत्यन्त कल्याणकारी बताया गया है ॥ २० ॥
पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव जगतीपते ।
दर्शनात् स्पर्शनाच्चैव किल्विषच्छेदिनौ नृप ॥ २१ ॥
पृथ्वीनाथ ! राजा जनमेजय ! पुष्करतीर्थ और पुण्डरीकाक्ष भगवान् श्रीकृष्ण—ये दो ही ऐसे हैं, जो दर्शन और स्पर्शसे सारे पापोंका उच्छेद करनेवाले हैं ॥ २१ ॥
पुष्करं पुण्डरीकाक्षो द्वावेव नृपसत्तम ।
सेव्यमानौ मुनिश्रेष्ठैरमरैर्धर्महात्मभिः ॥ २२ ॥
नृपश्रेष्ठ ! पुष्कर और पुण्डरीकाक्ष—इन दोका ही श्रेष्ठ मुनि तथा महामनस्वी देववृन्द सेवन करते हैं ॥ २२ ॥
द्वावेव हि नृपश्रेष्ठ सर्वपापप्रणाशकौ ।
तावुभौ यत्र सहितौ तत्र ते संस्थिता नृपाः ॥ २३ ॥
नृपश्रेष्ठ ! वे दो ही सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। वे दोनों जहाँ एक साथ हो गये थे, वहाँ वे सब नरेश उपस्थित हुए ॥ २३ ॥
दृष्टवन्तो हरिं विष्णुं विश्रुतश्रवसं परम् ।
पुष्करं पुण्यनिलयं तीर्थं ब्रह्मनिषेवितम् ॥ २४ ॥
उन सबने वहाँ विस्तृत यशवाले परम पुरुष भगवान् विष्णु हरिका तथा ब्रह्माजीके द्वारा सेवित पुण्य-स्थान पुष्करतीर्थका दर्शन साथ ही किया ॥ २४ ॥
ताभ्यां कुरु नमस्कारं मनसा नृपसत्तम ।
अहो निःशेषमभवत् तत्र भूयो न संशयः ॥ २५ ॥
सैन्यं तत्र च सम्प्राप्तं दैत्यरक्षःसमाकुलम् ।
नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! तुम भी अपने मनसे पुष्करतीर्थ और भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करो। अहो ! वहाँ दैत्यों और राक्षसोंसे भरी हुई जो सेना पहुँची थी, वह सारी-की-सारी फिर नष्ट हो गयी, इसमें संशय नहीं है ॥ २५३/४ ॥
अनेकभेरीपणवझर्झरीडिण्डिमाकुलम् ॥ २६ ॥
नानापणवसम्मिश्रं रक्षोनादविनादितम् ।
वह सेना अनेकानेक भेरी, पणव, झाँझ और नगाड़ोंकी ध्वनिसे व्याप्त थी, नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे मिश्रित राक्षसोंके सिंहनादसे गूँज रही थी ॥ २६३/४ ॥
प्रविश्य सरसस्तीरं पुष्करस्य विशाम्पते ।
दर्शयामास देवेशं युद्धाय समुपस्थितम् ॥ २७ ॥
प्रजानाथ ! उस सेनाने पुष्कर-सरोवरके तटपर पहुँचकर युद्धके लिये उपस्थित हुए देवेश्वर श्रीकृष्णका एक दूसरेको दर्शन कराया ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने युद्धार्थं हंसडिम्भकसैन्यानां पुष्करागमने एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंसडिम्भकोपाख्यानके प्रसङ्गमें युद्धके लिये हंस और डिम्भककी सेनाका पुष्करतीर्थमें आगमनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥
* शास्त्रकी आज्ञा है कि 'परासक्तः परेण न हन्तव्यः' (दूसरेके साथ युद्धमें फँसे हुए पुरुषको दूसरा न मारे), हंसकी सहायतामें जानेसे जरासंधको उक्त शास्त्राज्ञाके उल्लङ्घनजनित दोषकी प्राप्ति होती, इसलिये वह नहीं गया ।